Tuesday, April 15, 2025

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्पल उज्जैन की कविताओं से रूबरू होइए !!! मेरा आशय यहां से शुरू होता है-- आज समूचा विश्व अपने राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मुद्दों , संबंधों में कहीं न कहीं अधिक उत्पीड़ित और आक्रांत है । एक छद्म से भरे वीर भाव , शौर्य और पराक्रम की मन:स्थिति ने उन पर ऐसा भार लाद दिया है कि वह खच्चर होता जा रहा है । नतीजतन एक शीतयुद्ध सतत् उनके भीतर , बाहर जारी है ।
इतिहास फिर-फिर लौटता है अपने पुराने दिनों में । अच्छे दिनों में , और बुरे दिनों भी । परन्तु वर्तमान और भविष्य की चिंता ने मनुष्य के भीतर एक अलहदा किस्म का नकार भाव पैदा करता आया है । जो युद्ध से उपजे हिंसा , घृणा और नफरतों के नासूर घावों का आंकलन करती है , वह देखती है और पाती है कि तबाही का भयंकर मंजर है ।  दुनिया में अधिकांश युद्ध एक अवैज्ञानिक और अदूरदर्शी सोच की सनक से होती आई है , उसने क्या कुछ तबाह नहीं किया ! इतिहास भी इसकी गवाही देता है । वस्तुत: युद्धोन्माद , सत्ता की चरित्र अब भी बनी हुई है । वह हमेशा अपनी ताकत का विस्तार चरमपंथ के रास्ते करती है । एक चरमपंथी , अति भावुक , उग्र राष्ट्रवाद का ढकोसला एक देश को ऐसे भड़काती है कि देश विवेकहीन हो , राष्ट्रीय गौरव का अंध अनुयायियों में स्वयं को शामिल पाता है । वह अपने पड़ोसी और मित्र मुल्कों को शक के घेरे में ले दुश्मन मान लेने की भूल करता है । इस बीच‌ ऐसे ही चरमपंथियों के हवाले भारत-पाकिस्तान सहित अनेक राष्ट्र हैं । जिनकी भोली-भाली जनता असल और जेनुइन जरुरतों को दरकिनार कर एक बम में बदल रही है । जीवन विहीन स्थितियों में भी जनता के इस पागलपन का बड़ा से बड़ा नमूना पड़ोसी मुल्कों के अलावा खाड़ी के देशों में है । इस ख़तरनाक अंधराष्ट्रवाद के बरक्स पूंजी पर आधिपत्य जमाने का यूरोपीय , अमेरिकी नीति , जो ईंधन पर एकाधिकार जमाने का है ; सर्वथा निंदनीय और दु:साहसिक है । नीलोत्पल उज्जैन की इन कविताओं का  कथ्य बहुत मजबूत है और बिल्कुल  साफ़ है । बजाय युद्ध के शांति की दरकार कितनी जरूरी है ‌। नीलोत्पल की इन कविताओं की यह खूबी है कि वह पाठक से , आम जन समुदाय , अपने लोगों से सीधे संवाद स्थापित करती है । अफीमी चेतना को झकझोरती है । जगाती है । वे युद्ध के संदर्भ में और ज्ञात भय तथा उसके दुष्परिणाम पर कहते हैं

'युद्ध केवल युद्ध नहीं होता
अंत में
अधिक हिंस्र
अधिक अमानवीय बन जाता है'

वस्तुत:यह युद्ध की परिणिति का  सबसे बड़ा सच है । 
एक कवि जब युद्ध बनाम 'शांति' को कविता की केन्द्रिकता में रखता है तो कवि, कविता के सबसे अधिक सापेक्ष होगा और यह तभी ही लिखा जा सकता है । इसलिए इन कविताओं में कवि की उपस्थिति , उसकी सापेक्षता उसके घोषणाओं भी उतना ही सध जाता है जितनी कि भाव संवेग , व शिल्प से सधता है । मसलन

'युद्ध करुणा का अंत है'

नीलोत्पल उज्जैन युद्ध की जटिलता को केवल दो , दस देशों के निहितार्थ बाह्य रूपों को ही नहीं देखते , आंतरिक रुपों संरचनाओं की जटिल प्रक्रियाओं में भी देख रहे होते हैं 

' वे जो लाइनों में लगे हैं
जो 13 रोस्टर का विरोध कर रहे हैं
जिन्हें पिछले कई सालों से चिन्हित नहीं किया गया
वे जो बेमियादी हड़ताल पर ही सद्गति को प्राप्त हुए
वे किसान जो बार बार दिल्ली आकर
शासन के बहरे कानों में
अपना दर्द को सूखते हुए देखते हैं'

 नीलोत्पल उज्जैन की अब तक दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ।पहला संग्रह 'अनाज पकने का समय' जो कि भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित है और दूसरा संग्रह 'पृथ्वी को हमने जड़ें दीं' बोधि प्रकाशन से है ।

           01

युद्ध केवल युद्ध नहीं होता
अंत में
अधिक हिंस्र
अधिक अमानवीय बन जाता है

वह बाज के पंजों में दबी
नन्ही चिड़िया का आर्तनाद है

सरहद से जो लौटा नहीं
उस प्रतीक्षा में पथराई आंखें हैं
जो डूब जाएंगी

मैं इनकार करता हूं
दुनिया के सारे युद्धों से

युद्ध करुणा का अंत है.

            02.

हालांकि
युद्ध चारों तरफ़ है
जो लिख रहे हैं
जो नहीं लिख रहे हैं
वे सब एक युद्ध में है

वे जो लाइनों में लगे हैं
जो 13 रोस्टर का विरोध कर रहे हैं
जिन्हें पिछले कई सालों से चिन्हित नहीं किया गया
वे जो बेमियादी हड़ताल पर ही सद्गति को प्राप्त हुए
वे किसान जो बार बार दिल्ली आकर
शासन के बहरे कानों में
अपना दर्द को सूखते हुए देखते हैं

वे जिन्हें मुआवजा नहीं मिला
अपनी आवाज़ उठाते उठाते
निरूपाय से लगते हैं

सफाई कर्मी, अतिथि शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता
जो सड़कों के हवाले से हुमच रहे हैं

न्याय करने वाले जज
ख़ुद न्याय की शरण में
बाहर सड़कों पर बैठ गए हैं

वे सभी युद्धरत है.

               03.

युद्ध सिर्फ़ उस वक़्त युद्ध नहीं होता
जब लड़ा जाता है

पहले और बाद में
वह भी मारे और पराजित किए जाते हैं
जिन्हें अंत तक कुछ पता नहीं चलता.

                 04

युद्ध दो देशों या अन्य देशों के बीच या खिलाफ़ नहीं होता

थोड़ा वह सीमा के भीतर भी चलता है
ज्यादातर मांओं के साथ होता है

कुछ दोस्त है अलहदा
वे बेचैन चील की तरह
शहर के ऊपर मंडराते हैं

सरहद की गोलाबारी से सहमे परिंदे
लौटते नहीं
उनके जर्जर घोंसले और मृत अंडे
समय का भयावह मंजर है

दिलों को तोड़ना यह भी युद्ध है.

              

                     05

जिन्हें युद्ध चाहिए
अंत में मारे जाते हैं

जिन्हें युद्ध नहीं चाहिए
अंत में वे भी मारे जाते हैं

युद्ध के बाद
कोई उम्मीद नहीं बचती.

            06

 
जंगल की लड़ाई
जंगल में ही समाप्त हो जाती है

हमने लड़ते हुए
कई सरहदें लांघी हैं

यह जानते हुए कि
युद्ध एक क्षरण है
हमारी तमाम उपलब्धियों का
फ़िर भी हमने विसंगतियां बनाए रखी

उन्माद हमारा नया हथियार हैं.

              07

युद्ध के अनेक परिणाम है
लेकिन एक स्थायी है
कि वह कभी ख़त्म नहीं होता.
   

              
                08

डाल से सिर्फ़ पत्ते नहीं झड़ते
थोड़ा नमक
थोड़ा आंसू भी गिरता है
आंखें यह देख नहीं पाती

विदा होने का एक अर्थ
यह भी है कि पत्ते ही नहीं
एक दिन पेड़ भी गुम हो जाता है

युद्ध में हम शव नहीं गिन सकते
सारे आंसू चीत्कार और भीतर के दंश को नहीं समझ सकते

एक दिन यह भी समाप्त हो जाता है.   

                09

जिन्हें नहीं पता
युद्ध की हानियाँ 
जब वे भी युद्ध का समर्थन करते है
मुझे यह समझने में दिक्कत होती है 
कि हम सिर्फ़ कॉलर के भीतर ही शरीफ़ हैं
अन्यथा तो हमने जैसे कोई
हिंसक पशु भीतर पाल रखा है

समय बीतता है
और एक दिन हम मारे जाते हैं

उन मरे हुए लोगों में
एक युद्ध जितना ही सन्नाटा
और चीत्कार बची होती है.

                10

हर युद्ध पिछले युद्ध की तरह
अंतिम और निर्णायक घोषित किया जाता है

पिछली बार की तरह
शांति और समझौतों पर बहस होती है

शहीदों की संख्या और उनके शौर्य के किस्से लिखे जाते हैं

लोग जिन्हें युद्ध और सिनेमा में
लगभग समान दिलचस्पी रहती है
अंत में उबकर अपनी सीट छोड़कर
बाहर निकल जाते हैं.

                11

एक दिन आपसी जंग में
बहुत सारी चीटियां मारी गईं

उनकी उजड़ी बस्ती
और लाशों के ढेर के बीच
कई सारे गिद्द आ बैठे

जंगल का यह पुराना नियम है
जो मार दिया जाता है
उनके निशान भी मिटा दिए जाते हैं.

                12

हम अपने बनाए जंगल में रहते हैं

हम निशान मिटाने के बाद
इस बात पर बहस करते हैं
कि दूसरा पक्ष हमेशा क्रूर होता है
जबकि लड़ाई का बिगुल
हम साथ मिलकर बजाते हैं.

                13.

सीमाओं के दोनों और कितने है
जो लगातार इस कोशिश में रहते है
कि किसी भी बिंदु पर
कोई सहमति नहीं बने
ख़ासकर जब रक्तपात मुंहबाए खड़ा हो

इनकी शक्ल इतनी कॉमन है
कि कभी-कभी ये हममें भी शामिल हो जाते हैं
और समर्थन में साथ साथ चल पड़ते है
कुछ फासलों के बाद
अंतर पाटना मुश्किल हो जाता है

हम जिसे राष्ट्रवाद कहते हैं
और असहमतियों से डरते हैं
वह शांति और इंसानियत से बड़ी नहीं

सच बोलना भी देश के लिए है
अतिवादियों से बचना भी देश बचाना है
हल को समझना भी देश समझना है.

                 14

सिर्फ़ देश कहने से देश नहीं बचता

लोगों के बीच जाकर हांकना
और कहना कि देश आज सुरक्षित है
वह नहीं बचता
वह पड़ोस को कोसने से भी नहीं बचता

देश एक धागा है
आदि से अंत तक
हमारे आंसू, पसीने, प्रेम, दोस्ती, शांति
और भावनाओं में गुंथा हुआ है

देश अपने तट पर हिलता मस्तूल है
जिसे हर हाथ ने थाम रखा है

                   15

समय थोड़ा असभ्य और बनावटी है

इसलिए यह कहना कि
हमने समझ लिया देश को
एक महीन लकीर को काटने जैसा है

समझ पैदा होते नहीं आती
वह तब भी नहीं आती
जब सारी सनक एक होकर चिल्लाती है
कि देश बचाओ!!!

कभी-कभी यह देश
हमारे मानसिक विकार को भी ढोता है,
सहता है

युद्ध दो तरफा नहीं होता
एक तरफा ही खेल है
जो दोनों ओर से दिखाया जाता है.

                16

राजनीति बड़ी क्रूर होती है
वह अन्य अन्य परिस्थितियों में
पहचाने जाने लायक
बहुत कम सवाल छोड़ती है

जो सवाल वह छोड़ती है
वह कभी सुलझाने लायक नहीं होते

राजनीति उवाच है
बड़ा उवाच
और हम उसका बड़बड़ाना

हम बिखरे को समेटते हैं
राजनीति समेट कर बिखेर देती है.

               17

बहेलिया अपने ख़ाली जाल में
बहुत सी चिड़ियों को फांस लेता है
चिड़ियां शोर करती हैं
बहेलिया दूर से शांत होकर देखता है
थोड़ी देर में आकाश
चीत्कारों से भर जाता है

चीत्कार शांत होने पर
बहेलिया नृशंस हंसी हंसता है

जबकि
हम सब भूल जाते हैं
चिड़ियां विद्रोह नहीं
अपनी आज़ादी को कह रही थीं.

                 18

शांति के लिए
यदि युद्ध जरूरी है
तो ऐसी शांति भी अशांत है

                    19

इंसान से इंसान के बीच का संबंध इतना है
कि जितनी भी सीमाएं और रेखाएं
खींच दी जाती रही
हमने उन्हें पार किए बिना भी
संबंध बनाएं
चाहे उनका मक़सद एक दूसरे से भिन्न और व्यक्तिगत हो

                  20

यह जानना समझना कि
हिंसक और क्रूर बातों में
शामिल होने के लिए
हम कभी तैयार नहीं रहे

हमने ऐसा कोई पाठ नहीं पढ़ा
जो अपने समकाल में या आगे चलकर
हथियार उठाने या हिंस्र हो जाने के लिए कहता हो
तब भी इस पृथ्वी पर
अनगिनत युद्ध हुए हैं
लोग मारे जाते रहे
सदियों रक्त बहा

यह जानना समझना कि
देवताओं ने कितने युद्ध लड़े और क्यों लड़े?

शशि प्रकाश

उन्हें मैं पहले , कामरेड साथी कहता हूं । चूंकि कविता से पहले उनमें ग्राउंड आया । जमीनी चेतना और संघर्ष आए । फिर उस जमीन को जोतने की मेहनतकशी के परिणामत: ही उनमें संवेदना और कविता फूटी । इसलिए प्रथमतया यह कवि ग्राउंड एक्टिविस्ट हुआ , फिर कवि । जी हां मित्रों यहां बात मैं शशिप्रकाश की कर रहा हूं । जिनका कि इस बीच 'कोहेकाफ़ पर संगीत-साधना' तथा 'पतझड़ का स्थापत्य' दो-दो काव्य संग्रह  परिकल्पना प्रकाशन लखनऊ से कात्यायनी एवं सत्यम के संपादन में छपकर आया है । कहना ना होगा कि शशिप्रकाश की कविताओं के संदर्भ और फलक को जानने -समझने के लिए हमें संपादक द्वय के संपादकीय टीप को पढ़ा जाना , बेहद जरूरी है । ताकि यथार्थ के जमीन और स्थापत्य को लेकर कोई एक गहरी और वास्तविक समझ या। कि अन्तर्दृष्टि विकसित हो सके । चूंकि इन कविताओं का ताल्लुक़ात ऐतिहासिक आंदोलन परक रिपोर्ताज में दर्ज़ है । बीती सदी के पिछले चार दशकों पर नजर डालें तो विभिन्न संघर्षों व आंदोलनों का यह एक पुष्ट दस्तावेजीकरण भी है । अतः शशि प्रकाश के लिपिबद्ध दस्तावेज़ीकरण में कोई अशुद्धि या कि असावधानी  कि कोई घालमेल हो ; बचा जा सके । इसलिए यह जरूरी है । 


शशि प्रकाश के कवि कर्म के फलक की बात मैंने की , तो यह 'अराकान के उस पार' इरावदी , चिन्दविन और सालविन के तटीय कछार में उसके पानी के खारे बनाए जाने की गाथा व व्याख्यान में संदर्भित है । जहां  तानशाही का


"सैलाब पीछे को हट रहा है कुछ समय के लिए
रुक रहा है फिलहाल अंडमान समुद्र और बंगाल की खाड़ी में उठा हुआ तूफ़ान"


जिसने अभी-अभी देखी है आलाकमान और चिन की पहाड़ियों से टकराकर भीषण शोर मचाती त़ूफ़ानी हवाएं । अराकान के उस पार छह हजार मांओं की नन्हीं बच्चियों , बेटियों को बलात्कार के बाद झील में डुबो दिया गया । कैसे तानाशाही से पड़ोसी मुल्क म्यांमार में एक फिलिस्तीन , एक अल साल्वाडोर व पेरू ने जन्म ले लिया कि नक्श़ कदम पर हम भी खड़े हैं । समय कम बड़े नहीं हैं , कि मासूम सवालों की समझ के बनिस्बत जारी है अट्टाहस में परदे दारियां । जबकि संभावित खतरों विरत नहीं हैं हम। चूंकि प्रत्येक

"तानाशाह उन स्मृतियों से डरते हैं
जो मांओं के जेहन और बच्चों के मासूम सवालों में पलती हैं"

शशि प्रकाश की कविता में   वैश्विक दृष्टि व उसके फलक का अंदाजा तो लगता ही साथ ही , इस बात की ताकीद भी  होती है कि पड़ोसी मुल्क के आग की लपटें हैं ; हो सकता है ! कल हो न हो यहां भी यह मुकर्रर करे

"दूर से आ कर गिरती चिंगारियां
वर्साय के महल और जा़र के शीत प्रासाद की कहानियां दुहराई जाएंगी यहां भी कभी न कभी
शायद जल्दी ही 


शशिप्रकाश की कविता में यह जो अंदेशा है वह चेतावनी में प्रक्रियाधीन है । इसीलिए ही वसंत का उम्मीद बरकरार है । व तैयारियों के आगाह में है । चूंकि देश में सतत नाटक के मंचन की तैयारियां ख़ूब है, जो बहुत जल्दी में और जंगल तंत्र के रूप में , जोरों पर है । खैर! इन वारदात ए वाकये से शशि प्रकाश ठहर नहीं रहे बल्कि जन अधिकार के आंदोलन को जरूरी रसद से भी भर रहे हैं कि कविता अपने पर्याय वह लक्ष्य में बढ़ती है।

"बर्मा के मेरे भाइयों !
तुम्हारा एक हिंदुस्तानी दोस्त तुम्हें सलाम देता है"

जरूरी है कि मैं साफ़ करता चलूं , कि मैंने कविता के फलक की बात कही है । तो यह है फलक कि कवि बर्मा के साथियों को सीधे संबोधित है और बात पड़ोसी मुल्क के साथ भारत की अनदेखी नहीं करा , कहा कि ब्रह्मापुत्र गंगा और यमुना के मैदानों से लेकर हिमालय की तलहटी तक बूटों की धमक यहां भी गूंज रही है / यहां भी


"विश्वविद्यालयों में शिक्षा की नई-नई नीतियों के साथ 
बनाई जा रही हैं सेना पुलिस की छावनियां  
यहां भी हवा संवेदनशील हो उठी है"


शशि की यह कविता मुद्दों सिद्धांतों संस्कारों अधिकारों की कविता है। मेहनतकश संघर्ष जनता की कविता है इसलिए इसमें वैचारिक आवाजाही इतनी विपुल और भरपूर है कि सामूहिक गान और उत्स एक-सा हो जाता है


"मेरे बर्मी साथियो ! कुछ देर से ही सही , पर
यहां से भी जरूर उठेगी आवाज
बसंत का आह्वान करना
एक बार फिर सीखेंगे यहां के नौजवान भी"

यह भी कि

"बढ़ेंगे आगे _ कदम से कदम मिलाकर मार्च करते हुए"

पता नहीं यह मैं कितनी बार दोहराते रहूंगा कि शशि प्रकाश की कविता का फलक बेहद बड़ा है । वह कहीं स्थानिक है तो कहीं अपनी सीमाओं के अतिक्रमण से , कैसे वैश्विक हो जाता है ?  मूल्यबोध के विचार कैसे प्रबल होने लगते हैं ? आदिम मानुष राग निषेध के बनिस्बत में कैसे लड़ाके विचारों को प्रवृत्त होता है 

"शब्द वह कौन सा होगा 
जीवन का स्थानापन्न
और यह भी की प्रयोजन को हटाकर
क्यों हो रही है
लड़ने-न लड़ने की बातें ?"

अर्थ-अनर्थ के भौतिक द्वंद और व्यवहारिकी में , संदेह नहीं लड़ना क्रियाशील और गत्यात्मक प्रविधि है । वेजालियास ,स्पेंग्लर ,  फूकोयामा या कि कुकनूस की भी पूरी प्रक्रिया एक संघर्षशील प्रविधि में ही आकार लिया है जो अपने अपने क्षेत्रों के सर्जना में सतत् गतिकी के साथ खड़ा रहा । पीछले दिनों कवि कात्यायनी ने सरल किस्म के आशावाद पर कविता लिख एक बड़ी बहस तलब बात की । यहां उस आशावाद का खंडन एक सुगठित संघर्षमय रूप में आता है । 

मानव जीवन के संघर्ष और उसके गतिकी में निरंतरता के बरक्स उतार चढ़ाव कभी भी , मामूली नहीं हुए  । किंतु विचारधारा का स्वीकार है कि एक विचारशील व्यक्ति के चिंतन में वायवीय विचलन तनिक भी प्रभावी नहीं हो पाता । यानी कि हम जब प्रतिबद्धता की बात करते हैं तो यह उन विचारों और मूल्यों के प्रति हमारी नैतिक आस्था और विश्वास को लेकर, माना जाता है । परन्तु इसी मध्य हम या कि शशि प्रकाश अपने इर्द गिर्द जो देखे हैं वह 'एक रिटायर्ड कामरेड से' कविता में एक कोलाज बन हमारे कड़वे अनुभवों में दर्ज़ हुआ है ।

शशि चूंकि ग्राउंड एक्टिविस्ट कवि हैं । एक अंतहीन यात्रा में खड़े मुक्तिकामी कवि हैं । कि संशय के साथ ज़िद और जद्दोजहद भी कम न करे हैं  ।  मौज़ू कविता उनकी 'एक सागर यात्री का आत्मकथन' में यह आत्म कथात्मक बयानी में दृष्टिगोचर होता है कि लक्ष्य जिजीविषाओं, ज़िद और जद्दोजहद में परिणाम मूलक संस्थापन से प्रशस्त होता है

"हम अपनी डोंगियो में सीने से चिपकाए होते थे अपना द्वीप !"

Tuesday, December 6, 2022

मनमीत

मारे गए कारसेवक मृतक तो हैं ही , सत्ता की क्रूरता से मारे गए । विफल व्यवस्था से मारे गए । किंतु घृणा और बीमार मानसिकता जब घर कर जाए तो काव्य में ऐसे बिम्ब का आना मुझे स्वाभाविक- सा लगता है । इस देश को जितनी नफ़रत की आग संघी लंपटों ने दी है वह किसी ने नहीं दिया

"कम्यूनिस्टों की छोड़िये
वे एक रेड लाइट एरिया की आबादी से अधिक कुछ नहीं
उनकी मज़बूरी कुछ भी रही हो
अब वे आत्मा बेचकर भी ख़ुश हैं"

शहीद की परिभाषा यदि कारसेवक होते तो भंवरसिंह मेघवंशी को 'मैं भी कारसेवक था' संभवतः लिखने की जरूरत नहीं पड़ती । वे शहीद तो नहीं थे । मूर्ख भी नहीं थे , कायर नहीं थे कि आतंकवादी नहीं थे मान भी लिया जाए तो वे बीजेपी के चालबाज कुचक्र में फंसे चुके भेड़ जरुर हुए ! वे विवेकहीन हो चुके लोग थे । कि निमित्त में यह हुआ

कोई उन्हें शहीद कहता है
कोई उन्हें मूर्ख कहता है
कोई उन्हें कायर कहता है
कोई उन्हें आतंकवादी कहता है

संविधान परिवर्तनशील है , कोई स्थायित्व या जड़ता का पर्याय नहीं है । किंतु संघी भक्तों के का माडल का कोई खिलौना नहीं है । देश एक राग है हर किसी को इससे प्यार है । बस हर कोई छिछौरा नहीं है । देश को जीना चाहते हैं । निहायत बेवकूफी थी कि

उन्हें लगता था
उनकी चिताओं पर लगेंगे मेले
लेकिन वतन पर मिटने वालों को
राष्ट्र पर मिटने वालों से अलग रखा जाता रहा है

सब्सिडी , सत्ता के हाथों की रखैल रही है तब भी और अब भी है इसलिए यह तर्कशील नहीं है कि

वे मुसलमान नहीं थे
इस दुर्भाग्य ने उनके परिजनों को
सब्सिडी, पेट्रोल पम्प और हज आदि से वंचित रखा

यह हमारा दुर्भाग्य है कि देश

टूट टूट कर
पाकिस्तान बांग्लादेश श्रीलंका बर्मा चीन अफ़ग़ानिस्तान कब के बन गए
और अब आसाम कश्मीर राजस्थान केरल तमिलनाडु मणिपुर मिजोरम आदि

दरक रहे हैं - तड़ तड़ तड़

चिंता हो , कि हम बचा सकें बचाएं देश न तोड़ें


मारे गए कारसेवकों के बारे में 
______________________

कोई उन्हें शहीद कहता है
कोई उन्हें मूर्ख कहता है
कोई उन्हें कायर कहता है
कोई उन्हें आतंकवादी कहता है

उनके परिजन
उन्हें जिस गर्व से याद करते हैं
संविधान कहता है
इस तरह से उनकी याद
संविधान की मूल भावना की व्युत्क्रमानुपाती है

उन्हें लगता था
उनकी चिताओं पर लगेंगे मेले
लेकिन वतन पर मिटने वालों को
राष्ट्र पर मिटने वालों से अलग रखा जाता रहा है

वे मुसलमान नहीं थे
इस दुर्भाग्य ने उनके परिजनों को
सब्सिडी, पेट्रोल पम्प और हज आदि से वंचित रखा

- यह कोई दुख की बात नहीं -

- गर्व की भी नहीं यद्यपि -

वे अब भी याद किये जाते हैं
उन्हें याद करने वाले
अब भी अखंड भारत में रह रहे हैं
जबकि अखंड भारत में रहने वालों से
टूट टूट कर
पाकिस्तान बांग्लादेश श्रीलंका बर्मा चीन अफ़ग़ानिस्तान कब के बन गए
और अब आसाम कश्मीर राजस्थान केरल तमिलनाडु मणिपुर मिजोरम आदि

दरक रहे हैं - तड़ तड़ तड़

कारसेवक
बीजेपी के शासनकाल में शहीद हैं
और कांग्रेस के शासनकाल में
वे ऐसे हैं जैसे हैं ही नहीं

कम्यूनिस्टों की छोड़िये
वे एक रेड लाइट एरिया की आबादी से अधिक कुछ नहीं
उनकी मज़बूरी कुछ भी रही हो
अब वे आत्मा बेचकर भी ख़ुश हैं

एक नाम चमक रहा है कल से : कारसेवक जगदीश का 
जिसकी बेटी अब प्राइमरी टीचर है
वह अपनी स्कूल में गवाती है राष्ट्रगान

उसे समझ नहीं आता
कभी उसके होठों पर
एक टेढ़ी हँसी क्यों दौड़ जाती है?
कभी उसकी आँखें क्यों भीग जाती है?

जब वह सबसे जोर से गाती है
राष्ट्रगान का अंतिम पद -

जय जय जय जय हे!

क्या कोई गारंटी से कह सकता है-

अयोध्या के नए राम मंदिर में
बाबरी के मलबे की
एक भी ईंट शामिल नहीं है?
_______
मन मीत

Saturday, August 13, 2022

जसम

धन्यवाद कल्पना जी

आदरणीय मंच एवं साथी

आज जैसा कि जसम रायपुर ईकाई अपनी,  कुछ नया और बेहतर की मुहिम के साथ आगे बढ़ी है , गौर किया जा रहा है ।  यह आयोजन भी उसी तय मुहिम का हिस्सा है । इसके तारतम्य में हमने अपने पहले आयोजन में रामजी राय की कृति 'मुक्तिबोध : स्वदेश की खोज' पर गंभीर विमर्श किया।  उसके बाद जसम की सहयोगी संस्था अपना मोर्चा डाट काम के बैनर तले युवा उपन्यासकार किशन लाल के उपन्यास पर भी गंभीर मंत्रणा की । फिर हमने प्रेमचंद जयंती मनाई  जिसके अंतर्गत 'प्रेमचंद : कल आज और कल' विषय पर युवा आलोचक भुवाल सिंह का व्याख्यान हुआ तथा देश के दो शीर्ष कहानीकार हरि भटनागर व जया जादवानी ने अपनी कहानियों का पाठ किया तथा उन पर चर्चित आलोचक जयप्रकाश और सियाराम शर्मा के साथ कथाकार आनंद बहादुर ने भी अति महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कहना न होगा कि इन महत्वपूर्ण आयोजनों की अनुगूंज देश भर में गई । और देशभर की साहित्यिक बिरादरी का ध्यान हमारी ओर गया। यह बेहद प्रसन्नता का विषय है कि अनेक वर्षों के बाद होने वाले जसम के राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन भी रायपुर के हिस्से मेॅ आया है, जो आगामी 8 व 9 अक्टूबर को होगा। 

बहरहाल, मैं आज के इस आयोजन में जो साथी कवि काव्य पाठ करने वाले हैं, उनके संदर्भ में चंद बातें आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। वे अपनी कविताओं से कहना क्या चाह रहे हैं? क्या राय और विचार रखते हैं समकाल की चुनौतियों पर, उनकी कविताओं से गुजरते हुए जो एक समझ बनती और विकसित होती है उसे लेकर मैं आपके सम्मुख उपस्थित हूं। 

जया जादवानी की गतिशीलता कहानी और कविता की विधा में समान रूप से है । वे एक महत्वपूर्ण कथाकार और उपन्यासकार होने के साथ कवि के रूप में भी ख्यात हैं । उनकी कविताएं स्त्री मन की पीड़ा और गहन अनुभूतियों की कविताएं है । उनकी एक कविता में एक पंक्ति आई है- 

"कहते हैं वह एक अच्छी औरत थी
उसके मुंह में जबान नहीं थी" 

यह हमारा आज का कवि कह रहा है , और मैं कह रहा हूं कि यह प्रत्यय कोई चुटकुला नहीं है ; और न कोई गल्प । मैं तो कहूंगा कि कविता कम इतिहास अधिक है । स्त्री जीवन के संघर्ष और संकट के सच का इतिहास है । जो कि उनके सुख-दुख , मार्मिक सवालों और पीड़ाओं का एक जीवंत दस्तावेज है । यद्यपि स्त्री ताकतवर पितृसत्ता के चंगुल में कराह रही है अब भी । जैसे मानो वह बच्चा जनने की मशीन ही हो , अभी भी  । बहरहाल, अभी बहुत बाकी है ।  समय करवट ले रहा है । दादी की स्थिति को मैं बदलाव में देख प्रसन्न हूं कि उनकी ही थाती हैं जया जादवानी । जो हमें आश्वस्ति से भरती हैं । हमारे भीतर के विविध रंगों और पहलुओं के बीच , मानवीय जिजीविषाओं के साथ हमें और अधिक मनुष्य बनाने की प्रबल इच्छाओं , आकांक्षाओं का एक पूरा कोलाज खड़े करती हैं ।

जया जादवानी के यहां जो यथार्थ है वह नंगा यथार्थ है , खुला है । अदृश्य-सा या भुलावे में रख देने जैसा , कि कुछ भी बचाकर रख दें । यह संभव नहीं ।  उनकी अधिकांश कविताओं के केन्द्र में स्त्री है । जो फ़ौरी तौर पर एक खुद्दार , सेल्फ आईडेंटिटी से लैस दिखती है ; कि लगता है , उसका घर है , परिवार है । हालांकि , यह आधा भी सच नहीं है । इस पर मुझे ओमप्रकाश वाल्मीकि इसलिए याद आ रहे कि दशा

चूल्‍हा मिट्टी का
मिट्टी तालाब की
तालाब ठाकुर का ।

भूख रोटी की
रोटी बाजरे की
बाजरा खेत का
खेत ठाकुर का ।

बैल ठाकुर का
हल ठाकुर का
हल की मूठ पर हथेली अपनी
फ़सल ठाकुर की ।

कुआँ ठाकुर का
पानी ठाकुर का
खेत-खलिहान ठाकुर के
गली-मुहल्‍ले ठाकुर के
फिर अपना क्‍या ?



कुछ इसी तरह का ही भाव भूमि और मनोदशा है स्त्री के जीवन में । जो किन्हीं मायनों में उन दलित समाज की पीड़ाओं से भी अधिक ज्यादतियों के साथ उनके भीतर मौजूद है । इस बिंदु पर आते आते कभी कभी मुझे लगता है कि स्त्री सर्वाधिक शोषित उत्पीड़ित और दलित है । जिसे जया जादवानी अभिव्यक्त भी करतीं हैं कि

भोर से रात तक घर की चक्की घूमते 
उसके तमाम एहसास पिस-पिसा कर आटा हो गए
जिसकी रोटी वह रोज़ पकाती है और खाती है

जया जादवानी के यहां बिम्बात्मक प्रयोग की महीन परतों में कुछ ऐसा भी अनकहा अनछुआ सच है , जब झांकने लगता है और खदबदाने लगता है तब ज्ञात होता है कि विडंबनाओं का स्त्री जीवन और जाति में कितना गहरा विरोधाभास , भरा पड़ा है  ।

वह आंसुओं के पर्वत पर खड़ी हंसती थी 
पर कभी-कभी पानी के टब में देर तक 
देखती न जाने क्या ढूंढती थी। 

तो ये हुई जया जादवानी ।   अनेक प्रकाशित कृतियों के बीच तीन हिंदी के कविता संग्रह हैं । 'मैं शब्द हूं' 'अनंत संभावनाओं के बाद' 'उठाता है कोई एक मुट्ठी ऐश्वर्य' 

जिन्हें हमें आज और अभी सुनना है




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चांदी की दुनिया , पानी का पता पूछ रही थी मछली , किताब के समान खुलेंगी यदि आपके घर की खिड़कियां ; यह ही क्यों ?
कच्चा दूध , गर्भवती स्त्री , ममता दादुरिया दहेज कांड ,  खिलौनों से खेलने की उम्र में खिलौने बेचता बच्चा , 'स्वाति अग्निहोत्री के बहाने सात प्रेम कविताएं जैसी मार्मिक , मानवीय तथा उदात्त प्रेम और जीवन की कविताएं , फिर , जूते , बीस व्यक्तियों का संघर्ष गीत , या बस्तर सप्ताह के सात दिन का क्रमवार  , रविवार , सोमवार , मंगलवार ,बुधवार  ,गुरुवार  , शुक्रवार , शनिवार , और रविवार को , बस्तर के पुरा वैभव , वैशिष्ट्य में समेटे , उसकी वैविध्यता को झांक , आज के नक्सलवाद को अपनी यात्रा में शामिल करने कम जद्दोजहद नहीं की , कि फिर स्त्री पुरुष संबंध को पूरी एक श्रृंखला में सामने लाने वाले अंतिम दशक के प्रिय कवि , जिनके अब तक कि पांच संग्रह , यदि लिखने को कहा जाए , पानी का पता पूछ रही थी मछली , कारीगर के हाथ सोने के नहीं होते , सत्य कथा असत्य कथा जैसी अविस्मरणीय संग्रह के कवि कमलेश्वर साहू को भी हमें सुनना है । कमलेश्वर साहू छत्तीसगढ़ से आने वाले वे महत्वपूर्ण कवि हैं जिनके यहां चीजों का प्रायोगिक कक्ष है । संवेदना जीवंत और मार्मिक हैं । वायवीय उथल-पुथल नहीं है । सीधी साफ़ और सच बात है । पक्ष के चुनाव को लेकर कमलेश्वर विचारधारा के परस्पर ही मनुष्यता को कसौटी का आधार बनाते हैं । भेद रहित जीवन व्यवहार को प्राथमिक बनाते हैं वर्ग विभाजन को डिक्लास करने की मुहिम में उस वर्ग के साथ होते हैं जो शोषित हैं उत्पीड़ित है । भेद रहित दुनिया के लिए उन्हें आड़े हाथ लेते हैं जो इस विषाद को बड़ा कर रहे होते हैं ।

कहते हैं

उनकी तृष्णा तक होती है चांदी की
वे पसंद करते हैं
चांदी के जूतों की मार
वे हमेशा चांदी नहीं बोते
मगर फसल चांदी की काटते हैं

समाज में व्याप्त भेद को कमलेश्वर एक भाजक में रख , देखते हैं और उन चरित्रों की ख़ूब खैर लेते हैं । कि यह सिर्फ अधनंगा प्रदर्शन हैं


बाहर से खूबसूरत दिखने वाली चांदी की दुनिया 
भीतर  से बेहद खोखली , भयानक क्रूर और यातनामयी है

कमलेश्वर के यहां फैंटेसी का प्रयोग और उसका आधार समकालीन यथार्थ है । जादुई सौंदर्य कि काले जादू के अविश्वसनीय चमत्कार नहीं है । यह अपच्य हो जाता है

जिस वक्त मैं 
चांदी की दुनिया के अंधेरे यातना त्रासदी
और वहां के रहने वाले प्राणियों के बारे में
बता रहा था
एक आदमी आया
जैसे किसी फंतासी का कथा नायक
और मेरे देखते ही देखते 
लगाया छलांग 

खैर , कमलेश्वर साहू को हम साथी कवियों के संग सुनने आए हैं । जरूर सुनेंगे ।
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कवि भविष्यवेत्ता नहीं है । न कोई खगोल विज्ञानी ही । परन्तु वह जिस समय , समाज और अपने परिवेश तथा उसके प्राप्य में जो धारण करता है , उससे , उसके अनुभव का आकाश विस्तृत होता जाता है । वह दीर्घ जीवन अनुभव को  हासिल करता है ; प्रौढ़ता को पा लेता । तो मैं वसु गंधर्व की बात कर रहा हूं वसु गंधर्व इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में आए उन नवोदित कवियों में हैं , जिनके यहां यह दीर्घ जीवन अनुभव की प्रौढ़ता , पहले आ समायी है । वे कहते हैं


"मैं एक हज़ार आइनों के अपने प्रतिबिम्बों में
एक हज़ार बार हो चुका हूँ उम्रदराज़
और अपने भीतर दौड़ती एक हज़ारवें पुरखे की नवजात दृष्टि में
समाई बूंद भर रोशनी के उजास से टटोल चुका हूँ
अपनी आगामी पीढ़ियों के हिस्से की रातों का अंधकार। 


यह दृष्टि संपन्नता कोई वायवीय घटना नहीं है । अनुभवों से अर्जित किए हुए हैं । देखें हुए हैं खुली आंखों से मंजर कि


"नींद में अक्षुण्ण गिरती है कथाओं में जली
लकड़ियों की राख
सपनों में कुनमुनाती है आगामी मिथकों को जन्मने वाली
हवा, और पानी, और घास की सनसनाहटें 


यह कवि भी मुक्तिबोध के मार्ग का कवि जान पड़ता है । ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि इनके यहां भी वही बेचैनी व्यग्रता और जद्दोजहद अपने गंभीर मंतव्य में जी उठे हैं । हालांकि उन्हें  , उनके मार्ग और उत्तराधिकार के लिए लंबी यात्रा भी करनी होगी । कहना न होगा मुक्तिबोध वाम धारा के अपने समकालीनों में जिस तरह से एक उबाऊ राजनैतिक घेरे में बंद इस देह की उदास सिलवटों 
सभ्यताओं के क्रंदन देख सके थे वही यह अनुज कवि भी देख रहा है कि

"सीले पर पटक कर, घिस कर, चमका कर साफ
सुखाकर तपती धूप में हर रोज़
इसे गीदम के बाजार में ले जाता हूँ
दस रुपए में दाँव पर लगाने"

और साँझ होते
निंदुआई, उबासियों से भरी इस की आकृति को ढोकर
लौट आता हूँ घर वापस 

कह क्या रहा है वसु ?देखने की बात यह है कि 


"कथाओं में रिसता रहता है वर्षाजल।"


इन अर्थों में वसु प्रागैतिहासिकता से  समकालीनता तक की यात्रा का कोलम्बस नजर आता है। वसु के काव्य में मौजूद बिम्ब विधान बेहद अलहदा प्रकार के हैं और बेहद विलक्षण भाव तथा विचार की चित्रावलियों की यात्रा कराने में समर्थ हैं। 
वसु गंधर्व ने बहुत कम समय में देश के बहुत सारे जाने-माने लेखकों और आलोचकों का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया है। हरि भटनागर के अनुसार प्रथम दृष्टि में वसु की कविताएं अमूर्तन का भ्रम देती हैं, लेकिन इनके तल में जाने पर बात साफ होती है कि कवि अमूर्तन के बहाने समय की पदचाप को, उसके द्वंद को काफी गहरे धंसकर , रूप देता है, जिसमें हिंदी काव्य परंपरा के स्फुलिंग , आंखें मीचे मौन रूप में विद्यमान हैं। वहीं महेश वर्मा के अनुसार वसु की कविताएं एक सधी हुई भाषा में लिखी हुई सधी हुई कविताएं हैं, जो इन दिनों दुर्लभ मितकथन को सहज धर्म की तरह बरतती हैं, ये सादगी, चुप्पी और उम्मीद की कविताएं हैं।
वसु के काव्य में जो बिम्ब विधान हैं वे अद्भुत हैं ।  ओरांग ऊटांग की गह्वर गुफ़ा से बातें कराते हैं कि   

"तुम्हारी नींद में
पृथ्वी की नींद के गोशे हैं
वनस्पतियों का धीमे डोलना है
निविड़ एकांत में साँप सा सरसराता
धीमे से गुज़रता एक स्पर्श है
ऊँघते शहरों की तंद्रा है
जैसे एक बंदूक की खामोशी"

या कि देखें इस नवयुवा कवि की यह पंक्तियां

"अंतिम अलविदा का अनुगूँज हो सके ख़त्म
इसके पहले मैं लौट आऊँ घर
बुझी न हो दरवाज़े के पास जलती बत्ती
ख़त्म न हुआ हो मेरे हिस्से का भात।"

 भात  न सिर्फ हमारी जरूरत है । सनद रहे अधिकार भी है  

 साथियों! हमें वसु को भी सुनना है , फिर
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केदारनाथ सिंह के शब्दों में कहूं तो "जाना एक खौफनाक क्रिया है"
यह इन अर्थों में है कि


"कोई कहीं जाता है
तो पूरी तरह कहां लौट पाता है?"

सवाल विनोद वर्मा के कहन में जो विद्यमान है , उसे देखने के लिए दृष्टि चाहिए , होता है । हमारे आस-पास की दुनियावी दुनिया में जो कुछ घट रहा है , वह घटता ही जा रहा है किसी खौफनाक क्रिया की तरह । सिमट रहा है लगातार , छोटा होता जा रहा है शनै: शनै : । अर्थात्

"वह थोड़ा बह जाता है
अंजुरी से झरते पानी के साथ
नदी में
थोड़ा
किसी जंगली फूल की पंखुड़ियों के साथ
जंगल में अटक जाता है
पहाड़ के शिखर पर
किसी पेड़ की शाख पर
टंगा रह जाता है थोड़ा"


यह  कि हमारी व्यवहारिकी से इतर भी छूटने लगा है अनगिन कारवां इन दिनों । कि

"रह जाता है
शहर में सड़क के किनारे बैठे
बूढ़े की दयनीय आंखों में
ठहरे हुए पानी सा कभी
तो कभी किसी दुकान में सजे
कपड़ों के रंगों में"


जाने से चीजों के भीतर वीरानी छाई जाती है । छूटने लगते हैं स्पर्श अहसासात , इसलिए यह एक खौफनाक क्रिया है । और विनोद वर्मा उस खौफनाक क्रिया को महसूस कर सकें हैं कि कहते हैं


लौटता हुआ व्यक्ति
कभी अशोक की तरह लौटता है
अपनी हिंसा छोड़कर
पश्चाताप से भरा
तो कभी
दुनियावी माया को छोड़कर
बुद्ध की तरह


फिर भी जो रिक्ति बची रह जाती है, चकित करता है , चकित करता है


"तुम्हारा पूछना
कि कब लौटोगे"


 जाने की प्रक्रिया के साथ छूटा रह जाता है एक‌ सवाल की तरह।


विनोद वर्मा की कविताओं में जो अटैचमेंट है वह अचीवमेंट में है । संभाव्य तथा प्राप्य में हैं । स्वायत्त ,स्वशासी को बल देने के साथ यथार्थ से रूबरू कराने में हैं । मसलन देखें कि


"हर जाने वाला
लौटना ही चाहता है एक दिन"

उनके यहां नवीन जीवन बोध चाह के बरक्स में है कि

"इतिहास से सीखना ज़रूर पर
उसके काले पन्नों को
वर्तमान से मत जोड़ना"

चूंकि जीवन एक संभावना है । सप्रमाण कि

"जीवन न चिता की राख में होता है
न कब्रों में दफ़्न"


अर्थात्

"कितनी भी महान यात्रा हो इतिहास की
वह भविष्य का पथ प्रदर्शक नहीं हो सकती

यही वर्तमान
यही समय, देश और काल
हमारा तुम्हारा सच है"


और कि कहा जा सकता है

"लौटना तुम्हारा सपना हो सकता है
पर कोई नहीं लौट सकता
सपनों में" 
विनोद वर्मा एक चर्चित शख्सियत हैं, उनकी कविताओं से गुजरना एक अलग विजय विनोद वर्मा को उद्घाटित करने जैसा सनसनीखेज कार्य लगा। अपनी कविताओं में वे बिल्कुल सूक्ष्म, अनुभूतिपरक संवेदनाओं के कवि लगे। उनकी कविता विदा और मिलन की कविता तो है  ही, भीतर ही भीतर मोबाइल सृष्टि के संपूर्ण कार्यकाल आपकी संपूर्ण मानवीय था और जब यह था कि कविता नजर आती है उनकी प्रतीक्षा श्रृंखला की कविताएं प्रतीक्षा के इतने नानाविध रूपों को सामने रखती हैं जिनको पढ़ते हुए बरबस केदारनाथ अग्रवाल के हे मेरी तुम श्रृंखला की कविताओं की याद आ जाती है। कवि के रूप में आज विनोद वर्मा को सुनना आज के इस आयोजन को निस्संदेह स्मरणीय बनाएगा।

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ना राजा रहे और न रजवाड़े । फिर भी राजा की दुनिया का तिलिस्म कायम रहा ।  एक भी दिन नहीं बीता कि उसके तिलस्मी अस्तित्व से हम कभी ऊबर भी पाए हों । कुछ ऐसा ही ठोस दावा कर बीसवीं सदी के नवें दशक की हिंदी कविता में अपने स्थान को सुनिश्चित किए , कवि बुद्धि लाल पाल ने जो भी कहा है , बात मार्के की ; की है । और यह तभी कहा गया जब राजा का चारित्रिक स्तर ही अपनी पतनशीलता की गाथा बन गई ‌। काफ़ी निराशा करने लगे । नहीं तो भला ऐसा भी क्या था ? कि देश में प्रधान तक को कहा जा रहा

"राजा कदम कदम पर 
बहुत चौकन्ना होता है"

जबकि वस्तुत:

"यह उसका स्वभाव नहीं होता" 

अलबत्ता

"उसकी आंखों में 
पट्टी बांधी जाती है इसकी' 


कि वह चौकन्ना है ,  घिरा है मक्कार चाटूकारों से। इस पर बसंत त्रिपाठी ठीक कहते हैं इतिहास और वर्तमान के घेरे में राजा की उपस्थिति एक ऐसा यथार्थ है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती ।  इस प्रजातांत्रिक देश में राजा और उसकी रुचियां धर्म , ईश्वर , कर्मकांड , चाटुकार , दरबारी भय का विस्तार , आर्थिक नाकेबंदी जनता की निरीहता और उसका द्वंद राजतंत्र की ऐसी छवियां हैं जिसे रोजमर्रा की जिंदगी में हम अक्सर देखते हैं और भोगते भी हैं । यह प्रजातांत्रिक देश में परंपराओं और मुहावरों के मैनेरिज्म के , टूटने का काल है ।  राजा लगातार नंगा हो रहा है कि उसकी व्यवस्थाएं रीति नीति का केंद्र शीर्ष है , सत्तासीन होना है  । राजा का न्याय , मायाजाल , अदृश्यता , जैसी एक समग्र कविता के मार्फत क‌ई क‌ई दिशाओं और कोणों से बुद्धि लाल पाल वे सारी बातें कविताओं में दर्ज किए हुए हैं जिससे हमारे देश के राजनेताओं के राजनीतिक चरित्र की खासी समझ हम विकसित कर सकते हैं । राजा की दुनिया में सब अचरज है , अचंभा है । मुद्रा, विस्मयकारी है कि


राजा अदृश्य होकर 
वार करने की कला में  माहिर होता है 

वह अदृश्य ही रहता है

 परंतु जब भी दृश्य में होता है 
तो प्रकट होता है 
ईश्वर की तरह पीतांबर धारण किए होता है

मुद्रा तथास्तु की होती है !

बुद्धिलाल पाल अपने तीन कविता संग्रहों के साथ अपनी आरंभिक उपस्थिति को बनाए हुए हैं । चांद जमीन पर , एक आकाश छोटा-सा , और राजा की दुनिया काफी चर्चित रही ।
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"बेशक पत्थरों पर कालजयी ईबारतें लिखी जा सकती है

लेकिन
 मैं छेनी नहीं , कलम हूं


मुझे जानने के लिए
तुम्हें कागज होना पड़ेगा


यह ठोस दावा , आग्रह सुमेधा अग्रश्री करती हैं । स्त्री विमर्श को एक न‌ए आयाम दे वे नस्लभेद की तंगी को जैसे उजागर करतीं हैं वह उनमें नि:सृत अति मानवीय दृष्टि का परिणाम है । रूप सौंदर्य और आर्थिक सबलता ने हमारे भीतर की मनुष्यता को मारकर जो नैरेटिव ईर्ष्या पैदा की है , उनकी कविताओं में देखा जा सकता है

'धीरे धीरे पकती है ये
 तानों उलाहनों तिरस्कार  अवहेलना की भट्टी पर'

अब तक "पुरौनी" और "नवदीप" दो कविता संग्रह के अलावा एक नाटक "तीन लघु नाटक" संग्रह प्रकाशित हैं । हमें उन्हें भी सुनना है ।

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कहने सुनने की इस कड़ी में हमारे बीच एक मंजे हुए बेहद अज़ीम शायर मौजूद हैं । जिनकी उपस्थिति इस आयोजन को एक अलग ही डायमेंशन दे रही है। ये शायर है जनाब ज़िया हैदरी। जिया साहब ने शायरी विधा के मन मिजाज को खूब टटोल लिया है और बेहद कामयाब अशआर निकाले हैं। मुझे ऐसा लगता है कि उर्दू शायरी में रूमानियत की सबसे ज्यादा मजबूत उपस्थिति होती है लेकिन ज़िया के अशआर रूमानियत से मुक्त होते हैं, बावजूद इसके कि वे उर्दू शायरी के ट्रेडीशन से पूरी तरह वाकिफ हैं। बल्कि उनके एहसास में एक नवीनता है, वे अपने जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले शायर हैं। उनकी भाषा बिल्कुल स्पष्ट और सादगी भरी हुई होती है उनमें क्लिष्ट क्लासिक शब्दों की वह भरमार नहीं है जिसके चलते उर्दू शायरी हिंदी जाने वालों के लिए अपरिचित होकर रह जाती है। बल्कि वे हिंदुस्तानी आम फहम जुबान में शायरी करने वाले शायर हैं, रायपुर में शायरी की एक बहुत ही स्वस्थ है और पुरजोर परंपरा रही है, उस परंपरा के सबसे बेहतरीन नुमाइंदे के रूप में ज़िया हैदरी साहब हमारे सामने हैं उनकी शायरी का एक अंदाज है जो शायरों के सफे में उन्हें एक अलग पहचान देती है। एक नमूना देखिए देखिए-   वे कहते हैं कि

"मैं कि अब उम्र की ढलान में हूँ 
फिर भी लगता है इक उड़ान में हूँ" 

बावजूद कि


"कोई आता है और न जाता है 
मैं मोहब्बत के जिस मकान में हूँ"

क्या हुआ हूँ अगर अकेला मैं 
यही काफी है तेरे ध्यान में हूँ 


अर्थात् जीवन को चाहिए ही क्या ? सूफियाना शायरी के इस कद्रदान शायर ने जता ही दिया कि बकौल नफ़स अम्बालवी

"उसे गुमां है कि मेरी उड़ान कुछ कम है

मुझे यकीं है कि ये आसमां कुछ कम है"

 जिया साहब उन पुराने और मंझे हुए शायरों में हैं जिनके यहां उदात्त जीवन अनुभव व आत्मविश्वास अपने लबरेज़ में है ।
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वरिष्ठ आलोचक सियाराम शर्मा के अनुसार धरती और स्त्री अपने सौंदर्य के समस्त वैभव सृजनशीलता की बेचैनी और स्नेह की आद्रता के साथ विनोद शर्मा की कविताओं में उपस्थित है और उन शक्तियों की शिनाख्त करती हैं जो प्रेम प्रकृति और स्त्री की विरोधी हैं। विनोद प्रेम के महीन बारीक नरम और मुलायम एहसासों के कवि हैं। विनोद शर्मा की कविताएं सामाजिक अंतर्विरोधों और लोकतंत्र की विडंबनाओं को उजागर करती प्रगति और विकास के तमाम दावों को झुठलाती व्यवस्था विरोध की कविताएं हैं। इनके काव्यात्मक औजार बिंब, प्रतीक और उपमान प्रायः लोक जीवन से उठाए गए हैं। अनाम एहसासों को मूर्त करने के लिए जो उपमान चुने गए हैं वह परंपरा से अलग नए और टटके हैं।


तो साथियो, 

अब तो होइए मुखातिब अपनी तरफ! कम से कम तय कीजिए कि आपके हाथ में कैसा शब्द और कैसा हथियार होना चाहिए, क्योंकि यह तय करने का वक्त अब आ गया है और यह उस लायक मौसम भी है। 


फिर भी , इस कवि का मानना यह भी है कि

धरती के गर्भ में भरा होता है नेह
कोमल और मुलायम जीने की लालसा जगाता हुआ 
दौड़ने का दम भरता हुआ 
कि थकी हुई पलकों पर उंगलियां फेरता हुआ 

उनका मानना है कि

धरती कभी बांझ नहीं होती !


यह एक आश्वस्ति बीज है । यह तमाम चीजों को अपने भीतर भाष्य बना लेने की जद्दोजहद में सूक्त वाक्य है । जो कवि गांठ रहा है अभी ।

Wednesday, June 29, 2022

अनिल चतुर्वेदी की कविताएं

अनिल चतुर्वेदी का 'शहर उदास नहीं होता' पढ़ लिया ; और मैं उदास नहीं हूं । उदास नहीं हूं तो इसलिए कि 90 के दशक में जिन्हें बकौल कवि पहचाना जाना चाहिए था , वे कविता की दुनिया से लगभग गायब हो गए और आज जब फिर मिले , पुनः लिखना हुआ , तो कवियों में शुमार होने की काबिलियत के साथ  , पूरे शबाब में मिला । ऐसा कम ही कवि होंगे जो बकौल समाजिक , राजनीतिक चेतना से संपन्न हो , एक लंबी चुप्पी और विराम के बाद पुनः सक्रिय लेखन से जुड़ आगे आया हो ; तो निश्चित तौर अनिल चतुर्वेदी उसमें शामिल किए जा सकेंगे , यह कहने मुझे जरा भी संकोच नहीं होगा ! अनिल चतुर्वेदी 90 के दशक से लिख रहे थे । कि वैयक्तिक कारणों से इस राह की यात्राएं उन्हें स्थगित करनी पड़ीं ।  किन्तु अभिरुचि और साथ नहीं छूटा । कि साहित्यिक दखल के तौर पर पहले संवाददाता और फिर बतौर संपादक के रूप में वे विभिन्न अखबारों में काम करते हुए अपनी उपस्थिति को किसी मंंजे हुए कलाकार में भाष्य बनाते ग‌ए । वे विगत कुछ सालों से स्वतंत्र लेखन और कवि कर्म में तगड़ा हस्तक्षेप करते दिखाई दिए हैं । इसे कोई कवि , कलाकार  जज्बा ए जूनून के परस्पर सघन सिक्त जीवन अनुभवों , वैचारिकी और संवेदना के रास्ते चलकर ही संभव बना सकता है । अनिल चतुर्वेदी में संघर्ष तथा कामयाबी का यह गुर इन मायनों में स्वस्फूर्त तथा वंशानुगत है अर्थात् 

*तेज धार का कर्मठ पानी काट रहा है तट चट्टानी*

के जैसा ही जीवट और जुझारूपन में भरा, दिखाई देता है ।

 यह समय था ‌। सोवियत संघ के विघटन का , फिर देश में भूमंडलीकरण , उदारीकरण के दबाव के बाद अचानक से आए शीतकाल का । चारों ओर लोग-बाग में भय आशंका और सिर्फ निराशा दिखी । जो मनुष्य के मानसिक स्थिति पर इतना गहरा प्रभाव डाल चुका था कि उबरना कठिन हो चला था । वह असुरक्षा बोध से घिरा एक सेफ जोन की तलाश में चुप्पी को अपना कंदरा की तरह प्रयोग में लाने लगा ‌। हर दूसरी बात पर सिर्फ समझौते को अपना आखिरी प्रस्ताव की तरह स्वीकार किया था । ‌ स्थिति देखने समझने में यह थी  कि

"धरती की सारी नदियां मिलकर भी 
समुद्र का खारापन कम नहीं कर पातीं !"
 

अर्थात् विभिन्न छोटे बड़े आंदोलनों से तत्कालीन व्यवस्था कहीं भी विचलित नहीं थी ! यानी कि

"इतनी सारी नदियों से कोई फर्क नहीं पड़ता" (उन्हें)

"समुंदर का पानी न घटता है न बढ़ता है !"

यद्यपि आवाजाही थी फिर भी उन ताकतों के आगे विवश था मनुष्य कि

"जबसे वह इस धरती पर है 
पोषक बना हुआ है इसी व्यवस्था का"

व्यंग-व्यंजना में अनिल चतुर्वेदी कमाल दिखाते हैं । मध्यवर्ग उनके निशाने पर आते हैं । जिसे वे एक लंबी रूग्णता में देखते हैं , कहते हैं कि

"यह उसकी समझौतापरस्ती है 
या विवशता 
वह अब भी राजा के बगैर नहीं रह सकता!"

वे कहते हैं मनुष्य का नियंत्रण व्यवस्था पर हो किन्तु चीज़ें इसके उलट बह रही है कि

"वह सम्राट की तर्ज पर ही शासक चुनता है
 उसकी इच्छा पर शंख और थाली बजाता है 
फिर अपनी बदहाली का राग सुनाता है"

जबकि सृष्टि की यह सर्वोत्कृष्ट रचना अपनी निरी कायरता और कातरता के खोल में दुबक चुप्पा है । इस कविता के कुछ काव्य पंक्तियों में अनिल के यहां भी घालमेल है जबकि लक्ष्य अपने कांसेप्ट पर ही केन्द्रीकृत है । वे मानते हैं कि व्यवस्था का विरोध नागरिक समाज के सश्रम संघर्ष से ही फलित होगा । छद्म और समझौतापरस्ती से हासिल में निराशा हाथ आएगी । 

अनिल चतुर्वेदी ने नागरिक बोध और चेतना का खासा प्रभाव है कि वे निराशा के बनिस्बत ओज और नाराजगी में अपने सारे निर्णय सुरक्षित करते हैं । यह उनके 'व्यवस्था' क्रम की उन आठ कविताओं में शिद्दत से आए हैं ।  मसलन 'व्यवस्था -1'

सुबह की अगवानी में
चहचहाते हैं परिंदे 
एक आदमी ही है 
जो खामोश है

अनिल चतुर्वेदी इसी समाज के ही घटक हैं । और जिनके लिए ; जो उनका आग्रह है वे भी इसी समाज के ही घटक हैं । इसलिए वे उन्हें बार-बार अपने लपेटे में लेते हैं


वही 'व्यवस्था-2' में वे व्यवस्था के कुठाराघात और उसके व्युत्पन्न से उपजी खाई को ब्लैक होल में देखते हैं । 

"जब सब कुछ सिमट रहा हो
केन्द्र की ओर
पूरी बात परिधि में ही घूम रही हो
समझ लीजिए 
कि तारा मर रहा है
और बन रहा है ब्लैक होल

मैं इधर देखता हूं और पाता हूं कि अनिल चतुर्वेदी के यहां दृष्टि साफ़ है , फोकस में एक पुष्टि की तरह मौजूदा समय है । दृष्टव्य व्यवस्था-3


"फूल और कांटों की दोस्ती
किसी व्यवस्था के
तहत ही है होती"

अनिल चतुर्वेदी की कविताओं में बात अपने ठसक और दावेदारी में है । यथा 'व्यवस्था- 4'

"सूर्य तरेरता है आंखें 
और सहमी हुई पृथ्वी उसका चक्कर लगाती है"

वही इन कविताओं को अभिव्यक्त करने अनिल चतुर्वेदी ने खूब बिम्ब विधान गढ़े हैं । मसलन कि 'व्यवस्था- 5' में वे कहते हैं कि कीमियागरों ने जब घोड़े को घोड़ा , कुत्ते को कुत्ता , गधे को गधा भेड़िए को भेड़िया बनाया और शेर को शेर रहने दिया , तो रत्ती भर संदेह नहीं होना चाहिए कि धूर्त चालाक व्यवस्था के निर्माण की धुरी के निमित्त में यह वैमनस्यता ही रही । अनिल की ये कविताएं संदेह और सवालों के हवाले , आकार लेती है । सवाल यह आदमी कौन था ? क्या वाकई आदमी था कि लोक जन का असली दुश्मन ! जिसने सहूलियतों को पैमाने पर रख व्यवस्था बनाया । जैसा कि 'व्यवस्था -6 'में वे कह रहे हैं कि आबाद जंगल की सभ्यताएं भी आखेटकारी शिकारियों के अधीन अपनी मासूमियत में जूझ रही है और उसे ज्ञात सूत्र हाथ नहीं आ रहे कि

"नागरिक व्यवस्था नागरिक नहीं है"

व्यवस्था की मार और उसके झोल में फंसे आदमी की गहरी चिंता यदि अनिल चतुर्वेदी के यहां उनके पक्ष में है , तो वे जरूरी लताड़ भी हैं जो उनकी नादानियों और बेवकूफियों से खड़े किए जा सके । उनके सवाल होते हैं सरकार से , व्यवस्था से , यदि सरकार जनता के लिए जनता के द्वारा चुनी हुई है और वह नाकाम है अथवा कि विभिन्न कारगुजारियों के बाद भी किस आधार और ताकत से सत्ता पर बची हुई  है , बनी हुई है ? पाई-पाई तिनका-तिनका जोड़ मनुष्य ने जिस व्यवस्था का निर्माण किया , उस व्यवस्था के होने न होने का क्या अर्थ रह जाता है जिसके होने पर भी न पाई बचती है न पूंजी । प्रतीकात्मक बिम्ब की इस कविता में अनिल चतुर्वेदी बहुत तीखे और तेज़ होते हैं

"कितनी मुश्किल से 
चिड़िया अपना घोंसला बनाती है 
फिर भी अपने चूजे को नहीं बचा पाती 
अक्सर सांप निगल जाता है उसके चूजे"

जबकि व्यवस्था के नाम कार्यपालिका , न्यायपालिका और व्यवस्थापिका है । फिर भी

"परिंदा क्यों अपने चूजे क्यों नहीं बचा सकता 
क्यों सांप को उसकी मनमानी से नहीं रोका जा सकता"

सवाल हैं । सवाल दर सवाल कि

"सूरज जो अभी कुछ देर पहले ही निकला था 
सारी दुनिया में फैला था 
क्यों नहीं कुछ करता है 
आखिर वह भी तो इसी व्यवस्था का हिस्सा है"

फिर ये निर्मम बेरुखियां कहां जन्म लेती हैं ? यहां , यह किसी तरह का असहाय या पराजय बोध नहीं है । बल्कि सिक्त संवेदना है जो असहाय कि निरूपाय कभी नहीं होती । वह निरंतर गतिशील हो अपने जीवित होने के सबूत के साथ आगे आती , अभिव्यक्त होते रही है ।  बल्कि किन्हीं मायनों में यह थके हारे निरूपाय और निर्बल लोगों के हिस्से की धूप को इकट्ठी करने की जद्दोजहद में मनुष्यता के मांग को दुहराती है । अर्थात् 

"मैं चुप नहीं हूं 
नहीं रह सकता 
मेरे हृदय की सीप में मोती की तरह 
पल रही है एक कविता"

रसूख से अभिमान और प्रदर्शनप्रियता , फिर आडंबर और अतीत जीविता हमारे समय का सच बनता जा रहा है । यह भंगुर है । आज का आदमी यदि अपने अनुभवहीनता में अपने रसूख को सच मान , स्वांग तथा स्वार्थ में अपने मूल भावों से फिसल रहा है तो यह उसकी बेगैरत को दर्शाता है । यह दावा अनिल चतुर्वेदी का भी है

"फिलहाल आदमी बहुत बाद में है 
और आदमकद यहां कोई नहीं"

अर्थात् कि

"मैं उस धरती पर रहता हूं
जहां सूर्य भी बहुत छोटा दिखाई देता है
और सितारे दिख जाएं 
यही बहुत है"

फिर किस बिसात की बात ! क्या अभिमान या कि गुमान !! वृथा है , व्यर्थ है  सभी । इस तरह के अकाट्य कर देने वाले भाव विचार भी अनिल चतुर्वेदी में बहुतेरे हैं ।

साधारण आदमी की तरह हुआ है पलटू राम । नाम , पात्र और परिवेश में ग्राम्य ग्रामीण पलटू राम बेपरवाह अल्हड़ , श्रम साधक किसान है । परिस्थितियों ने उसे कृत्रिमता से विरक्त नैसर्गिक स्वभाव में मस्त रहना सिखा दिया । तब नहीं था ऐसा वह जब साधारण किसान था !  यूपी , बिहार , महाराष्ट्र , कर्नाटक, हरियाणा और पंजाब में यह इसलिए आ खड़ा हुआ चूंकि सामने हत्यारी सत्ता थी । उसकी फौजें थी । दलाल और आवारा पूंजी का मोहपाश था और बस्स 'वे' ही थे

"यह कम नहीं कि वह पेड़ नहीं हुआ ......( और )
 कम अज कम किसान के रूप में 
आत्महत्या करने से बच गया !"



इसलिए कि पलटू राम ने एक स्थिति के बाद खुद को तैयार किया ।

मैं पुनः पुनः कह रहा हूं कि अनिल चतुर्वेदी के यहां शब्द से अधिक चित्र यथार्थ गहराया हुआ है । उनके प्रतीक और बिम्ब अलग ही आख्यान रचते हैं और कालीन परत चढ़ाए नक्काशी से अधिक , चीजें उन्हें सरल रूप सौंदर्य में स्वीकृत होते है । जैसा कि दिन निकलता है रात होती है ; सुबह होती है शाम होता है । एक व्यापक समाज के सच को अपने तरह से देखती फिर उसे अभिव्यक्त करती इस कविता में अनिल चतुर्वेदी ने कृत्रिम पद्धति के जीवन सच और उस मुखौटे के प्रति भी हमें आगाह किया है कि 'नया साल' शब्द है । सिर्फ नाम है तथा शेष चीजें भरमाई हुई हैं । चूंकि जो मचा था

"समुंदर में हाहाकार वह
तो पहले जैसा ही है 
और नदियां 
अपनी नीयति में 
सिकुड़ कर लीन हो रहीं  
वृक्षों की वेदना पहले जैसी ही रहीं 
रामलाल का साल तो सालों से ठहरा हुआ है"

जीवित आदमी की चेतना कभी निरपेक्ष नहीं होगी । वह कभी डि-रेल नहीं होगा । सारी कोशिशें नाकाम होगी यद्यपि वह उपेक्षा भी करेगा तो अपनी सापेक्षता को अलगा नहीं पाएगा । मनुष्य का समाज विज्ञान इसी रूप में स्वीकृत है । इसी में प्रभावी है । चाहे वह लाख कोशिश करें देश , समाज , अर्थ , राजनीति से शून्य नहीं हो सकता ! कोई भी कोशिश उसका नाकाम होगा न विफल रहेगा

"घटना से निरपेक्ष 
मैं अपनी खामोशी में 
कुत्तों की उपेक्षा कर 
रातभर 
सोने की नाकाम कोशिश में लगा रहा"

देश समाज और राजनीति की जहीन समझ के बाद आदमी निरपेक्ष नहीं हो सकता । तेज हांफते-भागते जिंदगी के फलसफे में तेज नहीं है कुछ भी । विकास क्रम में मनुष्य और प्रकृति तथा जीव जगत का व्यवहार अपने गत्यात्मकता में क्रमिक है । वह सघन और घनीभूत है । देखने के बनिस्बत परखने में दृष्टांत होता है कि कैसे

"धीरे-धीरे उतरती है शाम 
रीत जाता है दिन 
धीरे-धीरे लोहे में लगती है जंग 
धीरे-धीरे वेदना की आंच में पकती है रूह 
धीरे धीरे अंकुरित होता है प्रेम"

तमाम-तमाम नैसर्गिक प्रक्रियाओं के बाद अनिल चतुर्वेदी में जो भौतिकी का द्वंद दिखाई देता है वह जमीन के स्तर में मजूर ,  किसान , कामगार के पक्ष में आ खड़े होता है ।

'शर्माती हुई स्त्री' अपने सौंदर्य बोध के लिहाज़ से एक 'अच्छी कविता' है । अस्तु स्त्री चीज नहीं है । वस्तु नहीं है ,अस्तित्व है स्त्री । अतः कोई भी पैमाना या कि मानकीकरण इसके लिए कतई ठीक नहीं । वह देवी अथवा शक्ति , या कि कोई आराध्या नहीं है । यदि हम कुछ निर्धारित कर रहे होते हैं , तो यकीन मानिए सत्ताधीशों की तरह कभी हम भी आक्रामक होंगे ही !  हम उस प्रकृति और सौंदर्य की अनुभूति पर आधिपत्य मान जंगलों और फसलों की तरह उसे सचेष्ट काटेंगे । अतः जरूरी सावधानी के साथ कहना चाहता हूं कि उसके अस्तित्व के साथ सहज और सरल बने । उस एक शर्माती हुई स्त्री को कायनात की सबसे अप्रतिम परिघटना की तरह देखें । लेकिन ठहर कर देखें । उसके सप्रमाण जीवंतता को अवांछित तारीफ़ और प्रशंसा से भरें नहीं । चूंकि कायनात के सबसे अप्रतिम सौंदर्य की हम बात करें तो यह उसके ठहराव में नहीं , उसके गतिमान में है।  उसे गति दें । उसे उसी तरह देखें , उसी तरह से लें , जिस तरह आप हैं । यह सही है कि

"वह शर्माती है 
और क्षण भर के लिए 
यह पृथ्वी ठहर जाती है 
सूर्य अपनी राह भटक जाता है"

इस अभिभूत सौंदर्यानुभूति को किसी ठहराव का आधार न बनाएं  ।

दृश्य बिम्ब भी अनिल चतुर्वेदी के यहां रक्ताभ लिया प्रतीत होता है । मसलन कि यह 'शाम का एक बिंब' है जहां

"लाल हो गया है आसमान  चू पड़ेगा अभी बादलों से रक्त" 

या कि दूसरा बिंब निसंग रात्रि का है जहां

"गहन अंधकार 
सृष्टि है निस्तब्ध

और मरसिया पढ़ रहे चांद सितारे हैं

परिवर्तन प्रकृति सम्मत परिघटना है । आप चाहकर भी उसे नहीं रोक पाएंगे कि नियंत्रित कर सकेंगे , कि हिस्सेदारी ही तय कर सकेंगे ! परन्तु नवीनता की चाह में वांछनीय तथा नवीन क्या हो ? यह तय कर सकेंगे । अंधाधुंध औद्योगिकीकरण रीयल स्टेट बाजार में भू माफियाओं की तूती बोल उठी है । कि बंधक बनाए गए वे किसान के माथे पर सवार हैं , जिनके घर पूंजी और बाजार है , सत्ता का सरोकार है । कि अनिल चतुर्वेदी को कहना होता है

"शायद इसीलिए हमारी राजनीति में 
इन सवालों से गुजर कर जाने का कोई रास्ता नहीं है"

और 

"हम उम्मीद करते हैं कि वह विद्रोह करें"

कम मुश्किल नहीं है । ताबूत तक घुटने टेक चुकी जनता के असहयोगात्मक रूख से कि वे विरोध अपने दम करें । हालांकि वे ऐतिहासिक किसान आंदोलन से साबित कर सके हैं कि आन पर जब आए बात , मिट ना पाए साथ ।


'कुछ हिस्सा उनका भी है' बकौल Bhaskar Choudhury  कि

"सूर्य की किरणों पे हक तो हमारा भी होगा 
ये और बात है 
तुम्हारी छत ने उसे रोका होगा"

अर्थात कि यह

"तुम्हारी जिद है चल जाएगी पर आंसुओं के समंदर में तुम्हारी नीव भी ढह जाएगी"

यकीं कर ऐ ज़ालिम यह गरीब गुरबा की बद्दुआ है लग जाएगी ! सच कि

"चांदनी की बात है वह तो तुम्हारी है !" 

किन्तु बकौल बिस्मिल अज़ीमाबादी हम कहेंगे जरूर

"वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां
अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" ।

की उक्ति में अनिल चतुर्वेदी शोषक को निशां पर रखते हैं और अंदाजे गुफ्तगू कहते हैं कि 

"अब सोच लो 
तीर का अगला निशाना तुम सरीखा बाज़ है"

यह कि

"खूब खेले तुम परिंदों से
मर गया अहसास है ।"

अनिल चतुर्वेदी की यह कविता उनके आरंभिक दिनों की है फिर भी अपनी चेतना और छाप में वैचारिकी को लेकर डंटी हुई है ।

'यही सोच रहा था' शीर्षक कविता फ़ौरी तौर पर लिखी कविता लगेगी परंतु इस कविता में जो रिसाव है  वह मिक साइनाइड की तरह जहरीली विषबुझी सी है जो अपने मारक क्षमता से सरलीकरण के भ्रम को तोड़ती है ;  तोड़ती है कि कविताएं रचना सामान्य बात भर नहीं है । खैर रूग्ण मानसिकी संघर्ष के पथ के बजाय डिमांड और वर्चस्व से चीजों को हासिल चाहता है । मसलन


"वे मेरा ख्याल रखें 
मैं जब भी कुछ कहूं उसे आदेश समझें 
उसका फ़ौरी अनुपालन करें"

परंतु यह पराकाष्ठा होगी कि

"पहले भी जब कभी 
मैं बीमार हुआ था 
तब मुझे राजा बनने का ख्याल आया था"

अथवा कि

"और जबकि यथार्थ यह है कि राजा बनने का ख्याल सबसे पहले किसी बीमार को ही आया था"

प्रकृति में संतुलन , अर्थात् समतामूलक परिवेश डिमांड की तरह हुआ ! संतुलन की यह मांग नैसर्गिक तथा अगेंस्ट नेचर के मध्य दीवार की तरह खड़ा है । यह अस्तित्ववादी मानुषिक विचार है । परन्तु भौतिक जीव जगत इस आशय की कोई ठोस पुष्टि के अभाव में , इससे इत्तेफाक नहीं रखता । क्योंकि धूप ,  पानी , हवा , नदी-नाले , पहाड़-पर्वत के किसी भी पर्याय में वह चराचर को उपभोग में अंगीकार किया है । यह तो हम पर निर्भर करता है कि उसे हम बनाए रखते हैं कि छिन्न-भिन्न करते हैं । इसलिए ही कह रहा हूं कि इस पर नजरिया अस्तित्ववाद के बजाय भौतिक समाज विज्ञान के आधार विकसित किए जाएं । एक कवि कलाकार इसी में वरेण्य है । वह देखता है कि

"हत्याओं का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता 
फिर भी शहर उदास नहीं होता"


पाता है कि थाना , कोर्ट-कचहरी , भूख-भीड़ सा 

"सत्ता की मीनार पर 
हत्या एक सीढ़ी है"

जीवन संग्राम में निरंतर युद्ध लड़ा जाता है ,शहर उदास रहे ना रहे कवि उदास होता है ! और मैं इसलिए उदास नहीं हूं तथा आशान्वित हूं कि कवि अपने दायित्वों का निर्वाह निरंतर ईमानदारी से कर रहा है ।

''कितनी झूठी सांत्वना , कितना गहरा छलावा है"

'निर्बल के बल राम हैं' । यह भारतीय निम्न मध्य वर्ग है जो अक्सर ही मारा जाता है । कहने को

"दावा है कि संविधान में 
उसके लिए न्याय की मुकम्मल व्यवस्था है" (निष्प्रभावी) 

जो

" इसी तंत्र के हिस्से हैं"

सोचो कि,  देखो कि

"मसलन कितनी ही प्रार्थना करो 
पर इंद्र बारिश नहीं करा सकते 
और पशुपतिनाथ को चूहे कुतर रहे 
देवियां तो सारी की सारी बन गई हैं (महाठगनी) 
हुकूमत की चेरी"

अनिल चतुर्वेदी ठीक पहचान करते हैं कि

"समस्या इतनी ही नहीं 
वस्तुत:  लोक पर तंत्र का शिकंजा 
कुछ इस तरह से कस चुका है 
कि लोक कराह भी नहीं सकता 
और विडंबना यह कि 
लोक समझता है कि तंत्र वही चलाता है"

यथार्थ बोध से लैस अनिल चतुर्वेदी की इस कविता में आज के राजनीति विज्ञान की बखूबी पड़ताल है ।

यह इक्कीसवीं सदी का आरंभिक समय और दूसरे दशक के उत्तरार्ध से प्रारंभ हुआ तीसरा दशक है । कहना न होगा कि जिस अनुपात में चीजों का स्थगन , विलोपन की भाषा में पुनर्निर्माण ही ; होने चाहिए उससे कहीं कई गुना तेजी से चीजें बदल रही है कि

"मैं चलता हूं लगता है 
लोग देखते हैं मेरी ओर"

अर्थात् कि 'मेरी आदमीयत संदेह के घेरे में' है । यही है वह बदलाव , कि पैदा हुई संदेह और ठिठक गए कदम ! आशा दुराशा के बीच पेंडुलम सी लटकती रह गई देह । जबकि 

"मैं कोशिश करता हूं 
भीड़ से तादात्म्य करने की 
और अकेला हो जाता हूं"

'मेरी आदमियत संदेह के घेरे में है' यहां इस कविता में कवि ऐसा इसलिए कह रहा है कि वह अपने होने के अर्थ में आदमी होने की शर्त को जीता है , कि तब पाता है आदमी और आदमीयत की परिभाषा भीड़ की तरह खतरनाक स्थिति में है  ।

यथार्थ नंगा होता है , जब कभी अभिव्यक्त होता है । प्रभावी कागज दवात के माध्यम अनुभूत सच और विचार को जब हम उसके कला धर्मी रूप में अभिव्यक्त करते हैं तो प्रभावी कारकों के बाद भी कला की महीन परतों से वह ढंक जाया करती है मसलन कि जहां 'भूख की सत्ता है'

"भूखा बालक रोटी मांगते 
आंखों से ओझल हो गया 
अब उसे किताब के पन्नों में खोजा औ पढ़ा"


दैनंदिन देश , समाज और व्यवस्था की भाषा दुभाषिए-सी होने लगी है । चीजों को भाष्य बनाना दुष्कर हो गया है । प्रतिमानों में , विचारों में सामंजस्य लाए जाने की महती आवश्यकता है । यह अनिल चतुर्वेदी 'पिता की पुत्र को नसीहत' शीर्षक कविता में कैसे साफ कर रहे हैं ,देखा जाना चाहिए 

".... क्या आते ही रोने लगे
...... मगर मेरे बच्चे रोना अब कारगर अस्त्र नहीं रहा""" । यह उक्ति भी फेल हो चुकी है की मां बच्चा को तब तक दूध नहीं पिलाती जब तक कि बच्चा रो नहीं देता अर्थात् दुनिया बहुत बदल चुकी है अब । ईजाद भाषा में सिखाया जाएगा दूध पीना । इस तरह से कि


"लोमड़ी की तरह पेश आओ
जब शेर सामने हो 
भेड़ियों के बीच फ़ौरन भेड़िया बन जाओ 
हां वफादारी के लिए हमेशा कुत्तों पर भरोसा रखो 
गिरगिट की तरह रंग बदलना तो कतई सीख लो
एक बात तो गांठ बांध लो सिर्फ इंसान होकर तुम नहीं जी सकते हो"

बहरहाल जिस तेजी से दुनिया बदल रही है

"एक आखरी बात और कहूंगा मेरे बच्चे
की उम्मीद बिल्कुल ही खत्म नहीं हुई है
तुम इंसान हो 
इस दुनिया को बदल भी सकते हो"

वस्तुतः इस कविता में कवि की यही वास्तविक एंट्री है जो इंटरवल के बाद की है

देव , दानव  ,ऋषि  , गंधर्व , हूर परी मिथ कथाएं हैं । वाचिक परंपरा ने इसे बल दिया । किंतु मनुष्य मिथ नहीं है । कागज कलम दवात मिथ नहीं है । स्वभाव से नरभक्षी शेर , विषैले सांप मिथक नहीं है । सोख़्ता स्वभावत: है । प्रैक्टिकल में है । किन्तु असुर और दानवों की विनाश की बात की जाए तो  मिथक से बड़ा उपाय कुछ नहीं । अतः वह वांछनीय हो जाता है । तब / जब

"रात की स्याही से 
दिन के कागज पर 
लिखना चाहता हूं एक शब्द-उम्र"

कि जिसे पढ़ , चाहता हूं

"एक नरभक्षी शेर की आंखों में आंसू आ जाए
जहरीला सांप फेंक दे अपनी विष ग्रंथियां
और एक आदमी बन जाए तो दधीच 
दान कर दे अपनी अस्थियां असुरों के विनाश के लिए"

तब

"सोख्ते की तरह मेरा यह (शब्द)
सोख ले
आदमी का दर्द उसकी सारी विपत्तियां"

जबकि 

"मैं परेशान हूं 
कैसे लिखूं .....
वह सब इस तेज़ बारिश में"

दया , करूणा , क्रोध चेतना , सौंदर्य की जितनी अर्थवत्ता अपनी है सार्थकता भी उसी अनुपात में और उतनी ही है । यह एक चेतना संपन्न मानव के भीतर संश्लिष्टता में पाए गए हैं । अर्थात्

"जहां आदमी होने की शर्त नहीं टूटती"

निश्चय ही वही जहां कोई कृष्ण पैदा हो जाता है । अनिल चतुर्वेदी इन चीजों के महत्व को अपने अंगूठे के मुहर से स्थापत्य देते हैं की यह दुनिया , इसी  के साथ बची रहे ।

भूख हमारे समय का सबसे बड़ा समकालीन यथार्थ है । हम न डरते कदाचित् कि यह न होता ! किंतु डर जाते हैं और खौफ खाते हैं तो इसलिए कि एक आग हमारे भीतर जलता रहता है । जबकि उसने जंगल और प्रकृति पर विजय प्राप्त किया ,लांघा समुद्र को , तोड़ा पर्वतों को । यह भी कि चांद के सीने पर पैर रखा । फिर

"आखिर कहां से आया होगा खौफ़ 
पहली बार आदमी के सामने"

निश्चय ही ऐसा है कि 

"जब आदमी ने आदमी पर आक्रमण किया होगा , 
तब वह पहली बार डरा होगा !"

या कि

"आदमी सबसे पहले डरा होगा 
जब वह भूख से लड़ा औ मरा होगा"

कि

"आज भी उसके हृदय पर अंकित है 
पराजयबोध के वे निशान 
आज भी वह होता है भूख से सर्वाधिक भयाक्रांत"

अनिल चतुर्वेदी ने अपनी अधिकांश कविताओं में भूख , मनुष्यता , इंसानियत , आदि को स्थायी तथा केन्द्रीय भाव दिया । भले ही कहीं-कहीं ठिठकना भी हुआ । जो  एक निरंतर गतिशीलता से उचट क‌ई क‌ई बार पुष्ट में अपुष्ट को लिए आ ही जाता है ।  यह द्वंदात्मक भौतिकी में आत्मसंघर्ष की प्रक्रिया है । जो उनके यहां बना रहता है । मसलन कि इंसानियत से दूर हुआ जा रहा मानव के देह तक में बह रहा रक्त का रंग तब भी साबूत लाल है ।

एक लेखक का पक्ष होता ही है । वह कहीं ना कहीं , किसी ना किसी ओर झुकेगा ही ! यह झुकना , झुकना नहीं , अपितु पक्षधर होना होगा । इन अर्थों में अनिल चतुर्वेदी की पक्षधरता वाम मार्ग को जाती है । चूंकि उनकी पहली और जरूरी चिंता में मनुष्यता का बचाव है । यद्यपि अनिल चतुर्वेदी में एक आदमी के दुख , पीड़ा , संतोष और सरोकारों का संवेदनागत विस्तार दिखाई देता है किंतु देखता हूं कि उनमें वामपंथ से एक दार्शनिक दूरियां भी है , जो अज्ञेय को जाता है । यह लोच है । जबकि वामपंथ वस्तुतः एक सीधा-साधा संघर्ष पथ है । क्रियाशील गतिशीलता का पथ है । अर्थात की कार्रवाई का पथ है । मैं इसे एक रचनाशील आदमी में दुर्बलता की तरह कोट करते आया हूं ।

"जो छले गए हैं रोशनी में 
वे लोग इसे जानते हैं 
रात जितनी अंधेरी होती है सितारे उतने ही चमकते हैं"

या कि

"इसे वे कैसे जानेंगे 
जो खुशी के गीत गाते हैं"

अलबत्ता जानेंगे वे

"जिन्होंने सीख लिया है तैरना 
गमों के समंदर में 
किनारे खुद ब खुद चलकर उनके पास आते हैं"

'जो छले गए हैं रोशनी में' कविता गीतात्मक शैली की जीवन अनुभव से निकली कविता है । जिसमें यथार्थ का जो गहरापन हैं वह महसूस करना होता है उसके उद्दीपन में तप्त देह की आंच को आभास करना होता है ।

आजादी को गर्वानुभूत मान प्रदान करने में राष्ट्रगान एक वह शै है जिससे हम अपने सामूहिक चेतना को बल प्रदान कर सकते हैं । अभिभूत हो सकते हैं , यह भी कि अपनी आजादी के अर्थ को हासिल करने के लिए ही , यह हुआ ! तभी तो 1947 घटी । किंतु अनिल चतुर्वेदी की कविता की बयानी  सैंतालीस के बाद और मोहभंग की है । जो मिली , अप्रत्याशित असफलता के रूप में मिली ; जस की तस में मिली ।

"जब राष्ट्रगान गाया जा रहा था
तब देश के करोड़ों भूखे लोगों ने उसे पेट से सुना"

और यह वही सिमट गया ।
जबकि वह लड़ाई भी उनके भूख से मुक्ति के लिए थी । आज जब हम सत्तर साल के इतिहास की बात करते हैं तो बरक्स में हासिल की बात भी हो ;  परन्तु यह अब भी जस का तस है ।

कवि हो और प्रेम की सघन अनुभूति तथा विस्तार ना हो , कैसे संभव है ? कोई भी सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक चेतना का सृजन तथा उसके फ्लैशबैक में प्रेम ही वह सिक्त भाव है कि हासिल में

"महासागर की अनंतता में खोई हुई तुम्हारी निगाहें 
जो झुकी हैं इस तरह कि न जमीं देखती हैं न आसमान 
यह शायद देश काल से पार सुदूर अंतरिक्ष में 
देख रहीं हों तुम्हारा देह रहित विस्तार"

अनिल चतुर्वेदी अपनी इस कविता में प्रेम के यथार्थ को दार्शनिक स्वीकृति प्रदान करते हैं , कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं

"धरती की छाती फाड़ कर फूट पड़ने वाले बीज की ताकत भी तुम ही हो 
अनंत काल से सूर्य का चक्कर लगा रही पृथ्वी का धैर्य भी तुम ही हो"

अर्थात्

जिसे मैं कह सकूं बस यही है प्यार 
ओ मेरे प्यार !

अनिल चतुर्वेदी की इस कविता को देखते हुए मुझे बांग्ला कवि रवींद्रनाथ  टैगोर , माइकल मधुसूदन , क़ाज़ी नजरूल इस्लाम का स्मरण हो आया ।

"तुम इस धरती पर होते हुए भी इस धरती के नहीं हो 
तुम्हारी अलौकिकता के प्रति मेरा चिर नमस्कार 
ओ मेरी चेतना के दुलारे 
तुम्ही तो हो भूखे के प्रति करुण चीत्कार  
बलात्कारी के खिलाफ सतत् आक्रोश भी 
तुम्ही हो"

प्रकृति विज्ञान की कोई भी मूर्त-अमूर्त घटनाओं के पीछे कोई ना कोई कारण होता ही है तथा कोई न कोई उसका जवाब देह भी होता है । यह अतिशय ही है कि इस व्यवस्था में , यहां जवाबदेह नहीं हैं ।

"हम एक ईश्वरीय व्यवस्था में जी रहे हैं 
जहां ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं 
हर जगह मौजूद है 
कण-कण में विद्यमान हैं पर किसी घटना के लिए वह जिम्मेदार नहीं"

यह अपने तरह का एक अनिवर्चनीय दकियानूस विचार है । यह कैसे संभव है ! यक्ष प्रश्न है जिसके लिए हम भीड़ और भेड़ हुए  , नहीं चुकते-मानने 'वह किसी भी घटनाओं के लिए जिम्मेदार नहीं' । अस्तित्ववादी दर्शन और उसकी स्वीकार्यता गहरे में पैठ बनाई हुई है तो सवाल तो बनने ही चाहिए कि

"हत्यारा खुलेआम घूम रहा"

 हमारी चुनी हुई व्यवस्था है और वह जिम्मेदार नहीं है । ऐसा कैसे चलेगा ! अस्तु या हमारा दुर्भाग्य है कि दुनिया उसकी है , और उसकी दुनिया में ,जो हैं

 "बलात्कारी नैतिकता पर भाषण दे रहा है" 


'पतंग उड़ाता हुआ लड़का' संग्रह की बेहतरीन कविताओं में है । यह देश असमय और चलते चलते बूढ़ा होता जा रहा है । अहसासात से परे वह धर्म की अफीम के नशे में है और हमारे भाग्य विधाता हैं कि निरंतर उसे बरगलाए हुए हैं । वह अपनी धुन में आसमान की तरफ देखता है , पतंग उड़ाता है , आटा , तेल , नमक  ,दाल के बढ़ते भाव को समझने की चेतना से वंचित रह जाता है फिर उसकी दिनचर्या में शामिल रह गया

"पड़ोसी लड़के की पतंग काट कर 
जश्न मनाता है 
पतंग उड़ाता हुआ लड़का बूढ़ा हो गया है"

अनिल चतुर्वेदी की कविताओं की ध्वनियों को बिना पकड़े उसकी व्यंजना को पकड़ पाना मुश्किल है जैसा कि उनकी अधिकांश कविताओं में है ।



"उन्होंने बलात्कार किए /सिर्फ इसलिए क्योंकि 
उनकी शक्लें हूबहू हमसे मिलती थीं !
वे हमारी तरह हंसते , रोते थे 
और हमारे सुख-दुख में 
शरीक होने की कला में माहिर थे ।"

नारों का अपना शोरगुल है । महत्त्व अभी इसलिए नहीं कहूंगा कि 'गर्व से कहो मैं हिंदू हूं' चूंकि यह भी एक नारा ही है । आश्चर्यजनक और बेतहाशा प्रचलन में इस बीच जो वाक्य सबसे अधिक सामने आया , वह 'गर्व से कहो मैं हिंदू हूं' ही है । यह नारा शोरगुल पैदा करने वाला नारा है । शोरगुल में कुछ भी सुना नहीं जा सकता । ‌ जैसे मनाही हो । यह कविता आवश्यक कला मांगो में भले ही खराब नहीं भी उतरे , किंतु भाव की सानिध्य प्रबलता से वह जो कहना चाह रही है , कहती है । मसलन कविता 'वोट बैंक' पृष्ठ संख्या 101को देखें

"हिंदू होने पर गौरवान्वित 
महसूस कराए जाने की 
यह प्रक्रिया 
शासक के लिए मतदाताओं 
के एक वर्ग के चयनित 
किए जाने की मुकम्मल तैयारी है"

जबकि यहां जो बात है , वे बातें कुछ और कहती हैं

"ये बात अगर 
शेर , कुत्ते या घोड़े को कहनी हो 
मसलन 
मैं कुत्ता हूं , मैं शेर हूं .....
तो इसका आशय क्या है ! मुझे इंसान होने पर नहीं 
हिंदू होने पर गर्व है"


नहीं भाई नहीं !

"आप इस मुगालते में न रहें 
कि मतदाता 
शासक का चुनाव करते हैं असल में शासक ही 
अपने मतदाताओं का 
चुनाव करता है"

संग्रह में 'कुर्सी' 'अभिनंदन' 'वे हत्यारे' 'प्रजातंत्र में शासक' 'व्यवस्था सीरीज की चार कविताएं' तथा 'प्रजा और तंत्र' व 'जनता ने थालियां बजाई' 'यह प्रजातंत्र है' 'प्रजातंत्र दो' जैसी अनेक राजनीतिक मुहावरों की कई महत्वपूर्ण राजनीतिक कविताएं हैं । जो वर्तमान व्यवस्था के चाल चरित्र को उजागर करने पूरी मुस्तैदी से जुटी हुई है । ये कविताएं हमारे समकालीन राजनीति के उन तमाम क्रूर सच्चाइयों को भलिभांति न सिर्फ देखती है पहचानती भी है , आगाह करती है ।
कविता , कला है की सच्चाईयों को स्वीकार करते हुए , स्वीकारता हूं कि कविता एक वक्तव्य भी है । अपने समय को दर्ज करता हलफ़नामा है । जो उनके इन तमाम राजनीतिक कविताओं में कमबेशी बनते-बिगड़ते दिखेंगे । परन्तु ये अपने वास्तविक सच होने के कारण इस आरोप से मुक्त भी हैं । यह भी कि अनिल चतुर्वेदी की कविताओं में कहीं कहीं पराजय बोध निरूपायता और अपने असहाय होने की गुंजाइश तथा स्वीकारोक्ति में भी दिखे हैं , फिर भी अंत में मैं यही कहूंगा कि ये कविताएं अपने भावबोध , अभिव्यक्ति की सीमाओं को दरकाने में कसर नहीं छोड़ते तथा व्यापक समाज के हितार्थ अपना ध्यान आकृष्ट कराने सफल होती है । कहूंगा कि इन कविताओं की खूबी में अनिल चतुर्वेदी के द्वारा प्रयुक्त प्रतीक , बिम्ब विधान और उनका व्यंगात्मक शैली है जो कविता को अपने शिल्प की अनगढ़ता से बांधे रखती है ।


संग्रह के प्रकाशन में जरूरी संपादन मशवरा न मुहैया कराना बिम्ब-प्रतिबिंब की कोताही और हड़बड़ी को दर्शाता है । काफी लापरवाही बरती गई है । यह शीर्षक और कविताओं के रिपीटेशन में झलकता है । जवाबदेही बनती है । प्रकाशन सिर्फ व्यवसाय नहीं है , जिम्मेदारी भी है ।

खैर अनिल चतुर्वेदी को खूब बधाई व स्नेह कि वे अपना पहला संग्रह ला सके । सस्नेह सादर

Friday, April 29, 2022

गणेश पाण्डेय

बगैर किसी वास्तविक आशय अथवा तथ्यों की समझ के जब भी हम बात करेंगे वह हल्का ही लगेगा ! गणेश पाण्डेय की आलोचना पद्धति पर लैंगिक भेद का आरोप मढ़ते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके कथन में निहित भाव का सारांश लैंगिक न होकर आलोचना के छद्म और विकार पर उनका कहा दारूण सच है । इसके लिए 'मर्दाना' अथवा 'जनाना' आलोचना शब्द के भावों को समझना जरूरी है ।

"मैंने जिसकी पूंछ उठाई
उसको मादा पाया"

 मैं यहां धूमिल की पंक्ति को इसलिए रख रहा हूं कि धूमिल के इस काव्य चेतना में भी क्या उन्हें यही लैंगिक भेद दिख रहा है या वह सच नहीं दिख रहा है जो धूमिल या कि गणेश पाण्डेय दिखा रहे हैं । तब साथी आपके सृजनशीलता पर मुझे संदेह है ।

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...