Monday, December 28, 2020

परसाई : अरस्तू की चिठ्ठी १

हरिशंकर परसाईं हिंदी व्यंग विधा में पितृ पुरूष की तरह ख्याति अर्जित किए  । उनका हर-एक , कहा-लिखा समय आने पर शिलालेख की तरह चमचमाती हुई दिखी । अब इस 'परिवर्तन' के लिए लिखा उनका अरस्तू की चिट्ठी - १ को ही देखिए आज के राजनीतिक सत्ता तथा उसके छद्म आचरण का यह कितना जीवंत रुप है । सत्ता की शक्ति पर काबिज होने की मंशा का भला इससे बढ़िया उदाहरण क्या होगा ? कितना सटीक और नंगा यथार्थ प्रस्तुत करते हैं हरिशंकर परसाई कि मुरीद हुए बगैर नहीं रहा जाता ‌।

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तुम्हारे प्रधानमन्त्री में यह अदा है। इसी अदा पर तुम्हारे यहाँ की सरकार टिकी है, जिस दिन यह अदा नहीं है या अदाकार नहीं है, उस दिन वर्तमान सरकार एकदम गिर जायेगी। जब तक यह अदा है, तब तक तुम शोषण सहोगे, अत्याचार सहोगे, भ्रष्टाचार सहोगे - क्योंकि तुम क्रोध से उबलोगे, तुम्हारा प्रधानमन्त्री एक अदा से तुम्हे ठंडा कर देगा। तुम जानकर आश्चर्य होगा कि तुम्हारे मुल्क की सारी व्यवस्था एक अदा पर टिकी है।
प्रधानमंत्री ने कहा - 'टैक्स दो' और तुम देने लगे। प्रधानमंत्री ने कहा - 'बजट ठीक है' तुमने कहा - 'बिलकुल ठीक है'। उनने कहा - 'दूसरी योजना के लिए त्याग करना पड़ेगा', तो तुमने कहा - 'लँगोटी उतरवा लो।'
और अब तुम्हारे प्रधानमन्त्री ने कहा कि दो साल बाद तुम्हारी हालत सुधर जायगी।
तुमने बात मान ली। तुम अदा पर मरते हो।

- अरस्तू की चिट्ठी १
(परिवर्तन, 01.जून.1957)

-हरिशंकर परसाई

राजेश सक्सेना

स्त्री के संघर्ष की गाथा प्रागैतिहासिक है । तब तुलनात्मक पुरूष के स्त्री बराबर की भागीदार थी । सहभागी रही । वह सहअस्तित्व के सिद्धांत पर सत्तासीन थी । पर समय का पहिया घूमता गया और लिखित अथवा ऐतिहासिक काल के आते-आते स्त्री के वजूद पर पुरूष का हस्तक्षेप बढ़ने लगा । जो स्त्री अपने वजूद को लेकर प्रारंभ से ही स्पष्ट रही शनैः शनैः पुरूष के आधिपत्य को स्वीकारने लगी । उनमें यह भाव और आगे आकर ज्यादा ही बलवती होती रही । वह रक्षात्मक होने लगी । या कह सकते हैं सुरक्षा के लिहाज से ही सही पर दासत्व भाव उनमें पनपने लगा । पर यह पूरा का पूरा सच भी नहीं है । चूंकि तब भी स्त्री में संघर्ष और अपनी मुक्ति की कामना मौजूद थी , और रही । उनमें कुशल नेतृत्व क्षमता का विपुल भंडार था । जिसका कि रजिया बेगम , रानी लक्ष्मीबाई , रानी अवंती बाई के नेतृत्व से लेकर आज तक विभिन्न राष्ट्रों के शीर्ष पदों को सुशोभित कर चुके विदुषियों के ताकतों से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है । ये भी आसमान से उतरी कोई उड़नपरी थी न कोई जादुई  जिन्न । ये भी हमारी- तुम्हारी तरह बच्चा जनने वाली स्त्रियां ही थी। हमारी-तुम्हारी तरह तमाम तरह के परिवारिक, समाजिक और राजनैतिक दायित्वों का निर्वहन करती स्त्री थी । हां जरूर ये कोई पद्मावती नहीं थीं । और न इन्हें पद्मावती होना चाहिए । एक स्त्री  में केवल और केवल पद्मावती (जायसी के) का चरित्र जो लोग देखते हैं  वे निश्चित ही ढपोर संघी तथा काम पिपासा से आह्लादित हैं । वे दकियानूस लोग स्त्री की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर सदैव मंडराते रहे ,पहरेदारी करते रहे । उनका यह ऐतराज स्त्री को उसी तरह देखना और ठिठका हुआ रहना चाहता है जैसा कि बाज़ार की वस्तु को लेकर नज़र -ए -आम है । वे स्त्री के संघर्ष और  मुक्ति की कामना को सिरे से ख़ारिज करने के यत्न में लगे हैं । यद्यपि यहां प्रस्तुत  राजेश सक्सेना की कविता स्त्री के पक्ष से प्रारंभ होती है और प्रथम दृष्टया स्त्री संवेदना पर एक बेहतरीन कविता जान पड़ती है ;  चूंकि स्त्री को लेकर इस कविता में उतनी ही चिंताऐ ,उतना ही कंटेंट समाहित है जितना कि पारंपरिक मूल्य बोध के ठेकेदारों की आवश्यकता है । भय उनकी आवश्यकता का प्रथम सोपान है । और इस पर वे अपनी सफलता की ताकीद मुकर्रर भी करते हैं । राजेश सक्सेना की इस कविता में संवेदना स्तर इतना गहरा है कि थाहना मुश्किल  हो जाता है और व्यक्ति गोते लगाने के उपक्रम पर शामिल रह जाता है ।  कंगना रानावत एक बेहतरीन अदाकारा हैं और स्त्री मुक्ति की कामना को उनकी तमाम गतिशीलता से निश्चय ही बल भी मिलता है ; तो इसमें दिक्कत क्या है ? कवि डर क्यों रहा है ! कंगना न तो उसकी बहन है , न बेटी और न मित्र भी । तो क्या कवि को कंगना अच्छी लगती है इसीलिए मात्र , वह डर रहा है । एक बेहतर स्त्री , एक बेहतर प्रकृति भी है और एक बेहतरीन समाज भी ।उसे बचाए जाने की जिम्मेवारी हम सबका है । पर उस स्त्री के बेहतर को सामने आने से ; क्या एक तरह से उसे, यह रोकने के जैसा नहीं है ?
पूरी कविता में असंगत किस्म का भय मुझे दिख रहा है जो कि कंगना के बहाने स्त्री की स्वतंत्रता व मुक्ति की कामना में शामिल स्त्रियों को समझाने का प्रयत्न प्रतीत हो रहा है अथवा कि उस पर दबाव बनाया जा रहा है या कि उन्हें  डराया जा रहा है । माना कि समय भयानक और बहुत ही बुरा है तो क्या बुरे वक्त के खिलाफ़ 'अच्छे दिनों' की आश की तमाम लड़ाई व यात्राएं स्थगित कर दी जानी चाहिए ?

'तुम्हारे दोषों में शामिल है
तुम्हारा लड़की होना
तुम्हारी हंसी भी खटकती है
बाजवक्त हमारे समय को
सवाल करना तो सबसे 
बड़ा जुर्म है ही स्त्रियों का
यह धरती फट चुकी है
स्त्रियों के सवालों से'

देखा जाए तो यह एक पूरी मुकम्मल कविता की पंक्ति है ।आम स्त्री की कविता है ।
पर---

'पता नहीं क्या तुम्हे कंगना ?'

कह
 राजेश सक्सेना इतने निजी और एकांगिक कैसे हो सके ? जबकि एक होनहार कवि अपनी निजता में भी समाजिक संसार का ताना-बाना और प्रगतिशील मूल्यों की रक्षा करता समाजिक मूल्यों , दायित्वों का बिंब स्थापित करता है ।

'क्यों बोलती हो
अपनी दिक्कतों के बारे में 
आदर्श सुशोभित वाक्यों की आत्मा के
निविड़ एकांत में 
सुस्ता कर रो लिया करो
निथार लिया करो ये खारापन

राजेश का यह व्ययंग भाव पूरी तरह, स्त्री के पक्ष का होकर भी उसका नहीं रह जाता । बल्कि इसके उलट एक विदुषी व विद्वान स्त्री के मनोबल को कमज़ोर करने लगता है ।

Friday, December 11, 2020

आशीष त्रिपाठी

हिंसा अपने किसी भी रूप में रहे बर्दाश्त कर पाना मुमकिन नहीं है । भय और अक्रांतकारी सत्ता अपने राजनीतिक , आर्थिक , सामाजिक और सांस्कृतिक चरित्र में इस बर्बरता का  पक्षकार बराबर बना हुआ है नतीजतन न्याय भी , नाउम्मीदी में बनी हुई है । संवेदना मनुष्य के भीतर नैसर्गिक है । मनुष्य अपने स्वभाविकता में कभी भी उतना उग्र नहीं है जितना कि अन्याय या अप्रीतिकर परिघटनाओं के बाद होने लगता है मसलन निर्भया कांड , उन्नाव रेप केस , कि रांची में हुई घटना को लेकर होता दिखा । वह तब और अधिक उग्रता में देखा गया कि उसने न्यायिक प्रक्रिया की लचरता से आजिज़ आ , पुलिस द्वारा कथित एनकाउंटर को भी जायज माना । हालांकि यह दुखद पहलू है कि वह न्याय प्रणाली से और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अनासक्त हुआ। लेकिन इनघटनाओं-परिघटनाओं के विपरीत एक कवि ने उसे , स्त्री को उनकी सार्थक समाजिक सरोकार से वंचित रखे जाने के षडयंत्र के रूप में देखा है और कहा --- 

बेटियों डरना मत
इसलिए हो रहा है यह सब
कि तुम लौट जाओ
घर की कैद में
पर तुम्हें बढ़ना है आगे
मुकाबला करना है

 यह कविता उन्हें लेकर , उनसे जुड़ी तमाम चिंताओं को लेकर, पूर्णतः स्त्री अस्मिता को लेकर है  । एक पिता की चिंता , एक भाई की चिंता , एक पूरे परिवार की चिंता भी इस कविता में अभिव्यक्त होता है । कविता केवल बलात्कार को ही लेकर लिखी बिल्कुल भी नहीं है । परन्तु कवि ने इस कविता को सम समायिक बलात्कार की घटनाओं से जोड़ इसकी व्याप्ति को और अधिक व्यापक किया । किसी कवि की कविता में मौजूदा समय का भान और भविष्य की संभावनाओं की संकल्पना उसके काव्य संप्रेषण को अधिक पुष्ट बनाती है । यह इस कविता के भीतर मौजूद है । 
कवि में एक ओर जहां स्त्रियों से साहस से उठ खड़े रहने का आग्रह है वहीं उस समय और स्थिति को देखने की आकुलता है , प्रतीक्षा है । उनके लौटने में लौटना वैसे नहीं है , जैसा भय से उत्पन्न लौटने में होगा । वे साफ़ और मुखर हो कहते हैं 'लौटना'

पर हत्यारों के भय से नहीं
अपनी काम खत्म कर लौटना वापस
मैं सदियों तक उस घड़ी का इंतजार करूंगा

Monday, December 7, 2020

त्युंसदे

तेनजिंन त्सुंदे की यह कविता छद्म व कृत्रिमता के आवरण से मुक्त व निरपेक्ष तथा उस स्वीकारोक्ति से संबद्ध है जिसमें एक अजन्मे देश की नासूर टींस व पीड़ा है । तथाकथित संयुक्त राष्ट्र संघ, मानव अधिकार संगठन के होते एक काली निरीह इतिहास है । खानाबदोश व दिन ब दिन पलायन के दंश को अपने भीतर समेटे लोगों की मनोदशा है । त्सुंदे उन्हीं संभावनाओं ,उन्हीं अनुष्ठानों, उन्हीं प्रक्रियागत वस्तुनिष्ठता का स्मरण अपने थके हुए पांवों से कर रहे हैं; तो निश्चय ही उनके इस ठहराव में वह स्पेस है जिसका कि भरा जाना है ।  वे यह क्यों और किस लिए कर रहा है का साइक्लिंग कौतूहल रच दोगले और पिछलग्गू वैश्विक समूह का खबर लेते हैं । राष्ट्र आदमी का पहचान है और राष्ट्रीयता उसका धर्म । हिन्दुस्तान के संदर्भ में भी यह इसी तरह का है । पर तथाकथित राष्ट्रवाद के झंडाबरो ने इसकी अलग ही व्याख्या कर इसके रूप को ढाँचागत अपने फ्रेंम में मढ़ने कोई कसर नही छोड़ा है । राष्ट्रवाद का ऐसा वीभत्स व विकृत रूप आजादी के बाद पहली मर्तबा दिख रहा है। तेनजिंग जहां अपने राष्ट्रीय पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं वही हम अपने सांस्कृतिक पहचान व उसके संघर्ष  के निमित्त भगवा आतंकवाद का लगातार मुकाबला कर रहे है दोनो ही संघर्ष इन अर्थो में  समरूप होते हैं कि  वे मानवीयता को अर्थवान बनाते हैं । त्सुंदे अपनी इस    कविता में थकने की  बात भले कह गए हों पर वे थके कहां हैं ? विचार और संघर्ष कभी खत्म नहीं होते, वह   कभी नहीं थकता, वह सतत प्रक्रियाधीन है ।वह चरम के खिलाफ है,  अनवरत है । त्सुंदे की इस कविता का एक बड़ा पक्ष जो मै देख रहा हूँ  वह यह कि ,वे बजाय स्वप्न जीवी के स्वप्नदर्शी हुए   ।                                (क्रमश: )

दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार हिंदी गज़ल के वे गज़लगो हैं जिन्होंने उर्दू शायरी को उसके पारंपरिक रोमैंटिज्म से मुक्त करा जन पक्षीय चेतना से जोड़ा । आज उर्दू अथवा हिंदी गज़ल का जो रूप हमारे सामने है वह दुष्यंत कुमार जैसे गज़लगो की वजह से है । ऐसा नहीं है कि दुष्यंत कुमार को विरोध का सामना न करना पड़ा , परन्तु आज वे खुद एक आधुनिक ग़ज़ल में परम्परा हैं ।  दुष्यंत कुमार अपनी ग़ज़लों में तत्काल का जिस तरह से अतिक्रमण किए हैं वह आज के परिप्रेक्ष्य में कितना सटीक है कि  कहना हो रहा है  ---

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

Wednesday, December 2, 2020

ganesh gani

अन्याय अथवा असमाजिकता का क्रिया व्यवहार है कि वह नैतिक मूल्यों का अतिक्रमण करें । विजय की लालसा का यह छद्म रूप राजनीतिक , आर्थिक और कुटनीतिक वैभवों के समानांतर ही एक  अविछिन्न सत्ता का संघर्ष-सा है ।  मौजूदा हिंदी कविता और कवि इससे अछूते नहीं हैं । परन्तु न्याय की मांग और उसका प्रतिवादी संघर्ष अपने समय के साक्ष्य बन अपनी सार्थकता को साबित करने प्रत्युत्तर हुआ ही है । यह देशी राग है ।
यह देशी ही है जब अपनी धुन में आए तो एक ही सांस में  कितनों को ठिकाने लगा दे । कितनों की पतलून गीली कर दे , कि नाड़े ही खींच दे । वैसे मैं इसका कभी हिमायती नहीं रहा पर हिंदी में कुछ वरिष्ठ - गरिष्ठ पदार्थों की पतनशीलता मुझे भी उनका प्रतिवादी बनाती है । ठीक वैसे ही जैसे कृष्ण कल्पित , ganesh Pandey अपनी कविताओं में मुखर हो जाते हैं

वरिष्ठ कवियो !

वे जो जिनकी कविताएँ दीवारों पर खुद चुकी हैं
वे जो पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं
वे जो अन्य भाषाओं में अनूदित हो चुके हैं
वे जो छात्रों की भाषा ख़राब कर चुके हैं
वे जो जिनकी प्रतिनिधि कविताएँ कबाड़ी ले जा चुके हैं
वे जो जिन्हें दफ़नाया जा चुका है अपनी क़ब्रों में

कितना लहू पिओगे
कितने युवा कवियों का कलेजा चबाओगे

वरिष्ठ कवियो, जाओ
सुसज्जित सभागारों में आपकी प्रतीक्षा हो रही है
फूलमालायें मुरझा रही हैं आपके इन्तिज़ार में

वे जो जिनकी भाषा एक अरसे से ठहरी हुई है विचार धुंधलाया हुआ है और कल्पनाशक्ति हर-रोज़ क्षीण हो रही है वे जिन्हें रोज़ कच्ची कोंपलें चबाने को चाहिये वे जो अपनी ख्याति के दलदल में धंसे हुये क़दमताल कर रहे हैं

वे जो जिनकी आँखों से लहू नहीं लालच टपकता रहता है हर-घड़ी वे जो किसी असम्भव प्रेम की आशा में अभी भी लिखे जा रहे हैं प्रेम-कविता

वरिष्ठ कवियो, थोड़ा हटो
रास्ता दो युवा कवियों को

एक जो एक मृत चित्रकार के पैसे से हर साल पेरिस में गर्मियाँ गुज़ारता है

एक जो अब भूलता जा रहा है कि जीवन में किन किन स्त्रियों का नमक खाया है

एक बरसों से अचेत है
उसे अचेतावस्था में ही किया गया सम्मानित

एक मुम्बई में घायल है
एक देहरादून के एक होटल में पस्त है

एक जयपुर में उपेक्षित है
एक पटना में सम्मानित है

एक लखनऊ में बांसुरी बजा रहा है
एक भोपाल में चित्रकारी कर रहा है

एक संगीत में डूबा हुआ है एक सिनेमा में
एक इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में स्कॉच पी रहा है और दूसरा लक्ष्मी नगर में ठर्रा

आदिवास का एक कवि किसी आदिवासी की हत्या से नहीं
किसी पेड़ से पत्ते झरने से व्यथित होता है

एक कवि कथाकारों की बस्ती में फ़रारी काट रहा है
एक को अभी-अभी निगमबोध घाट पर जला कर आ रहे हैं

एक जो किसी रामानन्द की लात  की प्रतीक्षा में
मणिकर्णिका घाट की सीढ़ियों पर लेटा हुआ है बरसों से

एक गठिया से परेशान है एक आंधासीसी का शिकार है
एक को नोबेल का शक पड़ गया है

एक ग़ालिब की आड़ में जिन्ना की भाषा बोलने लगा है
एक ने कब लिखी थी कविता उसे याद नहीं

जिसकी एक भी पंक्ति नहीं बची
उसके पास सर्वाधिक तमगे बचे हुये हैं

वरिष्ठ कवियो, जाओ
अपनी-अपनी क़ब्रों में अपने-अपने तमगों के साथ सो जाओ अब अधिक धूल मत उड़ाओ

कृपया जाओ
खिड़की से धूप आने दो
और मुझे खींचने दो चिल्ला !

कविता : साभार गणेश गनी

Tuesday, December 1, 2020

तगड़ा कवि

कविता में दम है तो , यह मायने ही नहीं रखता कि उसे किसने लिखा ! पर इस कविता में आए भाव व विचार उस कवि के प्रति मुझे कृतज्ञ बना जाता है । अमूमन हिंदी कविता में वैचारिक आग्रह की कविताएं चुनौती की कविताएं रही है , प्रतिवादी कविताएं हुई  । जो अपने साहस व सामर्थ्य से हिंदी को एक विजन तक ले जाती रही है । इस कवि की कविता भी उसी बड़े विजन का भाग है । उसी का ही एक विस्तृत फलक है । कवि के चैलेंजिग साहस को देख लगता है कवि जरुर कोई तगड़ा कवि होगा । हाल फिलहाल दिल्ली में डटे हुए साथियों का आदर करते  और शहीद किसान भाई को श्रद्धांजलि देते , इस कवि को पढ़ें ,गुनें  ; उस तगड़ा कवि की हिमाकत देखें.   

आलोक धन्वा Madan Kashyap 

          मैं किसान हूँ
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आसमान में धान बो रहा हूँ
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता
मैं कहता हूँ पगले!
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा।

वरवर राव

#क्रांतिकारी कवि #वरवर राव को #रिहा किया जाए । उनकी #नजरबंदी अन्याय है

भारत में यूरोपीय औपनिवेशिक दासता की जड़ें  1498 से पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा के भारत आगमन के साथ ही पड़नी शुरू हो गई । जो आगे चलकर डच ब्रिटिश कंपनियों के माध्यम औपनिवेशिक दासता अर्थात् दोहरी सत्ता के किंवदंतियों से सैकड़ों वर्ष तक जकड़ा रहा ।  यह वह समय था जिसमें तात्कालीन रियासतों में सत्ता छीन जाने का भय चरम पर था पर कहीं-कहीं और किसी-किसी   
रियासतों से इस पर विरोध का बिगुल भी फूटने लगा था । कहना न होगा कि ठीक इसके परस्पर ही जीवन मूल्यों और आजादी के प्रति ललक रखते आम जन में यह विरोध का भाव भी आकार लिया तथा उनके अनथक संघर्ष व प्रयत्नो से भारत स्वाधीन हुआ । तब से स्वतंत्र भारत में संघर्ष की इबारत का एक बड़ा इतिहास इसके पटल में अंकित है । आजाद भारत का स्वप्न जिन आंखों ने दीवानगी की हद तक 'अपना भारत' के रूप देखना स्वीकार किया उनके लिए चंद ही दिनों में सत्ता के दुरभिसंधियों से मोहभंग की स्थिति भी बनता ही ग‌या । आजाद भारत के लिए यह दुख की बात है कि महज 10 - 15 वर्ष में ही वह मोहभंग के त्रासद दौर से गुज़र अब तलक उबर नहीं पाया । आजाद भारत में मोहभंग का समय साठ के दशक का है । बताना न होगा इस कमोबेश मोह भंग ने जनता को आक्रमक होने बाध्य किया । जो नक्सलबाड़ी आंदोलन के उभार में शिद्दत से महसूस किए जा सकते हैं । इस आंदोलन का प्रभाव न सिर्फ कला के अन्य माध्यमों में दिखाई देता है बल्कि कविता में कहीं उससे और भी अधिक तथा प्रचुर मात्रा में दिखाई देता है । तेलगु कवि वरवर राव आजादी के उन्हीं दीवाने मतवालों में हैं । जो हर वक्त अपने जीवन को दबे , कुचले , शोषित , उत्पीड़ित जनता के संघर्ष में होम कर देते रहे हैं। वरवर राव मूल तेलगु कवि हैं पर भारतीय भाषाओं के प्रत्येक भाषा में सबसे अधिक स्वीकारे जाने वाले कवि हैं । आज वे 80 वर्ष की आयु को पार कर ग‌ए हैं और उस क्रूर तथा बर्बर तंत्र के अधीन जेल की सलाखों में हैं ; जिसके निर्माण में कभी सुभाष , भगत , आजाद , विस्मिल , खुदीराम , गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी । खैर ! वरवर राव कवि हैं , कविताएं लिखते हैं , और इस निस्पृह व्यवस्था प्रणाली से खासे नाराज हैं , तो स्वभाविक है विरोध की ही कविताएं लिखेंगे हैं । पर क्या यह सत्ता ब्रिटानी हूकूमत और इशारे पर चलने वाली सत्ता है ? जो असहमति बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकती ! कि संवैधानिक मूल्यों को ताक में रखकर आदमी के मूल अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी को छीन लेना चाहती है !! कि राज्य अथवा गणतंत्र को एक छत्र औपनिवेशिक राज्य में पुनर्स्थापित करने की मंशा को अंतिम रूप देने की स्थिति में है !!! मैं फिर कह रहा हूं वरवर राव कवि हैं , कविता लिखते हैं । कहना न होगा कि ताकत और तंत्र सत्ता के अधीन मैनुपुलेट होते हैं फिर सत्ता इतनी डरी क्यों है इस कवि की कविता से । यह सत्ता कोढ़ और कायर सत्ता है जो संस्कृति कर्मियों से डरी हुई है । वरवर राव वो कवि हैं जो आजादी के अर्थ को जीवन्त बनाए रखने के लिए संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को लेकर हमेशा ही मुखर रहे हैं व विचारधारा को सर्वोपरि मानते हैं । श्रम साध्य लोगों के संघर्ष को अपना मान अपने जीवन की आहुति दी है । वे अपनी कविताओं में नव‌उदारवाद , बाजारवादी , वैश्वीकरण औद्यौगिक विसंगतियों से उपजने वाली भ्रामक विकास के चपेट में आने से प्रकृति के विनाश के प्रति आगाह करते हुए उसका तेज़ विरोध किया है । यहां साभार कविता कोश के मैं उस विचार और चेतना संपन्न कवि की कविता को उनके अविलंब रिहाई की मांग करते हुए शेयर कर रहा हूं । ताकि वरवर राव के कवि व्यक्तित्व और लेखन के बीच के अर्थवान चरित्र को समझा जा सके ।

         चिन्ता
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मैंने बम नहीं बाँटा था

न ही विचार

तुमने ही रौंदा था

चींटियों के बिल को

नाल जड़े जूतों से ।

 

रौंदी गई धरती से

तब फूटी थी प्रतिहिंसा की धारा

 

मधुमक्खियों के छत्तों पर

तुमने मारी थी लाठी

अब अपना पीछा करती मधुमक्खियों की गूँज से

काँप रहा है तुम्हारा दिल !

 

आँखों के आगे अंधेरा है

उग आए हैं तुम्हारे चेहरे पर भय के चकत्ते ।

 

जनता के दिलों में बजते हुए

विजय नगाड़ों को

तुमने समझा था मात्र एक ललकार और

तान दीं उस तरफ़ अपनी बन्दूकें...

अब दसों दिशाओं से आ रही है

क्रान्ति की पुकार ।

        स्टील प्लांट
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हमें पता है
कोई भी गाछ वटवृक्ष के नीचे बच नहीं सकता ।

सुगंधित केवड़े की झाड़ियाँ
कटहल के गर्भ के तार
काजू बादाम नारियल ताड़
धान के खेतों, नहरों के पानी
रूसी कुल्पा नदी की मछलियाँ
और समुद्रों में मछुआरों के मछली मार अभियान को
तबाह करते हुए
एक इस्पाती वृक्ष स्टील प्लाण्ट आ रहा है ।

उस प्लाण्ट की छाया में आदमी भी बच नहीं पाएँगे
झुर्रियाँ झुलाए बग़ैर
शाखाएँ-पत्तियाँ निकाले बग़ैर ही
वह घातक वृक्ष हज़ारों एकड़ में फैल जाएगा ।

गरुड़ की तरह डैनों वाले
तिमिगल की तरह बुलडोजर
उस प्लाण्ट के लिए
मकानों को ढहाने और गाँवों को ख़ाली कराने के लिए
आगे बढ़ रहे हैं ।

खै़र, तुम्हारे सामने वाली झील के पत्थर पर
सफ़ेद चूने पर लौह-लाल अक्षरों में लिखा है —

"यह गाँव हमारा है, यह धरती हमारी है —
यह जगह छोड़ने की बजाय
हम यहाँ मरना पसन्द करेंगे" ।

           कवि
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जब एक डरा हुआ बादल

न्याय की आवाज का गला घोंटता है

तब खून नहीं बहता

आंसू नहीं बहते

बल्कि रोशनी बिजली में बदल जाती है

और बारिश की बूंदें तूफान बन जाती हैं।

जब एक मां अपने आंसू पोछती है

तब जेल की सलाखों से दूर

एक कवि का उठता स्वर

सुनाई देता है।

एक हाथ और दूसरा हाथ
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केरल के तंकमणी गाँव की घटनाओं पर 22.2.1987 के इलेस्ट्रेटिड वीकली में छपे वेणु मेनन के लेख के प्रति आभार सहित

दरवाज़े को लात मार कर खोला है

और घर में घुस कर

जूड़ा पकड़ कर मुझे खींचा है

मारा है । दी हैं गन्दी गालियाँ...

निर्वस्त्र किया है और क्या कहूँ !

छिपाने के लिए अब बचा ही क्या है

मै मुँह खोलूँ ?

उस का अत्याचार

शहद में डूबी मधुमक्खी की तरह

हृदय को सालता जख़्मी कर रहा है मुझे ।

अधिकार के बल से

उसके मुँह में भरी शराब की गन्ध

मेरे चेहरे की घुटन

टूटी चूड़ियों का तल्ख़ अहसास

पेट के भीतर से खींच कर

ख़ून थूकने पर भी नहीं जाता ।

अगर मैं छिपाऊँ यह सब

उसकी पाशविकता को छिपाने जैसा होगा ।

जो भी कहा जाए

यह संसार पवित्र करार दी गई भावना है ।

यह कोई सम्वेदना नहीं

ना ही मानाभिमान की चर्चा है ।

हॄदय और स्वेच्छा पर किया गया

दुराक्रमण है ।

सारी बातें कह डालने पर

और रोने से

हवा में बिखरने वाले पराग की तरह

दिल का बोझ हल्का हो जाता है

और नहीं कहने से

समस्त शरीर को जला देती है वेदना ।

देखती हूँ मनुष्यों को

पति को

बच्चों को

आस-पड़ोस में बसने वाले स्त्री-पुरुषों को

जानती हूँ सभी को

यही मेरे मानवीय सम्बन्धों का तत्त्व है ।

उस रात मेरी आँखों पर

चमगादड़ की तरह झपटी

खाकी अंधेरी जुगुप्सा को...

मनुष्य के आँसू भी नहीं धो सकते ।

शायद प्रतिकार में उबलता हुआ

रक्त ही धोएगा इसे ।

यह सावित्री का अनुभव है

ज़रूरी नहीं,

एलिअम्मा पतिहीन होने पर भी बेसहारा है

ऎसा नहीं है ।

आज यह केरल का तंकमणी गाँव

हो सकता है और

समाचार-पत्रों में अप्रकाशित

गोदावरी के आदिवासियों की

झोपड़ियों का झगड़ा हो सकता है ।

पल्लू पकड़ कर जाती हुई

हाथ को काट लेने वाली

शालिनी को देख कर

यह कहने के लिए इकट्ठे हुए हैं हम

कि नहीं करेंगे अब

किसी से भी

दुश्शासन रूपी अन्धकार को

खंडित करने की प्रार्थना...

यह मिस्समां की पुत्री शालिनी

बन चुकी है हमारे लिए अब स्त्री-साहस का प्रतीक ।

 

           मूल्य
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हमारी आकांक्षाएँ ही नहीं

कभी-कभार हमारे भय भी वक़्त होते हैं ।

द्वेष अंधेरा नहीं है

तारों भरी रात

इच्छित स्थान पर

वह प्रेम भाव से पिघल कर

फिर से जम कर

हमारा पाठ हमें ही बता सकते हैं ।

 

कर सकते हैं आकाश को विभाजित ।

 

विजय के लिए यज्ञ करने से

मानव-मूल्यों के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई

ही कसौटी है मनुष्य के लिए ।

 

युद्ध जय-पराजय में समाप्त हो जाता है

जब तक हृदय स्पंदित रहता है

लड़ाइयाँ तब तक जारी रहती हैं ।

 

आपसी विरोध के संघर्ष में

मूल्यों का क्षय होता है ।

 

पुन: पैदा होते हैं नए मूल्य...

पत्थरों से घिरे हुए प्रदेश में

नदियों के समान होते हैं मूल्य ।

 

आन्दोलन के जलप्रपात की भांति

काया प्रवेश नहीं करते

विद्युत के तेज़ की तरह

अंधेरों में तुम्हारी दृष्टि से

उद्भासित होकर

चेतना के तेल में सुलगने वाले

रास्तों की तरह होते हैं मूल्य ।

 

बातों की ओट में

छिपे होते हैं मन की तरह

कार्य में परिणित होने वाले

सृजन जैसे मूल्य ।

 

प्रभाव मात्र कसौटी के पत्थरों के अलावा

विजय के उत्साह में आयोजित

जश्न में नहीं होता ।

निरन्तर संघर्ष के सिवा

मूल्य संघर्ष के सिवा

मूल्य समाप्ति में नहीं होता है

जीवन-सत्य ।

 

वसन्त कभी अलग होकर नहीं आता
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वसन्त कभी अलग होकर नहीं आता

वसन्त कभी अलग होकर नहीं आता

ग्रीष्म से मिलकर आता है ।

झरे हुए फूलों की याद

शेष रही कोंपलों के पास

नई कोंपलें फूटती हैं

आज के पत्तों की ओट में

अदृश्य भविष्य की तरह ।

 

कोयल सुनाती है बीते हुए दुख का माधुर्य

प्रतीक्षा के क्षणों की अवधि बढ़कर स्वप्न-समय घटता है ।

 

सारा दिन गर्भ आकाश में

माखन के कौर-सा पिघलता रहता है चांद ।

यह मुझे कैसे पता चलता

यादें, चांदनी कभी अलग होकर नहीं आती

रात के साथ आती है ।

 

सपना कभी अकेला नहीं आता

व्यथाओं को सो जाना होता है ।

 

सपनों की आँत तोड़ कर

उखड़ कर गिरे सूर्य बिम्ब की तरह

जागना नहीं होता ।

 

आनन्द कभी अलग नहीं आता

पलकों की खाली जगहों में

वह कुछ भीगा-सा वज़न लिए

इधर-उधर मचलता रहता है ।

 

        सीधी बात
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लक़ीर खींच कर जब खड़े हों

मिट्टी से बचना सम्भव नहीं ।

 

नक्सलबाड़ी का तीर खींच कर जब खड़े हों

मर्यादा में रहकर बोलना सम्भव नहीं

 

आक्रोश भरे गीतों की धुन

वेदना के स्वर में सम्भव नहीं ।

 

ख़ून से रंगे हाथों की बातें

ज़ोर-ज़ोर से चीख़-चीख़ कर छाती पीटकर

कही जाती हैं ।

 

अजीब कविताओं के साथ में छपी

अपनी तस्वीर के अलावा

कविता का अर्थ कुछ नहीं होता ।

 

जैसे आसमान में चील

जंगल में भालू

या रखवाला कुत्ता

आसानी से पहचाने जाते हैं

 

जिसे पहचानना है

वैसे ही छिपाए कह दो वह बात

जिससे धड़के सब का दिल

सुगन्धों से भी जब ख़ून टपक रहा हो

छिपाया नहीं जा सकता उसे शब्दों की ओट में ।

 

ज़ख़्मों को धोने वाले हाथों पर

भीग-भीग कर छाले पड़ गए

और तीर से निशाना साधने वाले हाथ

कमान तानने वाले हाथ

जुलूस के लहराते हुए झण्डे बन गए ।

 

जीवन का बुत बनाना

काम नहीं है शिल्पकार का

उसका काम है पत्थर को जीवन देना ।

 

मत हिचको, ओ, शब्दों के जादूगर !

जो जैसा है, वैसा कह दो

ताकि वह दिल को छू ले ।

 

           औरत
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ऐ औरत !

वह तुम्हारा ही रक्त है

जो तुम्हारे स्वप्न और पुरुष की उत्कट आकांक्षाओं को

शिशु के रूप में परिवर्तित करता है ।

 

ऎ औरत !

वह भी तुम्हारा ही रक्त है

जो भूख और यातना से संतप्त शिशु में

दूध बन कर जीवन का संचार करता है ।

और

वह भी तुम्हारा ही रक्त है

जो रसोईघर में स्वेद

और खेत-खलिहानों के दानों में

मोती की तरह दमकता है ।

 

फिर भी

इस व्यवस्था में तुम मात्र एक गुलाम

एक दासी हो

जिसके चलते मनुष्य की उद्दंडता की प्राचीर के पीछे

धीरे-धीरे पसरती कालिमा

तुम्हारे व्यक्तित्व को

प्रसूति गृह में ढकेल कर

तुम्हें लुप्त करती रहती है ।

इस दुनिया में हर तरह की ख़ुशियाँ बिकाऊ हैं

लेकिन तुम तो सहज अमोल आनन्दानुभूति देती हो,

वही अन्त्तत: तुम्हें दबोच लेती है ।

वह जो तुम को

चमेली के फूल अथवा

एक सुन्दर साड़ी देकर बहलाता है,

वही शुभचिन्तक एक दिन उसके बदले में

तुम्हारा पति अर्थात मलिक बन बैठता है ।

 

वह जो एक प्यार भरी मुस्कान

अथवा मीठे बोल द्वारा

तुम पर जादू चलाता है ।

कहने को तो वह तुम्हारा प्रेमी कहलाता है

किन्तु जीवन में जो हानि होती है

वह तुम्हारी ही होती है

और जो लाभ होता है

मर्द का होता है ।

और इस तरह जीवन के रंगमंच पर

हमेशा तुम्हारे हिस्से में विषाद ही आता है ।

 

ऐ औरत !

इस व्यवस्था में इससे अधिक तुम

कुछ और नहीं हो सकतीं ।

तुम्हें क्रोध की प्रचंड नीलिम में

इस व्यवस्था को जलाना ही होगा ।

तुम्हें विद्युत-झंझा बन

अपने अधिकार के प्रचंड वेग से

कौंधना ही होगा ।

 

क्रान्ति के मार्ग पर क़दम से क़दम मिलाकर आगे बढ़ो

इस व्यवस्था की आनन्दानुभूति की मरीचिका से

मुक्त होकर

एक नई क्रान्तिकारी व्यवस्था के निर्माण के लिए

जो तुम्हारे शक्तिशाली व्यक्तित्व को ढाल सके ।

 

जब तक तुम्हारे हृदय में क्रान्ति के

रक्ताभ सूर्य का उदय नहीं होता

सत्य के दर्शन करना असम्भव है ।

 

          
(बैंजामिन मालेस की याद में) __________________

जब प्रतिगामी युग धर्म

घोंटता है वक़्त के उमड़ते बादलों का गला

तब न ख़ून बहता है

न आँसू ।

 

वज्र बन कर गिरती है बिजली

उठता है वर्षा की बूंदों से तूफ़ान...

पोंछती है माँ धरती अपने आँसू

जेल की सलाखों से बाहर आता है

कवि का सन्देश गीत बनकर ।

 

कब डरता है दुश्मन कवि से ?

जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हिं

वह कै़द कर लेता है कवि को ।

फाँसी पर चढ़ाता है

फाँसी के तख़्ते के एक ओर होती है सरकार

दूसरी ओर अमरता

कवि जीता है अपने गीतों में

और गीत जीता है जनता के हृदयों में ।

 

- वरवर राव

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...