बगैर किसी वास्तविक आशय अथवा तथ्यों की समझ के जब भी हम बात करेंगे वह हल्का ही लगेगा ! गणेश पाण्डेय की आलोचना पद्धति पर लैंगिक भेद का आरोप मढ़ते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके कथन में निहित भाव का सारांश लैंगिक न होकर आलोचना के छद्म और विकार पर उनका कहा दारूण सच है । इसके लिए 'मर्दाना' अथवा 'जनाना' आलोचना शब्द के भावों को समझना जरूरी है ।
"मैंने जिसकी पूंछ उठाई
उसको मादा पाया"
मैं यहां धूमिल की पंक्ति को इसलिए रख रहा हूं कि धूमिल के इस काव्य चेतना में भी क्या उन्हें यही लैंगिक भेद दिख रहा है या वह सच नहीं दिख रहा है जो धूमिल या कि गणेश पाण्डेय दिखा रहे हैं । तब साथी आपके सृजनशीलता पर मुझे संदेह है ।