Sunday, July 26, 2020
कविता
भाववादी विचार , रिक्त सौन्दर्य बोध अथवा रूझान एक कयिता को यथार्थ से विमुख करते हैं । पूंजी के इस संदिग्ध , कलावादी चेहरे से दूर एक सजग कवि हमेशा ही अपना अलग अस्तित्व गढ़ता है ।
Saturday, July 25, 2020
किधर जाऊं : किशनलाल
किशन लाल की यह दूसरी पारी है ; यह कहना निश्चय ही न्यायिक ही होगा कि वे अंतिम दशक की हिंदी कविता में अपनी स्पष्ट पहचान बना लेने के बाद उपन्यास पर जोर आजमाइश करते दिख रहे हैं । हालांकि यह किशन लाल का पहला उपन्यास है पर हिंदी के अन्य उपन्यासकारों में उनकी इस नई उपस्थिति को उनके कहन की शैली और संवादात्मक उपस्थिति के बीच एक जबर्दस्त रिस्पांस की उम्मीद है । आमतौर पर प्रचलित तौर तरीकों के विपरीत किशन का यह उपन्यास देशज है । जमीनी उपन्यास है । जो आत्मकथात्मक दलित चेतना के कई बड़े हस्ताक्षरों में ओमप्रकाश वाल्मीकि , शरण कुमार लिंबाले , जयप्रकाश कर्दम , तुलसी राम , मोहनदास नैमिषराय , कर्मानंद आर्य , कंवल भारती , मुसाफिर बैठा , मलखान सिंह आदि का ही विस्तार रुप है ।
किशन लाल के इस नए और ताजा उपन्यास का शीर्षक 'किधर जाऊं' एक दृष्टया किसी भटकाव अथवा विकल्पहीनता का बोध कराती है पर तह में जाएं तो बिल्कुल अलग ही प्रतीत होता है । एक अन्वेषी दृष्टि और दृढ़ता का भान होता है । मूलतः छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के देमार में जन्में किशन लाल के इस उपन्यास में छग की उर्वर माटी की उर्वरता भी संदेह के घेरे में है । जहां जैसा कि दिखता है , वैसा सब कुछ सामान्य नहीं है । इस उपन्यास में विषमताओं के आकंठ से ऊपजा गहरा असंतोष है । वर्ण व्यवस्था अथवा श्रेष्ठता बोध के आगे बौना होता समाज का चरित्र चित्रण है ।
किशन लाल के इस उपन्यास में छत्तीसगढ़ के मोची जाति की रोज़मर्रा , उनके लोक जीवन , लोक परंपरा , रीति-रिवाज , काम- काज , सामाजिक , राजनीतिक तथा आर्थिक संघर्ष शिद्दत से उजागर हुई है ; यकीनन यह आम जन के लिए अनछुआ पहलू है । मैं खुद भी अनछुआ था , आधी अधूरी रही ही थी , मेरी जानकारी । परन्तु इस उपन्यास को पढ़कर,जातीय बोध के दंश से असह्य दुख व पीड़ा को समझने में यह मेरे लिए बहुत मददगार साबित हुई । मोची जाति पर केन्द्रित किशन के इस नवीनतम उपन्यास का मुख्य किरदार सूरज एक पढ़ा लिखा नौजवान है जो एक अच्छा संवेदनशील इंसान भी हैं ; के इर्द गिर्द पूरी कहानी चलचित्र के भांति घूमती है और सूरज में उसका खोया बचपन , किशोर सूरज के मन का उद्देलन तथा युवा सूरज का विस्फोटक संघर्ष आकार पाता है ।
Sunday, July 19, 2020
रमाशंकर विद्रोही की कविताएं
रमाशंकर यादव अपने नाम के आगे जब यह 'विद्रोही' शब्द लगाए तो उन्होंने उसे अर्थवान भी बनाया। जितना भी रचा-कहा ; खरा रचा , खरा कहा और ख़ूब कहा । उनकी कविताएं नियमों से परे रह , सीमाओं को ढहाती रही , तोड़ती रही जड़ता को। मजूर ,किसानों और स्त्रियों को लेकर उनकी तरल और तरूण संवेदना तथा संप्रेषण की सहजता हमें उनके बहुत करीब ले जाता है । प्रगतिशील काव्य परंपरा के इस कवि का जुड़ाव जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से छात्र आंदोलन से लेकर जीवन पर्यन्त बना रहा । एक कविता संग्रह 'नई खेती' प्रकाशित है ।साभार कविता कोश पढ़िए उनकी चुनिंदा कविताएं
जन-गण-मन
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मैं भी मरूंगा
और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे
लेकिन मैं चाहता हूं
कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें
फिर भारत भाग्य विधाता मरें
फिर साधू के काका मरें
यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें
फिर मैं मरूं- आराम से
उधर चल कर वसंत ऋतु में
जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है
या फिर तब जब महुवा चूने लगता है
या फिर तब जब वनबेला फूलती है
नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके
और मित्र सब करें दिल्लगी
कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा॥
औरतें
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कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कूदकर जान दी थी
ऐसा पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है
और कुछ औरतें अपनी इच्छा से चिता में जलकर मरी थीं
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा हुआ है
मैं कवि हूँ, कर्त्ता हूँ
क्या जल्दी है
मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित दोनों को एक साथ
औरतों की अदालत में तलब करूँगा
और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूँगा
मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूंगा
जो श्रीमानों ने औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किए हैं
मैं उन डिक्रियों को भी निरस्त कर दूंगा
जिन्हें लेकर फ़ौजें और तुलबा चलते हैं
मैं उन वसीयतों को खारिज कर दूंगा
जो दुर्बलों ने भुजबलों के नाम की होंगी.
मैं उन औरतों को
जो अपनी इच्छा से कुएं में कूदकर और चिता में जलकर मरी हैं
फिर से ज़िंदा करूँगा और उनके बयानात
दोबारा कलमबंद करूँगा
कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया?
कहीं कुछ बाक़ी तो नहीं रह गया?
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई?
क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ
जो अपने सात बित्ते की देह को एक बित्ते के आंगन में
ता-जिंदगी समोए रही और कभी बाहर झाँका तक नहीं
और जब बाहर निकली तो वह कहीं उसकी लाश निकली
जो खुले में पसर गयी है माँ मेदिनी की तरह
औरत की लाश धरती माता की तरह होती है
जो खुले में फैल जाती है थानों से लेकर अदालतों तक
मैं देख रहा हूँ कि जुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है
चंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित और तमगों से लैस
सीना फुलाए हुए सिपाही महाराज की जय बोल रहे हैं.
वे महाराज जो मर चुके हैं
महारानियाँ जो अपने सती होने का इंतजाम कर रही हैं
और जब महारानियाँ नहीं रहेंगी तो नौकरियाँ क्या करेंगी?
इसलिए वे भी तैयारियाँ कर रही हैं.
मुझे महारानियों से ज़्यादा चिंता नौकरानियों की होती है
जिनके पति ज़िंदा हैं और रो रहे हैं
कितना ख़राब लगता है एक औरत को अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना
जबकि मर्दों को रोती हुई स्त्री को मारना भी बुरा नहीं लगता
औरतें रोती जाती हैं, मरद मारते जाते हैं
औरतें रोती हैं, मरद और मारते हैं
औरतें ख़ूब ज़ोर से रोती हैं
मरद इतनी जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं
इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी,
मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी
और यह मैं नहीं होने दूँगा.
कविता और लाठी
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तुम मुझसे
हाले-दिल न पूछो ऐ दोस्त!
तुम मुझसे सीधे-सीधे तबियत की बात कहो।
और तबियत तो इस समय ये कह रही है कि
मौत के मुंह में लाठी ढकेल दूं,
या चींटी के मुह में आंटा गेर दूं।
और आप- आपका मुंह,
क्या चाहता है आली जनाब!
जाहिर है कि आप भूखे नहीं हैं,
आपको लाठी ही चाहिए,
तो क्या
आप मेरी कविता को सोंटा समझते है?
मेरी कविता वस्तुतः
लाठी ही है,
इसे लो और भांजो!
मगर ठहरो!
ये वो लाठी नहीं है जो
हर तरफ भंज जाती है,
ये सिर्फ उस तरफ भंजती है
जिधर मैं इसे प्रेरित करता हूं।
मसलन तुम इसे बड़ों के खिलाफ भांजोगे,
भंज जाएगी।
छोटों के खिलाफ भांजोगे,
न,
नहीं भंजेगी।
तुम इसे भगवान के खिलाफ भांजोगे,
भंज जाएगी।
लेकिन तुम इसे इंसान के खिलाफ भांजोगे,
न,
नहीं भंजेगी।
कविता और लाठी में यही अंतर है।
मोहनजोदड़ो की आखिरी सीढ़ी से __________________
मैं साइमन
न्याय के कटघरे में खड़ा हूं
प्रकृति और मनुष्य मेरी गवाही दे!
मैं वहां से बोल रहा हूं जहां
मोहनजोदड़ो के तालाब के आखिरी सीढ़ी है
जिस पर एक औरत की जली हुई लाश पड़ी है
और तालाब में इंसानों की हड्डियां बिखरी पड़ी हैं
इसी तरह एक औरत की जली हुई लाश
आपको बेबीलोनिया में भी मिल जाएगी
और इसी तरह इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां
मेसोपोटामिया में भी मिल जाएँगी
मैं सोचता हूं और बारहा सोचता हूं
कि आखिर क्या बात है कि
प्राचीन सभ्यताओं के मुहाने पर
एक औरत की जली हुई लाश मिलती है
और इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां मिलती हैं
जिनका सिलसिला
सीथिया की चट्टानों से लेकर
सवाना के जंगलों तक फैला है.
एक औरत जो मां हो सकती है
बहन हो सकती है
बीवी हो सकती है
बेटी हो सकती है, मैं कहता हूं
तुम हट जाओ मेरे सामने से
मेरा खून कलकला रहा है
मेरा कलेजा सुलग रहा है
मेरी देह जल रही है
मेरी मां को, मेरी बहन को, मेरी बीवी को
मेरी बेटी को मारा गया है
मेरी पुरखिनें आसमान में आर्तनाद कर रही हैं
मैं इस औरत की जली हुई लाश पर
सिर पटक कर जान दे देता
अगर मेरी एक बेटी ना होती
तो और बेटी है कि कहती है
कि पापा तुम बेवजह ही
हम लड़कियों के बारे में इतना भावुक होते हो
हम लड़कियां तो लकड़ियां होती हैं
जो बड़ी होने पर चूल्हे में लगा दी जाती हैं.
और वे इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां
रोमन गुलामों की भी हो सकती हैं
और बंगाल के जुलाहों की भी
या अति आधुनिक वियतनामी, फिलिस्तीनी, इराकी
बच्चों की भी
साम्राज्य आखिर साम्राज्य ही होता है
चाहे वो रोमन साम्राज्य हो
चाहे वह ब्रिटिश साम्राज्य हो
या अतिआधुनिक अमेरिकी साम्राज्य हो
जिसका एक ही काम है कि-
पहाड़ों पर पठारों पर
नदी किनारे, सागर तीरे
मैदानों में
इंसानों की हड्डियों बिखेर देना-
जो इतिहास को तीन वाक्यों में
पूरा करने का दावा पेश करता है-
कि हम धरती पर शोले भड़का दिए
कि हमने धरती में शरारे भर दिए
कि हम ने धरती पर इंसानों की हड्डियाँ बिखर दीं
लेकिन मैं स्पार्टाकस का वंशज
स्पार्टाकस की प्रतिज्ञाओं के साथ जीता हूं
कि जाओ कह दो सीनेट से
हम सारी दुनिया के गुलामों के इकठ्ठा करेंगे
और एक दिन रोम आएंगे जरूर.
लेकिन हम कहीं नहीं जाएंगे
क्योंकि ठीक इसी समय
जब मैं यह कविता आपको सुना रहा हूं
लातिन अमरीकी मजदूर
महान साम्राज्य के लिए कब्र खोद रहा है
और भारतीय मजदूर उसके
पालतू चूहों के बिलों में पानी भर रहा है
एशिया से लेकर अफ्रीका तक घृणा की जो आग लगी है
वह आग बुझ नहीं सकती है दोस्त!
क्योंकि वो आग
एक औरत की जली हुई लाश की आग है
वह आग इंसानों की बिखरी हुई हड्डियों की आग है.
इतिहास में पहली स्त्री हत्या
उसके बेटे ने अपने बाप के कहने पर की
जमदग्नि ने कहा ओ परशुराम!
मैं तुमसे कहता हूं कि अपनी मां का वध कर दो
और परशुराम ने कर दिया
इस तरह पुत्र, पिता का हुआ
और पितृसत्ता आई
अब पिता ने अपने पुत्रों को मारा
जाह्नवी ने अपने पति से कहा
मैं तुमसे कहती हूं
मेरी संतानों को मुझ में डुबो दो
और राजा शांतनु ने अपनी संतानों को
गंगा में डुबो दिया
लेकिन शांतनु जाह्नवी का नहीं हुआ
क्योंकि राजा किसी का नहीं होता
लक्ष्मी किसी की नहीं होती
धर्म किसी का नहीं होता
लेकिन सब राजा के होते हैं
गाय भी, गंगा भी, गीता भी, और गायत्री भी
ईश्वर तो खैर!
राजा के घोड़ों की घास ही छिलता रहा
बढ़ा नेक था ईश्वर!
राजा का स्वामीभक्त!
अफसोस कि अब नहीं रहा
बहुत दिन हुए मर गया
और जब मरा तो
राजा ने उसे कफन भी नहीं दिया
दफन के लिए दो गज जमीन भी नहीं दी
किसी को नहीं पता
ईश्वर को कहां दफनाया गया है,
खैर ईश्वर मरा अंततोगत्वा
और उसका मरना ऐतिहासिक सिद्ध हुआ-
ऐसा इतिहासकारों का मत है
इतिहासकारों का मत यह भी है
कि राजा भी मरा अंततोगत्वा
उसकी रानी भी मरी
और उसका बेटा भी मर गया
राजा लड़ाई में मर गया
रानी कढ़ाई में मर गई
और बेटा, कहते हैं पढ़ाई में मर गया
लेकिन राजा का दिया हुआ धन रहा
धन वचन हुआ और बढ़ता गया
और फिर वही बात!
कि हर सभ्यता के मुहाने पर एक औरत की
जली हुई लाश
और इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां.
वह लाश जली नहीं है, जलाई गई है
ये हड्डियां बिखरी नहीं है, बिखेरी गई हैं
ये आग लगी नहीं है, लगाई गई है
ये लड़ाई छिड़ी नहीं है, छेड़ी गई है
लेकिन कविता भी लिखी नहीं है, लिखी गई है
और जब कविता लिखी जाती है
तो आग भड़क जाती है
मैं कहता हूं तुम मुझे इस आग से बचाओ मेरे दोस्तो!
तुम मेरे पूरब के लोगो! मुझे इस आग से बचाओ
जिनके सुंदर खेतों को तलवार की नोकों से जोता गया
जिनकी फसलों को रथों के चक्कों तले रौंदा गया
तुम पश्चिम के लोगो! मुझे इस आग से बचाओ
जिनकी स्त्रियों को बाजारों में बेचा गया
जिनके बच्चों को चिमनियों में झोंका गया
तुम उत्तर के लोगो! मुझे इस आग से बचाओ
जिनकी बस्तियों को दावाग्नि में झोंका गया
जिनके नावों को अतल जलराशियों में डुबोया गया
तुम वे सारे लोग मिलकर मुझे बचाओ
जिनके खून के गारे से
पिरामिड बने, मीनारें बनीं, दीवारें बनीं
क्योंकि मुझे बचाना उस औरत को बचाना है
जिसकी लाश
मोहनजोदड़ो के तालाब के आखिरी सीढ़ी पर
पड़ी है मुझको बचाना उन इंसानों को बचाना है
जिनकी हड्डियां
तालाब में बिखरी पड़ी हैं
मुझको बचाना अपने पुरखों को बचाना है
मुझको बचाना अपने बच्चों को बचाना है
तुम मुझे बचाओ मैं तुम्हारा कवि हूं
Saturday, July 11, 2020
कबीर
कबीर में लोक मंगल की कामना , दिवा स्मृतियों की कोमलता के बनिस्बत ठस्स यथार्थ का एक ऐसा कड़वा अनुभव है कि धर्म सत्ता के जागीरी करने वाले ठेकेदारों को वे अपचनीय हो गए । कबीर के यहां तुलसी के जैसे वातानूकूलित सुविधा नही थी । वे धूप थे , बरसात थे , और कड़ाके की ठंड भी ।
।
कबीर
कबीर में जो दृष्टि है वह स्वप्नजीविता से कहीं ज्यादा स्वप्नदृष्टा का है । एक संपूर्ण यथार्थवाद उनमें समाहित है । जीवन और दर्शन का अद्भुत सामंजस्य है कबीर के यहां । यकीनन हिन्दी के सबसे पहले और बड़े प्रतिरोधी कवि हैं कबीर । जो सम्पूर्ण समाजिक और तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था पर तेज प्रहार करते गए ।
यादों के झरोखे
यादों के झरोखों से चीजों का नि:सृत प्रवाह जब चल निकलता है तो वह नदी की निर्मल काया हो जाया करती है
विनोद कुमार शुक्ल
इधर विनोद कुमार शुक्ल की कविताई के जितने प्रबल समर्थक दिखे हैं आनुपातिक आलोचक कम हैं । हिंदी कविता में कलावादी कविताओं का एक दौर रहा है ; उन कलावादियों में विनोद कुमार शुक्ल भी रहे , पर उन्होंने अपने सामर्थ्य और अगुआई से लगभग उस जड़ता को तोडा । पृथक रास्ता बनाया । यही नहीं , हिंदी के माफियावादी संस्कृति से निकट का संबंध भी नहीं बनाया । वे लगभग पर्दे के पीछे के दृश्यों से बेखबर व अंजान रहे हैं । जो उनकी सादगी के प्रतिफलन है । सेलेक्टिव लेखन की दो प्रवृत्तियां रही है जिसमें एक व्यवस्था का विरोध करता है असहमति जताता है दूसरी में यह किनारा लिया होता है । विनोद कुमार शुक्ल की काव्य प्रवृत्ति दूसरे तरह का है ।
भक्ति
भक्ति का कार्य तर्कहीन हो जाना नहीं है । बल्कि , उन विचारों के तार्किक और अन्वेषित सत्य के रूप को विस्तार देना है ।
सम्प्रदायिकता
इस देश में संभवतः ऐसी कोई हत्या नहीं होती ; जिसके कोई फायदे न हो
और संप्रदायिक-राजनीतिक हो !
Friday, July 10, 2020
कारीगर के हाथ होने के नहीं होते : कमलेश्वर साहू
आखिरकार कमलेश्वर साहू के पांचवें संग्रह 'कारीगर के हाथ सोने के नहीं होते' पर लिखना संभव हो ही गया । जो कि अंतिका प्रकाशन गाजियाबाद से प्रकाशित हुई है । कमलेश्वर साहू के इस संग्रह पर मेरी ख़ास अभिरूचि इसलिए भी थी कि मैं इसके माध्यम से बस्तर को उसके ठीक ठीक संदर्भों में जान सकूं । कमलेश्वर साहू अंतिम दशक के कवि हैं । यह उनके 'यदि लिखने को कहा जाए' कविता संग्रह 2003 , 'पानी का पता पूछ रही मछ्ली' 2009 , 'किताब से निकल कर प्रेम कहानी' कविता संग्रह' 2011 , व 'पके हुए फल का स्वाद' 2012 , के बाद पांचवां संग्रह है । विगत चार संग्रह के बाद कमलेश्वर साहू इस संग्रह में भी एक बार पुनः अपने वही तेज़ और ओज के अनुरूप नमूदार हुए हैं । कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वे अपनी धार को और भी ज्यादा प्रभावी , प्रबल और तेज़ कर पाए हैं । समकालीन हिंदी कविता का यह कवि चूंकि काफी लंबे अरसे से बस्तर में रह रहा है और निरंतर रचनाशील है तो उनके इस संग्रह पर यह उम्मीद अधिक बलवती रही कि बस्तर तो आएगा ही आएगा ; और अपनी व्यापकता में आएगा । बस्तर का जीवन , संघर्ष , जिजीविषा , तजुर्बा और अनुभव की व्यापकता , उससे उनकी तादात्म्य , संबंधों की तल्लीनता इस संग्रह में स्वभाविक रूप से उपस्थित होने की अनिवार्यता थी । जो इस संग्रह में मौजूद ही नहीं , उनकी संपूर्ण कवित्व की गवाही बन आई है । यह कमलेश्वर की काव्यात्मक प्रोन्नति है । समकालीन हिंदी कविता में बस्तर पर चंद्रकांत देवताले , लक्ष्मीनारायण पयोधि , मांझी अनंत , त्रिजुगी कौशिक , विजय सिंह , शाकिर अली , पूर्णचंद्र रथ , किशनलाल सरीखे अनेक साथियों ने अच्छी कविताएं लिखी , निश्चय ही 'अच्छी' कविताएं इसलिए कहूंगा कि वे 'अच्छी' थी । पर उन कविताओं ने वह प्रभाव नहीं छोड़ पाया जो कमलेश्वर ने छोड़ा है । उन रचनाओं की अपनी सीमाएं रही , अधिकांश उन रचनाओं में कल था । कल का बस्तर था । कह सकते हैं कि कल का 'पुरा' अनुभव और वैभव था । पर आज का बस्तर कहीं न कहीं छूट गया था , जो मुझे अभी कमलेश्वर के यहां दिखाई दे रहा है । हालांकि बस्तर पर बड़ा कार्य करने वाले लाला जगदलपुरी ,अदम गोंडवी , हरिहर वैष्णव भी हैं पर वे भी अपनी सीमाओं और समयकाल के चलते हमें वह नहीं दे पाए जो कमलेश्वर ने अपनी इस संग्रह की कविताओं के माध्यम से दिया । ताज्जुब होता है कि बस्तर में बैठे तत्कालीन राजनेताओं , समाज शास्त्रियों व अनुसंधानियों की समझ पर कि वे सघन विश्लेषण से वंचित कैसे रहे ? जबकि आज का बस्तर सच मायनों में जल रहा है , बारुद के ढेर में तब्दील हो चुका है । बताना न होगा कि कमलेश्वर के आंखों देखी सच को बहुत पहले वारियर एल्विन , और बाद में हिमांशु कुमार , संजय पराते , कनक तिवारी जैसे रचनाकारों ने काफी हद तक अपनी रचनाओं में , लेखों में पुष्टि की है ।
तो मैंने कमलेश्वर साहू की प्रतिरोधी बातों से अपनी बात प्रारंभ की । यह कवि अपने पहली ही कविता 'लिखा जाना चाहिए में क्या कह रहे हैं बानगी देखिए
'यदि नदी में पानी लिखा जाना चाहिए
तो चट्टान में खनिज
पेड़ में पंछी
'और' फसल में किसान लिखा जाना चाहिए ।
कमलेश्वर में राइट टू रिकॉल का सैद्धांतिकी है । चीज़ों की पहचान है । और चीज़ों के पहचान में देशीपना है । वे बजाय लाग-लपट के सपाट कहते हैं
'यदि लिखा जाना चाहिए उपरोक्त
तो कुछ लोगों की नीयत पर
'शक' लिखा जाना चाहिए
लिखा जाना चाहिए
बिचौलिए , व्यापारी , उद्योगपति राजनेता
और अंत में लिखा जाना चाहिए 'सांठ-गांठ'
कमलेश्वर इस कविता में यही नहीं ठहरते , वे मानते हैं कि दुनिया कहीं समाप्त नहीं होती । और दुनिया जब समाप्त नहीं होती तो वे कहते हैं
'तो लिखे जाने के बाद
लिखा जाना चाहिए
सावधान !
यह जनसम्पत्ति है !!'
चीज़ों के प्रति सतर्क और दावा कैसा हो? कमलेश्वर की दो कविताएं एक 'जनकवि बोला' और दूसरी 'कविता हो बस पानी जैसी' आज के साहित्यिक समाज में पनप आए अभिजात्य चरित्र में कवि , आलोचकों के चयन और स्वाद पर अविश्वास करती है । इन कविताओं में कमलेश्वर कविता के गीतात्मक शैली में आते हैं और ठेठ तथा देशज मुहावरे की भाषा में होते हैं । यानी बतकही में वे अभिजात्य की सिंथेटिक कविता और आलोचना के बाड़े में घुस कर हिंदी आलोचना के आलोचकीय बेईमानी पर सटीक प्रहार करते हैं और वे कहते हैं
'आलोचक जी मुझको छोड़ो
गांव का निपट गंवारू ठहरा
कृपादृष्टि उन पर बरसाओ
बोलो उनकी कविता पर'
'महानगर के कवियों की है
चमचम करती चिकनी भाषा
कविता लगती महज़ तमाशा'
ऐसा धुर देशज और दो टूकिया प्रवृत्ति नागार्जुन , केदारनाथ अग्रवाल , और त्रिलोचन के यहां है । जो लताड़ती है , धिक्कारती है और बेईमानों को दरकिनार करती है ।
वे कहते हैं --
'कविता हो जब भोर का सूरज
कविता हो मेहनत का किस्सा
कविता हो जीवन की रंगत
कविता हो जीवन का हिस्सा
कविता हो बस पानी जैसी
या कबीर की बानगी जैसी'
एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के बीच ऊंच-नीच , अमीर-गरीब अथवा वर्गीय बोध वाली विभाजन प्रकृति सम्मत , शाश्वत नहीं है । मानव जीवन में विभाजन की यह रेखा हमारे ही द्वारा खींची गई रेखा है । जन्मना मनुष्य वह सब कुछ लेकर पैदा होता है , जो एक अमीर आदमी लेकर होता है । परन्तु , इस फांक में उन्नत और सच्चा मनुष्य , हमेशा मनुष्यता का पक्षधर हुआ है । वह मानुष गंध से निजात नहीं पाता , वह उसे रचता है , उसका सृजन करता है उसके सृजन व निर्माण में भागीदारी को सुनिश्चित करता है । इस कड़ी में कमलेश्वर की कविता 'मानुष गंध' और 'बूढ़े पहरेदार की कविता' किरदार के लिहाज से अपने मानुषिक बोध और संवेदनशील काव्यात्मक रूप में एक बेहद मार्मिक कविता है । कमलेश्वर इस कविता में उन तल्ख सच्चाईयों को उजागर करने में कामयाब दिखाई देते हैं। जिसमें एक प्राणी के प्रति आदमी कितना गैर ज़िम्मेदार और संवेदनहीन है । मह द्विस्तरीय मानव मूल्यबोध का फलसफ़ा है ।
कमलेश्वर की कविताई असीमित है । और बहुस्तरीय है । भूमंडलीकरण, उदारीकरण के बाद नवपूंजीवाद के बाज़ारवादी संस्कृति में आम आदमी के हताशा निराशा , अभिजात्य ताकतों का भोग , ऐश्वर्य और विलासिता की शिनाख्तगी ख़ूब है । जिसमें उन्होंने उनकी खूब ख़बर ली है । 'मसलन मैं तो बाज़ार घूमने गया था' 'लव टिप्स' और 'जूते' शीर्षक कविता को ही लें । इन कविताओं में हैसियत और मनुष्य का विकार साफ़ है । उसका वस्तु और बाजार में बदलता चेहरा है , जो चकाचौंध रोशनी और भ्रम के कोलाहल में इतना डूबा और इतराया हुआ है कि अजनबियत का 'मान' , माने नहीं रखता । आत्मविश्वास ऐसा है मानो निकलें तो बाज़ार जेब में ! उतावलेपन का एक घटिया और लचर मूल्य दृश्य है । वहां केवल कीमती मोबाइल हैं , कारें हैं , वस्त्र है , आभूषण है और उसके आगे सब बौना । उत्पाद और सेल्स की इस दुनिया में सब कुछ मीठी है , रसीली है चमकीली है और वही 'आत्मीय' है । लेकिन महत्वपूर्ण यह कि वह सच नहीं है । उपासक और आराध्य का ख़ालिस भेद है । गहराता संकट है । कमलेश्वर कहते हैं कि आत्मविश्वास से भरे इस अभिजन की यह पराकाष्ठा है जो
'किसी को खाली हाथ न जाने देने लिए प्रतिबद्ध
ग्राहक के दिल और दिमाग के द्वंद में
बाज़ी मार ले जाने में हुनरमंद'
बाज़ारवाद के इस दुश्चक्र और अपसंस्कृति का हलफनामा दर्ज करते कमलेश्वर अघाते नहीं हैं , थकते नहीं हैं , निर्बाध गतिमान हो उसकी चालाकियों को परत-दर-परत रखते हुए आखिर दुख और क्षोभ से भर कहते हैं
'मैंने देखा
बाज़ार के मायाजाल में फंसे लोगों के पास
सब कुछ था
बस कंधा नहीं था
कि ज़रूरत पड़ने पर
दे सकें किसी दूसरे को सहारा'
यही दशा का बयां 'लव टिप्स' शीर्षक कविता में भी दिखाई देता है । प्रेम के जैविक रूप से परीचित कवि के लिए उसका यांत्रिकीकरण और आसन्न संकट , उसे स्तब्ध करता है । घायल , आहत कवि का मन और मर्म इस कविता में सवाल और संदेह में जन्मता है
'मेरे मन के कोने में
चुभ रहा है कोई सवाल
हमारे जीवन से निकल कर क्या
लव टिप्स बेचने वालों की दुनिया में
बचा रह जाएगा प्रेम ?'
कमलेश्वर बाज़ारवाद के बढ़ते दुष्प्रभाव की अच्छी समझ रखते हैं कि चौतरफा होते हमलों की नब्ज जान चुके हैं जो कि उनके 'जूते' शीर्षक कविता में साफ़ साफ़ देखी जा सकती है
'रिश्तों से याद आया
बाज़ार किसी का संबंधी नहीं होता
नहीं होता किसी का रिश्तेदार
बल्कि सबसे पहले मारता है रिश्तों को बाजार'
। कमलेश्वर में जो विचार बोध है अथवा वैचारिकता है को ; यह सुनिश्चित करना असंभव है कि वे किस खोह में या पैमाने में रखे जाएं । बेहद उथल-पुथल, विविध विषय सामग्री , संदर्भों में अंटने बैठने के कारण अनिश्चितता दिखाई देता है । पर जन सरोकार , मानवीय संवेदना और उसके मार्मिक प्रस्तुति से उनके रुझानों को मैं वाम के खाते दर्ज करता हूं । और इन मायनों में कि उनके कहन में ठसक है , निश्चिंतता है । पुलिसिया धमक है । विद्रोह है , बाध्यता का अस्वीकार है । 'अच्छा नहीं हो रहा है' और 'सुने' शीर्षक कविता में यह फलीभूत होता दिखता है । मनुष्य के जीवन शैली और लय में यांत्रिकीकरण एक वह परिघटना साबित हुई है जो मनुष्य के समग्र जीवन शैली को बदलने में अधिक समय नहीं लगाता वह चीज़ों के रूपांतरण का अग्रगामी विन्यास होता दिख रहा है । किन्तु उसमें भी एक खोट है कि वह मूलभावों का कन्वर्शन जिस तरह से कर रहा
है वह नागवार है कमलेश्वर इस बात से बेहद खिन्न हैं, वे कहते हैं
'इस तरह से हो रहा है यदि बदलाव
तो यकीन मानिए
देशहित में
अच्छा नहीं हो रहा है'
'सुने' कविता बढ़ते राजनीतिक दबावों से उत्पन्न खतरों के प्रति हमें सचेत करती है । बताती है कि अभिव्यक्ति के खतरों के मध्य वस्तुस्थिति केवल सुना जाना ही रह गया है । यह सत्य का प्रकाट्य रूप बेहद वीभत्स है । कहना मनाही है और सुनना अकाट्य है । कमलेश्वर इस पीड़ा को, उस विडंबना को विभिन्न बिम्बों में रख कहते हैं
'वैसे भी
जिस जमीन पर खड़े हैं आप
उस जमीन से
सुना ही जा सकता है
कहा नहीं जा सकता
सुनें'
कमलेश्वर में यह पराजय बोध और माखौल का भाव अनायस ही नहीं है , यथार्थ का दिखता प्रतिबिम्ब है और वास्तविकता का स्वीकार है । यह आर्तनाद पूरे बस्तर का है , देश का है ।
देश में 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' का स्लोगन जोरो पर है । प्रियंका रेड्डी, निर्भया , कि कुलदीप सिंह सेंगर प्रकरण की पीडिता, या फिर चिन्मयानंद प्रकरण की पीडिता को लें , बेटी ही थीं। जिसका आखिर परिणाम करता हुआ ; से सब वाकिफ़ हैं । ऐसे में कमलेश्वर साहू की कविता 'उन पिताओं में नहीं हूँ मैं' बडा़ माने रखती है । यह कविता समाजिक विसंगतियों और उसके विद्रूपता पर कड़ा प्रहार करती है व हमें आश्वस्त करती है कि तमाम- तमाम घटनाओं , परिघटनाओं के बाद भी रूकना नहीं है । कालांतर में बेटी का होना अभिशप्त माना जाता रहा है । किन्तु , कमलेश्वर की कविता में सोच का बदलाव है साफ़ है । भले ही वह अनुपात में सीमित है। वांछनीय के मुकाबले नाकाफी है , एक बडा टालरेंस बना हुआ है । कमलेश्वर इस टालरेंस को जीरो टालरेंस में देखने की कवायद करते हैं ।
'चांद चुराने वालों की कविता' 'बिना पते की चिट्ठी' 'ईश्वर के बहाने कुछ बकबक :चार कविताएं' 'उत्तर आधुनिक व्यक्ति की प्रार्थना :तीन कविताएँ' वैचारिकता के धरातल पर नहीं ठहरती, अपना कोई प्रभाव नहीं छोडती । पर ये कविताएं आम जन के जीवन में समाहित स्थितियों- परिस्थितियों उनके हास- परिहास की मोहक प्रस्तुति हैं । ये कविताएं अदृश्य और काल्पनिकता का रचाव करती हैं । आंशिक फैंटेसी भी है पर अधिक प्रभावी नहीं है।
'खबरों का सिलसिला जारी रहेगा' बाजारवाद , आवारा पूंजी के बरक्स प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आए पतनशीलता का नोट्स तैयार की हुई कविता है। जिसमें साधन संपन्न लोग और मीडियाकरों के सनसनीखेज, सांठगांठ, फिर ताकत के रौब पर आम जीवन को बाधित करने के कुत्सित प्रयासों की निंदा है।
'आधा' 'हर बार बाजी' 'जब भी लडना' 'मिलना जुलना' 'मगर जब गोली चली' 'तो फिर' आदि कविताएं राजनीतिक जागरूकता व चेतना से संपन्न कविताएं है।
'हर बार बाजी' शीर्षक कविता में कमलेश्वर राजा व मसख़रा को चरित्र के स्तर पर एक ही करार देते हैं। दृष्टव्य है
जन के जीवन का
सबसे बड़ा यथार्थ है यह
और सबसे बड़ी त्रासदी कि
हर बार या तो
मसख़रा राजा होता है
या फिर राजा मसख़रा
जो गाता है——
कमलेश्वर इस कविता में राजसत्ता के संघीय चरित्र को उजागर तो करते ही हैं वे जनता के समीप जाते हैं और वस्तुस्थिति से अवगत कराते हैं , वे कहते हैं
'हर बार दांव लगाकर
हर बार बाजी
जनता ही हारती है
न मसखरे का कुछ बिगड़ता है
न राजा का कुछ जाता है'
यह राजनीतिक सत्य है। जीवन और अनुभव सत्य है कि सत्ता के हाथों अंततः छली जाती है जनता।
संग्रह की कविता 'मिलना जुलना' को तत्कालीन घटनाओं के मद्देनजर इसलिए देखना अनुचित नहीं होगा कि नागरिक और राजनेता के खड़ा होने के माने किन मायनों में अलग हो जाता है, किन अर्थों में विभाजित हो जाती है मसलन नवजोत सिंह सिद्धू के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ खड़े होना , और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के घर चुपके से बिरियानीबाजी करते खड़े होने का माने करता और कैसे निकाला जा सकता हैं ? अधिनायक वाद का चरमोत्कर्ष इन पंक्तियों में दृष्टांत है
'एक राष्ट्र के नागरिक का
दूसरे राष्ट्र के नागरिक से मिलने में
संदेह /शंकाएं /सवाल/ बवाल
जबकि एक राष्ट्र का राष्ट्राध्यक्ष से
जब भी मिलता है
जनगणमन गाता है'
कमलेश्वर इस कविता के माध्यम से उस खतरनाक विद्रूप स्थितियों को रखने में सबल और कामयाब हैं जहां एक नागरिक की नागरिकता को संदिग्ध बनाए जाने का छद्म राष्ट्रवाद चलायमान है ।
'मगर जब गोली चली' 'तो फिर' कविता को संग्रह की अति महत्वपूर्ण कविताओं की श्रेणी में रखा जाना चाहिए । यह कविता नई सदी के मुहाने में किसान आंदोलन और उनके संघर्ष को निर्ममता पूर्वक व्यवस्था द्वारा कुचले जाने के दास्तान का दस्तावेजीकरण है । यह वह समय है जब दिल्ली की सल्तनत ने किसानों की मांगों
को न मानने की जिद पर अड़ी रही और किसान भूखे रह चूहे , सांप , छूछंदर अथवा अपने ही मल मूत्र खाने बाध्य हुए । वे इस कविता में चुटीले तेवर में पूंजीवादी सत्ता व्यवस्था की पोल खोलते हैं
'मगर जब गोली चली
दिल्ली नहीं
मारा गया मंजूर
मारा गया किसान
मारा गया इस देश का आम आदमी
दू $$$ र
दिल्ली तो खड़ी रही
अपने पूरे वैभव के साथ'
अड़ी रही !
एक चीज है —कमलेश्वर की कविता को पढ़ आप तय नहीं कर पाएंगे कि कवि की कविताई में यथार्थ और फैंटेसी आखिर उनके भटकाव से उतपन्न होती है कि जिया यथार्थ से कि वैचारिकता आग्रह से ! यह इसलिए कि उनकी कविताएं बार-बार आपको अलग अलग दृश्य , रंग , संवाद से न केवल गुजारती ही है , बल्कि चमकाती है और विस्मित भी करती है । मुझे ऐसा लगता है कि कमलेश्वर में वैचारिकता का अतिरिक्त दबाव नहीं है। बल्कि जीवन के जिए और भोगे यथार्थ के निमित्त उनकी कविताई अविरल बहती है । वे मूर्त और अमूर्त दोनों में निर्बाध गोते लगाते हैं। यानी ठहराव या कि विराम नहीं है। गतिशीलता है । वैसा ही
'वही कबीर का ताना-बाना
भीतर बाहर एक समाना'
कमलेश्वर की कविता का एक खूबसूरत पहलू यह कि वे अनेकों कविताओं में सवाल के परस्पर संवाद करते हैं । नाट्य दृश्य रचते हैं । पर्दा गिरता है, पर्दा उठता है । चीजें छिप जाती है , फिर दिखने लगता है । कई-कई संवाद आत्मालाप, एकालाप की भी होती है । 'मसलन अमरकंटक एक्सप्रेस में मैं, भास्कर चौधरी और अंजान सहयात्री' 'आधा' ' एक दिन' 'इस दुनिया से जाने के बाद' मुहावरे का वजन' आदि कविताएँ अपने आस्वाद के अनुरूप ही मनुष्यता की वापसी में उसके जद्दोजहद में हमें शामिल कराती है। हमारे ठगे होने के बाद भी ठगे होने के अहसास और पीड़ा से हमें मुक्त कराती है । यह एक तरह का नया सौंदर्य दृष्टि है ।
'कारीगर के हाथ होने के नहीं होते'
कमलेश्वर साहू की यह कविता उनके संग्रह की शीर्षक कविता है । कमलेश्वर इस कविता में श्रमशील , श्रमजीवी जनता के शक्ति का उत्पादन में भूमिका तथा उनके साथ होने वाले बहुतायत उपेक्षा , अपेक्षा को केन्द्रीय बनाते हैं । मानव जीवन में साधन, संपदा इत्यादि का सीधा संबंध उत्पादन की शक्ति पर निर्भर है । बावजूद उत्पादकों ने इसका अनदेखा किया और उनके इस अदेखेपन के बाद भी श्रम से लदे 'वे मनुष्य' अधिक जीवंत हैं कि उन्होंने उत्पादक को अस्वीकारा नहीं , नहीं कहा
' वे यह भी कह सकते थे
सोने के हाथों में
नहीं होता हुनर
हमारे हाथों वाला !!!
कुल मिलाकर चालीस कविताओं का यह संग्रह अपने चयनित कविताओं , उसके तेवर , और कलेवर के भरोसे यकीन दिलाता है कि कमलेश्वर बहुविध , अधिक सधे हुए , मंजे हुए कलाकार हैं ।
किशन लाल की कविताओं का अपना लोक है
समकालीन हिंदी कविता के विगत तीन चार दशक निश्चय ही लोक बनाम महानगरीय बोध , फिर प्रतीकात्मक ब्यौरों , चीज़ों और घटनाओं का ज्ञान पाठ का रहा । पर अंतिम दशक अथवा नई सदी के आते-आते कविता के ये तय प्रतिमान अथवा काव्य धारा भी अस्थिर होता दिखा । इन मायनों में सदी का अंतिम दशक जिसमें कमलेश्वर साहू , बसंत त्रिपाठी , भास्कर चौधरी ,सतीश कुमार सिंह, कुमेश्वर कुमार , रजत कृष्ण , संजय शाम , निर्मल आनंद , नंदकुमार कंसारी,,विश्वासी एक्का , पूनम विश्वकर्मा , युगल गजेन्द्र सरीखे छग से संबद्ध कवियों के अलावा संतोष चतुर्वेदी , गणेश गनी , ब्रज श्रीवास्तव , सुरेश सेन निशांत , मणि मोहन मेहता , सिद्धार्थ वल्लभ , कुंदन सिद्धार्थ , अखिलेश श्रीवास्तव आदि कवियों ने भी अपने - अपने काव्य सृजन का लोहा मनवाया । यह ठीक है कि इन कवियों की कथ्य , शिल्प और भाषा तथा उसकी अंतर्वस्तुएं अलग-अलग रही है पर वे सृजन के स्तर प्रचलित ढर्रे से बाहर निरंतर नवोन्मेष , नव प्रयोग करते दिखे । किशन लाल भी इन्हीं कवियों में से हैं ।
किशन के इस संग्रह को पढ़ते हुए एक चीज मुझे बार बार ठिठकने को विवश किया और मैंने नोट किया कि उनके कुल रचनात्मकता के केन्द्र में प्रमुख किरदार 'भोग्या' है , भोगा यथार्थ है , उनका अपना जीवन अनुभव और उसका निचोड़ है । जो कि मानव के वस्तु रूप में हो रहे रुपांतरण तथा उसके संघातों को न केवल चिन्हांकित कर उसे क्रमबद्ध ही करता है बल्कि उसका विरोध भी करता है । यही नहीं ; लोक अथवा महानगरीय बोध , प्रतिकात्मक ब्यौरों और चींजों तथा घटनाओं के बीच किशन की कविता में मुझे एक नया स्वर दिखलाई दे रहा है ; दलित चिंतन और स्त्री विमर्श का स्वर । जो उन्हें अपने समकालीनों से भिन्न बनाती है ।
किशन जेनुइन कवि हैं । उनकी कविता में जीवन तथा अनुभवों का सान्द्र संसार है। संवेग का स्तर काफी गहरा है । समाजिक सरोकार वे उसका ताना-बाना उनकी कविता में जैसी आई दिखी वैसा छग के काव्य परिदृश्य पर कम ही दर्ज हुई । यानी उससे भी अच्छी बात यह कि इसमें वे जीवन की रागात्मकता से बनी बनाई वाली कुलीनतावादी काव्य धारा से खुद को अलग कर ढांचागत परम्परा तोड़ा वे जीवन से उसके संघर्ष से जुड़ आगे आए । यह किशन का तेवर है कि उसने बदलाव की सूरत तय की , इबारत लिखी । जो कि उनकी 'ईक्कीसवीं सदी' शीर्षक कविता में दिखलाई पड़ता है । यह कविता किशन के कई-कई और गंभीर आपत्तियों को एक साथ हमारे दृश्य पटल पर रख गई । किशन इस कविता में जहां अपने लोक के साथ भ्रमण , विचरण करते दिखाई देते हैं वहीं उनका वर्ल्ड चेतना भी उठ खड़ा होता है । यकीनन यह किशन का अपना लोक है और उसके प्रति समर्पण भी । यद्यपि किशन की कविता में वैचारिक आग्रह व प्रतिबद्धता एक सीध पर है पर यह उनका स्वचलित राडार ही है कि वे समाजिक अश्पृश्ता और वैमनस्यता से भरे इस संसार को देख समझ रहे होते हैं नि:शब्द नहीं रहते न गोया छाती पीटते हैं अपितु दलित लेखन और स्त्री विमर्श को एक आधारभूत ढांचा प्रस्तुत करते हैं । मसलन 'नारी साक्षरता' 'नहीं' 'किसनुवा' 'ईंट भट्ठे की एक सुबह' 'घृणा' इत्यादि व संग्रह की पहली कविता 'अभिवादन' में यह देखा जा सकता है ।
यह 'अ'
तुम्हारी वह शक्ति है
जो कल खेत पर
ज़मींदार की कुदृष्टि से बचाएगा
जरुरत पड़ने पर
यह थप्पड़ का आकार लेता हुआ
उसके गाल से चिपक जायेगा
किशन चूंकि एक मंझे हुए कलाकार हैं अतः उनकी कविताओं में जिस शिद्दत के साथ समाजिक सहभागिता , जागरूकता , मूल्यों के स्थापन्न वर्गीय चेतना के आरोह वह वैविध्यता का एक बड़ा जखीरा भी किशन की कविताओं में परिलक्षित होता है । यह कम ,विरल नहीं है । कवि के संग्रह की शीर्षक कविता 'जहां कवि होगा' व 'अगर कटते रहे पेड़' में वे अपने उन चुनौतियों के सत्यापन उस दायित्व का भलिभांति निर्वहन करते हैं जो कि उनका है
संग्रह की दो कविताएं ख़ास कर 'नदी के लिए' और 'नदी का मर जाना' इन अर्थों में एक सशक्त कविता है कि नदी एक जीवित इकाई है । एक पूरी सभ्यता है । और बगैर उसके समूची सृष्टि का मर जाना है ।पर पूंजी वे बाज़ार के दबावों में बैसाखी पर टिकी हुई सरकारें तथा दलाल पूंजीपतियों , औद्योगिक घरानों की मिश्रित व्यवस्था ने तमाम जानकारी और खतरों के बावजूद उसके उत्खनन , दोहन वे जल अधिग्रहण कानून ला पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों , मूल्यों को ध्यान किया। यहां कवि का समाजिक चिंतन व आग्रह बड़े ही मार्मिक रूप में अभिव्यक्त होती है ।
किशन को अपने गंवई -गांव , कस्बे , उसके चौक - चौराहे , हाट-बाजार , दिनचर्या व जिजीविषा से गहरा आत्मीय जुडाव है 'धमतरी' सीरीज की कविताओं में कवि के अपने समय के सापेक्ष तथा उसके इर्द - गिर्द घटित घटनाओं , ब्यौरों से एक सम्पूर्ण समाजिक परिदृश्य ,जीवन दशा का भान होता है जहां कवि धमतरी के रोमानियत को रिक्शे पर सवार स्कूल की ओर जाते देखता है तो उसके स्याह को बच्चों के प्लास्टिक कांच बीते कि मकई चौक पर बिकते मजूरों , कि कोष्टापारा में बीड़ी बनाती स्त्रियों या कि आदिवासी बालाओ की तीस पैंतीस रूपये में दिन भर खटती दशा व दरिद्र में देखता है।
यह अनायस ही नहीं है तमाम अवरोधों असहमतियों के बावजूद किशन का बार बार धमतरी के सौंदर्य के लिए ठिठकना , रूकना और अपनी आतुरता और विकलता के बीच रागात्मक होना । यह किसी कवि गहरे समाजिक बोध और सरोकारों से आती है ।
किशन की सम्प्रदायिक सौहार्द पर लिखी कविता 'एक पल के लिए' एक बेहतरीन व मार्मिक कविता है । यह ऐसे समय में हमें ढांढस बधाती है विश्वास जगाती जब सम्प्रदायिक शक्तियां कुनबों से निकल कर नग्न प्रदर्शन करते अपनी ताकत का मुजाहिरा कर रहे हो कभी 'लव जिहाद' कभी गौ रक्षा ,कभी बीफ के संदेह में, तो कभी गौरी लंकेश , दाभोलकर , कलबुर्गी , पानसरे की नृशंस हत्या करके ही । तब भी किशन का मानव मूल्य के प्रति आस्था उन्हें ज्यादा प्रमाणिक और सत्य बनाती है जो कि इस कविता में दृष्टि गोचर होती है
अपने ख़ास मित्रों के जिक्र में
बसंत त्रिपाठी , कुमेश्वर कुमार के बीच
कैसे भुला दूं
फरहत , सलीम , और नासिर अहमद सिकंदर को
यह कवि का अपना राग है । वह विभाजित नहीं करता , अलग नहीं करता वह देखता है तो उनमें बसे विशाल महामानवों को जिन्होंने उनके जीवन के भीतर मनुष्य होने की समझ पैदा की । उसे गति वाले दिशा प्रदान की ।
किशन की कविता में लोक भाषा लोक मुहावरे तथा लोक जीवन की व्यवहारिकी , बारिकी , मूर्त्त वस्तुएं वह उनका सूर्या रंग विपुल है । यह उनके लोक जीवन लोक , परम्पराओं से गहरे सानिध्य वे सरोकारों से आती है । किशन अपनी कविता उस लोक का प्रतिनिधित्व करते हैं जो तत्कालीन व्यवस्था की नादानी ,छद्मों और आडम्बरो से मारे जा रहे हैं । वे व्यवस्था के इस सशंकित चेहरे व स्वास्थ्य से खासी नाराज़ होते हैं । वे उस अमानवीय और क्रूर व्यवस्था के चरित्र और रहस्यों से न केवल पर्दा गिराते हैं अपितु उन लोक जन से मुखातिब होते हैं उन्हें संबोधित करते हैं तथा वैकल्पिकता का मार्ग भी प्रशस्त भी करते हैं । वे कहते हैं
बारसूर कुटुमसर की
अंधेरी गुफाओं से बाहर निकलो
और बीच का
रास्ता तलाशना छोड़कर
सोचों कि
जीने लिए
कोई तीसरा विकल्प क्या है
किशन की इस कविता से गुजरते हुए एकबारगी लगा कि किशन श्रीकांत वर्मा के मगध के तीसरा रास्ता से प्रभावित है जहां तीसरा रास्ता क्या है (? )का साफ़-साफ़ चित्र नहीं बनता । परन्तु किशन की इस कविता में वह स्पस्ट परिलक्षित होता है जो कि प्रतिकार का है , विद्रोह का है और संगठित विद्रोह का है
किशन के इस संग्रह में वर्ग चेतना की पूरी एक समृद्ध परंपरा का भी दृष्टिपात होता है । चूंकि वे ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो श्रम के अवमूल्यन विघटन के कारणों को उसके ठीक - ठीक रूप में पहचान तो करते ही हैं साथ ही उसके महत्व को रेखांकित करने कसर नहीं छोड़ते ।
धमतरी को जानना हो
तो पहुंचो मकई चौंक
और देखो अपनी आंखों से
बिकते हुए मजूरों को
कवि अपनी इस कविता में अपने आग्रह के जरिए संवाद को बढ़ाता है । मजूर और नियोक्ता के बीच के फांक को स्पष्ट करता है ।
संग्रह में अनेक ऐसी कविताएं हैं मसलन 'पीपी के लिए' 'भाभी: छह कविताएं' विशुद्ध परिवार पृष्ठभूमि की कविताएं हैं जो हमारे आदिम राग तथा मनुष्य का मनुष्य से रिश्ता और उसके अंतर्संबंधों को गहन सामाजिक अर्थ प्रदान करती है
यानी , कुल मिलाकर किशन का यह संग्रह उनके कवि होने के दायित्व बोध में पूर्णतः खरा है और अपनी अंतर्दृष्टि में नया भी ।
आरती तिवारी की कविताएं स्त्री प्रतिरोध का जीवंत दस्तावेज़ हैं
पिछले ही दिनों युवा आलोचक अजित प्रियदर्शी ने हिन्दी के किन्हीं एक कुकवि , यानी अशोक वाजपेयी की कुकविता को अपनी ही वाल से पोस्ट करी थी । यह महज संयोग है कि उस कुकवि की कुकविता का प्रारंभ भी सद्य स्नाता स्त्री थी और आरती तिवारी भी अपनी इस कविता का आरंभ सद्य स्नात स्त्री से ही कीं । पर दोनो की व्यवहारिक स्थिति में पन्न विपन्न की जो स्थिति निर्मित हुई है वह काबिल ए गौर है । सौन्दर्य बोध पर ऐसी अव्यवहारिक स्थिति का बनना मुझे लगता है एक कवि और कुकवि के मध्य का स्वाभाविक फर्क है । सौन्दर्य बोध से प्रारंभ होती दोनो 'कविता' में ऐसा क्या फर्क रह गया कि एक , सिर्फ और सिर्फ उच्छृंखल हो , परिसीमन का अतिक्रमण करने को लालायित दिखता है और दूसरा स्त्री के उस दूसरे पक्ष के साथ पूरी निष्ठा और ईमानदारी से खड़ा हो उनके महत्व को रेखांकित करता है । परिणामतः हिन्दी आलोचना के तमाम धुनक्कड़ों के लिए मानो द्वार खुल जाता है ; और कोई कुछ सुनने को तैयार ही नहीं रहता और सुने भी तो क्यों ? आखिर हिन्दी आलोचना किसी कुकवि को ऐसे ही क्यों और कब तक ढोयेगा ? जिन्हें एक सद्य स्नात स्त्री की विडंबनाओं , दुख , संत्रास , पीड़ा व उनके समाज के निर्माण में महत्वपूर्णं योगदान आदि ही ; नहीं दिखलाई पड़ता हो । दिखता भी है तो उसे वह कोमलांगी कामिनी ही , वह अपनी यौनानूभूतियों यौन आचारों के महिमामंडन में इतना पारंगत और विशिष्ट हो जाता है कि उस पर अलग से शोधकार्य ही किया जाना बनता है । हिन्दी आलोचना कम से कम अब यह बर्दाश्त नही ही करेगा ? विजेंद्र जी , गणेश गनी , अजित भाई , उमाशंकर , नासिर अहमद सिकंदर ,कमलेश्वर साहू और वल्लभ भाई तथा अन्य साथियों ने इस पर बड़ी अच्छी और व्यापक उपस्थिति दर्ज कर यह बता दिया कि मठ और धाक के दिन नहीं रहे । ये सभी साथियों ने यह माना कि सौन्दर्य की असीमता और बुनियादी संघर्ष को यौन भावो में परिवर्तित नहीं किया जा सकता । सौन्दर्य बिल्कुल अलग चीज़ है , वह प्राइमरी है । और प्राइमरी बातों की अपनी अर्थवत्ता रहती है जो कि कायम रहना चाहिए । यहाॅ प्रस्तुत आरती तिवारी की इस कविता की विषय वस्तु और अशोक वाजपेयी की विषय वस्तु में एक बड़ा फर्क है , बुनियादी फर्क कहूंगा ; वह लाजवाब है । आरती की स्त्री , वह सद्य स्नात स्त्री नहीं ही है , जो यौनानूभूति , यौन आवेगों , आकांक्षाओं से संक्रमित एक रूग्ण विचार से संपन्न कुकवि की है । आरती अपनी इस कविता मे कुलीनतावाद का न केवल मुखर विद्रोह करती नज़र आ रही हैं अपितु स्त्री के मानव सभ्यता के विकास में उनके योगदानो , प्रतिरोधों को भलिभांति रख पा रही हैं ।
यह कहने में मुझे तनिक संकोच नहीं आरती तिवारी हिन्दी की समृद्ध व दृष्टि संपन्न कलाकार हैं । उनकी कविता में गहन समाजिकता औसत के विपरीत , बेहद सूक्ष्म और अपने तरल रूप में प्रस्तुत होती है । उनकी इस कविता में कामायनी सौन्दर्य के बनिस्बत स्त्री का एक दूसरा अध्याय उद्धृत होता है जो कि आज के मर्दवादी हताशा और कुंठा को ज़ार -ज़ार कर देता है । दक्षिणी भारत के केरल प्रांत में स्थित शबरी माला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश पर निषेध का फैसला आरती को इसलिए भी आश्चर्य करता है कि वह मंदिर और उसमें विराजित अय्पपा स्वामी का उस देशकाल परिवेश से गहरा नाता है । पौराणिक कथाओं , मान्यताओं के अनुसार अयप्पा स्वामी के आगमन से ही भीलनी स्त्री शबरी को मुक्ति मिली थी । यह बेहद खेदजनक है कि सृष्टि की संपूर्ण रचना , यहां तक की उसके रचयिता व पालनहार ने भी अपने को स्त्री के गर्भ गृह में संरक्षित पाया । कई-कई युद्ध में विजय पाई । अतः समूची सृष्टि की संपन्नता में स्त्री के कर- कमलो का अनदेखा नहीं किया जा सकता ।पर पता नहीं हमारा समाज और इसके ठेकेदारों में स्त्रियों के प्रति इतनी हीन भावना कहां से और कैसे जन्मते हैं ? वे भी तो किसी स्त्री की नाल हैं उनसे ही जायी हुई हैं । सवाल बड़ा गहरा है । और ऐसे गहराते सवाल को आरती ने अपनी कविता का कथ्य बनाया । निश्चय ही यह आरती का साहसिक विद्रोह है । मैं विनोद मंगलम के फ्रांसीसी लेखिका सिमोन द बुआ के 'सेकंड सेक्स' के उद्धरण और उसके बाद की स्थिति से सहमत हूं कि स्त्री जयशंकर प्रसाद के कामायनी की तरह अब श्रद्धा की वस्तु नहीं है । वह सजीव है ; और श्रद्धा निर्जीव । इसका प्रतिकार होना चाहिए और यह प्रतिकार केवल स्त्री लेखिकाओं के हिस्से का दायित्व में ठहर जाए और एक नई कुंठा जन्म ले उससे पहले उन तमाम जनवादी प्रगतिशील मूल्य बोध के लेखकों को भी अपनी हिस्सेदारी का दायित्व निर्वाह करना होगा । यह कतई नहीं स्वीकारा जाना चाहिए कि पुरूष प्राथमिक है और स्त्री द्वितीयक ।
आरती अपनी इस पूरी कविता में एक युवा स्त्री को केन्द्र में रखती समाज के बहुरूपिए सौदागरों से मुखातिब होती हैं जो कि अपने पुरुष होने के दंभी आकंठ में डूबे हैं । वे उनकी पूरी बात एक-2 कर कि स्त्री कैसे और किस सम्मोहन के वशीभूत पुरुष के निकट आई । कहती हैं---
तुम बढ़े आगे
तुम मुग्ध हुए
वो भी खिंची
तुम्हारी मर्दानी गन्ध के भरोसे में
एकाकार हुए दो स्वप्न
तुम रिक्त हुए
भर भर गई वो
आरती की कविता की इस पंक्ति में वह जज्ब और विश्वास साफ़ है कि जरूरतें इकतरफा ही नहीं होती । जरूरतें और सहमतियां पारस्परिक है ।
आरती की इस कविता में घोर असहमतियां है । व्यंग्य है । क्षोभ है । सीख है । ज्ञान और उजास की पूरी संभावना है । पर उससे भी बड़ी बात है आक्षेपण का न होना । दुराग्रह का न होना ।
तुम भी जन्मे थे
जैसे सहस्त्राब्दियों से जन्मता आ रहा था तुम्हारा पितृ-पुरुष
हाँ सुनो तुम भी एक योनिजा हो
रुधिर और श्वेत स्राव में लिपटे
क्षत-विक्षत करते हुए उसके कोमलांग
भूमि पर
आरती की इस कविता की भाषा व बानगी अपने खुरदुरेपन तथा पैनेपन से सध गई । जो आक्रामक भी लगती है और संयम भी बरकरार रखती है अतः कहना न होगा कविता अपने भाषाई पकड़ बिंबात्मक प्रस्तुति में मारक है । असरकारक है ।
संघर्ष सतत् प्रक्रियाधीन होगी । वह निरंतर जारी रहेगा ; कभी न खत्म होनेवाला । वह विस्थापित होता रहेगा । स्वरूप बदलेगा , चीज़ें बदलेगी पर वह चीज़ खत्म नहीं होगी । वामपंथ इस प्रक्रिया में प्रक्रियाधीन ही रहेगा । उसे लगातार प्रतिक्रियावाद के खिलाफ़ अपनी लड़ाई जारी रखना होगा । मैं यहां भूमाता ब्रिगेड की चीफ तृप्ति देसाई व मुस्लिम महिला आंदोलन की प्रणेता नूरजहां साफ़िया नियाज़ तथा जाकिया सोमन को कोड करना चाहूंगा और उनका उल्लेख इसलिए भी जरूरी समझता हूं कि वे पारंपरिक भारत के घोर जड़वादी तथा प्रतिक्रियावादी समाज की ही अंग हैं । पर उन्होंने पिछले ही दिनों जहां हाज़ी अली के दरगाह पर चादर चढ़ाई और नासिक स्थित कपालेश्वर मंदिर में पूजा अर्चना की वही औरंगाबाद जिले के शनि शिंगणापुर में शनि के चबूतरे पर चढ़ साढ़े चार सौ पुरानी जड़ता को तोड़ा । यह आसां नहीं था ।
|| गर्भगृह के बाहर खड़ी स्त्री ||
ऋतु-स्नान के पश्चात्
लहरा रहे थे उसके चमकीले रेशमी केश
उसका सद्य स्नात सौंदर्य
भोर की प्रथम रश्मि सा
फूट कर प्रविष्ट हो रहा था
सृष्टि के सूक्ष्म कण में
तुम बढ़े आगे
तुम मुग्ध हुए
वो भी खिंची
तुम्हारी मर्दानी गन्ध के भरोसे में
एकाकार हुए दो स्वप्न
तुम रिक्त हुए
भर भर गई वो
तुम्हारा बीज धारण कर
धरती हो गई वो
उसके रज से
देह में पनपा एक और जीवन
उसके गर्भाशय का कोटर
तुम्हारे बीज का अभेद कवच था
नौ महीने अंकुरण से भ्रूण् यात्रा में
उसके रक्त से पोषित
एक और पुरुष
बढ़ते और बनते रहे तुम
खिलते रहे शुक्लपक्ष की चंद्रकलाओं से
वाद्य-यंत्र सी
बजती रही उसकी कोंख
गर्भनाल से तुम्हे चुगाती रही चुग्गा
तुम्हे पोषने तुम्हारे लिए ही
खाती रही पौष्टिक आहार
चाहे मन कभी कुछ न खाना चाहे तो भी
तुम भी जन्मे थे
जैसे सहस्त्राब्दियों से जन्मता आ रहा था तुम्हारा पितृ-पुरुष
हाँ सुनो तुम भी एक योनिजा हो
रुधिर और श्वेत स्राव में लिपटे
क्षत-विक्षत करते हुए उसके कोमलांग
भूमि पर आये थे
वात्सल्य के झरने में नहला
ममत्व की चिकनाई से
मलकर पुष्ट करती वो
तुम्हारा शैशव
अपने स्तनों से उड़ेलती अमृत धार
तुम्हारे छोटे से मुँह में
और झाँकती तुम्हारी झपझप करती आँखों में
पढ़ लेती तुम्हारी तुष्टि
तुम्हारी किश्तों में पूरी होती नींद
घटा देती उसकी नींद
घण्टों से मिन्टो में
और आज तुम एक पूर्ण पुरुष हो
अपने पिता की तरह
तुमने निषिद्ध कर दिए है
उसके प्रवेश किन्ही विशिष्ट मन्दिरों में
गर्भगृहों में
उसकी देह एक मन्दिर है
जिसकी अंतर्यात्रा तय करके
बाह्य-जगत में आये हो तुम
जिसके लिए अस्पृश्य घोषित किया उसे
उसी संसर्ग उसी रज उसी रक्त से निर्मित तुम
उसी गर्भगृह में रहे नौ माह
स्त्री शुचिता की परिभाषा तय करने वाले
जिस मार्ग से आये बाहर
वो अपवित्र ?
उस मन्दिर में जिस दिन हो जायेगा
तुम्हारा प्रवेश वर्जित
रह पायेगी क्या दुनिया
और तुम्हारे बनाये नियम भी?
आरती तिवारी
पुनः पोस्ट
Wednesday, July 8, 2020
विजय सिंह की कविता में लोक राग
विजय सिंह के संदर्भ में यह बताना काफी है कि वे समकालीन हिन्दी कविता के नवें दशक के एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में पहचाने गए ; अलावा इसके उनका रंगकर्म से भी गहरा जुड़ाव रहा है तथा वे समकालीन युवा लेखन को प्रोत्साहित करने वाली पत्रिका समकालीन सूत्र के संपादक भी हैं । यूं तो समकालीन हिन्दी कविता के नवें दशक में छग ने बड़ी महत्वपूर्ण साझेदारी की ; पर इस दशक के कवियो के साथ हिन्दी जगत के अन्यायपूर्ण रवैये ने छग को उनके जायज हक से महरूम ही रखा । कहना न होगा इस दशक में विजय सिंह के परस्पर नासिर अहमद सिकंदर , शरद कोकास , बुद्धिलाल पाल , त्रिजुगी कौशिक , आलोक श्रीवास्तव , माझी अनंत ,जयप्रकाश मानस , पूर्णचंद्र रथ , लक्ष्मीनारायण पयोधि , शाकिर अली , पथिक तारक ,विजय राठौर आदि रचनाकार अपनी रचनात्मकता के बूते सतत गतिमान रहे पर उनका वैसा मूल्यांकन नहीं हुआ जिसका कि वे वस्तुतः हकदार थे । इस संदेहास्पद वैचित्र्यपूर्ण स्थिति के निमित्त तत्कालीन आलोचना की बड़ी चूक को नकारा नहीं जा सकता । चूंकि इस दशक में छग की हिंदी कविता में जो उभार दिखा वह पहले नहीं था । इस दशक के कवियों में जहां विजय सिंह अपने लोक जीवन , लोक राग तथा लोक संवेदना में रचा-बसा आदिम राग को लेकर उपस्थित होते हैं , वही नासिर अहमद सिकंदर अपनी समाजिक भूमिका के साथ आते हैं और उन समाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हैं तो शरद कोकास अपनी गहन इतिहास बोध तथा राजनीतिक चेतना के साथ आ खड़ा होते हैं । विजय सिंह की अनेक कविताओं के ही आधार पर मुझे विजय सिंह की कविताओं में जो दिखा , वह है लोक जीवन का संघर्ष व उसका स्थापत्य और उसकी प्रचुरता । यहां प्रस्तुत कविता 'बोड़ा' उनकी मेरे इसी कथन की पुष्टि भी करती है । बोड़ा वस्तुतः छग में ही पाए जाते हैं ऐसा नहीं है । पर यह छग के लोक में ,उनके जीवन में वर्षा के आगमन के साथ बस्तर अंचल में उसके लोक के साथ उपस्थित होता है । जिसकी धमक का केन्द्र जगदलपुर का संजय बाज़ार होता है जिसे अपनी मुंडी पर उठाए ढो लाती हैं हर चुनौतियों से लबरेज़ गांव की बायले । विजय सिंह की कविता में बोड़ा वस्तुतःमहज एक खाद्य पदार्थ का नाम भर नहीं है बल्कि विजय सिंह के बोड़ा कहते ही एक सम्पूर्ण दृश्य का नाम हो जाता है। जहां बस्तर का लोक , उनका जीवन और उनका संघर्ष तथा उनकी दिनचर्या ; और क्रियाकलाप का अद्भुत दृश्य भी उपस्थित हो जाता है
"पहली बारिश में भीगकर
जंगल की मिट्टी हँसती है
और धूप की उजास में
सरई जंगल जी उठता है "
वही उनकी बोड़ा बोड़ा के शोर से और नापती हैं सोली- पैली से बोड़ा जब वे , तो शहर के चमचम बाज़ार को भी कर देती हैं फीका में उनका सतत् संघर्ष और निश्छल श्रम तथा उस मिट्टी की धमक दिखलाई पड़ता है ।
" बोड़ा - बोड़ा के शोर में ,बोड़ा के स्वाद में अच्छे - खासे शहर के बाजार को सांप सूंघ जाता है
वे नापती हैं सोली - पैली से बोड़ा
बोड़ा खरीदने वालों की भीड़ में
हर बार हारता है
शहर का चमचम बाज़ार !"
विजय सिंह की कविताएं लोक जीवन की कविताएं होती है । लोक जन का संघर्ष होता है । लोकमूल्य को स्थापित कर रही होती है । उनका लोक युद्धाभ्यास का आदी नहीं है , वह बेहद सरल और सहज है । कृत्रिम नहीं है , आवरणी नहीं है ,और छद्म का वाहक भी नहीं है । उनकी कविताएं वस्तुतः आदिम राग की अनुगूंज है , स्मृतिशेष कविताएं है । पर यह यहां तक बिल्कुल सही है इसमें कोई संदेह भी नहीं है । परन्तु इधर समय ने करवट बदल लिया है और उसका यथार्थ भी पहले से भिन्न हुआ है आज बस्तर जल रहा है , और एक जलता हुआ यथार्थ वह अपने भीतर समेटा हुआ धधक रहा है । जिसे हम केवल इन लोक संवेदनाओं लोकस्मृति से संभवतः नहीं भर पाऐंगे । एक यथार्थ वह है और एक यथार्थ यह भी है । जिसकी अपनी जटिलताएं बड़ी है और इसे पकड़ा जाना , समकालीन कविता का विषय भी बनना ; उतना ही जरूरी है जितना कि अन्य । मुझे ज्ञात है एक रचनाकार की अपनी शैली होती है , सीमाएं होती है पर कई - कई बार वे इन सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं । अतः बस्तर के इस प्रतिनिधि रचनाकार से मेरी अपेक्षाएं भी बढ़ी है । कविता में लोक जीवन , उनके दिनचर्या की भाव भंगिमाओं , हास- परिहास का बेजोड़ दृश्य के परस्पर उन जटिल यथार्थ को भी विजय सिंह चिन्हित करें और लाएं , वही , उसी विशुद्ध स्थानिक भाषा और उसके प्रकृति के साथ । बस्तर जी उठेगा । बस्तर के पृष्ठ पर जो स्याह है वह उनकी कविता की विषय वस्तु बने उनका कथ्य बने तो मैं समझता हूं बात बहुत दूर तक जाएगी ।
बोड़ा
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बस्तर में यह बोड़ा का मौसम है .मेरी एक कविता भी है " बोड़ा " कविता अधिकांश मित्रों ने पढ़ी है फिर भी कुछ साथी संभवत: उन्होंने बोड़ा नहीं पढ़ी है उनके लिए बोड़ा की जानकारी के साथ कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ ..
बोड़ा साल में एक बार बाजार में आने वाली मौसमी सब्जी है , जो जगदलपुर के बाजा़र में आते ही एक हजार रू. प्रति किलो ग्राम से बिकती है .. बस्तर के साल जंगलों में साल वृक्षों की जड़ों के पास नैसर्गिक रूप से ज़मीन के भीतर पनपने वाला छोटा सा गोल ( बाटी के बराबर) मशरूम को बोड़ा है .यह मानसून के पूर्व होने वाली बारिश - उमस में अकुंरित होता है ..जिसकी बाज़ार में बहुत मांग है ..शहर के बाज़ार में आते ही यह हाथो - हाथ बिक जाता है .
बोड़ा
+++++
पहली बारिश में भीगकर
जंगल की मिट्टी हँसती है
और
धूप की उजास में सरई जंगल
जी उठता है
सरई जंगल में यह
बोड़ा के आँख खोलने का समय है
और उधर दूर
बिहाने - बिहाने ( सुबह )
टुकनी मुंड में उठाये ,हाथ में कुटकी लिए गाँव की औरतें बोड़ा
कोदने (खोदने ) के लिए निकल पड़ती हैं जंगल की ओर
वे पहुँचती हैं सरई के जंगल में
एक पंक्ति ,एक लय ,एक ताल में
वे जानती हैं
बोड़ा कोई नहीं बोता ,सरई जंगल बोता है प्रकृति की छांव में
वे जानती हैं छोटा - मटमैला
जंगल का बोलता गोला
धरती का सीना चीर
किस जगह फूटता है
शहर के बाज़ार को आँख तरेरने के लिए
गांव की बायले (औरत) मन
लोहुन - लोहुन ( झुक - झुक कर ) पाना ( सूखी पत्ती ) को हटा- हटाकर
भुई (भूमि) को कोदती ( खोदना ) बोड़ा को बीनती हँसती - बतियाती सरई जंगल में आगे बढ़ती हैं
बोड़ा खोदकर ,बोड़ा बिनकर
बोड़ा टुकनी ,सोली - पैली ( नाप का पुराना पैमाना ) मुंडी में उठाकर
बोड़ा बेचने दस - दस ,बीस - बीस कोस दूर जंगल से नंगे पांव चली आती हैं जगदलपुर के बाज़ार में
वे आती हैं
और शहर के बाज़ार में
हड़कम्प मच जाता है
बोड़ा - बोड़ा के शोर में ,बोड़ा के स्वाद में अच्छे - खासे शहर के बाजार को सांप सूंघ जाता है
वे नापती हैं सोली - पैली से बोड़ा
बोड़ा खरीदने वालों की भीड़ में
हर बार हारता है
शहर का चमचम बाज़ार
विजय सिंह
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मिथिलेश कुमार राय की कविता का संदर्भ जुड़ता है
लोकोदय नवलेखन सम्मान
चयन समिति की संस्तुति के आधार पर वर्ष 2017 का लोकोदय नवलेखन सम्मान मिथिलेश कुमार राय के कविता संग्रह 'आदमी बनने के क्रम में' को दिए जाने का निर्णय लिया गया है।
मिथिलेश की कविताएँ प्रतिरोध की सकारात्मक व शानदार अभिव्यंजना हैं, साथ ही आज के दौर में सत्ता व व्यवस्था द्वारा द्रुत गति से चलाए जा रहे अमानवीयकरण के विरोध में मनुष्यता का विशिष्ट रेखांकन हैं। मिथलेश की कविताओं का सशक्त स्वर महज वैचारिक प्रतिक्रियाएँ नहीं हैं, न ही प्रतिक्रियाओं जैसी शुष्कता है। कवि अपनी प्रतिबद्धता व अनुभव संवेदना को वैविध्यपूर्ण ढंग से साफगोई के साथ उकेरकर आत्मीयता को सार्वजनिक स्वरूप प्रदान करता है जिसमें घिस-पिट चुके जुमलों और कारस्तानियों के खिलाफ मजबूत शब्दों का जीवन्त प्रतिवेदन मौजूद है।
मिथिलेश के लेखन के सम्बन्ध में इन्द्र कुमार राठौर लिखते हैं- "मिथिलेश कुमार राय वस्तुतः लोक जीवन के कवि हैं। ग्राम्य जीवन तथा संघर्षरत लोगों की संवेदना के कवि हैं। उनका यह लोक संघर्षरत लोगों का लोक है, अपनी दिनचर्या के बनिस्बत अपनी जिजीविषा को जूझ रहे लोगों का लोक है। कहना न होगा मिथिलेश की कविता लोक जीवन तथा लोक के संघर्ष में साँसें लेता है। यानी, यह भी कहा जा सकता है मिथिलेश का यह लोक करूणा का लोक है, कातर लोगों का लोक है, दयनीय और निरीह लोगों का लोक है जो मुर्दा शांति से भरे नहीं हैं। पर वे जीवन के उस वस्तु तथ्य सत्यता की तलाश व तपिश से अबोध हैं। दरअसल ऐसी मुर्दा शांति को जगाने की यह कोशिश मिथिलेश कुमार राय की ओर से मुझे लगता है एक प्रारंभिक और बड़ी कोशिश है। यह इसलिए कि हाशिए के ये लोग यथास्थिति स्वीकारे हुए मर-खप रहे हैं और जी रहे हैं बिना किसी राजनीतिक सरोकार के।"
Sunday, July 5, 2020
भाभी सीरीज की कविता : कवि किशन लाल
किशन लाल का यह दूसरी पारी है ; यह कहना निश्चय ही न्यायिक ही होगा कि वे अंतिम दशक की हिंदी कविता में अपनी स्पष्ट पहचान बना लेने के बाद उपन्यास पर जोर आजमाइश करते दिख रहे हैं । हालांकि यह किशन लाल का पहला उपन्यास है पर हिंदी के अन्य उपन्यासकारों में उनकी इस नई उपस्थिति को उनके कहन की शैली और संवादात्मक उपस्थिति के बीच एक जबर्दस्त रिस्पांस की उम्मीद है । आमतौर पर प्रचलित तौर तरीकों के विपरीत किशन का यह उपन्यास देशज है । जमीनी उपन्यास है । जो आत्मकथात्मक दलित चेतना के कई बड़े हस्ताक्षरों में ओमप्रकाश वाल्मीकि , शरण कुमार लिंबाले , जयप्रकाश कर्दम , तुलसी राम , मोहनदास नैमिषराय , मलखान सिंह आदि का ही विस्तार रुप है ।
किशन लाल के इस नए और ताजा उपन्यास का शीर्षक 'किधर जाऊं' एक दृष्टया किसी भटकाव अथवा विकल्पहीनता का बोध कराती है पर तह में जाएं तो बिल्कुल अलग ही प्रतीत होता है । एक अन्वेषी दृष्टि और दृढ़ता का भान होता है । मूलतः छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के देमार में जन्में किशन लाल के इस उपन्यास में छग की उर्वर माटी की उर्वरता भी संदेह के घेरे में है । जहां जैसा कि दिखता है , वैसा सब कुछ सामान्य नहीं है । बहुत विषमताओं से ऊपजा गहरा असंतोष है । वर्ण व्यवस्था अथवा श्रेष्ठता बोध के आगे बौना होता समाज का चरित्र चित्रण है ।
किशन लाल के इस उपन्यास में छत्तीसगढ़ के मोची जाति की रोज़मर्रा , उनके लोक जीवन , लोक परंपरा , रीति-रिवाज , काम- काज , सामाजिक , राजनीतिक तथा आर्थिक संघर्ष शिद्दत से उजागर हुई है ; यकीनन यह आम जन के लिए अनछुआ पहलू है । मैं खुद भी अनछुआ था , आधी अधूरी रही ही थी , मेरी जानकारी । परन्तु इस उपन्यास को पढ़कर,जातीय बोध के दंश से असह्य दुख व पीड़ा को समझने में यह मेरे लिए बहुत मददगार हुई । मोची जाति पर केन्द्रित किशन के इस नवीनतम उपन्यास का मुख्य किरदार सूरज एक पढ़ा लिखा नौजवान है जो एक अच्छा संवेदनशील इंसान भी हैं ; के इर्द गिर्द पूरी कहानी चलचित्र के भांति घूमती है और सूरज में उसका खोया बचपन , किशोर सूरज के मन का उद्देलन तथा युवा सूरज का विस्फोटक संघर्ष आकार पाता है ।
उपन्यास लोकोदय प्रकाशन लखनऊ से नवलेखन पुरस्कार योजना से सम्मानित और प्रकाशित हुई है । नीचे दिए पते से विभिन्न माध्यमों से इसे मंगाया जा सकता है
अनुपमा तिवारी की कविता 'रंडी'
प्रतिरोध का सख्त़ मिजाज कम ही मुमकिन हो पाता है । भीतर तक हिला देने की सामर्थ्य से लैस इस कविता को कवयित्री अनुपमा तिवारी ने लिखा है । क्या बानगी है इस कविता की ! कथ्य में जितनी केन्द्रीकता और गंभीरता अपने विषय चयन को लेकर है उतनी ही इस कविता में वैशिष्ट्य शिल्प और जानदार भाषा का प्रवाह भी है । देश की तमाम राजनीतिक सत्ताएं अपने-अपने आईटी सेल चरमपंथियों को बलात् कुछ भी करने का जो साहस और छूट दे चुके हैं , वह ही इस कविता में केन्द्रीय भाव बना है । सवाल यह है कि आखिर ये सत्ताएं इन आईटी सेल और चरमपंथियों की मानसिक विकृतियों के सहारे देश व समाज को क्या देना चाहते हैं ? चिंतनीय है । चीज़ों की सैद्धांतिकी और नैतिकता भी कोई चीज़ है । पक्ष में खड़े हुए तो ठीक , नहीं तो 'रंडी' । सैकड़ों उदाहरण हैं जो इस कविता में दीपिका पादुकोण के परस्पर नामित होते हुए काव्य बिम्ब रूप में आए । यह अशोभनीय है , खेदजनक है कि एक कवयित्री को कहना हो रहा है ' मैं भी रंडी होना चाहती हूं ' चूंकि यह स्वभाविक नहीं है । यह विवशता या कि लाचारी भी नहीं है ,बल्कि परिस्थितियों से मुकाबला की तैयारी है ।जो अनुपमा तिवारी ने कर ली है । भाषा व्यवहार व नैतिक मूल्य के इस 'अवसान काल' को दर्ज कराती अनुपमा तिवारी की इस कविता से मैं हिल सा गया हूं । बहुत दुखी हूं और निराश भी 'विश्व गुरु' बनने , बनाने के सपनों का इस इस देश इस परिणित अवस्था में है कि एक लड़की जेएनयू जाकर खड़ी क्या हो जाती है उसे 'रंडी' कह कर ट्रोल किया जाता है उसका बहिष्कार किया जाता है । निस्संदेह इन दिनों देश संक्रमण से गुजर रहा , देश में प्रतिरोध का स्वर ऊंचा हुआ है , देश को खतरा का भान हुआ है ।'अपने लोग' अपने ही लोगों का देशद्रोही कह लींचिंग का प्रयास कर रहे हैं । देश को असल खतरा वस्तुत इनसे है । जो थेथर और चोंचल चातुर्य से देश को भरमाने में अपनी पूरी ऊर्जा झोंक रहे हैं । हालांकि इन तथाकथित राष्ट्रवादी नौजवानों के तानों को बेअसर बनाती अनुपमा तिवारी यही नहीं ठहरती वे आगे जातीं हैं और कहती हैं
"अब रंडी गिरा हुआ शब्द नहीं है
क्षोभ और गर्व से मिश्रित शब्द है"
उनसे इस वक्तव्य के लिए असहमति जताते हुए सहमत हूं इन मायनों में कि
''समय के साथ शब्दों के अर्थ बदलते जाते हैं ''
उन्हें जो लगा , वस्तुत वह सही भी है चूंकि अपने विचारों , सम्मानों , स्वतांत्र्य बोध की बलि चढ़ा कर केवल जलील होना है । जिल्लत ज़लालत से बेहतर है है कि जुटें , कुछ तगड़ा करें , कहें और मन से कहें
आभार , अनुपमा तिवारी
*****
रंडी
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कल से दीपिका पादेकोण को रंडी लिखा पढ़ रही हूँ
तस्लीमा, घोषित रंडी है
नीलिमा चौहान, उभरती रंडी है
मैं भी रंडी होना चाहती हूँ.
अब रंडी गिरा हुआ शब्द नहीं
क्षोभ और गर्व से मिश्रित शब्द है
समय के साथ शब्दों के अर्थ बदलते जाते हैं
मुझे लगता है
इस देश और दुनिया को अब देवियों की नहीं,
रंडियों की ज़रुरत है
मेरी कामना है
कि इन जैसी इस दुनिया में तमाम रंडियां जन्म लें !
~ Anupama Tiwari
अमिताभ बच्चन की कविता
अमिताभ बच्चन नाम सुनते ही बरबस एक बार तथाकथित महानायक का चित्र उभर आता है । परन्तु हिन्दी जगत में जिस अमिताभ बच्चन का मैं नाम ले रहा हूं वे बिल्कुल ही उस भव्यता और भ्रम के चाम से विछिन्न हैं । वे सतत संघर्षशील मनुष्यता का आवाज़ बन महानायकत्व से मुठभेड़ करते दिखलाई देते हैं । वे न कभी महानायक हुए , और न कभी ऐसी मंशा ही रखें ।
"मुझे दुख है कि मैं महानायक भी नहीं बना"
इस कविता के कथ्य का मूल भाव वस्तुत: इस पंक्ति में ही आकर , नहीं ठहरती । बल्कि यह व्यंजना में कहा गया उक्ति वैचित्र्य है । ऐसा इसलिए भी कि उस तथाकथित महानायकों की चिंता में जो खच्चरपना है , वह बिल्कुल साफ़ दिखाई देता है । जो उत्पादकों के उत्पाद पर अच्छी कीमत लगवा लेता है , ब्रांडिंग बढ़िया करवा लेता है । अपनी ही भावी नस्ल की चिंता में दो - चार होता कभी पलटकर आधी आबादी को जिसने नहीं देखा , उन आधी आबादी का संघर्ष , स्वतांत्र्य बोध , जिसे समझ न आया । ऐसा महानायक किस काम का । जिसके पास आधी आबादी की चिंता काफूर है । उनका संघर्ष और मूल अधिकार सरोकारी नहीं है । निश्चय ही ये इलीट क्लास का पैरोकारी ताकतवर हैं , उतार- चढ़ाव से घबराते नहीं हैं , पीठ पर मैला लादे हिनहिनाते भागते हैं सरपट । परन्तु मनुष्य के जद में शामिल नहीं हैं । अमिताभ बच्चन इन मायनों में सरोकार के कवि ही नहीं महानायक भी कहे जा सकते हैं ।
एक कवि , कलाकार जब संदेह जताते हैं , तो जरूर उनके अंदेशे में सिर्फ आज ही नहीं रहता । बल्कि दीर्घकाल का दृश्य चित्र आकार ले रहा होता है । यानी वह उस दीर्घकालिक सच को देख रहा होता है जो आम जन के जीवन में शनै:शनै: प्रवेश कर ,असमय उनकी कब्रें खोद देता है । कविता में वस्तुत यह यथार्थ के निमित्त उनकी तात्कालिक प्रतिक्रिया रहता है पर भावी पीढ़ी के लिए इतिहास बोध भी होता है । प्रस्तुत है हमारे समय के 'जागरण काल' के कवि अमिताभ बच्चन की कविताएं
01
मुझे ईर्ष्या है महानायकों से
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मुझे ईर्ष्या है महानायकों से
उनकी तरह मैं मजबूत घोड़ा
ताक़तवर खच्चर नहीं बन सका
जो उतार-चढ़ाव से नहीं घबराते
सारा कूड़ा-करकट
पीठ पर लाद हिनहिनाते भागते
सबकी नैया पार लगाते
टूटते सितारों को कन्धा देते
मुझे दुख है मैं महानायक भी नहीं बना ।
02
वे जीने के बारे में सोच रहे हैं
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वह दूध लेने गया था.
तुमने उसे मार डाला.
वह शादी के बर्तन मांजने आया था.
तुमने उसे मार डाला.
अरसे बाद वह अपने घर आया था.
तुमने उसे मार डाला.
वह प्रार्थना करके बाहर आया था.
तुमने उसे मार डाला.
वह अल्हा अल्हा चिल्ला रहा था
तुमने उसे मार डाला.
वे सुबक रहे हैं मरने वालों को याद कर रहे हैं
मारे जाने का इंतजार नहीं कर रहे हैं
सोच रहे हैं मरने वालों के बगैर जीयेंगे कैसे
हां वे जीने के बारे में ही सोच रहे हैं
और तुम उन्हें मारने के बारे में सोच रहे हो
03
निहा खातून
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एनआरसी और कैब निहा खातून को निश्चय ही
हेस्टिंग्स रोड, निकट बाबा मजार, कोलकाता से
किसी डिटेंशन कैंप में पहुंचा देंगे
वहां से वह कहां ले जाई जाएगी
किसी को नहीं मालूम
वह गुम हो जाएगी
इससे क्या फर्क पड़ेगा
विक्टोरिया मेमोरियल के गेट के बाहर
कुछ रहमदिल इंसानों के आगे-पीछे दौड़ते हुए
वह कुछेक गुलाब की कलियों का ही तो सौदा कर पाती है
मैं भी क्या कर सकता हूं फिलहाल
उसकी एक तस्वीर, एक फूल ले लेने के अलावा
उसके गाल थपथपा देने के अलावा
04
कल जब तुम .....
----------------------------------------
कल जब जामिया विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में घुसकर
बच्चों को तुम बेरहमी से पीट रहे थे
जसीडीह के किसी गांव में पैदा हुआ बनारस में रहने वालाा एक बुजुर्ग कवि
बड़े जोश से कोलकाता में पढ़ रहा था
एक बंगालन लड़की के प्यार में डूबी अपनी बहुत पुरानी कविता
कल जब जामिया विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में घुसकर
बच्चों को तुम बेरहमी से पीट रहे थे
एक मामूली आदमी अपने ही विभाग के एक बड़े अधिकारी से बता रहा था
कि उसके दोनों बड़े बेटों ने दूसरे धर्म की लड़कियों से ब्याह रचा लिया
हम क्या करें साहब
कल जब जामिया विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में घुसकर
बच्चों को तुम बेरहमी से पीट रहे थे
बुलंदशहर का एक आदमी बड़े गर्व से बता रहा था
कि उसे अपनी मराठी बहू की जाति का नहीं पता
और हां, वह जिस बिहारी को ये सब बता रहा था
उसे अपने मराठी दामाद की जाति का पता नहीं था
कल जब जामिया विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में घुसकर
बच्चों को तुम बेरहमी से पीट रहे थे
बंगाल का एक पांचवी पास आदमी जो गेस्ट हाउस का स्वीपर है
और जिसका नाम मेघनाथ सरदार है
बड़ी शान और खिली हुई मुस्कान के साथ बता रहा था
कि हां, वह मेघनाथ साहा को जानता है
वे बहुत बड़े वैज्ञानिक थे
कल जब जामिया विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में घुसकर
बच्चों को तुम बेरहमी से पीट रहे थे
दो धर्मों के दो रसोइये एक साथ
दो दर्जन लोगों के रात के खाने की तैयारी में इस तरह जुटे हुए थे
जैसे देश कुछ नहीं होता, धर्म कुछ नहीं होता
ग्लास और प्लेट को चमकना चाहिए
फलों को काटकर इस तरह परोसा जाना चाहिए
कि आदमी की मरी हुई भूख जाग जाए
पाकिस्तानी शायर सुलेमान हैदर
पाकिस्तानी शायर सुलेमान हैदर की इस कविता से एक बात मोटे तौर पर साफ़ हो जाती है कि विश्व के तमाम सत्तासीन लोगों का चरित्र एक- सा है । वे असहमति के विचारों को उतना ही स्वीकार पाते हैं जितना कि उनकी कुर्सी के लिए बर्दाश्त है । अन्यथा आप ईरान में रहें कि अमेरिका में , पाकिस्तान में रहें कि भारत में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे । अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में महारत ये लोग बेसिकली मनुष्य विरोधी विचारों से ओतप्रोत हैं । ये कभी धर्म के नाम , तो कभी जाति के नाम , या कि भाषा अथवा क्षेत्र के नाम हंगामा मचाए ही रहेंगे । अब लो न इन मनुष्य विरोधी लोगों का जत्था ही को लो देखो ! किसी सम्प्रदाय विशेष के लोगों को लक्षित कर उन्हें काफ़िर करार देने तुल गए हैं । जल जंगल और जमीन के लिए संघर्षरत लोगों को उनके जमीन के मालिकाना हक से ; कैसे उन्हें वंचित कर राहत कैंपों में बंधक बना लेने को ठाने पूंजी पोषित ये कबरबिज्जू नित नए - नए प्रयोगों से देश को हलाकान किए फिर रहे हैं । इस कड़ी में ये संविधान को ताक पर रख क्रूरतम से क्रूरतम और पेचीदा कानून को अमलीजामा पहना रहे हैं । जो कि सर्वथा निंदनीय कृत्य है । विश्व का ऐसा कोई ऐसा भू-भाग नहीं बचा है जहां इस प्रजाति ने अपनी दानवी प्रवृत्ति से नरसंहार तक को जायज़ ही माना । परन्तु प्रतिरोध का यह स्वर हमेशा इनके सामने खड़ा है और दो-दो हाथ करने नहीं चूका । सलमान हैदर इसी असहमति का नाम है । जो काफ़िर क्या है ? कैसा है को इस कविता में अभिव्यक्त कर रहे हैं पढ़िए उनकी इस अद्भुत कविता
'मैं भी काफिर तू भी काफिर,
मैं भी काफिर, तू भी काफिर
फूलों की खुशबू भी काफिर, शब्दों का जादू भी काफिर
यह भी काफिर, वह भी काफिर,
फैज और मंटो भी काफिर
नूरजहां का गाना काफिर,
मैकडोनाल्ड का खाना काफिर
बर्गर काफिर, कोक भी काफिर,
हंसी गुनाह और जोक भी काफिर
तबला काफिर, ढोल भी काफिर,
प्यार भरे दो बोल भी काफिर
सुर भी काफिर, ताल भी काफिर,
भांगड़ा, नाच, धमाल भी काफिर
दादरा, ठुमरी, भैरवी काफिर,
काफी और खयाल भी काफिर
वारिस शाह की हीर भी काफिर,
चाहत की जंजीर भी काफिर
जिंदा-मुर्दा पीर भी काफिर,
भेंट नियाज की खीर भी काफिर
बेटे का बस्ता भी काफिर, बेटी की गुड़िया भी काफिर
हंसना-रोना कुफ्र का सौदा,
गम काफिर, खुशियां भी काफिर
जींस और गिटार भी काफिर,
टखनों से ऊंची बांधो तो अपनी यह सलवार भी काफिर, फन काफिर फनकार भी काफिर
जो मेरे फतवे ना छापें, वो सारे अखबार भी काफिर
यूनिवर्सिटी के अंदर काफिर,
डार्विन का बंदर भी काफिर
फ्रायड पढ़ने वाले काफिर,
मार्क्स के सब मतवाले काफिर
मेले-ठेले कुफ्र का धंधा, गाने-बाजे सारे फंदा
मंदिर में तो बुत होता है, मस्जिद का भी हाल बुरा है
कुछ मस्जिद के बाहर काफिर,
कुछ मस्जिद के अंदर काफिर
मुस्लिम मुल्क में मुस्लिम भी काफिर,
बाकी सब तो हैं ही काफिर
काफिर-काफिर मैं भी काफिर,
काफिर-काफिर तू भी काफिर,
काफिर काफिर दोनों काफिर,
काफिर दोनों जहाँ ही काफिर।
दलित विमर्श से मुख्य धारा की हिंदी कविता में गहरे में पैठ बनाते शिव कुशवाहा आगे आए
शिव कुशवाहा इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक की समकालीन कविता से लगभग पहचाने जा चुके हैं । कहना न होगा कि कथित दलित विमर्श से लेखन की शुरुआत कर वे मुख्यधारा की हिंदी कविता में आए और अपनी पहचान के लिए मुखर होते गए । इस बीच उन्होंने जरूरी ऊर्जा से खुद को न सिर्फ मांजा ; परिष्कृत भी किया ।
साहित्य का धर्म , जाति , भाषा , क्षेत्र के आधार पर विभाजन किन्हीं मायनों में अविश्वास पैदा करता है । यह विवाद पैदा करने वाला होता है । किन्तु पिछली सदी की हिंदी कविता ने अपने काव्य प्रवृत्तियों के बल इस तरह के वाद-विवाद तथा संवाद का भरपूर गुंजाइश और जो प्लेटफार्म अपने अंदाज ए गुफ़्तगू में दिया है ; वह आज भी कायम है तथा पूरे अपने नए यथार्थबोध में है ।
बावजूद मेरा मानना है कि आज की समकालीन हिंदी कविता के परस्पर जो कविता दलित विमर्श , आदिवासी विमर्श ,स्त्री विमर्श के रूप में आए हैं , या कि कश्मीर अथवा पूर्वोत्तर के राज्यों से आए , वस्तुत: वे भी मुख्यधारा की ही कविताएं हैं । भले ही साहित्य के अलग-अलग मठ उसे किसी भी रूप में नामित करते रहें । संशय नहीं होने चाहिए ।
अतः मैं कहना चाहूंगा कि यह अलग से कोई वाद नहीं है , बल्कि केवल एक काव्य प्रवृत्ति है ।
ऐसे विवाद वस्तुत: जनरेटेड विवाद हैं । हमें यह समझना होगा कि इसके पीछे वैश्विक पूंजी व बाजार व्यवस्था की गहरी चाल कुंडली मारे बैठा है । जो आज के मुख्यधारा की हिंदी कविता की प्रखरता से चिंतित है और सुनियोजित ढंग से अब ऐसे विवादों को जन्म दे , अपना हित साधने में लगा हुआ है ( जिसमें वे मठ भी शामिल हैं ) ताकि साहित्य की प्रखरता टुकड़ों में विभाजित हो , अपनी धार खो दे और वे अपनी मंशा में कामयाब हो सकें ।
ऐसा ही इन दिनों हिंदी में एक बड़ा नैरेटिव वर्ग भी दिखाई दे रहा है जो व्यवस्था विरोध या कि वैचारिक आग्रह की कविताओं , कवियों पर लाठी भांजते मुख्यधारा की कविता को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हानि पहुंचाने के उपक्रम में बढ़
आए हैं । परन्तु मेरे लिए यह बेहद सुखद बात है कि शिव कुशवाहा उन तमाम छद्म को दरकिनार कर मुख्यधारा की राह को चुन क्रियाशील हैं ।
शिव कुशवाहा की कविताएं वस्तुत: मनुष्यता के आग्रह में , उसके दुख , पीड़ा ,संताप , विडंबना बोध से उपजने वाली कविताएं हैं । यहां उनकी प्रस्तुत कविता 'बेरंग हो चुकी धरती पर' हमारे समय के मानवीय मूल्यों में आ रही गिरावट को जज़्ब करती तरल संवेदना से उपजी एक बेहद मार्मिक कविता है । जो अभिधा के परस्पर व्यंजना में है । उनकी इस कविता में आई व्यंजना की माने तो वाकई
'कविता भी असमर्थ हो गयी है
चंद शब्दों की व्यथा-कथा कहने में'
अद्भुत और पारदर्शी व्यंजना है । पतनोन्मुखी समाज में बड़े बुजुर्गो की हैसियत , उनकी उपयोगिता या कि अर्थवत्ता में क्षरण को 'शब्द' नहीं गढ़ पा रहा , भोथरा हुआ जा रहा है उसके प्रतिघात से ; 'जबकि शब्द ही मारक है' । कुछ भी नहीं छूटता उसकी मार से , कुछ भी नहीं बचता ! यह नमूदार प्रस्तुति है कि
'कदम दर कदम जब साथ चलना जरूरी होता है
तब संताने छोड़ देती है उनका हाथ'
इसलिए ही शिव कुशवाहा सीधे अभिधा में कविता को व्यक्त करते हैं । शिव कुशवाहा की कविताओं में अभिधा का आना परिवेश व परिस्थितियों से उत्पन्न हुई व्यग्रता के कारण हैं । जो उस व्यग्रता में , अधिक तकनीक को गैर वाजिब मानता है ।
'ठूठ हो चुके संबंधो में
अब पानी की कमी जाहिर हो चुकी है'
बेरंग हो चुकी धरती पर
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ठूठ हो चुके संबंधो में
अब पानी की कमी जाहिर हो चुकी है
कदम दर कदम जब साथ चलना जरूरी होता है
तब संताने छोड़ देती है उनका हाथ
उनके ध्वंस होते हुए सपनों ने
देख ली है संबंधों की हकीकत
कराह रही मानवीय संवेदना को
अब पढ़ लिया है उनकी पथराई आंखों ने
उन्मुक्त आकाश की ऊचाइयों पर
डेरा बनाने वाले पक्षी की तरह
उनकी बेरंग हो चुकी जिंदगी भी
अब निर्द्वन्द जीना चाहती है अपना जीवन
साथ ही साथ देखना चाहती है वह सब कुछ
जो एक जीवन जीने के लिए होता है जरूरी
जाहिर हो चुका है
कि भाषा ने भी तोड़ दिया है अपना दम
कवि की कलम कांप जाती है बार बार
कविता भी असमर्थ हो गयी है
चंद शब्दों की व्यथा-कथा कहने में
हम बेरंग हो चुकी धरती पर सीखें रंग भरना
क्योंकि बेरंगी में तब्दील हो रही दुनियां
अब बाट जोह रही है फिर अपने रंग में वापस होना..
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चूंकि शिव कुशवाहा पूर्व में यह कह चुके हैं
'कविता भी असमर्थ हो गयी है
चंद शब्दों की व्यथा-कथा कहने में'
तो बेहद जरूरी है यह बताना कि उन्होंने उसे व्यंजना में कहा । एक शब्दकार भला शब्द से विश्वासघात कैसे करे ? वह फिर-फिर शब्दों में आता है , लौटता है शब्दों में , शब्दों से गढ़ता अपने अरूप समय का प्रतिसंसार । जिसे वह चीन्हता हैं शब्दों में , दर्ज करता हैं शब्दों में ।
नेपथ्य में चलती क्रियाएं
बहुत दूर तक बहा ले जाना चाहती हैं
जहाँ समय के रक्तिम हो रहे क्षणों को
पहचानना बेहद मुश्किल हो चला है
और मुहर लगाते हैं कि--
बिखर रही उम्मीद की
आखिरी किरण सहेजते हुए
खत्म होती दुनिया के आखरी पायदान पर
केवल बचे रहेंगे शब्द,
और बची रहेगी कविता की ऊष्मा..
बचे रहेंगे शब्द
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नेपथ्य में चलती क्रियाएं
बहुत दूर तक बहा ले जाना चाहती हैं
जहाँ समय के रक्तिम हो रहे क्षणों को
पहचानना बेहद मुश्किल हो चला है
तुम समय के ताप को महसूस करो
कि जीवन-जिजीविषा की हाँफती साँसों में
धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं हमारी सभ्यताएं
स्याह पर्दे के पीछे
छिपे हैं बहुत से भयावह अक्स
जो देर सबेर घायल करते हैं
हमारे इतिहास का वक्षस्थल
और विकृत कर देते हैं जीवन का भूगोल
हवा में पिघल रहा है
मोम की मानिंद जहरीला होता हुआ परिवेश
और तब्दील हो रहा है
हमारे समय का वह सब कुछ
जिसे बड़े सलीके से संजोया गया
संस्कृतियों के लिखित दस्तावेजों में
बिखर रही उम्मीद की
आखिरी किरण सहेजते हुए
खत्म होती दुनिया के आखरी पायदान पर
केवल बचे रहेंगे शब्द,
और बची रहेगी कविता की ऊष्मा..
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शिव कुशवाहा के यहां तृष्णा है , विरक्ति नहीं है । भविष्योन्मुखी आज है , आरंभ है । पतनोन्मुखी समापन के अंदेशे के मध्य खात्मा के विरूद्ध सतत क्रियाशीलता का गतिज संसार है । जो खत्म होने से पहले नवसृजन के प्रति आश्वस्ति से भरा , हरा है । जो
गहराती हुई शाम के धुंधलके में
कुछ स्मृतियां उभर आती हैं
कुछ पीड़ाएँ भी देती हैं दस्तक
और याद आता है वह सब कुछ
जो आंखों के सामने कुछ अधूरेपन के साथ
एक रील की मानिंद खुलती जाती है हमारे सामने
के बाद भी चलायमान है । जैसे
दिन के ढल जाने पर भी
मनुष्य चलना नहीं छोड़ता
चिड़िया उड़ना नही छोड़ती
नदियां बहना नहीं छोड़ती
उसी तरह सूरज भी नहीं बदलता अपना रास्ता
खत्म होती शामों के साथ
पक्षी लौटते हैं बिखरे हुए अपने घोंसलों में
तमाम-तमाम परिस्थितियों के बाद भी ऐसे लौटना , और लौटने की जिजिविषा से भरे रहना अभूतपूर्व साहस से संभव है । यह लौटना , लौटने की खौफ़नाक क्रियाओं के बाद का है ।
खत्म होती शामों के साथ
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दिन के ढल जाने पर भी
मनुष्य चलना नहीं छोड़ता
चिड़िया उड़ना नही छोड़ती
नदियां बहना नहीं छोड़ती
उसी तरह सूरज भी नहीं बदलता अपना रास्ता
खत्म होती शामों के साथ
पक्षी लौटते हैं बिखरे हुए अपने घोंसलों में
अंधेरा बढ़ जाने के बावजूद
किसान को कोई फर्क नहीं पड़ता
वह अपनी फसलों को
सर्द हुए मौसम में सींचता है
और मजदूर अपनी खटराग में उलझे
दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम करता है
जैसे अंधेरे के साथ रोशनी
दिन के साथ रात और दुख के साथ सुख
कभी साथ नहीं छोड़ते एक दूसरे का
वैसे ही रास्ते भी नहीं छोड़ते किसी राही का साथ
गहराती हुई शाम के धुंधलके में
कुछ स्मृतियां उभर आती हैं
कुछ पीड़ाएँ भी देती हैं दस्तक
और याद आता है वह सब कुछ
जो आंखों के सामने कुछ अधूरेपन के साथ
एक रील की मानिंद खुलती जाती है हमारे सामने
खत्म होती शामों के साथ
अंकित होते हैं पूरे के पूरे बीते हुए दिन
जिन पर लिखा होता है समूचे देश का इतिहास,
कि कुछ घटनाएं दर्ज हो जाती हैं
स्याह हो रहे समय के माथे पर
जिन्हें याद करने पर कलेजा सहम उठता है.
__________________________
कोरोना के भय और इस महाविपद समय को लेकर हिंदी कविता में सभी कवियों ने कविताएं लिखी , ढेरों कविताएं आईं । उनमें विरेन्दर भाटिया , हरिओम राजोरिया , मीतादास , विनय कुमार , अदनान कपिल दरवेश , पंकज चतुर्वेदी , वासुकि प्रसाद , आत्मारंजन , राज्यवर्धन , गणेश पाण्डेय , आदि शामिल हैं ; के बरक्स शिव कुशवाहा की कविताएं भी मौजूद हैं ।
वैश्विक महामारी कोरोना ने किसी भी धर्म संप्रदाय को लक्षित नहीं किया । पर तथाकथित धर्म के पहरूओं ने एक संप्रदाय विशेष को इस संक्रमण काल में भी लांक्षित करना नहीं छोड़ा । उनके थूक से लेकर थाली , कटोरी , चम्मच तक को जूठा किए जाने का प्रचार ऐसा किया मानों कोरोना को उन्होंने ही पैदा किया । षड्यंत्रकारी वहीं थे । वही थे समाज के असली दुश्मन । परन्तु थाली , घंटा , घड़ियाल कि बेहुदे आतिशबाज़ी या कि पुष्प वर्षा के सनकी प्रोपेगंडा के बाद देशभर में इस बीमारी के मरीज पांच लाख के पार हो चुके हैं । ऐसे में शिव कुशवाहा की कविताई अपने आशय और धैर्य से जो स्थापना रचना चाह रहा है वह मुमकिन है और जरूरी भी ।
वे नहीं चीन्ह पाते
इंसानियत का उजला रास्ता
भेडों की पंक्ति की मानिंद
चले जा रहे एकदम सीधे
रास्ते के अगल-बगल
नहीं देख पाते गहरी खाईयां
वे नहीं मानते इंसानियत
उनके लिए धर्म है सबसे ज़रूरी
शिव कुशवाहा की यह कविता वस्तुत: किसी धर्म विशेष की आलोचना नहीं है । बल्कि उसके अफीम की आलोचना है और जो मोटे तौर पर सभी धर्मों में व्यापित है । इसीलिए वे कहते हैं
समझाना होगा उन्हें
कि उनकी पीढियां बढ़ रही हैं
आगे...बहुत आगे
इस संक्रमण के मुहाने पर
धर्म की व्याख्याएं हो रही हैं असंगत
अब पहचान लिया गया है
धर्म से पहले इंसान का होना जरूरी है
जब इंसान नहीं होंगे
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गहरे अंधेरे अदृश्य पथों पर
असंख्य लोग चले जा रहे कतारबद्ध
दयनीयता की मनोदशा से
जंग लग चुकी बुद्धि
जो हो चुकी है गिरवी,
विज्ञान और तर्क से दूर
बढ़ रहे लगातार
धर्मान्धता की ओर
वे नहीं चीन्ह पाते
इंसानियत का उजला रास्ता
भेडों की पंक्ति की मानिंद
चले जा रहे एकदम सीधे
रास्ते के अगल-बगल
नहीं देख पाते गहरी खाईयां
वे नहीं मानते इंसानियत
उनके लिए धर्म है सबसे ज़रूरी
वे आशाओं को धूमिल कर
शर्मसार कर रहे हैं इंसानियत
उन्हें नहीं जगा पा रहे हैं
उनके धर्म के पहरुआ
वे नेस्तनाबूद करने पर उतारू हैं
इस खूबसूरत दुनिया को
उनके लिए सवेरा नहीं होता
वे धर्मान्धता को मानते हैं
अपने जीवन आखिरी रास्ता
समझाना होगा उन्हें
कि उनकी पीढियां बढ़ रही हैं
आगे...बहुत आगे
इस संक्रमण के मुहाने पर
धर्म की व्याख्याएं हो रही हैं असंगत
अब पहचान लिया गया है
धर्म से पहले इंसान का होना जरूरी है
___________________________
'मजदूर होना ही उनका दुर्भाग्य था' और 'तब तुम्हें कैसे लगेगा' दोनों ही ही कविताएं समसामयिक घटनाओं से उत्पन्न और लाकडाऊन - 1 के बाद की कविताएं हैं । जब देश में जगह-जगह 'कोरोना के रोकथाम' के लिए पुलिस बल तैनात किए गए थे । यात्रा के सारे साधन स्थगित कर दिए गए थे । तब महानगरों से बेकाम हुए मजदूरों के लिए 'मजदूर होना ही उनका दुर्भाग्य था' की स्थिति बनी । जिसमें शिव कुशवाहा महानगर से लौटते मजदूरों की दयनीय दशा और यात्रा के दौरान रेल पटरी में कट कर हुए उनके त्रासद अंत का मार्मिक चित्रण करते हुए यह भी बताते हैं कि उनके अभागापन में वह शहर भी शामिल हैं जिसे
वे आजीवन सींचते रहे अपने रक्त से
महानगरों की असुंदर देह
संक्रमण के विस्फोटक समय में
वे छोड़ देना चाहते थे शहरी सभ्यता
जहां मानवता की कलगियां सूख रही थीं
और दरक रहे थे संवेदना के दरख़्त
उस शहर का दरख़्त खो चुका है अपना हरापन
मजदूर होना ही उनका दुर्भाग्य था
-------------------------------------------
वे चल रहे थे रात और दिन
मील नहीं हज़ारों किलोमीटर पैदल
उनके कंधों पर उनके छोटे बच्चे थे
और रास्ते में भूंख शांत करने के लिए कुछ सामान
वे लौट रहे थे राजधानी से गांव की ओर
संक्रमण ने निगल लिया था उनका रोजगार
भूंख पांव पसार रही थी बहुत तेज़ी से
सरकारें नहीं रोक पा रही थीं उनका पलायन
वे आजीवन सींचते रहे अपने रक्त से
महानगरों की असुंदर देह
संक्रमण के विस्फोटक समय में
वे छोड़ देना चाहते थे शहरी सभ्यता
जहां मानवता की कलगियां सूख रही थीं
और दरक रहे थे संवेदना के दरख़्त
भूख और जिजीविषा की जद्दोजहद में
वे चल रहे थे लगातार अपने अंतिम गंतव्य तक
छा गया था उनकी आंखों में अंधेरा
रोशनी की धूमिल उम्मीद के अहसास में
उनके कदम शहर-दर-शहर पार करते रहे
रात के सघन अंधकार में
उनके पदचाप छोड़ रहे थे अमिट निशान
चलते-चलते जब वे थक गए
तब हाइवे के फुटपाथ बन गए उनके लिए बिछौने
महादेश के घोषित लॉक डाउन में
अपने जीवन को बचाये रखने के लिए
उनका चलना ही आखिरी विकल्प था
दर दर भटकने को स्वीकार न करके
वे चल दिए अपने अपने गांव
रेल की पटरियां उनके लिए बन गए रास्ते
लाखों मजदूर इन पटरियों के रास्ते
सकुशल पहुंच गए अपने घर
किंतु कुछ के हिस्से में पटरियां बन गयीं
उनका अंतिम रास्ता
वे नहीं देख पाए अपने गांव
और नहीं देख सके अपने हिस्से की बिखरी रोटियां
विश्व की 'पांच ट्रिलियन' अर्थव्यवस्था को सहेजे
इस महादेश में
मजदूर होना ही उनका दुर्भाग्य था
और दुर्भाग्य था उनका
नंगे पांव अपने घर पहुँचना..
___________________________
शिव कुशवाहा की कविताओं में मानव मूल्य और संवेदना का सघन पक्ष जितने अपने सरल रूप में अभिव्यक्त होते हैं उतने ही मारक व्यंग्य में भी वह बना रहता है । मसलन कि वे कहते हैं
विश्व की 'पांच ट्रिलियन' अर्थव्यवस्था को सहेजे
इस महादेश में
मजदूर होना ही उनका दुर्भाग्य था
तब तुम्हें कैसा लगेगा' कविता महज़ सवाल की कविता नहीं है । सोच और विचार की कविता है । चूंकि बकैती आज के इलीट क्लास से भी कहीं अधिक मध्यमवर्गीय आचरण का हिस्सा बन चुका है । सोशल मीडिया के इस ख़तरनाक समय में हर दूसरा शख्स अपनी "कै" उलीच रहा है और निशाने में अपने कमजोर आदमी को सहजता से रख देता है । क्षुद्र ज्ञान की शेखी बघारते यह वर्ग भी स्वभाव से इलीट हुआ जा रहा है । अतः उन्हें यथार्थ की जमीन का मुआयना कराया जाना जरूरी है । शिव कुशवाहा इसमें सफल दिखाई देते हैं ।
तब तुम्हें कैसा लगेगा
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चार बाई छः की खोली में
रहने को दिया जाय तुम्हें
और दिनभर कराया जाय काम
सोने को दी जाय
केवल दो ग़ज़ जमीन
देश की घोषित तालाबंदी में
जब चला जाय रोजगार
और खाली हों राशन के कनस्तर
चूल्हा भी बुझ चुका हो
बच्चे बिलबिला रहे हो भूख से
और पढ़ाया जाय
उसी समय आत्मनिर्भरता का पाठ
तब तुम्हें कैसा लगेगा.
तपती दोपहर में
तुम्हें सड़कों पर
चलाया जाय पैदल
कंधे पर रखाया जाय समान
और परिवार सहित
भूखे पेट चलाया जाय
तब तुम्हें कैसा लगेगा.
संक्रमण के खतरे के बनिस्बत
पेट पर भूख के संक्रमण को भांपते
जब तुम लौट रहे होते अपने गांव
और लौटते समय बीच चौराहे पर
पुलिस द्वारा पीट पीट-कर
कराया जाय अधमरा
तब तुम्हें कैसा लगेगा.
रेल की पटरियों पर
तुम्हारे भाई चलते चलते
थक कर सो जायँ
और रात के अंधेरे में ट्रैन
उनके चिथड़े उड़ा दे
तब तुम्हें कैसा लगेगा.
तुम्हारी गर्भवती बहन बेटियों को
सड़कों पर चलने के लिए
किया जाय अभिशप्त
और वे चलते चलते प्रसव से कराह उठें
तब तुम्हें कैसा लगेगा.
।
विकास की प्रक्रिया में , कि उसके जद में , आने वाले तमाम चीजों का विस्थापन तय है । यद्यपि विकास हमें नयापन के अहसास से भरता है और सुखद भी लगता है , परन्तु उसके एवज में कई कुछ हमें खोना होता है । जो आदमी को , उसकी संवेदना व जुड़ाव को झकझोर देता है । भीतरी दबाव के साथ निराशा पैदा करता है । चीजों के गुम के बरक्स नया का अधिक प्रभावी होना हमारे स्वभाव के ललचाने से है । यानी यह सब मानव सुविधा के भोग वृत्ति से अधिक पैदा हुआ । यह प्रकृति सम्मत न होकर , प्रकृति के नियमों विपरीत हैं । अत: प्रकृति की स्वभाविकता का प्रेमी , उस गत्यात्मकता से दुखी होता है । मनुष्य स्मृति जीवी प्राणी है । वह आज को अपने स्मृतियों में तलाशता है । परन्तु आज के निर्बाध प्रवाह पुराने को ध्वस्त कर देता है । शिव कुशवाहा की यह कविता नए के एवज पुराने के राग संबंध का वृत्तांत कथा है जहां चीजों का ध्वस्त होना निरर्थक होने के बाद भी तय है । हालांकि संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती , 'गांव एक संभावना है' शीर्षक कविता में शिव कुशवाहा की माने तो यकीनन हर उस आदमी के भीतर गांव न केवल संभावना ही है , जरुरत भी है । यह उनमें गहरे में पैठ बनाता है जिन्होंने किसी न किसी सुख की तलाश में गांव को बरसों पहले छोड़ आया ! शिव इस कविता में लाकडाऊन के बाद और विपत्ति के दुस्सह स्थिति का वर्णन समकाल के प्रभाव में आकर कर रहे हैं और इसलिए कर रहे हैं कि गांव वास्तव में उन लोगों के लिए सच का एक दीप्त आश है । जो बचा रहेगा अपने अवशेष में । यही वह बात है जो शिव को विश्वास दिलाता है कि
सभ्यता के पुराख्यान का एक पूरा ग्रन्थ
गांवों ने रचना नहीं भूला है
सदियों के बाद भी वहां खड़े हुए हैं दरख़्त
फैली हुई हैं उनकी बड़ी बड़ी शाखाएं
गांव के पक्ष में व्यक्त चीजों के बीच अव्यक्त और छूटे हुए संदर्भ भी हैं जिसे मैंने यथासंभव रखा । बाक़ी जो है , वो हैये है । शुक्रिया शिव कुशवाहा ; निरंतर गतिमान रहें अपार संभावनाएं लेकर चले हैं तो मकाम तो बनेगा , कारवां पीछे-पीछे और आप आगे-आगे
गाँव अब भी संभावना है
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सभ्यता के पुराख्यान का एक पूरा ग्रन्थ
गांवों ने रचना नहीं भूला है
सदियों के बाद भी वहां खड़े हुए हैं दरख़्त
फैली हुई हैं उनकी बड़ी बड़ी शाखाएं
गांव के चबूतरों पर सुस्ताते हुए लोग
मिथकीय चरित को जीवित कर
एक नई बहस को जन्म देकर
विचरते हैं एक कल्पनालोक में
जहां दिवास्वप्न में खोए हुए
कुछ किसान खेतिहर लोक संवादों का
एक बड़ा पिटारा खोलकर
डूब जाते हैं गंवई रूप,शब्द और रस में
जैसे सांझ होने पर पक्षी लौटते हैं
अपने घोसलों की ओर
उसी तरह सैकड़ों मील चलकर आए हुए लोग
लौट आए हैं अपनी जड़ों की ओर
घर की स्त्रियां चूल्हे की मंद आंच पर
फिर सेकेंगी रोटियां
और पतेली पर चढ़ी दाल की खदबदाहट
सन्नाटे को चीरते हुए
फिर भूख की गहनता का कराएगी अहसास
गांव के खुले आसमान में
खरखटी चारपाई पर
दिखेंगे वे फिर अधूरे सपने
जिन्हें पूरा करते हुए
खप गया है उनका पूरा जीवन
देर रात में टिमटिमाते तारों को देखकर
पलकों की कोर थोड़ी नम होकर
कराएगी अहसास
विस्थापन के अनकहे दर्द का
जैसे अपनी जगह से उखड़े हुए पेड़
फिर दूसरी जगह मिट्टी और पानी पाकर
हो जाते हैं लंबवत
ठीक उसी तरह गांव को लौटे हुए लोग
खड़े होना सीख रहे हैं अपनी जमीन पर
अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है उनके लिए
वे चल दिए हैं खेतों की ओर
हांथ में खुरपी, फावड़ा और कुदाल लेकर
अब कत्तई इंकार नहीं किया जा सकता
कि वे तलाश ही लेंगे अपनी भूख के लिए ईंधन
शहरों से बेदखल हुए लोगों के लिए
गांव अब भी संभावना है.
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