Wednesday, June 29, 2022

अनिल चतुर्वेदी की कविताएं

अनिल चतुर्वेदी का 'शहर उदास नहीं होता' पढ़ लिया ; और मैं उदास नहीं हूं । उदास नहीं हूं तो इसलिए कि 90 के दशक में जिन्हें बकौल कवि पहचाना जाना चाहिए था , वे कविता की दुनिया से लगभग गायब हो गए और आज जब फिर मिले , पुनः लिखना हुआ , तो कवियों में शुमार होने की काबिलियत के साथ  , पूरे शबाब में मिला । ऐसा कम ही कवि होंगे जो बकौल समाजिक , राजनीतिक चेतना से संपन्न हो , एक लंबी चुप्पी और विराम के बाद पुनः सक्रिय लेखन से जुड़ आगे आया हो ; तो निश्चित तौर अनिल चतुर्वेदी उसमें शामिल किए जा सकेंगे , यह कहने मुझे जरा भी संकोच नहीं होगा ! अनिल चतुर्वेदी 90 के दशक से लिख रहे थे । कि वैयक्तिक कारणों से इस राह की यात्राएं उन्हें स्थगित करनी पड़ीं ।  किन्तु अभिरुचि और साथ नहीं छूटा । कि साहित्यिक दखल के तौर पर पहले संवाददाता और फिर बतौर संपादक के रूप में वे विभिन्न अखबारों में काम करते हुए अपनी उपस्थिति को किसी मंंजे हुए कलाकार में भाष्य बनाते ग‌ए । वे विगत कुछ सालों से स्वतंत्र लेखन और कवि कर्म में तगड़ा हस्तक्षेप करते दिखाई दिए हैं । इसे कोई कवि , कलाकार  जज्बा ए जूनून के परस्पर सघन सिक्त जीवन अनुभवों , वैचारिकी और संवेदना के रास्ते चलकर ही संभव बना सकता है । अनिल चतुर्वेदी में संघर्ष तथा कामयाबी का यह गुर इन मायनों में स्वस्फूर्त तथा वंशानुगत है अर्थात् 

*तेज धार का कर्मठ पानी काट रहा है तट चट्टानी*

के जैसा ही जीवट और जुझारूपन में भरा, दिखाई देता है ।

 यह समय था ‌। सोवियत संघ के विघटन का , फिर देश में भूमंडलीकरण , उदारीकरण के दबाव के बाद अचानक से आए शीतकाल का । चारों ओर लोग-बाग में भय आशंका और सिर्फ निराशा दिखी । जो मनुष्य के मानसिक स्थिति पर इतना गहरा प्रभाव डाल चुका था कि उबरना कठिन हो चला था । वह असुरक्षा बोध से घिरा एक सेफ जोन की तलाश में चुप्पी को अपना कंदरा की तरह प्रयोग में लाने लगा ‌। हर दूसरी बात पर सिर्फ समझौते को अपना आखिरी प्रस्ताव की तरह स्वीकार किया था । ‌ स्थिति देखने समझने में यह थी  कि

"धरती की सारी नदियां मिलकर भी 
समुद्र का खारापन कम नहीं कर पातीं !"
 

अर्थात् विभिन्न छोटे बड़े आंदोलनों से तत्कालीन व्यवस्था कहीं भी विचलित नहीं थी ! यानी कि

"इतनी सारी नदियों से कोई फर्क नहीं पड़ता" (उन्हें)

"समुंदर का पानी न घटता है न बढ़ता है !"

यद्यपि आवाजाही थी फिर भी उन ताकतों के आगे विवश था मनुष्य कि

"जबसे वह इस धरती पर है 
पोषक बना हुआ है इसी व्यवस्था का"

व्यंग-व्यंजना में अनिल चतुर्वेदी कमाल दिखाते हैं । मध्यवर्ग उनके निशाने पर आते हैं । जिसे वे एक लंबी रूग्णता में देखते हैं , कहते हैं कि

"यह उसकी समझौतापरस्ती है 
या विवशता 
वह अब भी राजा के बगैर नहीं रह सकता!"

वे कहते हैं मनुष्य का नियंत्रण व्यवस्था पर हो किन्तु चीज़ें इसके उलट बह रही है कि

"वह सम्राट की तर्ज पर ही शासक चुनता है
 उसकी इच्छा पर शंख और थाली बजाता है 
फिर अपनी बदहाली का राग सुनाता है"

जबकि सृष्टि की यह सर्वोत्कृष्ट रचना अपनी निरी कायरता और कातरता के खोल में दुबक चुप्पा है । इस कविता के कुछ काव्य पंक्तियों में अनिल के यहां भी घालमेल है जबकि लक्ष्य अपने कांसेप्ट पर ही केन्द्रीकृत है । वे मानते हैं कि व्यवस्था का विरोध नागरिक समाज के सश्रम संघर्ष से ही फलित होगा । छद्म और समझौतापरस्ती से हासिल में निराशा हाथ आएगी । 

अनिल चतुर्वेदी ने नागरिक बोध और चेतना का खासा प्रभाव है कि वे निराशा के बनिस्बत ओज और नाराजगी में अपने सारे निर्णय सुरक्षित करते हैं । यह उनके 'व्यवस्था' क्रम की उन आठ कविताओं में शिद्दत से आए हैं ।  मसलन 'व्यवस्था -1'

सुबह की अगवानी में
चहचहाते हैं परिंदे 
एक आदमी ही है 
जो खामोश है

अनिल चतुर्वेदी इसी समाज के ही घटक हैं । और जिनके लिए ; जो उनका आग्रह है वे भी इसी समाज के ही घटक हैं । इसलिए वे उन्हें बार-बार अपने लपेटे में लेते हैं


वही 'व्यवस्था-2' में वे व्यवस्था के कुठाराघात और उसके व्युत्पन्न से उपजी खाई को ब्लैक होल में देखते हैं । 

"जब सब कुछ सिमट रहा हो
केन्द्र की ओर
पूरी बात परिधि में ही घूम रही हो
समझ लीजिए 
कि तारा मर रहा है
और बन रहा है ब्लैक होल

मैं इधर देखता हूं और पाता हूं कि अनिल चतुर्वेदी के यहां दृष्टि साफ़ है , फोकस में एक पुष्टि की तरह मौजूदा समय है । दृष्टव्य व्यवस्था-3


"फूल और कांटों की दोस्ती
किसी व्यवस्था के
तहत ही है होती"

अनिल चतुर्वेदी की कविताओं में बात अपने ठसक और दावेदारी में है । यथा 'व्यवस्था- 4'

"सूर्य तरेरता है आंखें 
और सहमी हुई पृथ्वी उसका चक्कर लगाती है"

वही इन कविताओं को अभिव्यक्त करने अनिल चतुर्वेदी ने खूब बिम्ब विधान गढ़े हैं । मसलन कि 'व्यवस्था- 5' में वे कहते हैं कि कीमियागरों ने जब घोड़े को घोड़ा , कुत्ते को कुत्ता , गधे को गधा भेड़िए को भेड़िया बनाया और शेर को शेर रहने दिया , तो रत्ती भर संदेह नहीं होना चाहिए कि धूर्त चालाक व्यवस्था के निर्माण की धुरी के निमित्त में यह वैमनस्यता ही रही । अनिल की ये कविताएं संदेह और सवालों के हवाले , आकार लेती है । सवाल यह आदमी कौन था ? क्या वाकई आदमी था कि लोक जन का असली दुश्मन ! जिसने सहूलियतों को पैमाने पर रख व्यवस्था बनाया । जैसा कि 'व्यवस्था -6 'में वे कह रहे हैं कि आबाद जंगल की सभ्यताएं भी आखेटकारी शिकारियों के अधीन अपनी मासूमियत में जूझ रही है और उसे ज्ञात सूत्र हाथ नहीं आ रहे कि

"नागरिक व्यवस्था नागरिक नहीं है"

व्यवस्था की मार और उसके झोल में फंसे आदमी की गहरी चिंता यदि अनिल चतुर्वेदी के यहां उनके पक्ष में है , तो वे जरूरी लताड़ भी हैं जो उनकी नादानियों और बेवकूफियों से खड़े किए जा सके । उनके सवाल होते हैं सरकार से , व्यवस्था से , यदि सरकार जनता के लिए जनता के द्वारा चुनी हुई है और वह नाकाम है अथवा कि विभिन्न कारगुजारियों के बाद भी किस आधार और ताकत से सत्ता पर बची हुई  है , बनी हुई है ? पाई-पाई तिनका-तिनका जोड़ मनुष्य ने जिस व्यवस्था का निर्माण किया , उस व्यवस्था के होने न होने का क्या अर्थ रह जाता है जिसके होने पर भी न पाई बचती है न पूंजी । प्रतीकात्मक बिम्ब की इस कविता में अनिल चतुर्वेदी बहुत तीखे और तेज़ होते हैं

"कितनी मुश्किल से 
चिड़िया अपना घोंसला बनाती है 
फिर भी अपने चूजे को नहीं बचा पाती 
अक्सर सांप निगल जाता है उसके चूजे"

जबकि व्यवस्था के नाम कार्यपालिका , न्यायपालिका और व्यवस्थापिका है । फिर भी

"परिंदा क्यों अपने चूजे क्यों नहीं बचा सकता 
क्यों सांप को उसकी मनमानी से नहीं रोका जा सकता"

सवाल हैं । सवाल दर सवाल कि

"सूरज जो अभी कुछ देर पहले ही निकला था 
सारी दुनिया में फैला था 
क्यों नहीं कुछ करता है 
आखिर वह भी तो इसी व्यवस्था का हिस्सा है"

फिर ये निर्मम बेरुखियां कहां जन्म लेती हैं ? यहां , यह किसी तरह का असहाय या पराजय बोध नहीं है । बल्कि सिक्त संवेदना है जो असहाय कि निरूपाय कभी नहीं होती । वह निरंतर गतिशील हो अपने जीवित होने के सबूत के साथ आगे आती , अभिव्यक्त होते रही है ।  बल्कि किन्हीं मायनों में यह थके हारे निरूपाय और निर्बल लोगों के हिस्से की धूप को इकट्ठी करने की जद्दोजहद में मनुष्यता के मांग को दुहराती है । अर्थात् 

"मैं चुप नहीं हूं 
नहीं रह सकता 
मेरे हृदय की सीप में मोती की तरह 
पल रही है एक कविता"

रसूख से अभिमान और प्रदर्शनप्रियता , फिर आडंबर और अतीत जीविता हमारे समय का सच बनता जा रहा है । यह भंगुर है । आज का आदमी यदि अपने अनुभवहीनता में अपने रसूख को सच मान , स्वांग तथा स्वार्थ में अपने मूल भावों से फिसल रहा है तो यह उसकी बेगैरत को दर्शाता है । यह दावा अनिल चतुर्वेदी का भी है

"फिलहाल आदमी बहुत बाद में है 
और आदमकद यहां कोई नहीं"

अर्थात् कि

"मैं उस धरती पर रहता हूं
जहां सूर्य भी बहुत छोटा दिखाई देता है
और सितारे दिख जाएं 
यही बहुत है"

फिर किस बिसात की बात ! क्या अभिमान या कि गुमान !! वृथा है , व्यर्थ है  सभी । इस तरह के अकाट्य कर देने वाले भाव विचार भी अनिल चतुर्वेदी में बहुतेरे हैं ।

साधारण आदमी की तरह हुआ है पलटू राम । नाम , पात्र और परिवेश में ग्राम्य ग्रामीण पलटू राम बेपरवाह अल्हड़ , श्रम साधक किसान है । परिस्थितियों ने उसे कृत्रिमता से विरक्त नैसर्गिक स्वभाव में मस्त रहना सिखा दिया । तब नहीं था ऐसा वह जब साधारण किसान था !  यूपी , बिहार , महाराष्ट्र , कर्नाटक, हरियाणा और पंजाब में यह इसलिए आ खड़ा हुआ चूंकि सामने हत्यारी सत्ता थी । उसकी फौजें थी । दलाल और आवारा पूंजी का मोहपाश था और बस्स 'वे' ही थे

"यह कम नहीं कि वह पेड़ नहीं हुआ ......( और )
 कम अज कम किसान के रूप में 
आत्महत्या करने से बच गया !"



इसलिए कि पलटू राम ने एक स्थिति के बाद खुद को तैयार किया ।

मैं पुनः पुनः कह रहा हूं कि अनिल चतुर्वेदी के यहां शब्द से अधिक चित्र यथार्थ गहराया हुआ है । उनके प्रतीक और बिम्ब अलग ही आख्यान रचते हैं और कालीन परत चढ़ाए नक्काशी से अधिक , चीजें उन्हें सरल रूप सौंदर्य में स्वीकृत होते है । जैसा कि दिन निकलता है रात होती है ; सुबह होती है शाम होता है । एक व्यापक समाज के सच को अपने तरह से देखती फिर उसे अभिव्यक्त करती इस कविता में अनिल चतुर्वेदी ने कृत्रिम पद्धति के जीवन सच और उस मुखौटे के प्रति भी हमें आगाह किया है कि 'नया साल' शब्द है । सिर्फ नाम है तथा शेष चीजें भरमाई हुई हैं । चूंकि जो मचा था

"समुंदर में हाहाकार वह
तो पहले जैसा ही है 
और नदियां 
अपनी नीयति में 
सिकुड़ कर लीन हो रहीं  
वृक्षों की वेदना पहले जैसी ही रहीं 
रामलाल का साल तो सालों से ठहरा हुआ है"

जीवित आदमी की चेतना कभी निरपेक्ष नहीं होगी । वह कभी डि-रेल नहीं होगा । सारी कोशिशें नाकाम होगी यद्यपि वह उपेक्षा भी करेगा तो अपनी सापेक्षता को अलगा नहीं पाएगा । मनुष्य का समाज विज्ञान इसी रूप में स्वीकृत है । इसी में प्रभावी है । चाहे वह लाख कोशिश करें देश , समाज , अर्थ , राजनीति से शून्य नहीं हो सकता ! कोई भी कोशिश उसका नाकाम होगा न विफल रहेगा

"घटना से निरपेक्ष 
मैं अपनी खामोशी में 
कुत्तों की उपेक्षा कर 
रातभर 
सोने की नाकाम कोशिश में लगा रहा"

देश समाज और राजनीति की जहीन समझ के बाद आदमी निरपेक्ष नहीं हो सकता । तेज हांफते-भागते जिंदगी के फलसफे में तेज नहीं है कुछ भी । विकास क्रम में मनुष्य और प्रकृति तथा जीव जगत का व्यवहार अपने गत्यात्मकता में क्रमिक है । वह सघन और घनीभूत है । देखने के बनिस्बत परखने में दृष्टांत होता है कि कैसे

"धीरे-धीरे उतरती है शाम 
रीत जाता है दिन 
धीरे-धीरे लोहे में लगती है जंग 
धीरे-धीरे वेदना की आंच में पकती है रूह 
धीरे धीरे अंकुरित होता है प्रेम"

तमाम-तमाम नैसर्गिक प्रक्रियाओं के बाद अनिल चतुर्वेदी में जो भौतिकी का द्वंद दिखाई देता है वह जमीन के स्तर में मजूर ,  किसान , कामगार के पक्ष में आ खड़े होता है ।

'शर्माती हुई स्त्री' अपने सौंदर्य बोध के लिहाज़ से एक 'अच्छी कविता' है । अस्तु स्त्री चीज नहीं है । वस्तु नहीं है ,अस्तित्व है स्त्री । अतः कोई भी पैमाना या कि मानकीकरण इसके लिए कतई ठीक नहीं । वह देवी अथवा शक्ति , या कि कोई आराध्या नहीं है । यदि हम कुछ निर्धारित कर रहे होते हैं , तो यकीन मानिए सत्ताधीशों की तरह कभी हम भी आक्रामक होंगे ही !  हम उस प्रकृति और सौंदर्य की अनुभूति पर आधिपत्य मान जंगलों और फसलों की तरह उसे सचेष्ट काटेंगे । अतः जरूरी सावधानी के साथ कहना चाहता हूं कि उसके अस्तित्व के साथ सहज और सरल बने । उस एक शर्माती हुई स्त्री को कायनात की सबसे अप्रतिम परिघटना की तरह देखें । लेकिन ठहर कर देखें । उसके सप्रमाण जीवंतता को अवांछित तारीफ़ और प्रशंसा से भरें नहीं । चूंकि कायनात के सबसे अप्रतिम सौंदर्य की हम बात करें तो यह उसके ठहराव में नहीं , उसके गतिमान में है।  उसे गति दें । उसे उसी तरह देखें , उसी तरह से लें , जिस तरह आप हैं । यह सही है कि

"वह शर्माती है 
और क्षण भर के लिए 
यह पृथ्वी ठहर जाती है 
सूर्य अपनी राह भटक जाता है"

इस अभिभूत सौंदर्यानुभूति को किसी ठहराव का आधार न बनाएं  ।

दृश्य बिम्ब भी अनिल चतुर्वेदी के यहां रक्ताभ लिया प्रतीत होता है । मसलन कि यह 'शाम का एक बिंब' है जहां

"लाल हो गया है आसमान  चू पड़ेगा अभी बादलों से रक्त" 

या कि दूसरा बिंब निसंग रात्रि का है जहां

"गहन अंधकार 
सृष्टि है निस्तब्ध

और मरसिया पढ़ रहे चांद सितारे हैं

परिवर्तन प्रकृति सम्मत परिघटना है । आप चाहकर भी उसे नहीं रोक पाएंगे कि नियंत्रित कर सकेंगे , कि हिस्सेदारी ही तय कर सकेंगे ! परन्तु नवीनता की चाह में वांछनीय तथा नवीन क्या हो ? यह तय कर सकेंगे । अंधाधुंध औद्योगिकीकरण रीयल स्टेट बाजार में भू माफियाओं की तूती बोल उठी है । कि बंधक बनाए गए वे किसान के माथे पर सवार हैं , जिनके घर पूंजी और बाजार है , सत्ता का सरोकार है । कि अनिल चतुर्वेदी को कहना होता है

"शायद इसीलिए हमारी राजनीति में 
इन सवालों से गुजर कर जाने का कोई रास्ता नहीं है"

और 

"हम उम्मीद करते हैं कि वह विद्रोह करें"

कम मुश्किल नहीं है । ताबूत तक घुटने टेक चुकी जनता के असहयोगात्मक रूख से कि वे विरोध अपने दम करें । हालांकि वे ऐतिहासिक किसान आंदोलन से साबित कर सके हैं कि आन पर जब आए बात , मिट ना पाए साथ ।


'कुछ हिस्सा उनका भी है' बकौल Bhaskar Choudhury  कि

"सूर्य की किरणों पे हक तो हमारा भी होगा 
ये और बात है 
तुम्हारी छत ने उसे रोका होगा"

अर्थात कि यह

"तुम्हारी जिद है चल जाएगी पर आंसुओं के समंदर में तुम्हारी नीव भी ढह जाएगी"

यकीं कर ऐ ज़ालिम यह गरीब गुरबा की बद्दुआ है लग जाएगी ! सच कि

"चांदनी की बात है वह तो तुम्हारी है !" 

किन्तु बकौल बिस्मिल अज़ीमाबादी हम कहेंगे जरूर

"वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां
अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" ।

की उक्ति में अनिल चतुर्वेदी शोषक को निशां पर रखते हैं और अंदाजे गुफ्तगू कहते हैं कि 

"अब सोच लो 
तीर का अगला निशाना तुम सरीखा बाज़ है"

यह कि

"खूब खेले तुम परिंदों से
मर गया अहसास है ।"

अनिल चतुर्वेदी की यह कविता उनके आरंभिक दिनों की है फिर भी अपनी चेतना और छाप में वैचारिकी को लेकर डंटी हुई है ।

'यही सोच रहा था' शीर्षक कविता फ़ौरी तौर पर लिखी कविता लगेगी परंतु इस कविता में जो रिसाव है  वह मिक साइनाइड की तरह जहरीली विषबुझी सी है जो अपने मारक क्षमता से सरलीकरण के भ्रम को तोड़ती है ;  तोड़ती है कि कविताएं रचना सामान्य बात भर नहीं है । खैर रूग्ण मानसिकी संघर्ष के पथ के बजाय डिमांड और वर्चस्व से चीजों को हासिल चाहता है । मसलन


"वे मेरा ख्याल रखें 
मैं जब भी कुछ कहूं उसे आदेश समझें 
उसका फ़ौरी अनुपालन करें"

परंतु यह पराकाष्ठा होगी कि

"पहले भी जब कभी 
मैं बीमार हुआ था 
तब मुझे राजा बनने का ख्याल आया था"

अथवा कि

"और जबकि यथार्थ यह है कि राजा बनने का ख्याल सबसे पहले किसी बीमार को ही आया था"

प्रकृति में संतुलन , अर्थात् समतामूलक परिवेश डिमांड की तरह हुआ ! संतुलन की यह मांग नैसर्गिक तथा अगेंस्ट नेचर के मध्य दीवार की तरह खड़ा है । यह अस्तित्ववादी मानुषिक विचार है । परन्तु भौतिक जीव जगत इस आशय की कोई ठोस पुष्टि के अभाव में , इससे इत्तेफाक नहीं रखता । क्योंकि धूप ,  पानी , हवा , नदी-नाले , पहाड़-पर्वत के किसी भी पर्याय में वह चराचर को उपभोग में अंगीकार किया है । यह तो हम पर निर्भर करता है कि उसे हम बनाए रखते हैं कि छिन्न-भिन्न करते हैं । इसलिए ही कह रहा हूं कि इस पर नजरिया अस्तित्ववाद के बजाय भौतिक समाज विज्ञान के आधार विकसित किए जाएं । एक कवि कलाकार इसी में वरेण्य है । वह देखता है कि

"हत्याओं का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता 
फिर भी शहर उदास नहीं होता"


पाता है कि थाना , कोर्ट-कचहरी , भूख-भीड़ सा 

"सत्ता की मीनार पर 
हत्या एक सीढ़ी है"

जीवन संग्राम में निरंतर युद्ध लड़ा जाता है ,शहर उदास रहे ना रहे कवि उदास होता है ! और मैं इसलिए उदास नहीं हूं तथा आशान्वित हूं कि कवि अपने दायित्वों का निर्वाह निरंतर ईमानदारी से कर रहा है ।

''कितनी झूठी सांत्वना , कितना गहरा छलावा है"

'निर्बल के बल राम हैं' । यह भारतीय निम्न मध्य वर्ग है जो अक्सर ही मारा जाता है । कहने को

"दावा है कि संविधान में 
उसके लिए न्याय की मुकम्मल व्यवस्था है" (निष्प्रभावी) 

जो

" इसी तंत्र के हिस्से हैं"

सोचो कि,  देखो कि

"मसलन कितनी ही प्रार्थना करो 
पर इंद्र बारिश नहीं करा सकते 
और पशुपतिनाथ को चूहे कुतर रहे 
देवियां तो सारी की सारी बन गई हैं (महाठगनी) 
हुकूमत की चेरी"

अनिल चतुर्वेदी ठीक पहचान करते हैं कि

"समस्या इतनी ही नहीं 
वस्तुत:  लोक पर तंत्र का शिकंजा 
कुछ इस तरह से कस चुका है 
कि लोक कराह भी नहीं सकता 
और विडंबना यह कि 
लोक समझता है कि तंत्र वही चलाता है"

यथार्थ बोध से लैस अनिल चतुर्वेदी की इस कविता में आज के राजनीति विज्ञान की बखूबी पड़ताल है ।

यह इक्कीसवीं सदी का आरंभिक समय और दूसरे दशक के उत्तरार्ध से प्रारंभ हुआ तीसरा दशक है । कहना न होगा कि जिस अनुपात में चीजों का स्थगन , विलोपन की भाषा में पुनर्निर्माण ही ; होने चाहिए उससे कहीं कई गुना तेजी से चीजें बदल रही है कि

"मैं चलता हूं लगता है 
लोग देखते हैं मेरी ओर"

अर्थात् कि 'मेरी आदमीयत संदेह के घेरे में' है । यही है वह बदलाव , कि पैदा हुई संदेह और ठिठक गए कदम ! आशा दुराशा के बीच पेंडुलम सी लटकती रह गई देह । जबकि 

"मैं कोशिश करता हूं 
भीड़ से तादात्म्य करने की 
और अकेला हो जाता हूं"

'मेरी आदमियत संदेह के घेरे में है' यहां इस कविता में कवि ऐसा इसलिए कह रहा है कि वह अपने होने के अर्थ में आदमी होने की शर्त को जीता है , कि तब पाता है आदमी और आदमीयत की परिभाषा भीड़ की तरह खतरनाक स्थिति में है  ।

यथार्थ नंगा होता है , जब कभी अभिव्यक्त होता है । प्रभावी कागज दवात के माध्यम अनुभूत सच और विचार को जब हम उसके कला धर्मी रूप में अभिव्यक्त करते हैं तो प्रभावी कारकों के बाद भी कला की महीन परतों से वह ढंक जाया करती है मसलन कि जहां 'भूख की सत्ता है'

"भूखा बालक रोटी मांगते 
आंखों से ओझल हो गया 
अब उसे किताब के पन्नों में खोजा औ पढ़ा"


दैनंदिन देश , समाज और व्यवस्था की भाषा दुभाषिए-सी होने लगी है । चीजों को भाष्य बनाना दुष्कर हो गया है । प्रतिमानों में , विचारों में सामंजस्य लाए जाने की महती आवश्यकता है । यह अनिल चतुर्वेदी 'पिता की पुत्र को नसीहत' शीर्षक कविता में कैसे साफ कर रहे हैं ,देखा जाना चाहिए 

".... क्या आते ही रोने लगे
...... मगर मेरे बच्चे रोना अब कारगर अस्त्र नहीं रहा""" । यह उक्ति भी फेल हो चुकी है की मां बच्चा को तब तक दूध नहीं पिलाती जब तक कि बच्चा रो नहीं देता अर्थात् दुनिया बहुत बदल चुकी है अब । ईजाद भाषा में सिखाया जाएगा दूध पीना । इस तरह से कि


"लोमड़ी की तरह पेश आओ
जब शेर सामने हो 
भेड़ियों के बीच फ़ौरन भेड़िया बन जाओ 
हां वफादारी के लिए हमेशा कुत्तों पर भरोसा रखो 
गिरगिट की तरह रंग बदलना तो कतई सीख लो
एक बात तो गांठ बांध लो सिर्फ इंसान होकर तुम नहीं जी सकते हो"

बहरहाल जिस तेजी से दुनिया बदल रही है

"एक आखरी बात और कहूंगा मेरे बच्चे
की उम्मीद बिल्कुल ही खत्म नहीं हुई है
तुम इंसान हो 
इस दुनिया को बदल भी सकते हो"

वस्तुतः इस कविता में कवि की यही वास्तविक एंट्री है जो इंटरवल के बाद की है

देव , दानव  ,ऋषि  , गंधर्व , हूर परी मिथ कथाएं हैं । वाचिक परंपरा ने इसे बल दिया । किंतु मनुष्य मिथ नहीं है । कागज कलम दवात मिथ नहीं है । स्वभाव से नरभक्षी शेर , विषैले सांप मिथक नहीं है । सोख़्ता स्वभावत: है । प्रैक्टिकल में है । किन्तु असुर और दानवों की विनाश की बात की जाए तो  मिथक से बड़ा उपाय कुछ नहीं । अतः वह वांछनीय हो जाता है । तब / जब

"रात की स्याही से 
दिन के कागज पर 
लिखना चाहता हूं एक शब्द-उम्र"

कि जिसे पढ़ , चाहता हूं

"एक नरभक्षी शेर की आंखों में आंसू आ जाए
जहरीला सांप फेंक दे अपनी विष ग्रंथियां
और एक आदमी बन जाए तो दधीच 
दान कर दे अपनी अस्थियां असुरों के विनाश के लिए"

तब

"सोख्ते की तरह मेरा यह (शब्द)
सोख ले
आदमी का दर्द उसकी सारी विपत्तियां"

जबकि 

"मैं परेशान हूं 
कैसे लिखूं .....
वह सब इस तेज़ बारिश में"

दया , करूणा , क्रोध चेतना , सौंदर्य की जितनी अर्थवत्ता अपनी है सार्थकता भी उसी अनुपात में और उतनी ही है । यह एक चेतना संपन्न मानव के भीतर संश्लिष्टता में पाए गए हैं । अर्थात्

"जहां आदमी होने की शर्त नहीं टूटती"

निश्चय ही वही जहां कोई कृष्ण पैदा हो जाता है । अनिल चतुर्वेदी इन चीजों के महत्व को अपने अंगूठे के मुहर से स्थापत्य देते हैं की यह दुनिया , इसी  के साथ बची रहे ।

भूख हमारे समय का सबसे बड़ा समकालीन यथार्थ है । हम न डरते कदाचित् कि यह न होता ! किंतु डर जाते हैं और खौफ खाते हैं तो इसलिए कि एक आग हमारे भीतर जलता रहता है । जबकि उसने जंगल और प्रकृति पर विजय प्राप्त किया ,लांघा समुद्र को , तोड़ा पर्वतों को । यह भी कि चांद के सीने पर पैर रखा । फिर

"आखिर कहां से आया होगा खौफ़ 
पहली बार आदमी के सामने"

निश्चय ही ऐसा है कि 

"जब आदमी ने आदमी पर आक्रमण किया होगा , 
तब वह पहली बार डरा होगा !"

या कि

"आदमी सबसे पहले डरा होगा 
जब वह भूख से लड़ा औ मरा होगा"

कि

"आज भी उसके हृदय पर अंकित है 
पराजयबोध के वे निशान 
आज भी वह होता है भूख से सर्वाधिक भयाक्रांत"

अनिल चतुर्वेदी ने अपनी अधिकांश कविताओं में भूख , मनुष्यता , इंसानियत , आदि को स्थायी तथा केन्द्रीय भाव दिया । भले ही कहीं-कहीं ठिठकना भी हुआ । जो  एक निरंतर गतिशीलता से उचट क‌ई क‌ई बार पुष्ट में अपुष्ट को लिए आ ही जाता है ।  यह द्वंदात्मक भौतिकी में आत्मसंघर्ष की प्रक्रिया है । जो उनके यहां बना रहता है । मसलन कि इंसानियत से दूर हुआ जा रहा मानव के देह तक में बह रहा रक्त का रंग तब भी साबूत लाल है ।

एक लेखक का पक्ष होता ही है । वह कहीं ना कहीं , किसी ना किसी ओर झुकेगा ही ! यह झुकना , झुकना नहीं , अपितु पक्षधर होना होगा । इन अर्थों में अनिल चतुर्वेदी की पक्षधरता वाम मार्ग को जाती है । चूंकि उनकी पहली और जरूरी चिंता में मनुष्यता का बचाव है । यद्यपि अनिल चतुर्वेदी में एक आदमी के दुख , पीड़ा , संतोष और सरोकारों का संवेदनागत विस्तार दिखाई देता है किंतु देखता हूं कि उनमें वामपंथ से एक दार्शनिक दूरियां भी है , जो अज्ञेय को जाता है । यह लोच है । जबकि वामपंथ वस्तुतः एक सीधा-साधा संघर्ष पथ है । क्रियाशील गतिशीलता का पथ है । अर्थात की कार्रवाई का पथ है । मैं इसे एक रचनाशील आदमी में दुर्बलता की तरह कोट करते आया हूं ।

"जो छले गए हैं रोशनी में 
वे लोग इसे जानते हैं 
रात जितनी अंधेरी होती है सितारे उतने ही चमकते हैं"

या कि

"इसे वे कैसे जानेंगे 
जो खुशी के गीत गाते हैं"

अलबत्ता जानेंगे वे

"जिन्होंने सीख लिया है तैरना 
गमों के समंदर में 
किनारे खुद ब खुद चलकर उनके पास आते हैं"

'जो छले गए हैं रोशनी में' कविता गीतात्मक शैली की जीवन अनुभव से निकली कविता है । जिसमें यथार्थ का जो गहरापन हैं वह महसूस करना होता है उसके उद्दीपन में तप्त देह की आंच को आभास करना होता है ।

आजादी को गर्वानुभूत मान प्रदान करने में राष्ट्रगान एक वह शै है जिससे हम अपने सामूहिक चेतना को बल प्रदान कर सकते हैं । अभिभूत हो सकते हैं , यह भी कि अपनी आजादी के अर्थ को हासिल करने के लिए ही , यह हुआ ! तभी तो 1947 घटी । किंतु अनिल चतुर्वेदी की कविता की बयानी  सैंतालीस के बाद और मोहभंग की है । जो मिली , अप्रत्याशित असफलता के रूप में मिली ; जस की तस में मिली ।

"जब राष्ट्रगान गाया जा रहा था
तब देश के करोड़ों भूखे लोगों ने उसे पेट से सुना"

और यह वही सिमट गया ।
जबकि वह लड़ाई भी उनके भूख से मुक्ति के लिए थी । आज जब हम सत्तर साल के इतिहास की बात करते हैं तो बरक्स में हासिल की बात भी हो ;  परन्तु यह अब भी जस का तस है ।

कवि हो और प्रेम की सघन अनुभूति तथा विस्तार ना हो , कैसे संभव है ? कोई भी सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक चेतना का सृजन तथा उसके फ्लैशबैक में प्रेम ही वह सिक्त भाव है कि हासिल में

"महासागर की अनंतता में खोई हुई तुम्हारी निगाहें 
जो झुकी हैं इस तरह कि न जमीं देखती हैं न आसमान 
यह शायद देश काल से पार सुदूर अंतरिक्ष में 
देख रहीं हों तुम्हारा देह रहित विस्तार"

अनिल चतुर्वेदी अपनी इस कविता में प्रेम के यथार्थ को दार्शनिक स्वीकृति प्रदान करते हैं , कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं

"धरती की छाती फाड़ कर फूट पड़ने वाले बीज की ताकत भी तुम ही हो 
अनंत काल से सूर्य का चक्कर लगा रही पृथ्वी का धैर्य भी तुम ही हो"

अर्थात्

जिसे मैं कह सकूं बस यही है प्यार 
ओ मेरे प्यार !

अनिल चतुर्वेदी की इस कविता को देखते हुए मुझे बांग्ला कवि रवींद्रनाथ  टैगोर , माइकल मधुसूदन , क़ाज़ी नजरूल इस्लाम का स्मरण हो आया ।

"तुम इस धरती पर होते हुए भी इस धरती के नहीं हो 
तुम्हारी अलौकिकता के प्रति मेरा चिर नमस्कार 
ओ मेरी चेतना के दुलारे 
तुम्ही तो हो भूखे के प्रति करुण चीत्कार  
बलात्कारी के खिलाफ सतत् आक्रोश भी 
तुम्ही हो"

प्रकृति विज्ञान की कोई भी मूर्त-अमूर्त घटनाओं के पीछे कोई ना कोई कारण होता ही है तथा कोई न कोई उसका जवाब देह भी होता है । यह अतिशय ही है कि इस व्यवस्था में , यहां जवाबदेह नहीं हैं ।

"हम एक ईश्वरीय व्यवस्था में जी रहे हैं 
जहां ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं 
हर जगह मौजूद है 
कण-कण में विद्यमान हैं पर किसी घटना के लिए वह जिम्मेदार नहीं"

यह अपने तरह का एक अनिवर्चनीय दकियानूस विचार है । यह कैसे संभव है ! यक्ष प्रश्न है जिसके लिए हम भीड़ और भेड़ हुए  , नहीं चुकते-मानने 'वह किसी भी घटनाओं के लिए जिम्मेदार नहीं' । अस्तित्ववादी दर्शन और उसकी स्वीकार्यता गहरे में पैठ बनाई हुई है तो सवाल तो बनने ही चाहिए कि

"हत्यारा खुलेआम घूम रहा"

 हमारी चुनी हुई व्यवस्था है और वह जिम्मेदार नहीं है । ऐसा कैसे चलेगा ! अस्तु या हमारा दुर्भाग्य है कि दुनिया उसकी है , और उसकी दुनिया में ,जो हैं

 "बलात्कारी नैतिकता पर भाषण दे रहा है" 


'पतंग उड़ाता हुआ लड़का' संग्रह की बेहतरीन कविताओं में है । यह देश असमय और चलते चलते बूढ़ा होता जा रहा है । अहसासात से परे वह धर्म की अफीम के नशे में है और हमारे भाग्य विधाता हैं कि निरंतर उसे बरगलाए हुए हैं । वह अपनी धुन में आसमान की तरफ देखता है , पतंग उड़ाता है , आटा , तेल , नमक  ,दाल के बढ़ते भाव को समझने की चेतना से वंचित रह जाता है फिर उसकी दिनचर्या में शामिल रह गया

"पड़ोसी लड़के की पतंग काट कर 
जश्न मनाता है 
पतंग उड़ाता हुआ लड़का बूढ़ा हो गया है"

अनिल चतुर्वेदी की कविताओं की ध्वनियों को बिना पकड़े उसकी व्यंजना को पकड़ पाना मुश्किल है जैसा कि उनकी अधिकांश कविताओं में है ।



"उन्होंने बलात्कार किए /सिर्फ इसलिए क्योंकि 
उनकी शक्लें हूबहू हमसे मिलती थीं !
वे हमारी तरह हंसते , रोते थे 
और हमारे सुख-दुख में 
शरीक होने की कला में माहिर थे ।"

नारों का अपना शोरगुल है । महत्त्व अभी इसलिए नहीं कहूंगा कि 'गर्व से कहो मैं हिंदू हूं' चूंकि यह भी एक नारा ही है । आश्चर्यजनक और बेतहाशा प्रचलन में इस बीच जो वाक्य सबसे अधिक सामने आया , वह 'गर्व से कहो मैं हिंदू हूं' ही है । यह नारा शोरगुल पैदा करने वाला नारा है । शोरगुल में कुछ भी सुना नहीं जा सकता । ‌ जैसे मनाही हो । यह कविता आवश्यक कला मांगो में भले ही खराब नहीं भी उतरे , किंतु भाव की सानिध्य प्रबलता से वह जो कहना चाह रही है , कहती है । मसलन कविता 'वोट बैंक' पृष्ठ संख्या 101को देखें

"हिंदू होने पर गौरवान्वित 
महसूस कराए जाने की 
यह प्रक्रिया 
शासक के लिए मतदाताओं 
के एक वर्ग के चयनित 
किए जाने की मुकम्मल तैयारी है"

जबकि यहां जो बात है , वे बातें कुछ और कहती हैं

"ये बात अगर 
शेर , कुत्ते या घोड़े को कहनी हो 
मसलन 
मैं कुत्ता हूं , मैं शेर हूं .....
तो इसका आशय क्या है ! मुझे इंसान होने पर नहीं 
हिंदू होने पर गर्व है"


नहीं भाई नहीं !

"आप इस मुगालते में न रहें 
कि मतदाता 
शासक का चुनाव करते हैं असल में शासक ही 
अपने मतदाताओं का 
चुनाव करता है"

संग्रह में 'कुर्सी' 'अभिनंदन' 'वे हत्यारे' 'प्रजातंत्र में शासक' 'व्यवस्था सीरीज की चार कविताएं' तथा 'प्रजा और तंत्र' व 'जनता ने थालियां बजाई' 'यह प्रजातंत्र है' 'प्रजातंत्र दो' जैसी अनेक राजनीतिक मुहावरों की कई महत्वपूर्ण राजनीतिक कविताएं हैं । जो वर्तमान व्यवस्था के चाल चरित्र को उजागर करने पूरी मुस्तैदी से जुटी हुई है । ये कविताएं हमारे समकालीन राजनीति के उन तमाम क्रूर सच्चाइयों को भलिभांति न सिर्फ देखती है पहचानती भी है , आगाह करती है ।
कविता , कला है की सच्चाईयों को स्वीकार करते हुए , स्वीकारता हूं कि कविता एक वक्तव्य भी है । अपने समय को दर्ज करता हलफ़नामा है । जो उनके इन तमाम राजनीतिक कविताओं में कमबेशी बनते-बिगड़ते दिखेंगे । परन्तु ये अपने वास्तविक सच होने के कारण इस आरोप से मुक्त भी हैं । यह भी कि अनिल चतुर्वेदी की कविताओं में कहीं कहीं पराजय बोध निरूपायता और अपने असहाय होने की गुंजाइश तथा स्वीकारोक्ति में भी दिखे हैं , फिर भी अंत में मैं यही कहूंगा कि ये कविताएं अपने भावबोध , अभिव्यक्ति की सीमाओं को दरकाने में कसर नहीं छोड़ते तथा व्यापक समाज के हितार्थ अपना ध्यान आकृष्ट कराने सफल होती है । कहूंगा कि इन कविताओं की खूबी में अनिल चतुर्वेदी के द्वारा प्रयुक्त प्रतीक , बिम्ब विधान और उनका व्यंगात्मक शैली है जो कविता को अपने शिल्प की अनगढ़ता से बांधे रखती है ।


संग्रह के प्रकाशन में जरूरी संपादन मशवरा न मुहैया कराना बिम्ब-प्रतिबिंब की कोताही और हड़बड़ी को दर्शाता है । काफी लापरवाही बरती गई है । यह शीर्षक और कविताओं के रिपीटेशन में झलकता है । जवाबदेही बनती है । प्रकाशन सिर्फ व्यवसाय नहीं है , जिम्मेदारी भी है ।

खैर अनिल चतुर्वेदी को खूब बधाई व स्नेह कि वे अपना पहला संग्रह ला सके । सस्नेह सादर

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...