भास्कर की चिंताए वाज़िब है । दिशाएं वाज़िब है । 'विकास' जिसे कि साबित करने की होड़ - सी मची है । वस्तुत: वह विकास से कहीं ज्यादा हमारी विनाश गाथा की ईबारतें हैं । जो लिखी जा चुकी है अथवा लिखा जाना शेष है । यहां इस कविता में भास्कर लगभग यही कहने का यत्न कर रहे हैं ।
इन दिनों
कम दिखाई पड़ रहे हैं सांप
छछुंदर नेवले और खरगोश
बिल्लियां भी गिनती की ही बचीं हैं
घरों में नज़र आ जाती हैं कभी कभार
आंगन से जा चुकी हैं कबका
गौरैया पंडुकी और मैना
भास्कर की इस कविता की उक्त इस पंक्ति को काव्य तर्क के लिहाज से इसलिए देखा जाना चाहिए कि चीज़ें गुम नहीं हुई है ; पर है प्रक्रियाधीन ।
एक सजग और जागरूक कवि सतत् बचाव की मुद्रा में खोने के एवज हस्तांतरित चीज़ों को पाने की प्राथमिकी से भी लगभग बाहर ही रहता है । वह उस हस्तांतरण का हिमायती इसलिए नहीं रह जाता कि वह स्वप्नदृष्टा है । वह दमक - चमक वाली आयतित दुनिया के पीछे के भयावह सत्य का रहस्योद्घाटक भी है । वह 'इन दिनो के बहाने' जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में का प्रमुख साक्षी है । भास्कर अपने इस कविता में वही रख रहे हैं जो उन्हें साफ़ साफ़ दिखलाई पड़ रहा है ।
भास्कर की यह आपत्ति निश्चय ही मेरा भी आपत्ति है । मेरे गांव -शहर में बढ़ रहे मीलों-मील 80-80 फीट तक की चौड़ी सड़कें किलो-किलोमीटर तक बनने वाले फ्लाई ओव्हर, चमक- दमक से चुंधियाई हुई पाॅश कालोनियाॅ , बड़े क्लब हाऊसेस कि गेस्ट हाऊस या कि बहुमंजली दिखावटी भवनों , स्वीमिंग पुल्स में मुझे भी विकास ठहरा प्रतीत होता है । खेती के ऊपजाऊ जमीनों का औद्यौगिक विकास के नाम उद्योगपतियों के हाथों कौड़ी के दाम बेचकर उन जमीनों को बंजर बनाए जाने की अमानुषिक कृत्यों के बीच मुझे विकास कहीं नज़र , नहीं ही आ रहा है । इसके पीछे के भयावह सत्य में मुझे भी कृत्रिमता और साजिश साफ दिखाई दे रहा है । इस विकास के एवज सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग का नमूदार प्रस्तुति और ताज़ातरीन उदाहरण बस्तर तथा उन तमाम आदिवासी इलाकों की गाथा है । जो बदस्तूर बनती ही जा रही है और जारी है , जहां जंगल के जंगल, गांव के गांव जलाए जा रहे हैं । इस उपक्रम में आम आदिवासी सरकारी मशीनरी और नक्सलियों के बीच भेंट भी चढ़ रहे हैं उनके लिए यह नीयति एक तरफ कुंआ और दूसरी ओर खाई की स्थिति विनिर्मित करती है । विकास की इस तथाकथित अवधारणा में अबूझमाड़ तो क्या ? अच्छा -भला साफ और सुरक्षित जगहों पर भी मूक तमाशा हमारी नीयति होने लगी है । प्रकृति बारूद की ढेर से लेकर कांक्रीट युक्त 'जंगल' में तब्दील होता जा रहा । गांव का शहर में घटने बढ़ने का यह मंजर बेहद पीड़ादायी है । कई-कई बार तो मुझे ऐसा लगता है विकास का पर्याय यदि यही है -- तो मैं विकास विरोधी हूं , सत्ता विरोधी हूं और सच कहूं तो देशद्रोही ही कहा जाए तो मैं शर्म नहीं ही करूंगा और ना ही कोई सफाई ही दूंगा । क्या है आखिर हमारा यह विकास का पैमाना ? कि गरीब मजूर और हमारा मध्यवर्ग ही हाशिए की वस्तु बने कि वह अपनी जिजीविषा में यह सब बर्दाश्त करे । अतः कहना न होगा भास्कर की यह कविता इसी विकास का प्रतिकार तथा सत्ता का विद्रोह है । यह समय रहते इस अवचेतन से बाहर निकाल लाने की एक बड़ी और सार्थक कोशिश है । पूंजी आज अपना नंगा नाच, नाच रहा है , डोल रहा है , थिरक रहा है अपनी उन्मता से अभद्र अंदाज में । बताना न होगा कि भास्कर की यह कविता हमारे समय के इसी भयावह और बदसूरती का आख्यानपाठ प्रस्तुत कर पाने में सफल दिख रही है ।
इन दिनो
मारे जा रहे हैं आदिवासी
कभी नक्सलियों के नाम पर
कभी पुलिस के लिए मुखबिरी के नाम पर ।
भास्कर छ ग से संबद्ध और अंतिम दशक के महत्वपूर्णं कवियों में कमलेश्वर साहू , बसंत त्रिपाठी , रजत कृष्ण , किशनलाल , कुमेश्वर कुमार , सतीश कुमार सिंह , संजय शाम , पूनम विश्वकर्मा , युगल गजेन्द्र , विश्वासी एक्का , निर्मल आनंद , सूरज प्रकाश आदि कवियों के साथी कवि हैं । वे अपने समय के तमाम चुनौतियों से लगातार मुठभेड़ कर , इस विचार से लबरेज़ हैं ।
इन दिनों
कम दिखाई पड़ रहे हैं सांप
छछुंदर नेवले और खरगोश
बिल्लियां भी गिनती की ही बचीं हैं
घरों में नज़र आ जाती हैं कभी कभार
आंगन से जा चुकी हैं कबका
गौरैया पंडुकी और मैना
इन दिनों
जब कांक्रीट के जंगल तेजी से बढ़ रहे हैं
और शहर का हो रहा है विस्तार
सुनाई पड़ने लगी हैं
जंगल से बाहर भी
जंगल में चल रही धांए धांए
दूर तक पक्की सड़कें भी थरथराने लगती हैं
गोलियों की गूंज और आर डी एक्स के धमाकों से
अखबारों के मुखपृष्ठ लाल दिखाई देते हैं
इन दिनों
मारे जा रहे हैं आदिवासी
कभी नक्सलियों के नाम पर
कभी पुलिस के लिए मुखबिरी के नाम पर
इन दिनों
छीज रहें हैं धान के खेत
छत्तीसगढ़ का धान का कटोरा लगता है जैसे
रह गया है चम्मच के आकार का
गायब हो चुके हैं
बच्चों के खेल के मैदान
उनकी जगह खड़ी हैं
बहुमंजिली इमारतें हवाई हस्पताल शापिंग माल और स्टेडियम
जहां सिर्फ आई पी एल या
क्रिकेट के नामी गिरामी खिलाड़ी खेल सकते हैं
जो अकेले ही दसों धान के खेतों का पानी
एक दिन में पी जाते हैं
इन दिनों
जब देश तरक्की की राह पर है
तेजी से घट रहे हैं -
जंगल
आदिवासी और
धान के खेत !!
भास्कर चौधुरी
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