Tuesday, September 14, 2021
कविता शरद कोकास
बच्चों और बचपन की दुनिया में कितनी कौतूहल भरी रहती है , निरा और उदात्त चित्त में कितना कुछ समाया रहता है कि उमंग- पतंग है ,और नर्म व गर्म लिहाफ़ में ढंका वस्तुनिष्ठ उत्साह फिरकी लेता लट्टू । यह मैं नहीं एक शोधार्थी पुरातत्ववेत्ता की कविता कह रही है । नवें दशक के प्रारंभिक दिनो से अपनी काव्य यात्रा में निकल पड़े प्रगतिशील मूल्य बोध के इस जागरूक कवि का रचना संसार निरी जिद्द से प्रमाणिक तथ्यों - दस्तावेजों तक का सफ़र यूं ही तय नहीं करता वह उसकी बानगी भी बनती है ।कवि की कविता में उसका बचपन न केवल शकुंतला पुत्र भरत के जैसे कुलांचे मारते- दिखता बल्कि नादान और चालाक खरगोश के मानिंद संपृक्त भी ।समकालीन हिन्दी कविता में 'लोकगान' की अतिरंजना के बनिस्बत लोक संवेदना तथा लोकमंगल की कविताओं को ज्यादा स्वीकृति तथा सफल मानी गई और शरद की कविताओं में ये सारी खूबियाॅ उनके समाजिक व वैज्ञानिक बोध के साथ उदधृत हुई है । शरद के बचपन और उसके राग को मुद्दत बाद महसूस कर रहा हूं ठीक वैसा-जैसा भूख - रोटी को महसूसता है ।यह शरद का गैर राजनीतिक पक्ष होकर भी एक पक्षधर कवि की सामाजिक पक्षधरता के सन्निकट का प्रस्थान बिंदु बनता है । इस बीच शरद की 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' व 'पुरातत्ववेत्ता' इत्यादि संग्रह हम पाठकों के मध्य आ चुका है । लिहाजा कवि की दृष्टि ज्यादा गंभीर और पैनी बन गई है । अतः कहना न होगा शरद अपने समकालीन - सहयात्रियों में महत्वपूर्ण बन गए हैं ।
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