कुमार अंजन को बतौर अंजन कुमार नाम से जानता हूं मैं । निस्संदेह उससे बहुत और अतिरिक्त स्नेह सर्वथा रहा है मेरा । पर रचना और चयन के मामलों में मैं उससे इत्तेफ़ाक बहुत देर से रख पाया । शायद यह मेरी कमी थी या फिर धैर्य ? पर मुझे लग रहा है कि इस कवि पर चर्चा अब नहीं तो कब ? अतः आज मैं वैयक्तिक हूं कि अपने चयन मामले में खरा ; यह साथी तय करें ।
अंजन कुमार नई सदी की समकालीन हिंदी कविता में उस समय प्रवेश करते हैं जब देश में विघटनकारी साम्प्रदायिक शक्तियां पूरे ताकत से उठ रहे थे और अपने सामर्थ्य को जुटाने में लगे थे । निश्चय ही यह वह समय था जब गोधरा घटी , बाबरी का ध्वंस हो चुका था और सोवियत गणराज्य नेस्तनाबूत । एक ओर भारत का सेक्यूलर राजनीति छिन्न भिन्न हो , सम्प्रदायिकता के रंग में रंग गया था । पूंजीवाद अपनी पांव पसार उदारीकरण के रास्ते पर चल पड़ा था । अंकल-डंकल झोला लिए देश को झोल रहे थे । नवउदारवाद का चेहरा मोटे तौर पर तय हो चुका था पर उसकी पहचान को स्पष्ट रुप में घोषित किया जाना शेष था ; खैर ।
आश्चर्य कि उस समय का यह नवांकुर कवि चुप नहीं था । अधीर था और बहुत बेचैन भी । उसकी यह बेचैनी और तड़पड़ाहट उन दिनों शिद्दत से उनकी रचनाओं में आकार लेने लगी थी । कुछ ऐसा लिखा जा रहा था उससे , कि उसकी शिनाख्तगी तय थी । अतः कहना चाहूंगा कि यह कवि अब नया नहीं है । साज और साध्य के मामले में सजग है । चौकन्ना है । बजाय उस स्त्री के बगल में लेटकर धूमिल के शब्दों में कहूं तो ; अधिक दायित्व बोध से लैस है । ककहरा को बहुत पीछे छोड़ आया है । इस कवि की कविता 'अफीम' अचानक ही मेरे फेसबुक पर दिखाई दी । मेरा मोह जाग गया । दरअसल अंजन कुमार की इस कविता में कोरोना महामारी के बाद उपजे भय और आशंका के बीच प्रधानमंत्री के लाकडाऊन को सफल बनाने के लिए ढुंढे गए अवैज्ञानिक सोच और छद्म की मीडियाकरी थी । जिसका अंजन कुमार ने गहरी और सूक्ष्म पड़ताल की है । अंजन ने इस कविता में न केवल कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में दर्ज उस अवैज्ञानिकता को आधार बनाए जाने को नकारा बल्कि सात पर्दे पार के रहस्य को भी बेनकाब किया । अंजन की कविता की बानगी ही इस बात की गवाही है ।
दृष्टव्य है कविता 'अफ़ीम'
अफ़ीम
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भय से घरों में कैद
लोगों के टीवी चैनलों में
परोस दी गई है अफ़ीम
जिसे चाटते हुए दिन रात
इतने आदी हो जायेगें एक दिन
कि हर समस्या का हल
हम अफ़ीम के नशे में ढूंढेंगे
तब कितना आसान हो जायेगा
सच को छुपा लेना
हर समस्या के लिए
किसी को दुश्मन बना देना
कितना आसान हो जायेगा तब
अफीमचियों के हाथों में
संविधान की जगह
शस्त्र थमा देना ।
तो वही अंजन कुमार दूसरी कविता 'ये आपकी तरह नहीं है साहब' में 'अच्छे दिनो' के आस में एक राज्य से दूसरे राज्य की सीमा लांघ गए लोगों का लाकडाउन के बाद घर को लौट जाने की जद्दोजहद में दर-ब-दर की जो स्थिति उत्पन्न हुई , उस पीड़ा, तकलीफ और कातरता का भयावह दृश्य को बयां किया ।
बयानगी दृष्टव्य है
ये आपकी तरह नही है साहब !
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देख रहे हो साहब !
उस आदमी को
इस संकटपूर्ण भयावह समय में भी
जिसने नहीं छोड़ा अपनी पत्नी का साथ
आपके इस नफरत भरे समय में भी
प्रेम की मिसाल बन
चलने से लाचार पत्नी को कंधे पर बैठाकर
मीलो का सफर तय कर रहा है जो
देख रहे हो साहब !
उस रिक्शा चलाने वाले पिता को
जो बेख़ौफ़ अपनी दो छोटी-छोटी बेटियों को रिक्शे में बैठाये
कुछ पानी की बोतलों और किताबों के साथ
कई दिन, कई रात का सफर तय कर
पहुँचना चाहता है अपने घर
देख रहे हो साहब !
उस लड़के की हिम्मत
जिसने अपने टूटे टांग का प्लास्टर
खुद अपने हाथों से निकाल दिया है
कि उसे मीलों पैदल चलने में उसे परेशानी न हो
आप देख रहे हो साहब !
ये जो चले आ रहें है चीटियों की तरह
ये मेहनत, मजूरी कर अपना घर चलाने वाले हैं
ये किसी के पति, किसी के पिता
किसी के भाई, किसी के बेटे,
किसी के मित्र, किसी के रिश्तेदार हैं
इनका अपना घर परिवार है
ये ख़ालिस और मुकम्मल आदमी हैं
इनकी अपनी जिम्मेदारी है
इनके लिए सबसे बड़ी महामारी
इनकी भूख और बेकारी है ।
तीसरी कविता 'तानाशाह' अंजन के लिए __ इन मायनों में मील का पत्थर साबित होती है कि इस शीर्षक और विषयवस्तु पर अनगिन कविताएं हैं और अलहदा भी है उनमें यह भी शामिल है । तानाशाह की शिनाख्तगी को लेकर समकालीन कवियों ने न केवल वैविध्य काव्य बिम्ब का भरपूर प्रयोग किया है । बल्कि शिल्पगत वैशिष्ट्यता को भी जहीनियत में रखा । मसलन मंगलेश डबराल, कौशल किशोर, मणिमोहन मेहता, भास्कर चौधरी, कुमार अनुपम, निर्मल गुप्त इत्यादि । बताना न होगा कि अंजन कुमार की यहां प्रस्तुत कविता तानाशाह भी इन्हीं कवियों के परस्पर चाल और चरित्र के छद्म में गूंथें खलनायक का निर्विवाद पहचान करती है जो कि
कविता के मानकीकरण पर खरा है
तानाशाह
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तानाशाह
सबसे पहले चुनता है एक सम्बोधन
जैसे हिटलर ने चुना था फ्रेंड्स
फिर वह चुनता है वह स्थान
जो जनता की आस्था केंद्र होता है
जैसे हिटलर ने चुना था म्यूनिख को
फिर वह चुनता है
अपना एक धार्मिक दुश्मन
जैसे हिटलर ने चुना था यूहदीयों को
फिर वह चुनता है अपने हितचिंतकों को
जैसे हिटलर ने चुना था
चरम पूंजीपतियों को
फिर वह चुनता है
अपने सहयोगी को
जैसे हिटलर ने चुना था कारपोरेट को
फिर वह बनाता है अपना संगठन
जैसे हिटलर ने बनाया था
मिलीशिया, यंग फासीवादी और नागरिक सेवा संगठन
फिर वह चुनता है अपनी विचारधारा
जैसे हिटलर ने चुना था राष्ट्रवाद
फिर वह
अपने सहयोगियों और संगठनों के माध्यम से
पहले बढ़ाता है जनता की आस्था
फिर उठाते हुए उसी का फायदा
फैलाता है अंधराष्ट्रवाद, अफवाहें, भय और नफ़रत
करवाता है अपने दुश्मनों की हत्याएं
अपने संगठन के हाथों
जैसे हिटलर ने करवाया था
यूहदीयों, कम्युनिस्टों, लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों
और तमाम अपने विरोधियों की
क्योंकि विरोध से डरता है वह
इसीलिए वह कभी नहीं करता संवाद
किसी भी बात पर
पूछता नहीं किसी से
केवल जारी करता है फरमान
वह भी इस तरह से
कि उसका हर निर्णय लगता है जनता को
जैसे उनके हित के लिए है
वह झूठ को इस तरह कहता है बार-बार
की लोग उसे सच समझने लगते हैं
और करने लगते हैं उसका अनुशरण
इस तरह वह जनता की आँखों में
बांधकर अंधराष्ट्रवाद की पट्टी
भेड़ों की भीड़ में कर देता है तब्दील
और जब , जैसे चाहे हंकालता रहता है
फिर तोड़ देता उन तमाम
पुराने सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक ढांचों को
जो उसकी सत्ता में बाधक है
ध्वस्त कर सारे सार्वजनिक उपक्रमों को
कर देता है इजारेदारी पूंजी के हवाले
क्योंकि वह जनता का नहीं
होता है केवल चरम पूंजीपतियों का हितैषी
इस तरह एक दिन
लोकतंत्र की हत्या करके
वह सब पर कर लेता है कब्जा
और बन जाता है
सबसे प्रभुत्वशाली तानाशाह
अंजन की इस कविता में एक संप्रभु राष्ट्र की प्रभुता को बचाए रखने की चिंता है ।उसके गांभीर्य को नकारा नहीं जा सकता ।बताना ना होगा कि इधर हाल के बदले हुए हालात से मध्यमवर्गीय चयन और चुनाव पर इस कविता में सवालिया क्षोभ है । चूंकि चीज़ों के परस्पर सच दृश्य में नहीं है । वह गायब है । फासीवाद और हिटलर के कई अदृश्य चेहरा और उसका बिम्ब है । जिसके सहारे तानाशाह की स्थापनाएं आगे बढ़ता है और जब चरम की प्राप्ति के बाद वह पूरा नंगा हो जाता है तब चीजें बिखरी हुई होती है । कहना तो नहीं चाहिए ,पर देश दुनिया में जितने भी उथल पुथल हैं , वह सहूलियत परस्ती से है । इस सहूलियत परस्ती अर्थात् कि गंवारूपन का जिम्मा सबसे अधिक मध्यमवर्ग ने उठाए । इसमें संदेह नहीं है । यह वही मध्य वर्ग है जिसने अपने -अपने गांव को लौट रहे दुखीजनों के दुख को देख रो लिया और क्षण भर में सब को दरकिनार कर गाने लगा । पर उसने एक वास्तविक और जिम्मेदार नागरिक बोध से दुःख के कारकों पर ऊंगली रखने की जहमत उठाया नहीं कभी । वह नौ बजे , नौ मिनट के प्रोपैगंडा में आतिशबाजी करते दिखा ,थाली पीटा। अंजन की इन कविताओं में ईमानदार कवि की अभिव्यक्ति है । समाजवादी स्थापनाओं का नज़रिया है अंजन की कविताओं में प्रतीक बिम्ब की प्रधानता है के साथ सीधे फ़ूल को फूल और शूल को शूल कहने के सामर्थ्य भरे हुए हैं । इस क्रम में उनके यहां 'नाटकबाज' 'गिद्ध' 'मसखरे' जैसी अनेक कविताएं हैं
मसखरे
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मसखरों का
कोई इतिहास नहीं होता
लेकिन हर इतिहास में होते हैं मसखरें
राजा, रानी, मंत्री
हर किसी को
हँसाते, गुदगुदाते, खुश रखते
मसखरे
मसखरों की मसखरी ही
उनका रोजगार होता है
उनका दाना-पानी
सो उसी के सहारे बने रहते हैं
हर दरबारों में
यहां तक कि अंतःपुरों में भी
कब, किसे, कैसे खुश रखना है
यह बहुत अच्छे से जानते हैं मसखरें
अपने स्वार्थ सिद्धि में लीन
आत्ममुग्ध मसखरें
सामाजिक सरोकारों से परे
केवल मसखरें होते हैं
न वे गंभीर होते हैं किसी के लिए
न कोई गंभीरता से लेता है उन्हें ही
हर कोई पसंद करें उन्हें
इसी में खुश रहते हैं मसखरें
नये-नये किस्से
नये-नये जुमले
नये-नये झूठ
ही इनकी संपत्ति
या यूं कहे कला होती है
ऐसे मसखरों से
भरा पड़ा है इतिहास
मगर
इतिहास कभी भी
मसखरों का रहा नहीं।
।
एक बात और कि वैचारिक बोध और असहमति की कविताओं में ख़ासी मशक्कत के बाद भी चीजें घूम फिर कर वहीं आ जाती हैं । अपने संधान और लक्ष्य भेदन के लिए वह सीमित अस्त्र तथा विचारों में विश्वसनीय बने रहती है । अंजन के यहां वैचारिक कविताओं के परस्पर 'अंधेरे की उजली गुफा' 'बीड़ी बनाती स्त्रियां' 'आवाज़' 'संवादहीनता' जैसी कलात्मक और संवेदनशील कविताओं का विस्तृत कैनवास है । जिनमें चीज़ों का दिखना और होने के बीच के फांक का भयावह सच है । 'अंधेरे की उजली गुफा' शीर्षक कविता में यह बिम्बों में उजागर हुई है।
अंधेरे की उजली गुफा
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उदास चेहरों के बीच
एक लालटेन थी
जिसमें अंधेरा नहीं
समय जल रहा था
अंधेरा
उजाले की मोटी दीवार के पीछे खड़ा हंस रहा था
उन कटे हुए हाथों पर
जो जमीन में हाथ गड़ाये
ढूंढ़ रहे थे अपनी घड़ी
जिसमें समय न जाने कब से
दफ्न पड़ा था
उन बूढ़ी आँखों पर
जो ढूंढ़ते हुए अपनी आँखों की रोशनी
ले आये थे मुफ्त में
जीवनभर का अंधेरा अपने लिए
उन स्त्रियों पर
जो गई थी देश के विकास में नसबंदी कराने
और दे आई थी अपनी जानें
उन तमाम लोगों पर
जो सायों की तरह उतरते सीढ़ियाँ
अपने घरों की
और गुम हो जाते भीड़ में
अपने खो चुके चेहरों की तरह
अंधेरा हंस रहा था
जिस उजाले पर
एक अंतहीन अंधेरे की उजली गुफा थी
एक तिलस्म अनंत इच्छाओं और भूख का
जिसकी मोहपाश में बंधें
गिरते है जहाँ, एक-एक कर
ठगे, पर फूले हुए चेहरे लिए
आश्चर्य लोक के यात्री बन सभी
उजाले के शोर में गुम
बाँधें हुए आँखों पर रंगीन चमकदार पट्टी
सब दिखते एक से
एक से भाव और उत्तेजना में लिप्त
अपने को ही उधेड़ते
खोलते आदिम वासनाओं के द्वार
भटकते रिक्तता के मरूस्थल में
उजाले की चमकती मृगमरीचिकाओं के साथ
रेत होते जीवन तक
जहाँ पाने के लिए कुछ भी नहीं
एक और नई इच्छा के सिवा
और इच्छा भी किसी इच्छाधारी सर्प की तरह
अपना रूप बदल-बदलकर डसने को तैयार
जहर बुझे तीरों की तरह आँखों को बेधती हुई
विषाक्त करती पूरे जीवन को
मैं गिरता हूँ इस उजली गुफा में
सूखी चाम पर
चूसी गई हड्डियों पर
पथराई आँखों पर
क्षत-विक्षत भूखी नंगी सैकड़ों मृत देहों पर
दबी हुई सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े
विज्ञापनों के नीचे
जो कभी खबर नहीं बन पायी
किसी भी अखबार की मुख्य पृष्ठ की
ना ही दिखाई गई बार-बार किसी भी टी.वी. चैनल पर
जैसे दिखा दी जाती है अक्सर
किसी माडल के अधोवस्त्र के गिरने की खबर
बार-बार लगातार पूरी रोचकता के साथ
एक उजली और चमकदार गुफा है यह
जिसमें हर बड़ा चेहरा
प्रेतआत्माओं-सा घेरे हुए
लगातार लगा हुआ है
आत्महीन
विवेकहीन
चरित्रहीन
और व्यक्तित्व विहीन
करने में हमें।
एक कवि कलाकार जब बहुत सारे अदृश्य चित्रों को , हमारे समय के अनेक सामाजिक , राजनीतिक यथार्थ को , दृश्य चित्रों में बदलने की लालसा से सराबोर होने लगता है और वह उसे उस मानक रूप में दर्ज नहीं कर पा रहा होता है जिसकी मंशा उस पर बलवान होती है ; अर्थात कि चीजों के दृश्यांश के लोभ संवरण से वह मुक्त नहीं हो पाता और वैचारिक तथा कलात्मकता के ऊहापोह और जंजाल से घिर कर वैकल्पिक दशा के निर्माण में धारहीन होता महसूस करता है ; तब वह बिम्ब के सृजन को श्रेयस्कर मानता है । बिम्ब विधान अपनी कथन को बहुत कम शब्दों में समेट उसे अधिक व्यापी बनाने की वह काव्य कला है जिसमें एक के परस्पर अनेक ध्वनि , लय , अंतर्लय गोते लगाने लगते हैं । और सृजन अपनी समग्रता में अभिमुखित होता है । अंजन के यहां विचारधारा और कला का यही टकराव बिम्बों के सृजन का कारण है । 'स्वप्न और यथार्थ' कविता इसी उहापोह से जनित कविता है । जिसमें विचार और कला के बचाव का जोखिम तथा जद्दोजहद है।
स्वप्न और यथार्थ के बीच
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कुत्तों के रूदन में
गहरी हो चुकी रात
गूंज रही है सूखे पत्तों पर
चांद
अटका हुआ है पेड़ की शाख पर
किसी उदास गेंद की तरह
और तारें धुंध में कहीं
दूर निकल गये हैं भटककर
यह स्वप्न और यथार्थ के बीच
चूक गये समय की सर्द रात है
जहां सारे जरूरी मूल्य
पेड़ पर चमगादड़ की तरह
उल्टे लटके चीख रहें हैं
और सारा शहर
चादर से बाहर निकाले पांव
एक कभी न खत्म होने वाले
स्वप्न में डूबा हुआ है
एक ऐसा रहस्यमय स्वप्न
जो जितना विराट है
उतना ही जठिल भी
जो जितना सुंदर है
उतना ही भयावह भी
नहीं है तो सिर्फ
तर्क करने की जगह
संदेह करने की वजह
आश्चर्य है कि इसमें नहीं है
कोई विराम चिन्ह भी
जहां थोड़ी देर ठहरकर
यह देखा जा सके
कि घंटे को पकड़ने के चक्कर में
मिनट के कांटे से गिरकर
सेकंड के हाथों
कैसे मारे जा रहें हैं
हम लगातार
घड़ी हाथ में बंधी है
या हाथ बंधे है घड़ी से
कि सारे जरूरी प्रश्न
छुटते जा रहें हैं यक-ब-यक
समय के अभाव में
हर चेहरा होता जा रहा है विद्रूप
दिन-ब-दिन एक भाव के अभाव में
मनुष्यता जैसे कोई पिछले जमाने की
बात हो गई हो
और अपराधबोध
कोई पुरानी दिल की बिमारी
यथार्थ से कोसो दूर
एक स्वप्न में डूबा यह शहर
बिल्कुल उस चिड़िया की तरह है
जिसे दाना तो दिखाई देता है
पर अफसोस जाल नहीं
जो एक रात भटककर
जा पहुंचती है किसी कमरे में
ढूंढ़ते हुए एक सुरक्षित कोना
और अगले दिन मिलती है
मरी हुई
यह स्वप्न और यथार्थ के बीच
चूक गये समय की सर्द रात है
जहां रात के ब्लैकबोर्ड पर
खींचते हुए आड़ी-तिरछी लकीरें
उस नदी से बेखबर है सभी
जो खतरे की निशान से
ऊपर बह रही है।
'बीड़ी बनाती स्त्रियां' श्रम साध्य लोगों की अंतर्कथा है । उनके साध्य से तादात्म्य संबंध की नाप है । लय और तुक का परिमाप है जो कि मशीनीकरण के इस युग में भी यांत्रिकता को उसके परस्पर चुनौती देता है । साहस और सामर्थ्य से भरे हुनरमंद मजबूत हाथों की हौसला-अफजाई है ।
बीड़ी बनाती स्त्रियां
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वे गोल बनाकर
बैठी हुई थी स्टेशन के एक कोने में
ऐसे, जैसे बैठी हों किसी आँगन में
उनके चेहरे पर
न कहीं पहुँचने की बैचनी थी
न ही किसी सफर की थकान
एक समान भाव से बैठी
बनाती हुई बीड़ियाँ
तैयार करती हुई बीड़ियों बंडल
वे इस तरह कर थीं बातें
कि जैसे बातें करना भी
उनके इस काम में शामिल हो
न कोई हँसी, न कोई मजाक
कभी-कभी तो लगता
कि अपने आप से ही
बतिया रही हैं सब
मैं जब तक देख पाता
बीड़ी बनाने की सही-सही विधि
बीड़ी बनकर तैयार हो जाती
बीड़ी बनाते हुए
इतने अभ्यस्त हो चुके थे उनके हाथ
कि हाथ, हाथ नहीं
यंत्र लग रहे थे
जिनसे फूटने के बजाय कोई गीत
आ रही थी मशीन की धीमी आवाज
मानो वह
बीड़ी बनाती स्त्रियाँ नहीं
किसी यांत्रिक दुनिया के जीवित कल पुर्जे हों।
अतः कहना न होगा कि नई सदी की हिंदी कविता में अंजन कुमार अपनी इन कविताओं के बल बेहतर हस्तक्षेप करते नजर आए हैं । उनका मैं स्वागत करता हूं