Friday, August 28, 2020

प्रतिरोधी चेतना के सशक्त कवि हैं रंजीत वर्मा

इधर रंजीत वर्मा ने कुछ बेबाक और दहकते सवालों को अपना काव्य विषय बनाया । उनकी कविताई में काव्य विषय का चयन और कहन की शैली का जो तारतम्य है वह मुझे भी प्रभावित करता है । यानी कथ्य और शिल्प के बीच यथार्थ का जो गुथम-गुथी उनकी कविताओं में देखा गया , वह एक अलहदा खूबियों में परिलक्षित होता है । कहना न होगा कि रंजीत वर्मा की काव्य दृष्टि अपने सामर्थ्यवान खूबियों के कारण न सिर्फ सराही जाती हैं बल्कि हमारे समय को एक गंभीर इतिहास बोध से जोड़ , मंत्रणा से भर देता है । रंजीत वर्मा की कविता वस्तुत: हिंदी कविता में प्रतिरोधी चेतना की सशक्त कविताओं के साथ , हमें अपने वास्तविकता से रूबरू कराए रखने वाली जरूरी कविताएं हैं  । ये कविताएं अपने लक्ष्य तथा मुहिम के साथ आती हैं । कोई दुराव कि छिपाव नहीं होता । मतलब कि जब कोई कवि आग को आग की तरह और पानी को पानी की तरह देख-समझ लेता है तो बात को वह गोलियों के बौछारों की तरह धांय-धांय उड़ेल ही देता है । रंजीत वर्मा की शिनाख्तगी भी इसी रूप में किया जा सकता है । हमारे समय के तमाम लीपा-पोती को रंजीत वर्मा सीधे-सीधे यानी फूल को फूल और शूल को शूल कहने , देर नहीं करते । वे अपनी कविता में , कोई क्रियेटिव स्केच यदि बनाते भी हैं तो स्केच के बाहर के दृश्य और संभावनाओं को भी तल्खी में बता जाते हैं । किन्तु इधर देख रहा हूं कि हिंदी कविता में कुछ कायर और कोढ़ दिमाग के कवियों का समाज सक्रिय हो गया है , उनके द्वारा कविता की मुख्यधारा को कोसना और गरियाना जारी है । प्रतिरोध अथवा क्रांति की कविताओं से ये लोग अपने लिजलिजे संदर्भों की कविता से तुलना  करते , मुख्यधारा की कविता से अड़ाने की चेष्टा में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं । परन्तु मुख्यधारा की कविता है कि उत्तरोत्तर गतिमान है । वजहें जो भी है पर यह साफ़ है कि उनकी पेट से जुबां तक इंफेक्शन वैचारिक कविताओं के बेधक साहस से गहराया हुआ जान पड़ता है । जहां तक मैं देख पा रहा हूं ये लोग हर दूसरे-तीसरे लफ्ज़ पर वाम को गरिया विचारधारा के ऊपर लांछन लगाने को अपनी शग़ल बना चुके हैं । घिन मुझे उन तथाकथित काव्य प्रेमियों के प्रयोजन व उस तरीके पर नहीं आते  , जो पीछे दरवाजे से सत्ता की चाकरी बजाते हुए अपना काम कर रहे होते हैं । यकीनन यह चरित्र उनका ऐतिहासिक चरित्र है ! पर मुझे घिन और उबकाई आने लगती है उनके घटिया और गैर जरूरी अल्लुक खल्लुक दांव-पेंच पर । घिन आती है उस मानसिकता पर जो सुन्दर , सजीव , और यथार्थ कला से लबरेज़ कविताओं को नकार ढुलमुल कविताओं और लिजलिजे विचारों की डुगडुगी बजाते खड़े हो जाते हैं  । वाम कवियों लेखकों में तकनीकी त्रुटियां हो सकती है , किन्तु उनके विचारों में उनके तरह के कोई भी घटिया पूर्वाग्रह नहीं है , जैसा कि इधर के उन लिजलिजे दिलों दिमाग वाले कवियों में है ।  बेसिकली ये खलियार लोग हैं । उकताए लोग हैं । और असल में अफीमी ,भंगेड़ी लोग हैं । जो चड्डी में हैं और त्रिशूल भाले के नुकीले इशारे पर चड्डी में ही दौड़ पड़ते हैं । हिंदी कविता की ऊर्वर भूमि में यदि ये लोग चिन्हित नहीं हुए या नकार दिए गए तो दोष विचारधारा का कि मार्क्सवाद का नहीं है । दोष उस भाव भूमि की है जिसमें प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक विरासत के प्रति जिम्मेदारी का भान नहीं है । ये वो 'वीर' हैं  और उसकी संतानें हैं जिससे एक दिन इतिहास को शर्मिंदा होना ही है ।  सस्नेह सादर पढ़िए रंजीत वर्मा की कविताएं  Ranjit Verma Mili Mukherji Prashant Jain Prashant Rahi u Pratibha Upadhyaya Jyoti Sparsha Jyoti Khare Mamta Kalia Mamta Singh Naresh Saigal नदीम हसन चमन Rajanand Jha वि राग विनोद Yugal Gajendra अरविंद यादव  योगिता यादव Ramprakash Kushwaha Ram Pyare Rai Ramkumar Tiwari Shubhra Singh

आओ मुझे गिरफ्तार करो
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अगर तुम लिखने के जुर्म में 
वरवर राव को गिरफ्तार कर सकते हो
तो मुझे क्यों नहीं
मैं भी तो कविताएं लिखता हूँ
आओ मुझे गिरफ्तार करो

लेकिन यह जान लो
तुम भले मुझे गिरफ्तार कर लो
कविताओं को गिरफ्तार नहीं कर पाओगे
कहाँ गिरफ्तार हुईं वरवर राव की कविताएं भी
वे आंधियों के हवाले हैं
वे खुद आंधियां हो चुकी हैं
और बेखौफ अपना काम कर रही हैं
तुम आओ मुझे गिरफ्तार करो

ऐसा क्या है कि तुम
वरवर राव की कविता से तो डरते हो
मेरी कविता से नहीं
क्या मेरी कविता में कुछ कम कविता है
क्या मेरे प्रतिरोध में कुछ कम प्रतिरोध है
कहाँ रह गई कमी मुझमें
मैं भारी बोझ में जी रहा हूँ
मैं इन्हें ठीक करना चाहता हूँ

मैं जीवन से लाऊंगा चुनकर हर जरूरी चीज
भूख 
टूटी हुई नींद
अनवरत जागते सपने
उदासी गुस्सा भय अपमान
मैं लाऊंगा सब
अपनी हार
और उम्मीद भी
लेकिन नहीं नहीं
मैं कविता को ही ले जाऊंगा
किताब के पन्नों से निकालकर बाहर
हर पल चोट खाती जिंदगी के बीच
जहाँ हर पल सैलाब उमड़ता रहता है

अगर फासिस्ट यह सोचता है
कि काल कोठरी का ठंडा भय दिखाकर
बर्फ कर देगा वह मेरी कलम की स्याही को
वह भोथरे कर देगा शब्द 
कलम के भीतर ही
तो वह गलती में है
यहाँ खून में डुबोकर अंगुलियाँ 
कविता लिखने का रिवाज है
यही कहा था फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने 
अपने जमाने के फासिस्ट से

ओ मेरे जमाने के फासिस्ट
सुनो
यह उठती करोड़ों आवाजें 
ढाह देंगी तुम्हारी जेल की दीवारें
मैं भीतर की आवाज में शामिल होना चाहता हूँ

      मुर्दाखोर हँस रहा था
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एक जिंदा आदमी भटकता है
एक जिंदा शहर की तलाश में
और मुर्दा हो जाता है

टेलीविजन पर एक मुर्दा
चीखता हुआ पूछता है मृत सवाल
जिसका मृत जवाब
चीखता हुआ देता है दूसरा मुर्दा 
टेलीविजन पर

मृत सपने लिए
करोड़ों लोग निकल पड़े हैं
वे जहाँ से आ रहे हैं
वह जगह पहले से मरी हुई थी
वे जहाँ जा रहे हैं उसे 
मुर्दों की बस्ती घोषित किया जा चुका था

जनतंत्र पहले ही मर चुका था
संसद मर चुका था
अदालतें मर चुकी थीं
बहसें मर चुकी थीं
फैसले जो भी आते थे
मरे हुए आते थे
संविधान का नाम
मरी हुई किताबों की सूची में
सबसे ऊपर लिखा मिलता था

मरे हुए लोग देख रहे थे
लोगों को मरते हुए
प्लेटफॉर्म पर
सड़क पर
पेशाबघर में
और उनके इस तरह मरने पर 
वे उन्हें गालियाँ दे रहे थे

मुर्दाखोर हँस रहा था
जिंदगी मौत से ज्यादा काली हो चुकी थी।

आपको सिस्टम से बाहर निकलना होगा
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मैंने सबसे पहले गोगोई की जाति जाननी चाही
पता चला कि वे ताई अहोम हैं
जिसे अनुसूचित जाति में शामिल करने की 
कशमकश चली थी 
इसी सरकार की शुरुआत में
आगे क्या हुआ पता नहीं

मुझे तुरंत राष्ट्रपति की जाति का ख्याल आया
वे भी अनुसूचित जाति के निकले
और अपने प्रधानमंत्री तो खैर
खुद को पिछड़ी जाति का
कहते ही रहते हैं

जातियों को लेकर
यूपीए के समय जो संजोग थे
उस पर भी एक नजर डाल लीजिए
प्रधानमंत्री सिख थे
और सत्ताधारी दल की अध्यक्ष क्रिश्चियन
और शुरूआती चार वर्ष मुस्लिम राष्ट्रपति 
मतलब तीनों अल्पसंख्यक थे
इस बीच तीन वर्षों के लिए 
भारत के मुख्य न्यायाधीश पद पर
कम से कम एक दलित तो थे ही

यह दो हजार चार से दो हजार बीस तक के 
भारत के लोकतंत्र में मौजूद
सबसे ताकतवर पद पर बैठे 
लोगों की बातें हैं
इतर इन सबके कुछ ऐसे राज्य भी रहे
जैसे बिहार और उत्तरप्रदेश
जहां पिछले तीस वर्षों से लगातार
या तो पिछड़े मुख्यमंत्री रहे या दलित
लेकिन इन सबके बावजूद
ऐसा कभी लगा नहीं कि
सामाजिक न्याय की जड़ें देश में गहरी हुई हों
या ब्राह्मणवाद ज़रा भी 
टस से मस हुआ हो
या पूंजीवाद की चूलें हिली हों
हालांकि कोई कह सकता है कि
इस बीच कुछ ब्राह्मण राष्ट्रपति भी हुए थे
और कुछ ब्राह्मण मुख्य न्यायाधीश भी 
लेकिन यह जान लीजिए
अगर ये नहीं होते तब भी सब कुछ 
इसी तरह घटित होता

दरअसल ब्राह्मणवाद एक सिस्टम है
भारत में शताब्दियों से जो अपना काम कर रहा है
पहले यह सामंतवाद का मजबूत किला था
आज यह पूंजीवाद के कत्लगाह का जिम्मा
अपने हाथों में लिए हुए है
कोई भी व्यक्ति या जाति
अपनी पूरी ताकत लगा कर भी
इसे खत्म नहीं कर सकता 
ब्राह्मण भी नहीं
भले ही यह वाद उसका अपना हो
हां वह इसे मजबूत जरूर कर सकता है
और यह काम वह दूसरों के मुकाबले ज्यादा
खतरनाक ढंग से कर सकता है
बल्कि कहिए कि यही वह कर भी रहा है

अगर इन्हें देखना है तो
कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं
साहित्य की दुनिया में ही देख लीजिए
यहां ब्राह्मणवाद का जोर इतना है कि
आज जब करोड़ों लोग सड़कों पर
भूखे मर रहे हैं
आत्महत्याएं कर रहे हैं
खून के आंसू रो रहे हैं
तब ये लोग उनकी सुध लेने की जगह
रामचन्द्र शुक्ल के नब्बे साल पहले लिखे गये 
इतिहास-लेखन को लेकर
उठे बेहद पुराने सवाल पर तलवार खींचे हुए हैं
जबकि सामान्य जानकारी रखनेवाला भी जानता है
कि इतिहास रोज बनता है
और उसे रोज लिखना पड़ता है
लेकिन इनके लिए वक्त जैसे ठहर चुका है
इतिहास की गति को अगर ये समझते तो जानते
कि बाद के नब्बे साल का इतिहास काफी है
पहले की दबा दी गई कड़ियों को ढूंढ निकालने के लिए
लेकिन इन्हें इन सबसे क्या मतलब
ये ब्राह्मणवाद की खुराक बन चुके लोग हैं
तनिक भी आँच आए उन पर
ये बर्दाश्त नहीं कर पाते
ये अपनी कविता की आलोचना पर बिफर जाते हैं
ये इस कदर अहम् के शिकार होते हैं
कि साथी लेखक की मृत्यु पर उसे नहीं पहचानने को
अपने बड़े होने के प्रमाण के तौर पर 
दुनिया के सामने रखने से भी नहीं हिचकते

आपको इनका रवैया भले ही अटपटा लगे
लेकिन सिस्टम को बनाए रखने में
इनका रवैया बड़ा कारगर साबित होता है
ये लोग चाहे किसी भी जाति के हों
अंततः ब्राह्मणवाद का कलपुर्जा होकर रह जाते हैैं
यह उनकी मजबूरी होती है
और विडंबना यह कि 
इसे वे अपनी मजबूरी नहीं समझते
वे उसे खुशी-खुशी अपनाते हैं
और खुद को धन्य समझते हैं
और ताकतवर होने का भ्रम पालते हैं

आपको ब्राह्मणवाद खत्म करना है
तो आपको सिस्टम से बाहर निकलना होगा
दिमाग में पहले से जमी
गर्द की मोटी परत आपको झाड़ फेंकनी होगी।

        जन्म की तारीख
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पहले मुझे 
ऐसे लोगों से ईर्ष्या हुआ करती थी 
जिनके जन्म की तारीख दो अक्टूबर
चौदह नवंबर
पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी
हुआ करती थी

कई बड़े साहित्यकारों का
जन्मदिन भी देखा है मैंने
किसी बड़े ख़ास दिन पर पड़ते हुए
जैसे कि बुद्ध पूर्णिमा बसंत पंचमी 
या मजदूर दिवस 

मेरे जन्म की तारीख
एक सामान्य तारीख है
लेकिन मैं यह सोचकर खुद को 
खुशनसीब मानता हूँ 
कि अगर वह कोई महान दिन नहीं है
तो वह पांच अगस्त भी नहीं है
छह दिसम्बर नहीं है
छब्बीस जून या
सत्ताईस फरवरी की सुबह नहीं है
तीस जनवरी भी नहीं है

तारीख तो तारीख होती है
अगर इनमें से कोई भी तारीख होती
तो क्या हो जाता
आप जिंदगी में क्या करते हैं असल बात यह है
तारीखें नहीं
आप प्लीज़ ऐसा कुछ मत कहिएगा

यह भी नहीं कहिएगा
कि हजारों वर्षों में हजारों बार
ये तारीखें आई होंगी
ऐसे में यह हिसाब रखना असम्भव है
कि किस तारीख में कितना खून गिरा
और किसका गिरा
बेमतलब का उपदेश है यह सब
अब आप चुप हो जाइए
और सुनिए क्या कह रहे हैं लोग

मुझे तो मिलने लगे हैं वैसे लोग
वे इतराते हुए कहते हैं 
कि जिस दिन
तीन सौ सत्तर हटाया गया था
या जिस दिन नागरिकता के सवाल पर
असम में लोगों को खदेड़ा जा रहा था
या जिस दिन राममंदिर का शिलान्यास किया गया था
या कश्मीर की घाटियों में ताला लगाया गया था
बस समझिए कि वही हमारे जन्म की तारीखें हैं
वे अब आठ नवंबर नहीं कहते
अपने जन्म की तारीख नोटबंदी बताते हैं

कुछ लोग तो ऐसे मिले
जो दाभोलकर पानसरे कलबुर्गी गौरी लंकेश
कि हत्याओं की तारीखों से जोड़कर
बताते थे अपने जन्म की तारीखें 
और छूरे चमकाते थे

एक बड़े गर्व से कह रहा था
कि उसके जन्म की तारीख वही है
जिस दिन पहलू खान की हत्या की गई थी
एक की मुस्कुराहट बहुत घिनौनी थी
उसने उसी घिनौनी मुस्कुराहट के साथ कहा
वह जिस दिन पैदा हुआ था
उसी दिन आसिफा का बलात्कार किया गया था
और फिर हत्या

अगर कुछ कहना है तो यहाँ कहिए
जितनी ताकत है अंदर
सब बटोरकर चीखते हुए कहिए
हाथ-पांव सुन्न हो रहे हैं तब भी कहिए
बाहर देखिए दरवाजे पर खड़ा है पागलपन
जिसके अंदर आते ही
जिंदा रहने को तरस जाएंगे।

शहर उनके लिए गिद्ध हो चुका था
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वे जहाँ से आ रहे थे
वहाँ उनके लिए कुछ नहीं बचा था
न कोई उम्मीद न कोई सपना
वे हारे हुए सैनिक की तरह लौट रहे थे
शहर उनके लिए गिद्ध हो चुका था
जो उसे नोच खाने के लिए
मंडरा रहा था 
चिमनियों के ऊपर

वे हजारों मील के सफर में थे
कभी उनके पांव के नीचे पहाड़ आते थे
कभी दबी आग 
कभी उनके साथ चलती आती थी 
लोहे की वीरान पटरियाँ
उनके पांव के नीचे पत्थर होते थे 
कांटे होते थे
गहरी खाइयां होती थीं
उनकी नींद में
थोड़ा बारुद रखा होता था

हमसफ़र रास्ते
जिनसे होकर कभी 
उनका जाना हुआ था
लौटते वक्त 
उनके खून के ताजे धब्बों से 
तर-बतर थे
हत्यारे हर कदम पर थे

हत्यारा जब भी हत्या करता था
पीछे उनकी कहानियाँ 
छोड़ जाता था
कभी टूटे चप्पल
कभी मैले-कुचैले कपड़े
इस बार पटरियों पर
रोटियाँ छूटी थीं
जिसके पास भूख की
अनगिनत कहानियाँ थीं

कुछ कहानियाँ उनका पीछा करती
गाँव तक चली आई थीं
अफसोस कि
गाँव वही नहीं रह गया था
वहाँ उनके पहुंचने से पहले
अफवाहें पहुंच गयी थीं
धमकियां पहुंच गयी थीं
अफसोस यह भी है
कि वे भी अब वही मजदूर नहीं रह गये थे
वे सस्ते मजदूर में बदलते जा रहे थे
वे बंधुवा मजदूर में बदलते जा रहे थे

यही समय है साथियों
कि आप रोक दें अपना पलायन
और खड़े हो जाएं डटकर सामने
हर उस तिकड़म के खिलाफ
इस उलटे बहते समय के खिलाफ
जो आपको सस्ता बना रहा है
बंधुवा बना रहा है

क्या आप तक खबर नहीं पहुंची
कि आपका नहीं होना 
रोक देगा देश का 
घूमता पहिया

क्या आप तक खबर नहीं पहुंची
कि बौखलाए हुए हैं पूंजीपति
और बौखलाई हुई हैं 
सरकारें भी
यह सोचकर कि उनसे ज्यादा जरूरी हैं 
आप देश के लिए
लोग यह समझने लगे हैं

वे मुसीबत बनकर टूट पड़े हैं 
आप पर 
अपनी जरूरतों के लिए
आपको निचोड़ने के लिए

जब वे खुलकर सामने आ गये हैं
तो आपकी ओर से देरी क्यों
आप भी टूट पड़ें
उनपर मुसीबत बनकर
अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान के लिए
हक और अरमान के लिए
श्रम के लुटेरों को
सबक सिखाने का
यही वक्त है
इंतजार क्यों

       यह कैसा झूठ है
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यह कैसा झूठ है
जिससे न्यू इंडिया गढ़ा जा रहा है
जहाँ जनता के पैसों को करदाताओं का पैसा 
कुछ इस तरह बताया जा रहा है मानो
वे कोई मुठ्ठी भर लोग हों
जो देश का खर्च उठाने के लिए 
सदाशयता में अपनी जेबें ढीली करते हों
जबकि सच्चाई यह है कि हल्कू भी देता है टैक्स

और वह सिर्फ टैक्स ही नहीं देता
श्रम भी करता है हाड़तोड़
वे जिसे जीडीपी कहते हैं
कभी उसके महक को देखो
हल्कू के पसीने की गंध मिलेगी 
यहां तक कि वे जिस कमाई पर टैक्स देते हैं
उसके पीछे भी हल्कू का ही श्रम लगा है
और तब यह कहना कि 
कर्जे से लदा अंबानी देश चलाने वाला करदाता है
और कड़ी मेहनत कर
देश का पेट भरने वाला हल्कू 
कर के उस रुपये पर मौज करनेवाली जनता
तो यह कपट और दुष्टता से भरे वक्तव्य 
के सिवा और कुछ नहीं है

हमारी मांग है
कि देश को देश की तरह समझा जाए
एनजीओ की तरह नहीं
करदाता को करदाता समझा जाए
फंडिंग एजेंसी नहीं
कर में प्राप्त धन को
अतिरिक्त कमाई करने के अपराध में
वसूला गया दंडित धन समझा जाए
अनुदान में दिया गया धन नहीं

हमारी यह भी मांग है
कि देश को देश ही समझा जाए 
कोई दुकान नहीं 
जहां वे हमसे कहें कि शिक्षा खरीदो
स्वास्थ्य खरीदो
न्याय खरीदो
खुशियां खरीदो सपने खरीदो उम्मीदें खरीदो
बिजली खरीदो पानी खरीदो
सुरक्षा खरीदो

जब देखो तब
वे लगातार कहते रहते हैं
खरीदो खरीदो खरीदो
लेकिन हम जानते हैं
मन में उनके चलता रहता है
बिको बिको बिको 
उन्हें लगता है कि यह
खरीदेगा नहीं तो बिकने का सोचेगा कैसे
दरअसल उनको बिक जाने वाले लोग चाहिए
अपनी मेहनत का वाजिब दाम मांगती 
मेहनतकश अवाम नहीं
उन्हें गुनहगारों की गिड़गिड़ाती भीड़ चाहिए
ताकि उसकी जिंदगी को 
वे जब चाहें चबा जाएं
जब चाहें उसके नुमाइंदे को
खरीदकर अपने गोदाम में डाल दें

यह कैसी सोच है आपकी सरकार
बेशर्मी की हद पार कर
आप बहुत आगे निकल गए हैं
यहाँ हम देश को सहेजे रखने में 
दांव पर लगा दिए हैं अपना सब कुछ
और आप पूरे देश को बरबाद कर
उसे भीख की जिंदगी जीने को बाध्य किए हुए हैं
क्या यह महज संयोग है कि
इसी दौरान भारत का एक आदमी
एशिया का सबसे धनी आदमी बन जाता है
और हमसे कहा जाता है कि
हम इसे अपनी उपलब्धि समझें
क्या आपको दिख नहीं रहा यहां हमारी जिंदगी
कीड़े-मकोड़ों से भी बदतर हो गई है
अन्न के दाने को तरसती पूरी आबादी
सड़कों पर रेंग रही है

दुश्मन हैं देश के तो
दुश्मन की तरह खुलकर सामने आइए
छिपकर वार करने जैसा घृणित काम मत कीजिए।

एकता नाहर की कविता : सपाट सीने वाली लड़कियां

कोई अधिक अथवा अधिकारिक जानकारी नहीं है मुझे । परन्तु यह केवल एक कविता ही है जो मुझे एकता नाहर का मुरीद बनाती है । पेशे से पत्रकार साथी एकता नाहर विद्रोही तेवर की हैं । अपनी उपस्थिति को सीधी सपाट बयानी में दर्ज़ करती हैं । हालिया प्रकाशित उनके काव्य संग्रह 'सूली पर समाज' की कविता साभार वेब पत्रिका 'अपना मोर्चा डाट काम' से ।
इस कविता को पोस्ट करने की वजह ‌और आशय साफ है समकालीन हिंदी कविता में यौनिकता के मार्फत आती अश्लीलता के बनिस्बत इस कविता से कवि कुछ यथार्थ को पकड़े ना कि अश्लील संवाद अथवा रेखाचित्र बनाएं । जहां एक उत्कृष्ट रचना अपनी रचनात्मकता में पूरी तरह समाजिक होती है। समाज में फैले वैमनस्य भावों को ठीक-ठीक रेखांकित करती है , सवाल खड़ा करती है । न्यूनतम के प्रति ईमानदार होती है । वही छद्म रचनाशीलता आपको पब्लिश करायेगा । आह ,वाह से नवाजेगा । सरोकारी नहीं बना पाएगा । यह समझने की जरूरत है । 

सपाट सीने वाली लड़कियां
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सपाट सीने वाली लड़कियां हर जगह से ठुकराई गयीं

 

रिश्ते की बात करने आए लड़के वालों ने 

जब नजर भर के उसे देखा तो फिर 

उसका कोई और हुनर मायने न रहा 

 

पुलिस की नौकरी में आवेदन करने से भी, 

लोक सेवा आयोग ने शर्तों में लिखा है

कि कितने इंच का होना चाहिए सीना

 

किसी चित्रकार ने अपने खूबसूरत चित्रों में

जगह नहीं दी उस स्त्री को

जिसके सीने पे उभार न था

चित्र बनाने के लिए सुडौल शरीर का बिम्ब सबसे आकर्षक था.

 

आए दिन देखा तिरस्कार 

सहेलियों की बातों में, पति की नज़रों में 

अंतरंग क्षणों में भी वो प्रेमी के सामने सहमी-सहमी सी रही

कभी खुद को ही आइने में देख हुई शर्मिंदा 

कभी पैडेड ब्रा में छिपाती रही खुद से खुद को ही 

 

उसके लिए छाती पर दुपट्टा डालना

भरे बदन वाली लड़की जितना ही जरूरी था 

ताकि वो बचा सके खुद को उस पर हंसती हुई लालची नज़रों से 

हां...भरे बदन का मतलब भरी हुई छातियों से ही है शायद. 

 

ये लोग नहीं कर सके उन्हें पूरा प्रेम 

लेकिन इन सबने चुटकुले बना कर हंसा उन पर खूब 

क्योंकि हम बड़े हुनर बाज हैं 

हर चीज को अपने चुटकुलों में जगह देते हैं.

Thursday, August 20, 2020

अश्लीलता और देहराग के सवाल पर अनिल पांडेय की टिप्पणी

Indra Rathore के यौनिकता सम्बन्धी एक पोस्ट पर दी गयी टिप्पणी कुछ इस तरह है-

ये खाए पिए अघाए हुए लोग हैं जिन्हें जन की व्यथा न दिखाई देकर योनि और गुदा दिखाई दे रहा है| रीतिकाल का विरोध क्यों किया जाता है? क्यों आदिकालीन साहित्य को जनता का साहित्य नहीं कहा जाता? यह उनसे पूछिए जो अश्लीलता को उचित ठहरा रहे हैं| खाली दिमाग ऐय्यास होता है| सम्पन्न कवि सुरा और सुंदरी खोजता है| अशोक वाजपेयी, शुभम श्री, मोनिका कुमार, अम्बर पाण्डेय जैसे कवियों के समय और भी कवि हैं जिनके यहाँ नंगई नहीं है| मैथुन और थ्रीसम जैसी परिकल्पना नहीं है| इसलिए नहीं कि वे भारतीय कला और शास्त्र से परिचित नहीं हैं, इसलिए कि उन्हें जन-जीवन का चित्रण करने उनकी यथा-व्यथा को अभिव्यक्ति करने से ही फुर्सत नहीं है| 

रीतिकाल के कवि जहाँ दरबारी ऐय्यासी की उपज थे वहीं इस काल के अधिकांश ऐसे कवि पोर्न मोवीज के उपज हैं| यह कार्य महज कविताओं में नहीं है| कहानी में इससे भी अधिक दुर्दशा है| गीताश्री जैसी कथाकार फेसबुक पर चैट करते करते स्त्री पात्र से पुरुष पात्र को सम्भोगरत दिखाती हैं, ऐसा रसात्मक वर्णन करती हैं कि पूछिए मत, यह मामूली बात नहीं है| साहित्यकार अपने जीवन के संचित अनुभवों से ही विषयों को विस्तार देता है| उचित हो कि व्यक्तिगत कुंठाओं को परोसने की अपेक्षा कुछ सामाजिक हित की बात की जाए| 

हो सकता है कि कुछ लोग खजुराहो आदि को उचित ठहराएं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कला और साहित्य में अंतर है| इस प्रकार के साहित्य को हिंदी साहित्य में लुगदी साहित्य कहा जाता है| सरस सालिस, मनोहर कहानियां, आदि पत्रिकाएँ यहीं सब कर रही हैं| वे भी करें कौन रोक रहा है लेकिन गम्भीर साहित्य की परिधि से उन्हें दूर ही रखा जाए| 

फ़िल्में बन रही हैं कुछ पारिवरिक बन रही हैं, कुछ सामाजिक बन रहीं हैं| कुछ केवल बालिगों के लिए बन रहीं हैं| वहीं कुछ ऐसे भी कलाकार हैं जो पोर्न मूवीज बना रहे हैं| पोर्न बना रहे हैं उन्हें समाज में दिखाना अनुचित माना गया है| तो ऐसे लोगों का विधिवत बहिष्कार किया जाए| चर्चा ही न किया जाए| मैं तो यही समझता हूँ|

Tuesday, August 18, 2020

पंकज चतुर्वेदी अटल प्रकरण

"अटल जी निश्चय ही प्रमुख तौर पर उत्तर भारतीय उच्च-मध्यवर्गीय भद्रलोक की इस मरीचिका के प्रतिनिधि राजपुरुष थे कि सरेआम फ़ासिस्ट हुए बग़ैर भी दक्षिणपंथी हुआ जा सकता है। मगर यह मरीचिका अब ध्वस्त हो चुकी है। परदा गिर गया है। दक्षिणपंथ का नग्न और बर्बर फ़ासीवादी संस्करण हमारे सामने है ।  

(पंकज को समझने के लिए उसकी कविता के भीतर तक जाना होगा ; मूर्खतापूर्ण असहमति से चीज़े दुरस्त नहीं की जा सकती )

"स्मृति में 
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फ़ासीवाद के 
सुघड़ शिल्पकार की 
स्मृति में 
बर्बर सब दुखी हैं 
संगठित और कृतज्ञ

जानते हैं कि शुरूआत में 
उसी नाटकीय 
शालीनता की बदौलत 
वे स्वीकार्य हुए 
और अब 
शीर्ष पर क़ाबिज़ हैं"

Wednesday, August 12, 2020

शरद कोकास की कविता

यह खालिस डर नहीं है
किसी पागल के तन पर अटका
पैबन्दों से भरा चीथड़ा
संगीन की नोक पर
हवा में ध्वज की तरह लहराएगा

उसके हाथ की रोटी
उसमे चक्र की तरह स्थापित हो जाएगी

फूल नहीं बरसेंगे आसमान से
रक्त की एक धार निकलेगी
खून के छींटे बिगाड़ देंगे
कुछ चेहरों का मेकअप

झोपड़ियाँ चिता बन जाएँगी
उनसे निकलता धुआँ
जेट के धुएँ की तरह 
दिखाया जायेगा आसमान में
झूठ से लबालब भरे दिलों में
बेमौत मरनेवालों के लिये
दो शब्द भी नहीं होंगे सांत्वना के

हद तो तब होगी
जब चीख से हिलते होंठों की
फिल्म उतारी जायेगी
उन्हें डब किया जायेगा
किसी दूसरी भाषा में
जैसे आप गा रहे हों
सारे जहाँ से अच्छा 
देश यह हमारा ।

शरद कोकास 

(कविता : "हद तो तब होगी" । कविता  संकलन 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' से )

हमसे तो बेहतर हैं रंग संग्रह को प्रकाशित हुए काफी दिन हो गए हैं । तब समय यह नहीं था जो अब है । संभवतः आहट मात्र थी चीज़ो के उत्पाद में बदलने और उस तकनीक के ईजाद की । बाज़ार पांव पसार रहा था । लेकिन शरद चौकन्ने थे , पहचान रहे थे वीभत्स आज का---

हद तो तब होगी
जब चीख से हिलते होंठों की
फिल्म उतारी जायेगी
उन्हें डब किया जायेगा
किसी दूसरी भाषा में
जैसे आप गा रहे हों
सारे जहाँ से अच्छा 
देश यह हमारा । 

शरद की रचना प्रक्रिया में ख़ासी मशक्कत है । थोड़ी कठिनाई है । पर भाषा- शिल्प और उसके लय से वे पूरी कविता कोऔहैं अंत तक । शरद छ ग से संबद्ध नवें दशक के एक महत्वपूर्णं कवि हैं । वे छग की पावन माटी में रचे बसे हैं । उनका इतिहास बोध का कोई सानी नहीं है । जो उनके आगे के संग्रह 'पुरातत्ववेतता' के अध्ययन से पता लगाया जा सकता है । छग की समकालीन हिन्दी कविता में नासिर अहमद सिकंदर , आलोक श्रीवास्तव ,और विजय सिंह के समानांतर उन्होंनें बड़ी महत्वपूर्ण़ साझेदारी की है । वे सतत चिंतनशील तथा सृजनरत हैं ।

Tuesday, August 11, 2020

सुरेश सेन निशांत

समकालीन हिन्दी कविता के नवें दशक के उत्तरार्ध से बेहद सक्रिय साथी , और विजेन्द्र जी के परम्परा को आत्मसात करते लोकधर्मी कवि सुरेश सेन निशांत आज 59 के हो गए । समकालीन हिन्दी कविता के अपने समीचीनो में वे एक बिल्कुल अलग काव्य मुहावरो के लिए पहचाने गए । किसानी संवेदना उनकी कविता का आधारभूत मौलिक ढांचा है । जन की बात और मन की बात ही उनकी कविताओं में आकार लेता है । एक ओर निरीह और कातर संवेदना के कवि आत्मप्रवंचना में डूबे इतरा रहे हैं वही सुरेश सेन निशांत बाहरी शोरगुल और लब्बोलुआब के झांसे से परे बेसिकली कवि और कविता का जीवन जीते प्रचार की दुनिया से किनारा किए आगे बढ़ रहे हैं । साथी का आज जन्मदिन है उन्हें ढेरों बधाई व शुभकामनाएं

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( सुरेश सेन निशांत पर मेरे एक पोस्ट को फिर लगा रहा हूं )

हिन्दी में लोक स्वर कुछ मौका परस्त पाखंडियों के हाथों कैद होती दिखी । पर प्रतिरोधी स्वरों ने अपनी पुरजोर कोशिशों से लगभग इसे बचा ही लिया । यह सुखद बात है कि दिल्ली के निष्फल कवि , आलोचक इसमें असफल हुए और मुख्यधारा की कविता अपनी जीवटता  में जीती रही । वैश्विक साहित्य के पन्नो में उकेरे जितने भी लोकधर्मी कवि हुए हैं उनमें से -- अमरीकन कवि वाल्ट ह्विटमैन , जर्मन कवि बर्टोल्ट ब्रेख्त , रसियन कवि मायकोवस्की ,अर्जेन्टीनियाई पाब्लो नेरूदा , स्पेनिश कवि फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का तथा टर्की के नाज़िम हिकमत ,की बात करें तो ठीक उन्हीं के परस्पर हिन्दी कविता में भी एक विशाल लोकधर्मी कवियों की परंपरा रही है जो छायावाद के घोर रूदन और प्रलाप को ध्वस्त कर आए आधुनिक हिन्दी कविता के कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' से प्रारंभ होकर केदार , नागार्जुन , त्रिलोचन , शमशेर से होते हुए विजेन्द्र तक की परंपरा के रूप में ख्याति अर्जित करता दिखता है । यह संयोग है कि इनका लोक दिल्ली की तरह न वायावी ही हुआ और न बातूनी ही । यहां तक इनका प्रतिरोध भी बनिस्बत इनके ; अपने कार्यव्यवहार से मानवीय संवेदना को , जीवन व मूल्यों को संरक्षित करता है ।  यानी यह आदमी और उसकी आदमियत को जिंदा रख पाने की एक बड़ी कोशिश के रूप में सार्थक उपस्थित दर्ज कराती है । कहना न होगा इस परंपरा को पोषित करने वाले कवियों के यहां मार-धाड़ , छल-प्रपंच से भरा विद्रोह कम ; बल्कि ये कवि असीम विश्वास से लबालब भर लौटते रहे जीवन की संभावनाओं का पता लगाते खेत- खलिहान , गंवई -गांव , मिल -मजूरो के संग । ये कवि पार करते रहे तमाम और बमुश्किल अवरोधों को । हिन्दी कविता का लोकधर्म मुझे दो तरह का दिखलाई पड़ता है । एक वे हैं जो प्रतिरोध की आग को हवा दे रहे हैं और दूसरे वे हैं जो संवेदनागत हैं । इन दूसरे तरह के कवियो के साथ मैं उतना ही खड़ा हो पाता हूं जितना कि पहले तरह के कवियों के साथ होता हूं । बल्कि मैं तो कहना चाहूंगा कि मुझे कविता में यह दूसरे तरह का लोकधर्म कहीं ज्यादा उत्प्रेरित करते हैं , प्रभावित करते हैं । लोकधर्मी कवियों की इस परंपरा को कुछ महत्वपूर्ण नामों में मैं निराला , केदार , नागार्जुन , त्रिलोचन , शमशेर तथा विजेन्द्र के अलावा उस परम्परा के कवियों में सुरेश सेन निशांत का नाम इसलिए जोड़ना चाहूंगा कि मैं देख रहा हूं एक तेज़ प्रतिरोधी है तो दूसरा अपने यथार्थ के असमान्य दबावों , संकटों से जूझ लेने का दुस्साहस भरा साहसी । यह कोई कम बात नहीं है । ये वो कवि हैं तथा इनकी ख़सियत यह रही कि ये अपने समय के संकटों उसकी जटिलताओं तथा यथार्थ को यथावत् और सदृश रख प्रश्नाकुल हो स्पेस का रचाव कर रहे होते हैं । समकालीन हिन्दी कविता में सुरेश सेन निशांत का सरोकार यही से बिम्बित होता है । 

 गेहूं
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गेहूं उगेगी 
तो लौटेगी 
पिता के गुतो मे लय
मां की आवाज़ में रस
भाई के चेहरे पर खुशी
गेहूं उगेगी  तो

हिन्दी की समकालीन कविता में ऐसा पारदर्शी विश्वास शायद ही ,और कहीं - कहीं है । यह कहते मुझे तनिक संकोच नहीं है । सुरेश सेन निशांत में जो संवेदनशीलता है वह विरल और अधिक यथार्थवादी है । उनमें जो उत्साह है अथवा भरोसा है वह अवश्यंभावी है । एक किसान अथवा उनका परिवार और उनकी निर्भरता उनके द्वारा ऊपजाये जाने वाले फसल पर ही सन्निहित है । कहना न होगा देश के सकल घरेलू उत्पाद में एक बड़ा हिस्सा उनका है । पर आंकड़ों के इस देश में सबसे बड़ा शक्तिशाली होकर भी वह निरीह- सा है । सबसे अधिक संकटग्रस्त वही है । सबसे अधिक आत्महत्या वही कर रहा है । और तथाकथित जनतांत्रिक सरकारें इस दशा पर निस्पृह हैं । यह कहना लाजिमी होगा कि सरकारें मरी हुई हैं । पर सुरेश सेन निशांत यहां शोर शराबे कर रहे हैं न छाती पीट रहे हैं बल्कि वे विश्वास से भर- उठ कहते हैं

गेहूं जब अंगुल भर चढ़ेगी
तो पिता को याद आयेगे
पुरखो से सुने हूए गीत
वह उन्हें गुनगुनायेंगे 
मां को बादलो और सूरज में
दिखेगा ईश्वर
वह उन्हें पूजेगी
भाई का अपने श्रम पर
बढ़ेगा विश्वास
वह देर तक खडा रहेगा
मुंडेरो पर उनकी चौकीदारी करता  हुआ
गेहूं जब अंगुल भर बढ़ेगी

 सुरेश सेन की इस कविता में न कोई चमत्कृत फैंटेसी है और न कृत्रिमता । बस केवल एक कृषक परिवार का यथार्थ है । न कोई लब्बो-लुआब छल है न कोई ढकोसला है । है तो सिर्फ एक अपरिमित सत्य । एक ऐसा सत्य जो झकझोरता है , हिलोरता है । मानवीय संभावनाओ को ग्राह्य बनाता है । सुरेश के यहां सब कुछ मानव के सहज वृत्तियों का प्रतिफल है । उनके यहां मां को बहिन का कद बुरा नहीं लगेगा , कि पिता लेनदारो के सामने तनकर तभी खड़ा हो पाएगें , कि भाई के लाठी में ताकत तभी आ पाएगी जब

गेहूं की बालियो में 
भरने लगेगा जब रस
बहिन का बढ़ता कद
बुरा नहीं लगेगा  मां को
तन कर खडे हो जायेंगे 
पिता लेनदारो के सामने
भाई की लाठी में
लौट आएगी ताकत
गेहूं की बालियो में
भरने लगेगा रस

सुरेश के यहां सामूहिक हौसलाई है  । एक-दूसरे में आबद्ध  । और वही उनका ताकत भी है । कि सुरेश कहते हैं --

गेहूं के बीजो तुम सभी उगना 
एक दूसरे को हौसला देते हुऐ
गेहूं के पौधो 
बेधड़क बढना हर दिन अंगुल भर तुम
हंसना खूब
पहरेदारी मे खडा मिलेगा तुम्हे भाई
पुरखो के गीतो को
लोरी की तरह गुनगुनाते हुए
गुज़रेंगे तुम्हारे सामने से पिता
मां तुम्हारी ही कुशलता के लिए 
मांगेगी दुआ
गेहूं की बालियां
खूब लहराना तुम
अपने ही भार से इस तरह झुकना
कि लेनदार खिसियाते गुजरे
हमारे ऑगन के पास से 

सुरेश सेन पर यदि विजेद्र जी लिखते हैं निशान्त हमारे समय के महत्वपूर्ण लोक धर्मी कवि है । हिन्दी के समीक्षको का उधर ध्यान जाना जरूरी है । तो असहमति का तो प्रश्न ही नहीं उठता ।  

बढ़िए , सुरेश सेन निशांत
9098649505

( कवि सुरेश सेन निशान्त की कविता )
 
गेहूं
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गेहूं उगेगी 
तो लौटेगी 
पिता के गुतो में लय
मां की आवाज़ में रस
भाई के चेहरे पर खुशी
गेहूं उगेगी तो

गेहूं जब अंगुल भर चढ़ेगी
तो पिता को याद आयेंगे
पुरखो से सुने हूए गीत
वह उन्हें गुनगुनायेंगे 
मां को बादलों और सूरज में
दिखेगा ईश्वर
वह उन्हें पूजेगी
भाई का अपने श्रम पर
बढ़ेगा विश्वास
वह देर तक खड़ा रहेगा
मुंडेरो पर उनकी चौकीदारी करता हुआ
गेहूं जब अंगुल भर बढ़ेगी

गेहूं की बालियो में 
भरने लगेगा जब रस
बहिन का बढ़ता कद
बुरा नही लगेगा मां को
तन कर खडे हो जायेंगे 
पिता लेनदारो के सामने
भाई की लाठी में
लौट आएगी ताकत
गेहूं की बालियो में
भरने लगेगा रस

गेहूं के बीजो तुम सभी उगना 
एक दूसरे को हौसला देते हुऐ
गेहूं के पौधों 
बेधड़क बढना हर दिन अंगुल भर तुम
हंसना खूब
पहरेदारी मे खड़ा मिलेगा तुम्हे भाई
पुरखो के गीतो को
लोरी की तरह गुनगुनाते हुए
गुजरेगे तुम्हारे सामने से पिता
मां तुम्हारी ही कुशलता के लिए 
मांगेगी दुआ
गेहूं की बालियां
खूब लहराना तुम
अपने ही भार से इस तरह झुकना
कि लेनदार खिसियाते गुजरे
हमारे ऑगन के पास से
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निशान्त हमारे समय के व नवें दशक के उत्तरार्ध के महत्वपूर्ण लोकधर्मी कवि हैं । यह कविता उनके कविता संग्रह 'कुछ थे जो कवि थे' से है । 

सौजन्य व आभार विजेन्द्र जी

विचार

अपने विचारों को    जड़ मत बनाएं ।
समय और संतापो से जूझते हुए समय समय पर परिमार्जित करते रहें । नवीनता बनी रहेगी

Thursday, August 6, 2020

तय करना होगा ही : संजय शांडिल्य

संदेह ; जन्माती हैं चुप्पियां । पैदा करता है गलतफहमी । यह वक्त है निर्धारण का , तय करने का वक्त है यह । साथी संजय शांडिल्य अपनी मुखरता में लगभग यही बात बता रहें हैं-- कि रहना है हमें इस पार की उस पार  ; हां के साथ या ना के साथ ; यह तय हो । माना जाना चाहिए कि साथ होना पड़ेगा हमें , किसी न किसी के साथ । कि चुनना ही पड़ेगा किसी एक को । वस्तुतः यह चुनने का ही वक्त है । एक बेहतरीन उद्घोषणा के साथ समुचित कार्रवाई की मांग करती इस कविता में अस्वीकार है , वितृष्णा है , उत्साह है , और चुनौतियों को स्वीकार करने का ताकत भी । नवें दशक के उत्तरार्ध के इस कवि के कहन में उनके जीवनानुभवों का सार व सामूहिक चेतना का आग्रह वस्तुतःज्यादा है । फिर ललकार , और उस ललकार के साथ आल्हादित करता , उत्प्रेरित करता स्वर है ; जिससे बचाई जा सकती है अपने शेष और असल हिस्से की धूप । कवि की मांग में समाप्ति का स्थान भी किसी विलुप्त नदी की तरह प्रवाहमान है । कह सकते हैं अनदेखा , अनचीन्हा और सतत् । यह सुखद बात है कि कवि वैचारिकता का आग्रह और प्रतिबद्धता की स्पष्टता चाहता है । वह लिज़लिज़े व बड़बोलेपन से भरे भौंडे प्रतिरोध का प्रतिकार करता है ।  वह सम्मोहन भरा जादुई स्पर्श नहीं करता , न पोस्टर ब्वाय होता है । हां अवश्य ही स्पष्टता का ध्वज वाहक होता है । समकालीन हिन्दी पट्टी में यह चिंता और उसका भार ढोने का जतन खट्टेपन के अहसासो से भरा हुआ है । पर इसे अधिक साहस से उठा पाने में समर्थ हुए और आगे आए साथियों में लोकधर्मी परम्परा के युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार ,अजीत प्रियदर्शी , अनिल पांडेय , व गनेश गनी ,लगातार मुखाफ़लत करते प्रतीत हो रहे हैं । गौर- ए - तलब है कि संजय शांडिल्य जिस छद्म आचरण के खिलाफ़ होना चाहते हैं वे अपने जिस कानसेप्ट को ,जो कि पूरी तरह - जैसा स्पष्ट है , वैसा ही स्पष्टता चाहते हैं ।  बजाय बीच के होने के , नपुंसकता का अस्वीकार करते हैं वह सब जनवादी लोकधर्मी कवियो के यहां अपनी विपुलता में मौज़ूद है । एकबारगी जनवादी लोकधर्मी कवियों या कि उनकी कविता को छोड़ दें तो मौजूदा समय के पहचान की यह एक बेहतरीन कविता है । कवि में गहरा असंतोष है । अपने गहराते संकट और समय को लेकर एक उच्च और उत्कट आकांक्षा का भाव है । प्रतिरोधी ताकतें निश्चय ही अभी अपने-अपने महत्वाकांक्षाओं से अपने प्रभाव को खोते दिख रहे हैं इन दिनों ; जबकि उनमें मतैक्य अथवा कि विचारों में समानता भरपूर है । इन तमाम बातों के बीच वस्तुतः जो निषेध या कि अलगाव है ; अलग-अलग खोके का बना रहना या फिर बनाए रखने की निरी हठ , वह बेसिकली वर्चस्ववाद और श्रेष्ठताबोध से प्रेरित है । बड़े होने के बोध से प्रेरित है व दंभता से प्रेरित है । दंभ मनुष्य का और मनुष्यता का सबसे बड़ा शत्रु है । वह मनुष्य को उसके आवेगो को क्षरित करता है । आमतौर पर वामपंथी बिखराव उनकी असल चिंता का सबब है । साथी के इस कविता को प्रस्तुत करने का मेरा उद्देश्य साफ़ है । साथी के इस बोधगम्य उद्गार का मैं प्रबल हिमायती हूं और मैं उनका साथ भी हूं । पाने की प्रक्रिया से खोने की प्रक्रिया ज्यादा दुःसह होती है । वामपंथ ने इस बीच पाया कम खोया ज्यादा है । और समय रहते हम चेते नहीं तो ( बिना डरे ही )हममें ही कोई अख़लाक़ होगा । तो कोई गौरी लंकेश , दाभोलकर और पंसारे ही । तय है यह ! चूंकि हत्यारे झुंड में है और झुंड अथवा भीड़ के पास कोई वैचारिक आधार नहीं होता ।  
अस्तु संजय शांडिल्य की इस कविता को मैं उनके वक्तव्य और आह्वान के रूप में देख रहा हूं जो मनुष्य के बेहतरी के लिए कारगर सुझाव भी है ।

।।  तय करना होगा  ।।

तय करना होगा
हम इस पार हैं या उस पार
'हाँ'के साथ या 'नहीं' के साथ
यह तय करने का वक्त है, दोस्त,
और आवाज उठाने का 
चुप बैठने से 
अनेक गलतफहमियाँ पैदा हो रही हैं 
एक साथ

जानता हूँ
यह जो चुप्पी है
यही बीच का वह रास्ता है
जिसमें विचार की नदी बहती है
और यह भी 
कि इस नदी से 
अंतहीन विचारों की असंख्य नदियाँ 
निकलती हैं दसों दिशाओं में

तुम अपने दमदार विचारों के साथ 
इनमें गोते लगाते रहोगे
और बहुत जल्द यह समय
अपने कूड़ेदान में तुम्हें फेंक देगा

केवल रचना में भी बात कहने का वक्त 
यह नहीं है, दोस्त!
हमें किसी न किसी ओर होना पड़ेगा सदेह
'अन्याय का स्वीकार' और 'अन्याय का प्रतिकार' में 
एक को चुनना ही पड़ेगा
यह चुनने का वक्त है, दोस्त, 
और कार्रवाई करने का!

Monday, August 3, 2020

अधार्मिकता

सच और तथ्य का अस्वीकार कम अधार्मिकता नहीं है ।

असंग घोष अपने तीक्ष्ण प्रहार से पहचाने जाने वाले कवि हैं

हिंदी कविता और दलित चेतना के मुखर स्वर असंग घोष के सन्दर्भ में कि ------

वे कवि इसलिए हैं ; 
'केशव पांडेय स्मृति कविता सम्मान' के काबिल इसलिए हैं । 

शम्बूक!

तुमने रामराज्य में
तपस्या कर
सशरीर स्वर्ग जाना चाहा
तुम्हारी यही तपस्या
सही नहीं गई

ब्राह्मणों, क्षत्रियों व
खुद राजा राम तक
सबने षड्यंत्र रचा, और
तुम्हारा सिर धड़ पर न रहा
तुम मारे गए बेकसूर
राजा राम के हाथों
रामराज्य में तब से
हत्यारा राजा राम
महिमामंडित हो
भगवान श्री राम हो गया।

ओ कजरवारा की मोना!

तुम मरीं
भूख से
बुखार से
कुत्ता काटने से
उपेक्षा से
या अपनी अभिरक्षा से
वंचित हो मरीं,
व्यथित हो मरीं
क्या तुम नहीं जानतीं?
गरीब-गुरबा मरते हैं
झुलसती गर्मियों में लू से
कड़कड़ाती ठण्ड में शीत से
बरसात में बाढ़ से
गाज गिरने से
मौका लगे तो
दूसरों की लगाई आग से
इलाज के अभाव में
बीमारी से, पर
खाने को जब तक होती हैं
हवा, घास, भीख या रहम
तब तक गरीब नहीं मरते
कभी भूख से
ओ मोना!

कजरवारा में तो
दावों-प्रतिदावों के बीच
यह सब था
फिर तुम मरीं क्यों?
शासन नहीं कहता
तुम्हारी लाश उखाड़े बिना
बिना चीरफाड़ किए
तुम्हें भूख ने मारा
बुखार ने मारा
अभाव ने मारा, या
मौत ने मारा
ओ मोना!
तुम मरीं क्यों?

धर्म!

तुम भी एक हो
मेरे पैदा होने के बाद
जाति के साथ
चिपकने वाले।

कमबख्त जाति को
मैं नहीं त्याग सकता
यह सदियों पूर्व से
मेरे पुरखों के साथ
थोपी गई है।
यदि मैं
जातिबोधक शब्द न लगाऊँ तो
तुम्हारा घाघ पुरोधा
जासूसी कर
मेरी जाति खोज लाता है
लेकिन मैं
तुम्हें तो त्याग ही सकता हूँ
भले ही
तुम्हारा बाप बामन
घड़ियाली आँसू बहाए
लाख कहे हमारा दोष क्या है
हम बामन के घर पैदा हुए, पर
वह पीठ पीछे वार करना नहीं भूलता
तुम्हारा ठेकेदार जो है
फिर मैं
तुम्हें क्यों न छोडूँ
लो
मैं तुम्हें तिलांजलि देता हूँ।

सुरेश सेन निशांत लोकधर्मी चेतना के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...