इधर रंजीत वर्मा ने कुछ बेबाक और दहकते सवालों को अपना काव्य विषय बनाया । उनकी कविताई में काव्य विषय का चयन और कहन की शैली का जो तारतम्य है वह मुझे भी प्रभावित करता है । यानी कथ्य और शिल्प के बीच यथार्थ का जो गुथम-गुथी उनकी कविताओं में देखा गया , वह एक अलहदा खूबियों में परिलक्षित होता है । कहना न होगा कि रंजीत वर्मा की काव्य दृष्टि अपने सामर्थ्यवान खूबियों के कारण न सिर्फ सराही जाती हैं बल्कि हमारे समय को एक गंभीर इतिहास बोध से जोड़ , मंत्रणा से भर देता है । रंजीत वर्मा की कविता वस्तुत: हिंदी कविता में प्रतिरोधी चेतना की सशक्त कविताओं के साथ , हमें अपने वास्तविकता से रूबरू कराए रखने वाली जरूरी कविताएं हैं । ये कविताएं अपने लक्ष्य तथा मुहिम के साथ आती हैं । कोई दुराव कि छिपाव नहीं होता । मतलब कि जब कोई कवि आग को आग की तरह और पानी को पानी की तरह देख-समझ लेता है तो बात को वह गोलियों के बौछारों की तरह धांय-धांय उड़ेल ही देता है । रंजीत वर्मा की शिनाख्तगी भी इसी रूप में किया जा सकता है । हमारे समय के तमाम लीपा-पोती को रंजीत वर्मा सीधे-सीधे यानी फूल को फूल और शूल को शूल कहने , देर नहीं करते । वे अपनी कविता में , कोई क्रियेटिव स्केच यदि बनाते भी हैं तो स्केच के बाहर के दृश्य और संभावनाओं को भी तल्खी में बता जाते हैं । किन्तु इधर देख रहा हूं कि हिंदी कविता में कुछ कायर और कोढ़ दिमाग के कवियों का समाज सक्रिय हो गया है , उनके द्वारा कविता की मुख्यधारा को कोसना और गरियाना जारी है । प्रतिरोध अथवा क्रांति की कविताओं से ये लोग अपने लिजलिजे संदर्भों की कविता से तुलना करते , मुख्यधारा की कविता से अड़ाने की चेष्टा में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं । परन्तु मुख्यधारा की कविता है कि उत्तरोत्तर गतिमान है । वजहें जो भी है पर यह साफ़ है कि उनकी पेट से जुबां तक इंफेक्शन वैचारिक कविताओं के बेधक साहस से गहराया हुआ जान पड़ता है । जहां तक मैं देख पा रहा हूं ये लोग हर दूसरे-तीसरे लफ्ज़ पर वाम को गरिया विचारधारा के ऊपर लांछन लगाने को अपनी शग़ल बना चुके हैं । घिन मुझे उन तथाकथित काव्य प्रेमियों के प्रयोजन व उस तरीके पर नहीं आते , जो पीछे दरवाजे से सत्ता की चाकरी बजाते हुए अपना काम कर रहे होते हैं । यकीनन यह चरित्र उनका ऐतिहासिक चरित्र है ! पर मुझे घिन और उबकाई आने लगती है उनके घटिया और गैर जरूरी अल्लुक खल्लुक दांव-पेंच पर । घिन आती है उस मानसिकता पर जो सुन्दर , सजीव , और यथार्थ कला से लबरेज़ कविताओं को नकार ढुलमुल कविताओं और लिजलिजे विचारों की डुगडुगी बजाते खड़े हो जाते हैं । वाम कवियों लेखकों में तकनीकी त्रुटियां हो सकती है , किन्तु उनके विचारों में उनके तरह के कोई भी घटिया पूर्वाग्रह नहीं है , जैसा कि इधर के उन लिजलिजे दिलों दिमाग वाले कवियों में है । बेसिकली ये खलियार लोग हैं । उकताए लोग हैं । और असल में अफीमी ,भंगेड़ी लोग हैं । जो चड्डी में हैं और त्रिशूल भाले के नुकीले इशारे पर चड्डी में ही दौड़ पड़ते हैं । हिंदी कविता की ऊर्वर भूमि में यदि ये लोग चिन्हित नहीं हुए या नकार दिए गए तो दोष विचारधारा का कि मार्क्सवाद का नहीं है । दोष उस भाव भूमि की है जिसमें प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक विरासत के प्रति जिम्मेदारी का भान नहीं है । ये वो 'वीर' हैं और उसकी संतानें हैं जिससे एक दिन इतिहास को शर्मिंदा होना ही है । सस्नेह सादर पढ़िए रंजीत वर्मा की कविताएं Ranjit Verma Mili Mukherji Prashant Jain Prashant Rahi u Pratibha Upadhyaya Jyoti Sparsha Jyoti Khare Mamta Kalia Mamta Singh Naresh Saigal नदीम हसन चमन Rajanand Jha वि राग विनोद Yugal Gajendra अरविंद यादव योगिता यादव Ramprakash Kushwaha Ram Pyare Rai Ramkumar Tiwari Shubhra Singh
आओ मुझे गिरफ्तार करो
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अगर तुम लिखने के जुर्म में
वरवर राव को गिरफ्तार कर सकते हो
तो मुझे क्यों नहीं
मैं भी तो कविताएं लिखता हूँ
आओ मुझे गिरफ्तार करो
लेकिन यह जान लो
तुम भले मुझे गिरफ्तार कर लो
कविताओं को गिरफ्तार नहीं कर पाओगे
कहाँ गिरफ्तार हुईं वरवर राव की कविताएं भी
वे आंधियों के हवाले हैं
वे खुद आंधियां हो चुकी हैं
और बेखौफ अपना काम कर रही हैं
तुम आओ मुझे गिरफ्तार करो
ऐसा क्या है कि तुम
वरवर राव की कविता से तो डरते हो
मेरी कविता से नहीं
क्या मेरी कविता में कुछ कम कविता है
क्या मेरे प्रतिरोध में कुछ कम प्रतिरोध है
कहाँ रह गई कमी मुझमें
मैं भारी बोझ में जी रहा हूँ
मैं इन्हें ठीक करना चाहता हूँ
मैं जीवन से लाऊंगा चुनकर हर जरूरी चीज
भूख
टूटी हुई नींद
अनवरत जागते सपने
उदासी गुस्सा भय अपमान
मैं लाऊंगा सब
अपनी हार
और उम्मीद भी
लेकिन नहीं नहीं
मैं कविता को ही ले जाऊंगा
किताब के पन्नों से निकालकर बाहर
हर पल चोट खाती जिंदगी के बीच
जहाँ हर पल सैलाब उमड़ता रहता है
अगर फासिस्ट यह सोचता है
कि काल कोठरी का ठंडा भय दिखाकर
बर्फ कर देगा वह मेरी कलम की स्याही को
वह भोथरे कर देगा शब्द
कलम के भीतर ही
तो वह गलती में है
यहाँ खून में डुबोकर अंगुलियाँ
कविता लिखने का रिवाज है
यही कहा था फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने
अपने जमाने के फासिस्ट से
ओ मेरे जमाने के फासिस्ट
सुनो
यह उठती करोड़ों आवाजें
ढाह देंगी तुम्हारी जेल की दीवारें
मैं भीतर की आवाज में शामिल होना चाहता हूँ
मुर्दाखोर हँस रहा था
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एक जिंदा आदमी भटकता है
एक जिंदा शहर की तलाश में
और मुर्दा हो जाता है
टेलीविजन पर एक मुर्दा
चीखता हुआ पूछता है मृत सवाल
जिसका मृत जवाब
चीखता हुआ देता है दूसरा मुर्दा
टेलीविजन पर
मृत सपने लिए
करोड़ों लोग निकल पड़े हैं
वे जहाँ से आ रहे हैं
वह जगह पहले से मरी हुई थी
वे जहाँ जा रहे हैं उसे
मुर्दों की बस्ती घोषित किया जा चुका था
जनतंत्र पहले ही मर चुका था
संसद मर चुका था
अदालतें मर चुकी थीं
बहसें मर चुकी थीं
फैसले जो भी आते थे
मरे हुए आते थे
संविधान का नाम
मरी हुई किताबों की सूची में
सबसे ऊपर लिखा मिलता था
मरे हुए लोग देख रहे थे
लोगों को मरते हुए
प्लेटफॉर्म पर
सड़क पर
पेशाबघर में
और उनके इस तरह मरने पर
वे उन्हें गालियाँ दे रहे थे
मुर्दाखोर हँस रहा था
जिंदगी मौत से ज्यादा काली हो चुकी थी।
आपको सिस्टम से बाहर निकलना होगा
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मैंने सबसे पहले गोगोई की जाति जाननी चाही
पता चला कि वे ताई अहोम हैं
जिसे अनुसूचित जाति में शामिल करने की
कशमकश चली थी
इसी सरकार की शुरुआत में
आगे क्या हुआ पता नहीं
मुझे तुरंत राष्ट्रपति की जाति का ख्याल आया
वे भी अनुसूचित जाति के निकले
और अपने प्रधानमंत्री तो खैर
खुद को पिछड़ी जाति का
कहते ही रहते हैं
जातियों को लेकर
यूपीए के समय जो संजोग थे
उस पर भी एक नजर डाल लीजिए
प्रधानमंत्री सिख थे
और सत्ताधारी दल की अध्यक्ष क्रिश्चियन
और शुरूआती चार वर्ष मुस्लिम राष्ट्रपति
मतलब तीनों अल्पसंख्यक थे
इस बीच तीन वर्षों के लिए
भारत के मुख्य न्यायाधीश पद पर
कम से कम एक दलित तो थे ही
यह दो हजार चार से दो हजार बीस तक के
भारत के लोकतंत्र में मौजूद
सबसे ताकतवर पद पर बैठे
लोगों की बातें हैं
इतर इन सबके कुछ ऐसे राज्य भी रहे
जैसे बिहार और उत्तरप्रदेश
जहां पिछले तीस वर्षों से लगातार
या तो पिछड़े मुख्यमंत्री रहे या दलित
लेकिन इन सबके बावजूद
ऐसा कभी लगा नहीं कि
सामाजिक न्याय की जड़ें देश में गहरी हुई हों
या ब्राह्मणवाद ज़रा भी
टस से मस हुआ हो
या पूंजीवाद की चूलें हिली हों
हालांकि कोई कह सकता है कि
इस बीच कुछ ब्राह्मण राष्ट्रपति भी हुए थे
और कुछ ब्राह्मण मुख्य न्यायाधीश भी
लेकिन यह जान लीजिए
अगर ये नहीं होते तब भी सब कुछ
इसी तरह घटित होता
दरअसल ब्राह्मणवाद एक सिस्टम है
भारत में शताब्दियों से जो अपना काम कर रहा है
पहले यह सामंतवाद का मजबूत किला था
आज यह पूंजीवाद के कत्लगाह का जिम्मा
अपने हाथों में लिए हुए है
कोई भी व्यक्ति या जाति
अपनी पूरी ताकत लगा कर भी
इसे खत्म नहीं कर सकता
ब्राह्मण भी नहीं
भले ही यह वाद उसका अपना हो
हां वह इसे मजबूत जरूर कर सकता है
और यह काम वह दूसरों के मुकाबले ज्यादा
खतरनाक ढंग से कर सकता है
बल्कि कहिए कि यही वह कर भी रहा है
अगर इन्हें देखना है तो
कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं
साहित्य की दुनिया में ही देख लीजिए
यहां ब्राह्मणवाद का जोर इतना है कि
आज जब करोड़ों लोग सड़कों पर
भूखे मर रहे हैं
आत्महत्याएं कर रहे हैं
खून के आंसू रो रहे हैं
तब ये लोग उनकी सुध लेने की जगह
रामचन्द्र शुक्ल के नब्बे साल पहले लिखे गये
इतिहास-लेखन को लेकर
उठे बेहद पुराने सवाल पर तलवार खींचे हुए हैं
जबकि सामान्य जानकारी रखनेवाला भी जानता है
कि इतिहास रोज बनता है
और उसे रोज लिखना पड़ता है
लेकिन इनके लिए वक्त जैसे ठहर चुका है
इतिहास की गति को अगर ये समझते तो जानते
कि बाद के नब्बे साल का इतिहास काफी है
पहले की दबा दी गई कड़ियों को ढूंढ निकालने के लिए
लेकिन इन्हें इन सबसे क्या मतलब
ये ब्राह्मणवाद की खुराक बन चुके लोग हैं
तनिक भी आँच आए उन पर
ये बर्दाश्त नहीं कर पाते
ये अपनी कविता की आलोचना पर बिफर जाते हैं
ये इस कदर अहम् के शिकार होते हैं
कि साथी लेखक की मृत्यु पर उसे नहीं पहचानने को
अपने बड़े होने के प्रमाण के तौर पर
दुनिया के सामने रखने से भी नहीं हिचकते
आपको इनका रवैया भले ही अटपटा लगे
लेकिन सिस्टम को बनाए रखने में
इनका रवैया बड़ा कारगर साबित होता है
ये लोग चाहे किसी भी जाति के हों
अंततः ब्राह्मणवाद का कलपुर्जा होकर रह जाते हैैं
यह उनकी मजबूरी होती है
और विडंबना यह कि
इसे वे अपनी मजबूरी नहीं समझते
वे उसे खुशी-खुशी अपनाते हैं
और खुद को धन्य समझते हैं
और ताकतवर होने का भ्रम पालते हैं
आपको ब्राह्मणवाद खत्म करना है
तो आपको सिस्टम से बाहर निकलना होगा
दिमाग में पहले से जमी
गर्द की मोटी परत आपको झाड़ फेंकनी होगी।
जन्म की तारीख
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पहले मुझे
ऐसे लोगों से ईर्ष्या हुआ करती थी
जिनके जन्म की तारीख दो अक्टूबर
चौदह नवंबर
पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी
हुआ करती थी
कई बड़े साहित्यकारों का
जन्मदिन भी देखा है मैंने
किसी बड़े ख़ास दिन पर पड़ते हुए
जैसे कि बुद्ध पूर्णिमा बसंत पंचमी
या मजदूर दिवस
मेरे जन्म की तारीख
एक सामान्य तारीख है
लेकिन मैं यह सोचकर खुद को
खुशनसीब मानता हूँ
कि अगर वह कोई महान दिन नहीं है
तो वह पांच अगस्त भी नहीं है
छह दिसम्बर नहीं है
छब्बीस जून या
सत्ताईस फरवरी की सुबह नहीं है
तीस जनवरी भी नहीं है
तारीख तो तारीख होती है
अगर इनमें से कोई भी तारीख होती
तो क्या हो जाता
आप जिंदगी में क्या करते हैं असल बात यह है
तारीखें नहीं
आप प्लीज़ ऐसा कुछ मत कहिएगा
यह भी नहीं कहिएगा
कि हजारों वर्षों में हजारों बार
ये तारीखें आई होंगी
ऐसे में यह हिसाब रखना असम्भव है
कि किस तारीख में कितना खून गिरा
और किसका गिरा
बेमतलब का उपदेश है यह सब
अब आप चुप हो जाइए
और सुनिए क्या कह रहे हैं लोग
मुझे तो मिलने लगे हैं वैसे लोग
वे इतराते हुए कहते हैं
कि जिस दिन
तीन सौ सत्तर हटाया गया था
या जिस दिन नागरिकता के सवाल पर
असम में लोगों को खदेड़ा जा रहा था
या जिस दिन राममंदिर का शिलान्यास किया गया था
या कश्मीर की घाटियों में ताला लगाया गया था
बस समझिए कि वही हमारे जन्म की तारीखें हैं
वे अब आठ नवंबर नहीं कहते
अपने जन्म की तारीख नोटबंदी बताते हैं
कुछ लोग तो ऐसे मिले
जो दाभोलकर पानसरे कलबुर्गी गौरी लंकेश
कि हत्याओं की तारीखों से जोड़कर
बताते थे अपने जन्म की तारीखें
और छूरे चमकाते थे
एक बड़े गर्व से कह रहा था
कि उसके जन्म की तारीख वही है
जिस दिन पहलू खान की हत्या की गई थी
एक की मुस्कुराहट बहुत घिनौनी थी
उसने उसी घिनौनी मुस्कुराहट के साथ कहा
वह जिस दिन पैदा हुआ था
उसी दिन आसिफा का बलात्कार किया गया था
और फिर हत्या
अगर कुछ कहना है तो यहाँ कहिए
जितनी ताकत है अंदर
सब बटोरकर चीखते हुए कहिए
हाथ-पांव सुन्न हो रहे हैं तब भी कहिए
बाहर देखिए दरवाजे पर खड़ा है पागलपन
जिसके अंदर आते ही
जिंदा रहने को तरस जाएंगे।
शहर उनके लिए गिद्ध हो चुका था
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वे जहाँ से आ रहे थे
वहाँ उनके लिए कुछ नहीं बचा था
न कोई उम्मीद न कोई सपना
वे हारे हुए सैनिक की तरह लौट रहे थे
शहर उनके लिए गिद्ध हो चुका था
जो उसे नोच खाने के लिए
मंडरा रहा था
चिमनियों के ऊपर
वे हजारों मील के सफर में थे
कभी उनके पांव के नीचे पहाड़ आते थे
कभी दबी आग
कभी उनके साथ चलती आती थी
लोहे की वीरान पटरियाँ
उनके पांव के नीचे पत्थर होते थे
कांटे होते थे
गहरी खाइयां होती थीं
उनकी नींद में
थोड़ा बारुद रखा होता था
हमसफ़र रास्ते
जिनसे होकर कभी
उनका जाना हुआ था
लौटते वक्त
उनके खून के ताजे धब्बों से
तर-बतर थे
हत्यारे हर कदम पर थे
हत्यारा जब भी हत्या करता था
पीछे उनकी कहानियाँ
छोड़ जाता था
कभी टूटे चप्पल
कभी मैले-कुचैले कपड़े
इस बार पटरियों पर
रोटियाँ छूटी थीं
जिसके पास भूख की
अनगिनत कहानियाँ थीं
कुछ कहानियाँ उनका पीछा करती
गाँव तक चली आई थीं
अफसोस कि
गाँव वही नहीं रह गया था
वहाँ उनके पहुंचने से पहले
अफवाहें पहुंच गयी थीं
धमकियां पहुंच गयी थीं
अफसोस यह भी है
कि वे भी अब वही मजदूर नहीं रह गये थे
वे सस्ते मजदूर में बदलते जा रहे थे
वे बंधुवा मजदूर में बदलते जा रहे थे
यही समय है साथियों
कि आप रोक दें अपना पलायन
और खड़े हो जाएं डटकर सामने
हर उस तिकड़म के खिलाफ
इस उलटे बहते समय के खिलाफ
जो आपको सस्ता बना रहा है
बंधुवा बना रहा है
क्या आप तक खबर नहीं पहुंची
कि आपका नहीं होना
रोक देगा देश का
घूमता पहिया
क्या आप तक खबर नहीं पहुंची
कि बौखलाए हुए हैं पूंजीपति
और बौखलाई हुई हैं
सरकारें भी
यह सोचकर कि उनसे ज्यादा जरूरी हैं
आप देश के लिए
लोग यह समझने लगे हैं
वे मुसीबत बनकर टूट पड़े हैं
आप पर
अपनी जरूरतों के लिए
आपको निचोड़ने के लिए
जब वे खुलकर सामने आ गये हैं
तो आपकी ओर से देरी क्यों
आप भी टूट पड़ें
उनपर मुसीबत बनकर
अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान के लिए
हक और अरमान के लिए
श्रम के लुटेरों को
सबक सिखाने का
यही वक्त है
इंतजार क्यों
यह कैसा झूठ है
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यह कैसा झूठ है
जिससे न्यू इंडिया गढ़ा जा रहा है
जहाँ जनता के पैसों को करदाताओं का पैसा
कुछ इस तरह बताया जा रहा है मानो
वे कोई मुठ्ठी भर लोग हों
जो देश का खर्च उठाने के लिए
सदाशयता में अपनी जेबें ढीली करते हों
जबकि सच्चाई यह है कि हल्कू भी देता है टैक्स
और वह सिर्फ टैक्स ही नहीं देता
श्रम भी करता है हाड़तोड़
वे जिसे जीडीपी कहते हैं
कभी उसके महक को देखो
हल्कू के पसीने की गंध मिलेगी
यहां तक कि वे जिस कमाई पर टैक्स देते हैं
उसके पीछे भी हल्कू का ही श्रम लगा है
और तब यह कहना कि
कर्जे से लदा अंबानी देश चलाने वाला करदाता है
और कड़ी मेहनत कर
देश का पेट भरने वाला हल्कू
कर के उस रुपये पर मौज करनेवाली जनता
तो यह कपट और दुष्टता से भरे वक्तव्य
के सिवा और कुछ नहीं है
हमारी मांग है
कि देश को देश की तरह समझा जाए
एनजीओ की तरह नहीं
करदाता को करदाता समझा जाए
फंडिंग एजेंसी नहीं
कर में प्राप्त धन को
अतिरिक्त कमाई करने के अपराध में
वसूला गया दंडित धन समझा जाए
अनुदान में दिया गया धन नहीं
हमारी यह भी मांग है
कि देश को देश ही समझा जाए
कोई दुकान नहीं
जहां वे हमसे कहें कि शिक्षा खरीदो
स्वास्थ्य खरीदो
न्याय खरीदो
खुशियां खरीदो सपने खरीदो उम्मीदें खरीदो
बिजली खरीदो पानी खरीदो
सुरक्षा खरीदो
जब देखो तब
वे लगातार कहते रहते हैं
खरीदो खरीदो खरीदो
लेकिन हम जानते हैं
मन में उनके चलता रहता है
बिको बिको बिको
उन्हें लगता है कि यह
खरीदेगा नहीं तो बिकने का सोचेगा कैसे
दरअसल उनको बिक जाने वाले लोग चाहिए
अपनी मेहनत का वाजिब दाम मांगती
मेहनतकश अवाम नहीं
उन्हें गुनहगारों की गिड़गिड़ाती भीड़ चाहिए
ताकि उसकी जिंदगी को
वे जब चाहें चबा जाएं
जब चाहें उसके नुमाइंदे को
खरीदकर अपने गोदाम में डाल दें
यह कैसी सोच है आपकी सरकार
बेशर्मी की हद पार कर
आप बहुत आगे निकल गए हैं
यहाँ हम देश को सहेजे रखने में
दांव पर लगा दिए हैं अपना सब कुछ
और आप पूरे देश को बरबाद कर
उसे भीख की जिंदगी जीने को बाध्य किए हुए हैं
क्या यह महज संयोग है कि
इसी दौरान भारत का एक आदमी
एशिया का सबसे धनी आदमी बन जाता है
और हमसे कहा जाता है कि
हम इसे अपनी उपलब्धि समझें
क्या आपको दिख नहीं रहा यहां हमारी जिंदगी
कीड़े-मकोड़ों से भी बदतर हो गई है
अन्न के दाने को तरसती पूरी आबादी
सड़कों पर रेंग रही है
दुश्मन हैं देश के तो
दुश्मन की तरह खुलकर सामने आइए
छिपकर वार करने जैसा घृणित काम मत कीजिए।