Thursday, November 26, 2020

वरवर राव

#क्रांतिकारी कवि #वरवर राव को #रिहा किया जाए । उनकी #नजरबंदी अन्याय है

भारत में यूरोपीय औपनिवेशिक दासता की जड़ें  1498 से पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा के भारत आगमन के साथ ही पड़नी शुरू हो गई । जो आगे चलकर डच ब्रिटिश कंपनियों के माध्यम औपनिवेशिक दासता अर्थात् दोहरी सत्ता के किंवदंतियों से सैकड़ों वर्ष तक जकड़ा रहा ।  यह वह समय था जिसमें तात्कालीन रियासतों में सत्ता छीन जाने का भय चरम पर था पर कहीं-कहीं और किसी-किसी   
रियासतों से इस पर विरोध का बिगुल भी फूटने लगा था । कहना न होगा कि ठीक इसके परस्पर ही जीवन मूल्यों और आजादी के प्रति ललक रखते आम जन में यह विरोध का भाव भी आकार लिया तथा उनके अनथक संघर्ष व प्रयत्नो से भारत स्वाधीन हुआ । तब से स्वतंत्र भारत में संघर्ष की इबारत का एक बड़ा इतिहास इसके पटल में अंकित है । आजाद भारत का स्वप्न जिन आंखों ने दीवानगी की हद तक 'अपना भारत' के रूप देखना स्वीकार किया उनके लिए चंद ही दिनों में सत्ता के दुरभिसंधियों से मोहभंग की स्थिति भी बनता ही ग‌या । आजाद भारत के लिए यह दुख की बात है कि महज 10 - 15 वर्ष में ही वह मोहभंग के त्रासद दौर से गुज़र अब तलक उबर नहीं पाया । आजाद भारत में मोहभंग का समय साठ के दशक का है । बताना न होगा इस कमोबेश मोह भंग ने जनता को आक्रमक होने बाध्य किया । जो नक्सलबाड़ी आंदोलन के उभार में शिद्दत से महसूस किए जा सकते हैं । इस आंदोलन का प्रभाव न सिर्फ कला के अन्य माध्यमों में दिखाई देता है बल्कि कविता में कहीं उससे और भी अधिक तथा प्रचुर मात्रा में दिखाई देता है । तेलगु कवि वरवर राव आजादी के उन्हीं दीवाने मतवालों में हैं । जो हर वक्त अपने जीवन को दबे , कुचले , शोषित , उत्पीड़ित जनता के संघर्ष में होम कर देते रहे हैं। वरवर राव मूल तेलगु कवि हैं पर भारतीय भाषाओं के प्रत्येक भाषा में सबसे अधिक स्वीकारे जाने वाले कवि हैं । आज वे 80 वर्ष की आयु को पार कर ग‌ए हैं और उस क्रूर तथा बर्बर तंत्र के अधीन जेल की सलाखों में हैं ; जिसके निर्माण में कभी सुभाष , भगत , आजाद , विस्मिल , खुदीराम , गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी । खैर ! वरवर राव कवि हैं , कविताएं लिखते हैं , और इस निस्पृह व्यवस्था प्रणाली से खासे नाराज हैं , तो स्वभाविक है विरोध की ही कविताएं लिखेंगे हैं । पर क्या यह सत्ता ब्रिटानी हूकूमत और इशारे पर चलने वाली सत्ता है ? जो असहमति बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकती ! कि संवैधानिक मूल्यों को ताक में रखकर आदमी के मूल अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी को छीन लेना चाहती है !! कि राज्य अथवा गणतंत्र को एक छत्र औपनिवेशिक राज्य में पुनर्स्थापित करने की मंशा को अंतिम रूप देने की स्थिति में है !!! मैं फिर कह रहा हूं वरवर राव कवि हैं , कविता लिखते हैं । कहना न होगा कि ताकत और तंत्र सत्ता के अधीन मैनुपुलेट होते हैं फिर सत्ता इतनी डरी क्यों है इस कवि की कविता से । यह सत्ता कोढ़ और कायर सत्ता है जो संस्कृति कर्मियों से डरी हुई है । वरवर राव वो कवि हैं जो आजादी के अर्थ को जीवन्त बनाए रखने के लिए संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को लेकर हमेशा ही मुखर रहे हैं व विचारधारा को सर्वोपरि मानते हैं । श्रम साध्य लोगों के संघर्ष को अपना मान अपने जीवन की आहुति दी है । वे अपनी कविताओं में नव‌उदारवाद , बाजारवादी , वैश्वीकरण औद्यौगिक विसंगतियों से उपजने वाली भ्रामक विकास के चपेट में आने से प्रकृति के विनाश के प्रति आगाह करते हुए उसका तेज़ विरोध किया है । यहां साभार कविता कोश के मैं उस विचार और चेतना संपन्न कवि की कविता को उनके अविलंब रिहाई की मांग करते हुए शेयर कर रहा हूं । ताकि वरवर राव के कवि व्यक्तित्व और लेखन के बीच के अर्थवान चरित्र को समझा जा सके ।

         चिन्ता
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मैंने बम नहीं बाँटा था

न ही विचार

तुमने ही रौंदा था

चींटियों के बिल को

नाल जड़े जूतों से ।

 

रौंदी गई धरती से

तब फूटी थी प्रतिहिंसा की धारा

 

मधुमक्खियों के छत्तों पर

तुमने मारी थी लाठी

अब अपना पीछा करती मधुमक्खियों की गूँज से

काँप रहा है तुम्हारा दिल !

 

आँखों के आगे अंधेरा है

उग आए हैं तुम्हारे चेहरे पर भय के चकत्ते ।

 

जनता के दिलों में बजते हुए

विजय नगाड़ों को

तुमने समझा था मात्र एक ललकार और

तान दीं उस तरफ़ अपनी बन्दूकें...

अब दसों दिशाओं से आ रही है

क्रान्ति की पुकार ।

        स्टील प्लांट
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हमें पता है
कोई भी गाछ वटवृक्ष के नीचे बच नहीं सकता ।

सुगंधित केवड़े की झाड़ियाँ
कटहल के गर्भ के तार
काजू बादाम नारियल ताड़
धान के खेतों, नहरों के पानी
रूसी कुल्पा नदी की मछलियाँ
और समुद्रों में मछुआरों के मछली मार अभियान को
तबाह करते हुए
एक इस्पाती वृक्ष स्टील प्लाण्ट आ रहा है ।

उस प्लाण्ट की छाया में आदमी भी बच नहीं पाएँगे
झुर्रियाँ झुलाए बग़ैर
शाखाएँ-पत्तियाँ निकाले बग़ैर ही
वह घातक वृक्ष हज़ारों एकड़ में फैल जाएगा ।

गरुड़ की तरह डैनों वाले
तिमिगल की तरह बुलडोजर
उस प्लाण्ट के लिए
मकानों को ढहाने और गाँवों को ख़ाली कराने के लिए
आगे बढ़ रहे हैं ।

खै़र, तुम्हारे सामने वाली झील के पत्थर पर
सफ़ेद चूने पर लौह-लाल अक्षरों में लिखा है —

"यह गाँव हमारा है, यह धरती हमारी है —
यह जगह छोड़ने की बजाय
हम यहाँ मरना पसन्द करेंगे" ।

           कवि
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जब एक डरा हुआ बादल

न्याय की आवाज का गला घोंटता है

तब खून नहीं बहता

आंसू नहीं बहते

बल्कि रोशनी बिजली में बदल जाती है

और बारिश की बूंदें तूफान बन जाती हैं।

जब एक मां अपने आंसू पोछती है

तब जेल की सलाखों से दूर

एक कवि का उठता स्वर

सुनाई देता है।

एक हाथ और दूसरा हाथ
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केरल के तंकमणी गाँव की घटनाओं पर 22.2.1987 के इलेस्ट्रेटिड वीकली में छपे वेणु मेनन के लेख के प्रति आभार सहित

दरवाज़े को लात मार कर खोला है

और घर में घुस कर

जूड़ा पकड़ कर मुझे खींचा है

मारा है । दी हैं गन्दी गालियाँ...

निर्वस्त्र किया है और क्या कहूँ !

छिपाने के लिए अब बचा ही क्या है

मै मुँह खोलूँ ?

उस का अत्याचार

शहद में डूबी मधुमक्खी की तरह

हृदय को सालता जख़्मी कर रहा है मुझे ।

अधिकार के बल से

उसके मुँह में भरी शराब की गन्ध

मेरे चेहरे की घुटन

टूटी चूड़ियों का तल्ख़ अहसास

पेट के भीतर से खींच कर

ख़ून थूकने पर भी नहीं जाता ।

अगर मैं छिपाऊँ यह सब

उसकी पाशविकता को छिपाने जैसा होगा ।

जो भी कहा जाए

यह संसार पवित्र करार दी गई भावना है ।

यह कोई सम्वेदना नहीं

ना ही मानाभिमान की चर्चा है ।

हॄदय और स्वेच्छा पर किया गया

दुराक्रमण है ।

सारी बातें कह डालने पर

और रोने से

हवा में बिखरने वाले पराग की तरह

दिल का बोझ हल्का हो जाता है

और नहीं कहने से

समस्त शरीर को जला देती है वेदना ।

देखती हूँ मनुष्यों को

पति को

बच्चों को

आस-पड़ोस में बसने वाले स्त्री-पुरुषों को

जानती हूँ सभी को

यही मेरे मानवीय सम्बन्धों का तत्त्व है ।

उस रात मेरी आँखों पर

चमगादड़ की तरह झपटी

खाकी अंधेरी जुगुप्सा को...

मनुष्य के आँसू भी नहीं धो सकते ।

शायद प्रतिकार में उबलता हुआ

रक्त ही धोएगा इसे ।

यह सावित्री का अनुभव है

ज़रूरी नहीं,

एलिअम्मा पतिहीन होने पर भी बेसहारा है

ऎसा नहीं है ।

आज यह केरल का तंकमणी गाँव

हो सकता है और

समाचार-पत्रों में अप्रकाशित

गोदावरी के आदिवासियों की

झोपड़ियों का झगड़ा हो सकता है ।

पल्लू पकड़ कर जाती हुई

हाथ को काट लेने वाली

शालिनी को देख कर

यह कहने के लिए इकट्ठे हुए हैं हम

कि नहीं करेंगे अब

किसी से भी

दुश्शासन रूपी अन्धकार को

खंडित करने की प्रार्थना...

यह मिस्समां की पुत्री शालिनी

बन चुकी है हमारे लिए अब स्त्री-साहस का प्रतीक ।

 

           मूल्य
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हमारी आकांक्षाएँ ही नहीं

कभी-कभार हमारे भय भी वक़्त होते हैं ।

द्वेष अंधेरा नहीं है

तारों भरी रात

इच्छित स्थान पर

वह प्रेम भाव से पिघल कर

फिर से जम कर

हमारा पाठ हमें ही बता सकते हैं ।

 

कर सकते हैं आकाश को विभाजित ।

 

विजय के लिए यज्ञ करने से

मानव-मूल्यों के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई

ही कसौटी है मनुष्य के लिए ।

 

युद्ध जय-पराजय में समाप्त हो जाता है

जब तक हृदय स्पंदित रहता है

लड़ाइयाँ तब तक जारी रहती हैं ।

 

आपसी विरोध के संघर्ष में

मूल्यों का क्षय होता है ।

 

पुन: पैदा होते हैं नए मूल्य...

पत्थरों से घिरे हुए प्रदेश में

नदियों के समान होते हैं मूल्य ।

 

आन्दोलन के जलप्रपात की भांति

काया प्रवेश नहीं करते

विद्युत के तेज़ की तरह

अंधेरों में तुम्हारी दृष्टि से

उद्भासित होकर

चेतना के तेल में सुलगने वाले

रास्तों की तरह होते हैं मूल्य ।

 

बातों की ओट में

छिपे होते हैं मन की तरह

कार्य में परिणित होने वाले

सृजन जैसे मूल्य ।

 

प्रभाव मात्र कसौटी के पत्थरों के अलावा

विजय के उत्साह में आयोजित

जश्न में नहीं होता ।

निरन्तर संघर्ष के सिवा

मूल्य संघर्ष के सिवा

मूल्य समाप्ति में नहीं होता है

जीवन-सत्य ।

 

वसन्त कभी अलग होकर नहीं आता
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वसन्त कभी अलग होकर नहीं आता

वसन्त कभी अलग होकर नहीं आता

ग्रीष्म से मिलकर आता है ।

झरे हुए फूलों की याद

शेष रही कोंपलों के पास

नई कोंपलें फूटती हैं

आज के पत्तों की ओट में

अदृश्य भविष्य की तरह ।

 

कोयल सुनाती है बीते हुए दुख का माधुर्य

प्रतीक्षा के क्षणों की अवधि बढ़कर स्वप्न-समय घटता है ।

 

सारा दिन गर्भ आकाश में

माखन के कौर-सा पिघलता रहता है चांद ।

यह मुझे कैसे पता चलता

यादें, चांदनी कभी अलग होकर नहीं आती

रात के साथ आती है ।

 

सपना कभी अकेला नहीं आता

व्यथाओं को सो जाना होता है ।

 

सपनों की आँत तोड़ कर

उखड़ कर गिरे सूर्य बिम्ब की तरह

जागना नहीं होता ।

 

आनन्द कभी अलग नहीं आता

पलकों की खाली जगहों में

वह कुछ भीगा-सा वज़न लिए

इधर-उधर मचलता रहता है ।

 

        सीधी बात
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लक़ीर खींच कर जब खड़े हों

मिट्टी से बचना सम्भव नहीं ।

 

नक्सलबाड़ी का तीर खींच कर जब खड़े हों

मर्यादा में रहकर बोलना सम्भव नहीं

 

आक्रोश भरे गीतों की धुन

वेदना के स्वर में सम्भव नहीं ।

 

ख़ून से रंगे हाथों की बातें

ज़ोर-ज़ोर से चीख़-चीख़ कर छाती पीटकर

कही जाती हैं ।

 

अजीब कविताओं के साथ में छपी

अपनी तस्वीर के अलावा

कविता का अर्थ कुछ नहीं होता ।

 

जैसे आसमान में चील

जंगल में भालू

या रखवाला कुत्ता

आसानी से पहचाने जाते हैं

 

जिसे पहचानना है

वैसे ही छिपाए कह दो वह बात

जिससे धड़के सब का दिल

सुगन्धों से भी जब ख़ून टपक रहा हो

छिपाया नहीं जा सकता उसे शब्दों की ओट में ।

 

ज़ख़्मों को धोने वाले हाथों पर

भीग-भीग कर छाले पड़ गए

और तीर से निशाना साधने वाले हाथ

कमान तानने वाले हाथ

जुलूस के लहराते हुए झण्डे बन गए ।

 

जीवन का बुत बनाना

काम नहीं है शिल्पकार का

उसका काम है पत्थर को जीवन देना ।

 

मत हिचको, ओ, शब्दों के जादूगर !

जो जैसा है, वैसा कह दो

ताकि वह दिल को छू ले ।

 

           औरत
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ऐ औरत !

वह तुम्हारा ही रक्त है

जो तुम्हारे स्वप्न और पुरुष की उत्कट आकांक्षाओं को

शिशु के रूप में परिवर्तित करता है ।

 

ऎ औरत !

वह भी तुम्हारा ही रक्त है

जो भूख और यातना से संतप्त शिशु में

दूध बन कर जीवन का संचार करता है ।

और

वह भी तुम्हारा ही रक्त है

जो रसोईघर में स्वेद

और खेत-खलिहानों के दानों में

मोती की तरह दमकता है ।

 

फिर भी

इस व्यवस्था में तुम मात्र एक गुलाम

एक दासी हो

जिसके चलते मनुष्य की उद्दंडता की प्राचीर के पीछे

धीरे-धीरे पसरती कालिमा

तुम्हारे व्यक्तित्व को

प्रसूति गृह में ढकेल कर

तुम्हें लुप्त करती रहती है ।

इस दुनिया में हर तरह की ख़ुशियाँ बिकाऊ हैं

लेकिन तुम तो सहज अमोल आनन्दानुभूति देती हो,

वही अन्त्तत: तुम्हें दबोच लेती है ।

वह जो तुम को

चमेली के फूल अथवा

एक सुन्दर साड़ी देकर बहलाता है,

वही शुभचिन्तक एक दिन उसके बदले में

तुम्हारा पति अर्थात मलिक बन बैठता है ।

 

वह जो एक प्यार भरी मुस्कान

अथवा मीठे बोल द्वारा

तुम पर जादू चलाता है ।

कहने को तो वह तुम्हारा प्रेमी कहलाता है

किन्तु जीवन में जो हानि होती है

वह तुम्हारी ही होती है

और जो लाभ होता है

मर्द का होता है ।

और इस तरह जीवन के रंगमंच पर

हमेशा तुम्हारे हिस्से में विषाद ही आता है ।

 

ऐ औरत !

इस व्यवस्था में इससे अधिक तुम

कुछ और नहीं हो सकतीं ।

तुम्हें क्रोध की प्रचंड नीलिम में

इस व्यवस्था को जलाना ही होगा ।

तुम्हें विद्युत-झंझा बन

अपने अधिकार के प्रचंड वेग से

कौंधना ही होगा ।

 

क्रान्ति के मार्ग पर क़दम से क़दम मिलाकर आगे बढ़ो

इस व्यवस्था की आनन्दानुभूति की मरीचिका से

मुक्त होकर

एक नई क्रान्तिकारी व्यवस्था के निर्माण के लिए

जो तुम्हारे शक्तिशाली व्यक्तित्व को ढाल सके ।

 

जब तक तुम्हारे हृदय में क्रान्ति के

रक्ताभ सूर्य का उदय नहीं होता

सत्य के दर्शन करना असम्भव है ।

 

          
(बैंजामिन मालेस की याद में) __________________

जब प्रतिगामी युग धर्म

घोंटता है वक़्त के उमड़ते बादलों का गला

तब न ख़ून बहता है

न आँसू ।

 

वज्र बन कर गिरती है बिजली

उठता है वर्षा की बूंदों से तूफ़ान...

पोंछती है माँ धरती अपने आँसू

जेल की सलाखों से बाहर आता है

कवि का सन्देश गीत बनकर ।

 

कब डरता है दुश्मन कवि से ?

जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हिं

वह कै़द कर लेता है कवि को ।

फाँसी पर चढ़ाता है

फाँसी के तख़्ते के एक ओर होती है सरकार

दूसरी ओर अमरता

कवि जीता है अपने गीतों में

और गीत जीता है जनता के हृदयों में ।

 

- वरवर राव

Tuesday, November 24, 2020

कृृष्ण कल्पित

भाषाई अस्मिता के सवाल हो कि उसके अतिक्रमण का , कृष्ण कल्पित चूके नहीं । वे व्यवहारिक अतिक्रमण करने में भी कमतर नहीं दिखे । है तो है और नहीं तो नहीं , यह माद्दा उनमें है । कथनी और करनी में भेद बिल्कुल भी नहीं दिखता । यह दीगर है कि कृष्ण कल्पित कभी-कभी अनचाहे विवादों को जन्मते रहे , पर सैद्धांतिकी में उन्हें कमतर कर नहीं देखा जा सकता । हिंदी साहित्य में दिल्ली दरबार हमेशा से ही अपने मठाधीशी ताकत और शौर्य के लिए जाना जाता रहा । किसी ने मुंह बाए करने की कोशिश अथवा हिमाकत नहीं ही करी ; बल्कि उनका पिठ्ठू बनने में ही भला माना । पर इस विछिन्न कड़ी को विराम लगाने में गणेश पाण्डेय , उमाशंकर सिंह परमार, अजित प्रियदर्शी , कर्ण सिंह चौहान , धनंजय वर्मा , नीलकांत , अनिल पांडेय , लहक संपादक निर्भय देव्यांश तथा कृष्ण कल्पित , जैसे साथियों ने उल्लेखनीय भागीदारी सुनिश्चित कर जता दिया कि हिंदी को दिल्ली आधारित दोगलाई की जरूरत नहीं है । यहां प्रस्तुत कृष्ण कल्पित की कविता इस विचार का ही एक बानगी है , एक समग्र संस्करण है । कृष्ण कल्पित अपनी इस कविता में  दिल्ली स्थित साहित्य मंडी को लेकर बेहद तीखे तेवर के साथ मुखर विद्रोह को रचने में कामयाब हुए हैं । वे दिल्ली स्थित कारखानों के घटिया उत्पाद , मिलावट , फिर मुनाफाखोरी को लेकर जितना सख्त हैं उतना ही स्त्री को उत्पाद के रुप में बदलने की कला कौशल में निपुण लोगों के प्रति अतिरिक्त सचेत भी हैं । 

'सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूठ की कोई इंतहा नहीं'

नूर ने ठीक ही कहा । 

यह एक तरह के पगलेटों का दौर है जो दिल्ली में मजमा जमाए बैठे हैं और तय कर रहे हैं नाम,  ईनाम , पुरस्कार और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ।

Saturday, November 21, 2020

शमशेर की कविता

दिन ब दिन विषाक्त होता जा रहा है समय , जैसे दस्तूर है यह । रोज उगला जाने वाला जहर ही जैसे नीयती है हमारी । मनुष्य अपने स्वभाविक वृत्तियों को तिलांजलि किसके बहकावे में दे रहा है आखिर ? तहज़ीब भी तो कोई चीज़ है हमारे होने की ; हमारे समय के मान्य कवि शमशेर बहादुर सिंह की कविता में यही आग्रह है । इन्हीं विडंबनाओं के प्रति तार्किक नजरिया है । देश में जो कुछ घट बढ़ रहा है वह कम चिंताजनक नहीं है कि खुले में शौच करने के अपराध में तथाकथित देवदूत सजा के तौर पर हत्या को जायज़ ठहराएं कि मुस्लिम शिक्षक के संस्कृति ज्ञान ,भाषा विज्ञान पर संदेह जताएं और उसका बहिष्कार करें । मैं इसे अपने समय के सबसे शर्मनाक दौर के रूप में देखता हूं । अपने इस प्यारे देश की तहज़ीब में काला इतिहास के रूप में देख देख रहा हूं । जो शमशेर बहादुर सिंह बहुत पहले ही महसूस किए

Monday, November 9, 2020

निर्भय देव्यांश

यह कहना कत‌ई असंगत नहीं होगा कि 'लहक' संपादक के तौर पर निर्भय देव्यांश ने हिंदी  साहित्य के मठ परम्परा पर बड़ी चोट की है । तथाकथित साहित्यिक सत्ताएं , संस्थाएं उनके वार से तिलमिला गए  और किन्हीं मायनों में भयभीत भी हुए । वे निरंतर हिंदी के अनेकों अनछुए पहलुओं पर अपनी बेबाकी के लिए स्पष्ट रूप से पहचाने ग‌ए । अपने संपादन में उन्होंने हिंदी जगत को 'दिल्ली दरबार' हिंदी कविता में आई यौनिकता , और छायावाद के पुनर्पाठ से संबंधित क‌ई महत्त्वपूर्ण और जरूरी अंक दिए हैं जो कि अविस्मरणीय है । इस विद्रोही तेवर के साथी का आज जन्मदिन है उन्हें मेरी ढेरों बधाई व शुभकामनाएं साथी ही उनकी एक बहुत ही महत्वपूर्ण कविता और मेरी एक पुरानी टिप्पणी---

फकीराना और सूफियाना शायरी का ये कवि पता नहीं कब फकीर हो ग‌ए । पर बेसिकली हैं तो निर्भय ही । बिना लाग-लपेट के सीधे सीधे और खरी खरी कहना जैसे इनका क्रिया व्यवहार और नीयति । लहक संपादक के तौर पर कि फकीर के रूप में निर्भय लगातार सवाली और मुद्द‌ई ही होते दिख रहे हैं । नब्बे के दशक के इस निडर कवि  की चिंता में बस डर है तो रोटी और उसे डकारे जाने वाले निस्पृह हरामियों के लूट तथा उन मजलूमों , वंचितों के अधिकारो की जिन्हें निरंतर अपदस्थ किया गया और किया जा रहा है । रोटी और राजनीतिक चेतना का सवाल निश्चय ही वैश्विक सवाल था और समूचे राष्ट्र इससे दो दो हाथ कर भी रहे थे।  भारत के परिप्रेक्ष्य में कहें तो छायावाद के चरम रोमानियत और असंपृक्त जीवन बोध के इतर रोटी और राजनीतिक चेतना के सवाल को जहां निराला,नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल , त्रिलोचन , शमशेर ने बड़ा बुनियादी और जरूरी बनाया वही बाद की पीढ़ी में धूमिल , सर्वेश्वरदयाल सक्सेना , रघुवीर सहाय , गोरख पांडेय सरीखे कवियों ने इसे केन्द्रीयता प्रदान की। वर्चुवल यानी आभासी सच और रीयल अर्थात वास्तविक सच के भेद की पहचान कराती निर्भय देव्यांश की इस कविता में जितना बहिर्गमन है उतना ही अन्तर्गमन है ।  हिंदी कविता में साठ का दशक तीव्र प्रतिरोध का रहा । भाषाई आक्रामकता चीज़ों को लांघ रही थी । संयम और धैर्य बेकाबू हो चला था । नेस्तनाबूत करने लालायित दिख रहा था । हाहाकार और कोहराम मचा था । बुद्धि और विवेक सम्पन्नता के अभाव में  वह निरीह जनता से भी निरीह ही ; हो चला । यानी ; एक भयंकर और आक्रांत के दौर में भी हमें कुछ भी हासिल न हुआ और बेसिक सवाल, सवाल ही रह गया । ऐसे में निर्भय की यह कविता उन सीमाओं के अतिक्रमण की कविता बनती दिख रही है  । एक सटीक विवेक और बुद्धि कौशल का परिचय देती दिख रही है । निर्भय इस कविता में  बेहद  संयमित और सजग रुप में प्रस्तुत होते हैं । वे रोटी की बुनियादी जरूरतों को एक तरफ़ रखते हैं तो दूसरी तरफ़ वाल्टेयर , रुसो जैसे दार्शनिक और राजनीति में भूचाल पैदा करने वाले तत्तकालीन दर्शन विज्ञान को ।
वे कहते हैं ---

दम है तो जनता को 
दर्शन खिला कर रखो
तो हम कहेंगे
तुम्हारा लोकतंत्र जिंदा है

वस्तुत: भूख की पहली जरूरत रोटी है । न दर्शन , न नारे , न वादे । फ्रांस‌ और भारत की भाव - भूमि इन मायनों  में एक- सी ही रही । दोनों ने अपने राजनीतिक इतिहास में औपनिवेशिकता और संघर्ष का एक बड़ा दौर देखा तब कहीं वह कुछ हासिल कर सका । पर जिस गति से राजनीति ने जनता का जैसा माखौल उड़ाया उससे मोहभंग ज़्यादा आसान और स्वभाविक हुआ । फिर भी निर्भय ने यहां उग्र शोर - शराबे  , अथवा गरियाने - कोसने से कहीं ज़्यादा कहने , सुनने और सुनाने  शालीन तरीके पर यकीन किए । वे मेक्रोन  के प्रतिकात्मक दृश्य बिम्ब के मार्फत के देश के 10लाखी कोट और उसमें समा‌ए खोट को उजागर कर बताते हैं कि इससे देश अथवा जनता का कुछ भी भला नहीं होने वाला । वे कहते हैं --   

मेक्रोन कोट पहनो 
मगर उसके अंदर की जेब में
रोटी रखो, पानी की बोतल 
टॉफी भी 
तुम्हारे देश के तानाशाह नेपोलियन को 
टॉफी बहुत पसंद थी

आत्म प्रचार और  प्रवंचनाओ से लैस वर्तमान राजनीति अर्थात् तंत्र में लोक की संभावना क्षींण होती जा रही है। वह न्यूनतम के सूचकांक पर है । राजतंत्र की पैरोडी पर है । गाहे-बगाहे अभिशप्त लोक अनचाहा ही उसे स्वीकार रहा है । उनके उड़ाए माखौल और अपनी बेबसी पर खुलकर न रो सका न बोल सका । असहमति विद्रोह नहीं होता । करार दिया जाता है । एक्सट्रीम नेशनलिज्म के हाथों खत्म कर दी जाती है । निर्भय बखूबी यह देख, समझ रहे हैं इसीलिए ही वे कड़ा प्रतिरोध कर कहते हैं 

महल में लोकतंत्र रखने से काम नहीं चलेगा मेक्रोन 
यह सड़क की चीज है 
देखो कि सड़क के लोग कैसे हैं 
कैसे जी रहे हैं 
क्या खा रहे हैं 

निर्भय की यह कविता जहां असहमति की ऊपज है वहीं भय और आशंका के बीच व्यापक वैश्विक जद्दोजहद है । जो दारुण मानव मूल्य व सभ्यता के प्रति हमें सचेत भी करती है 

दुनिया के हर कोने में सातों दिन काम पर डटे हैं 
शनिवार को
फ्रांस जल रहा था 
रविवार को कोई और जलेगा

आभार , निर्भय देव्यांश

Tuesday, November 3, 2020

भास्कर चौधरी

भास्कर की चिंताए वाज़िब है । दिशाएं वाज़िब है । 'विकास'  जिसे कि साबित करने की होड़ - सी मची है । वस्तुत: वह विकास से कहीं ज्यादा हमारी विनाश गाथा की ईबारतें हैं । जो लिखी जा चुकी है अथवा लिखा जाना शेष है । यहां इस कविता में भास्कर लगभग यही कहने का यत्न कर रहे हैं ।

इन दिनों
कम दिखाई पड़ रहे हैं सांप
छछुंदर नेवले और खरगोश
बिल्लियां भी गिनती की ही बचीं हैं
घरों में नज़र आ जाती हैं कभी कभार
आंगन से जा चुकी हैं कबका
गौरैया‌ पंडुकी और मैना

भास्कर की इस कविता की उक्त इस पंक्ति को काव्य तर्क के लिहाज से इसलिए देखा जाना चाहिए कि चीज़ें गुम नहीं हुई है ; पर है प्रक्रियाधीन ।
एक सजग और जागरूक कवि सतत् बचाव की मुद्रा में खोने के एवज हस्तांतरित चीज़ों को पाने की प्राथमिकी से भी लगभग बाहर ही रहता है । वह उस हस्तांतरण का हिमायती इसलिए नहीं रह जाता कि वह स्वप्नदृष्टा है । वह दमक - चमक वाली आयतित दुनिया के पीछे के भयावह सत्य का रहस्योद्घाटक भी है । वह 'इन दिनो के बहाने' जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में का प्रमुख साक्षी है । भास्कर अपने इस कविता में वही रख रहे हैं जो उन्हें साफ़ साफ़ दिखलाई पड़ रहा है ।
 भास्कर की यह आपत्ति निश्चय ही मेरा भी आपत्ति है । मेरे गांव -शहर में बढ़ रहे मीलों-मील 80-80 फीट तक की चौड़ी सड़कें किलो-किलोमीटर तक बनने वाले फ्लाई ओव्हर, चमक- दमक से चुंधियाई हुई पाॅश कालोनियाॅ , बड़े क्लब हाऊसेस कि गेस्ट हाऊस या कि बहुमंजली दिखावटी भवनों , स्वीमिंग पुल्स में मुझे भी विकास ठहरा प्रतीत होता है । खेती के ऊपजाऊ जमीनों का औद्यौगिक विकास के नाम उद्योगपतियों के हाथों कौड़ी के दाम बेचकर उन जमीनों को बंजर बनाए जाने की अमानुषिक कृत्यों के बीच मुझे विकास कहीं नज़र , नहीं ही आ रहा है । इसके पीछे के भयावह सत्य में मुझे भी कृत्रिमता और साजिश साफ दिखाई दे रहा है । इस विकास के एवज सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग का नमूदार प्रस्तुति और ताज़ातरीन उदाहरण बस्तर तथा उन तमाम आदिवासी इलाकों की गाथा है । जो बदस्तूर बनती ही जा रही है और जारी है , जहां जंगल के जंगल, गांव के गांव जलाए जा रहे हैं । इस उपक्रम में आम आदिवासी सरकारी मशीनरी और नक्सलियों के बीच भेंट भी चढ़ रहे हैं उनके लिए यह नीयति एक तरफ कुंआ और दूसरी ओर खाई की स्थिति विनिर्मित करती है । विकास की इस तथाकथित अवधारणा में अबूझमाड़ तो क्या ? अच्छा -भला साफ और सुरक्षित जगहों पर भी मूक तमाशा हमारी नीयति होने लगी है । प्रकृति बारूद की ढेर से लेकर कांक्रीट युक्त 'जंगल' में तब्दील होता जा रहा ।  गांव का शहर में घटने बढ़ने का यह मंजर बेहद पीड़ादायी है । कई-कई बार तो मुझे ऐसा लगता है विकास का पर्याय यदि यही है -- तो मैं विकास विरोधी हूं , सत्ता विरोधी हूं और सच कहूं तो देशद्रोही ही कहा जाए तो मैं शर्म नहीं ही करूंगा और ना ही कोई सफाई ही दूंगा । क्या है आखिर हमारा यह विकास का पैमाना ? कि गरीब मजूर और हमारा मध्यवर्ग ही हाशिए की वस्तु बने कि वह अपनी जिजीविषा में यह सब बर्दाश्त करे  । अतः कहना न होगा भास्कर की यह कविता इसी विकास का प्रतिकार तथा सत्ता का विद्रोह है । यह समय रहते इस अवचेतन  से बाहर निकाल लाने की एक बड़ी और सार्थक कोशिश है । पूंजी आज अपना नंगा नाच, नाच रहा है ,  डोल रहा है , थिरक रहा है अपनी उन्मता से अभद्र अंदाज में । बताना न होगा कि भास्कर की यह कविता हमारे समय के इसी भयावह और बदसूरती का आख्यानपाठ प्रस्तुत कर पाने में सफल दिख रही है ।

इन दिनो
मारे जा रहे हैं आदिवासी
कभी नक्सलियों के नाम पर
कभी पुलिस के लिए मुखबिरी के नाम पर ।

भास्कर छ ग से संबद्ध और अंतिम दशक के महत्वपूर्णं  कवियों में कमलेश्वर साहू  , बसंत त्रिपाठी ,  रजत कृष्ण , किशनलाल , कुमेश्वर कुमार ,  सतीश कुमार सिंह , संजय शाम , पूनम विश्वकर्मा , युगल गजेन्द्र , विश्वासी एक्का , निर्मल आनंद , सूरज प्रकाश आदि कवियों के साथी कवि हैं । वे अपने समय के तमाम चुनौतियों से लगातार मुठभेड़ कर , इस विचार से लबरेज़ हैं ।

इन दिनों
कम दिखाई पड़ रहे हैं सांप
छछुंदर नेवले और खरगोश
बिल्लियां भी गिनती की ही बचीं हैं
घरों में नज़र आ जाती हैं कभी कभार
आंगन से जा चुकी हैं कबका
गौरैया‌ पंडुकी और मैना

इन दिनों 
जब कांक्रीट के जंगल तेजी से बढ़ रहे हैं
और शहर का हो रहा है विस्तार
सुनाई पड़ने लगी हैं
जंगल से बाहर भी
जंगल में चल रही धांए धांए
दूर तक पक्की सड़कें भी थरथराने लगती हैं
गोलियों की गूंज और आर डी एक्स के धमाकों से
अखबारों के मुखपृष्ठ लाल दिखाई देते हैं 

इन दिनों
मारे जा रहे हैं आदिवासी
कभी नक्सलियों के नाम पर
कभी पुलिस के लिए मुखबिरी के नाम पर

इन दिनों
छीज रहें हैं धान के खेत
छत्तीसगढ़ का धान का कटोरा लगता है जैसे
रह गया है चम्मच के आकार का
गायब हो चुके हैं
बच्चों के खेल के मैदान
उनकी जगह खड़ी हैं
बहुमंजिली इमारतें हवाई हस्पताल शापिंग माल और स्टेडियम
जहां सिर्फ आई पी एल या 
क्रिकेट के नामी गिरामी खिलाड़ी खेल सकते हैं
जो अकेले ही दसों धान के खेतों का पानी
एक दिन में पी जाते हैं

इन दिनों
जब देश तरक्की की राह पर है
तेजी से घट रहे हैं - 
जंगल 
आदिवासी और 
धान के खेत !!

भास्कर चौधुरी

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...