'ग़ालिब' बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे "
चचा ग़ालिब के इस शेर का उद्धरण मैं इसलिए ही दे पा रहा हूँ कि इतनी बेहतरीन भाव ,संवेग , कला , सौंदर्य दृष्टि , जीवन बोध जिनकी कविताओं में हो , वह कवि आखिर परिदृश्य पर उस तरह से क्यों नहीं देखा जा सका , जिस तरह से समकालीन साथी देखे जा सके हैं ? तो इसका एक बड़ा कारण एक तो यह है कि कि सुरेश शर्मा की कविता में अधिक मानवीय तटस्थता है । जीवन को अधिक व्यवहारिक रूप में देखने का तटस्थ नजरिया है । तथा दूसरा बड़ा कारण हिंदी का दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति भी है कि हिंदी समाज में मान का व्यक्ति पूजन नजरिया , व्यक्ति केन्द्रित और ईर्द-गिर्द का है । जिसका कि ड्रा बैक इस रूप में सामने आता है । एक संपन्न और समृद्ध कला अपने कलावादी मानकों से अधिक ससंपन्न, परिष्कृत,और समृध्द तो दिखता है परन्तु वह मुकाबले अपाहिज और विपन्न इसलिए है कि पक्ष में स्पष्टता का अभाव प्रतीत होता है । यह तब हो रहा है जब हम एकांगी हो बहुविध, बहुरंग को नकार गए होते हैं । तथापि अब कहना न होगा कि हिंदी कविता में ठहराव या कि संकुचन की इस प्रवृत्ति का प्रभाव उसके नकार की प्रवृत्ति खेमों के , विचारों के , आग्रहों के प्रचलन में साफ़ और स्पष्ट रूप में पहले से कहीं अधिक गहराए हुआ दिख रहा है । यानी सुरेश शर्मा की कविता का एक बड़ा पाठक वर्ग होने के बावजूद यदि वे नामित नहीं दिखाई देते हैं तो इस तरह के प्रश्न या कि जिज्ञासा का होना लाजिम है ।
यह सच है कि कठिन समय पर सिर्फ अपनी ईमान और निष्ठा ही हमें बचाता है । तमाम छद्म या कि आडंबर स्वत: विरक्ति लिए चला जाता है । उस समय बस!शब्दों का रहता है साथ । शब्द ही बनाए रख सकते हैं विश्वास । कहना ना होगा
"ना सभा-समारोह,ना बहस बौद्धिक
ना छद्म व्यवहार"
बचा पाएगी हमें ।
चूंकि
"कठिन समय में
ना लाल-पीला,ना हरा सलाम
ना मार्ग वाम,ना दाहिने से काम"
चलेगा !
चूंकि छूटे,टेढ़े-मेढ़े सब रास्ते तभी संग साथ होते और रहे हैं जब तक कि चीजें आपसे नियंत्रित होता है अन्यथा सब कुछ तमाम हो जाता है । यह बात और उस समय को एक सजग कवि जल्दी ही समझ जाता है । इसलिए ''वे लोग" उसे क्या नकारेंगे , वह खुद ही
"भद्रजनों की पंक्ति में शुमार नही हुआ"
एक पक्षधर कवि का मनोविज्ञान यह बखूबी जानता है , जानता है कि कठिन समय के आगे के दिनों में उसका विश्वास ही मूल्यवान है । इसलिए वह
" ना मंदिर में गया ना मस्ज़िद में...! "
और वह भरपूर
"बचा!मंचासीन
भव्य पुरुषों की भव्यता से बचा..
रिरियाते विद्वजनों की दीनता से बचा..
जो थे 'कापुरुष' उनके पौरुषेय चिंतन से बचा
हर संभव,छल-छद्म और पाखंड से बचा..!"
फिर
"सहेजता रहा
आग और उम्मीद और कोंपल
का हरापन जो सुरक्षित था अभी" भी
बुजुर्गों और बच्चों और पृथ्वी के पास
वस्तुत: यह लौटना है कठिन दिनों में , शब्दों के सहारे शब्दों के साथ लौटना है ।
मनुष्य के जीवन में रिश्ते भी बुनियादी जरुरत की तरह हुए । बुनियादी जरूरतों को मनुष्य ने काफी हद तक अपने ही संघर्ष से हासिल किया । किन्तु रिश्ते को वह प्रयास से कभी हासिल नहीं कर सका । यह संभव भी नहीं है । रिश्ते जज्ब करने की बात है, अनुभूत करने की बात है, यह त्याग और समर्पण तथा मान के मांग के बाद स्वत: करीब आई बात है । हिंदी कविता में कि वैश्विक कविता में जो दर्जा मां को मिली है वह शायद ही किसी और को मिला , मिला भी तो लगभग प्रेम में डूबे प्रेमी जोड़ों को मिला । इन मायनों में पिता संभवतः दूसरे नम्बर पर है । इस बीच पिता पर जो कविताएं मुझे दिखी उसमें नीरज नीर #Vijay Kumar #Rajat Krishna #Mohan Kumar Nagar #Vivek Chaturvedi #Santwana Shrikant मिथिलेश कुमार राय की कविता भी उल्लेखनीय कविताएं हैं । उसी कड़ी में छोटे छोटे टुकड़ों पर लिखी सुरेश शर्मा की यह कविता भी काव्य के संप्रेषण ,संवेदना ,भाषा और शिल्प के मामले में स्तरीय रहकर उनके उपस्थिति-अनुपस्थिति से बने अभावों और प्रभावों का एक रूपक बिंब बनाती है । मसलन कि
"पिता
घनी छाँह थे !
छाँह में पले-बढ़े, हम हुए खड़े"
प्रभाव साफ़ है
और अभाव उतना ही स्पष्ट
"फिर/ बड़े..हम इतने बड़े हो गए
कि, पिता स्मृति में खो गए !"
इसी तरह इस दूसरी , तीसरी कविता में भी
"थे / पिता
तो अंगूठे पर था जमाना,"
पहले प्रभाव है , उसके बाद अभाव । देखिए
"अब! जमाने के अंगूठे पर हम
था, पिता में कितना दम !!"
"बरसों-बरस रहे,
पिता के कांधे सवार!
घूमे शहर-शहर/ घूमे मेले हज़ार"
"पिता, एक ही बार..आए कांधे हमार
चले हम हरिद्वार!!"
प्रतिरोध का यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह राजनीतिक सत्ता का ही विरोधी रहे । विरोध के लिए सैकड़ों वैकल्पिक मोर्चे हमारे ही आसपास मौजूद हैं । जिसे छूना जरूरी ही नहीं उस पर समान रुप से आक्रमण करना भी आवश्यक है । यानी उनमें से एक ,यह भी है कि जिस पर सबसे अधिक विश्वास किया और उसका ही नेपथ्य में चला जाना है ! बाकी तो यह मंच विदूषकों के अट्टाहस से भरा हुआ है । कहना न होगा कि अभी , इन बहुरुपियों का शिनाख्त बेहद जरूरी के साथ कम मुश्किल काम नहीं है । चूंकि ये वो लोग हैं जो दांए-बांए सबमें खड़े भव्य पुरूषों के यशोगान में मुग्ध हैं । जबकि वस्तुस्थिति यह है कि
देश !
बाजार में बदल रहा था
बदल रहे थे आँगन और चौपाल
भाषा अपरिचय की दहलीज पर खड़ी थी
और फूहड़ता शनैः शनैः तब्दील हो रही थी
संस्कृति में
इसलिए सुरेश शर्मा के इस कथन का मान और भी अधिक बढ़ जाता है कि
इस विकट समय में/कौन जतन करें
कि थोड़ी-सी उम्मीद...प्रेम थोड़ा-सा
थोड़ा-सा भरोसा बचा रह जाए!!
मसलन कि किसान आंदोलन को लेकर जो फब्तियां कसी जा रही है जो अविश्वास पैदा किए जा रहे हैं
इस विकट समय में/कौन जतन करें
विद्रोह के तरीके और तेवर ईजाद करने के मामले में कुछ टूल्स बड़े मायने रखते हैं ; एक तो कवि की मजबूती के साथ रखा गया कथ्य , दूजा नक्काशी की बारीकियों में यानी करीने से भाव व विचार को बिल्कुल सही-सही जगह रख जाए वह शिल्प । तिसरका उसके टकसाल से सुगठित ढाला गया देशज बिम्ब । जो एक कवि के कविता के भीतर उसके काव्य भाषा , मुहावरों , और कहन की शैली यानी , कथनीयता से आते हैं और काव्य के संप्रेषण को बहुत दूर तक ले जा पाने समर्थ होते है । बताना न होगा कि इस संदर्भ में प्रत्येक कवि का रकबा-खसरा अपना-अपना होता है । यही बात सुरेश शर्मा के विरोध और तेवर के संदर्भ में कहा जाए तो सुरेश शर्मा बिल्कुल ही उन अलहदा कवियों में शुमार हैं जो तेज व्यंग्यात्मकता में शालीन विद्रोह को रचते हैं । मांग के मुकाबले पूर्ति अहम् है । किन्तु जरूरत भर मांग के आगे दरकार भर पूर्ति की संभावनाएं क्षींण हो तो , जो शक्ल से आदमी होगा , भाव विचार से मनुष्य होगा वह , उसके बेचारगी का शोक मनाते कहेगा ही
"राजन!
बहुत कम चाहिए हमें
बहुत भव्य तुम्हारी दुनिया से"
वह मांगेगा भी तो
"अनाज उतना!दे चिड़िया को पेट भर
जल उतना!दे सरोवर अंजुरी भर जितना"
सुरेश शर्मा की इस कविता की भाव भंगिमा जो प्रत्यक्षत: दिख रही है वह करूण तरूणाई में है किन्तु अदृश्य में तथा अप्रत्यक्ष में जो वे कह रहे हैैं वह कम अप्रत्याशित अट्टाहस में, नहीं निकली है । उसके लिए ; जिन्होंने ने हमारे हिस्से की मुट्ठी भर धूप और छांह को कैद कर रखा है, उनके लिए वे कहते हैं
"पृथ्वी
सारी तुम्हारी राजन
बस छाँह भर अपनी
जो सुख में दे दुख में काम!"
सुरेश शर्मा की इस कविता के कैनवास को देखें तो यह व्यंजना से कहीं अधिक अभिधा में , शालीन विरोध की साफ़गोई में , सही और जरूरी के चुनाव में है ।
"जो गुम हो रहा जीवन से/बचाये रखनी है आग जो मद्धम हो रही लगातार...
बचाये रखना है, हँसी बच्चों की" !
के लिए साफ़ इंकार भी करती है
"ऐसे में
संभव नही किसी मुनादी पर
शाही जलसे में शरीक होना
राजन ! क्षमा करें .. ! !"
सुरेश शर्मा की कविताओं में उनका मानवीय प्रेम का कायांतरण अभिभूत करने वाले हैं । चालू मुहावरों के बनिस्बत साहसी प्रतिरोध का अलख जगाता एक लामबंद सामूहिक चेतना का आविष्कार करता है । अतः प्रचलित चालू मुहावरों के वैशिष्ट्य से आगे
"शुरू करनी ही होगी
स्थगित यात्राएं,स्थगित थी
जो खतरों के भय से"
सुरेश शर्मा की कविता अनुकूलन-प्रतिकूलन के उर्ध्व में खड़े रह , अनुकूल का तलाश तो करती ही है ; प्रतिकूल का तराश करने में भी मुस्सअसल लिए आरोह में बनी रहती है ।
"पंख को चाहिए आकाश
बीज को जमीन
थोड़ा साहस पैरों को
और चाहिए संकल्प
एक जिंदा लड़ाई को"
वह कैसे ?
इसका भी , प्रत्युत्तर रचते वे कहते हैं
"कि,जैसे
भूख को पीठ पर लादे
संकटों के पहाड़ चढ़ती है
मजूर औरत की आँखों में
उम्मीदें दूब-सी ऊगती है"
मनुष्य के साहस गाथा का जो बिंब , वृतांत , वृत्त चित्र सुरेश की कविता में आए हैं वह असीमित अपरीमित और पक्षीय विश्वास से आए हैं ।
"कि,अनन्त काल से पृथ्वी को नापता
एक आदमी,भयावह सुरंग से गुजरता है आंगन में एक टुकड़ा छाँह का ठहरता है"
मौजूदा खतरों के जद़ में कौन नहीं है ? बचा कौन है ?? इसकी बेहतर शिनाख्तगी तथा उन शिनाख्त बिंबों के मार्फत सुरेश शर्मा हर-एक को अपने चिंतनशील विचारों से अवगत कराते ,आश को दीप्त रखते हैं । ठीक वैसे ही
जैसे,शुरू करती है मंजूर औरत
जैसे,सुरंग से गुजरता है आदमी
जैसे,बच्चों की आस पर
उड़ान भरती है चिड़िया!
दुनिया उम्मीद पर टिकी है और कायम भी है तो ऐसे विश्वासों से भरे रह सकने के कारण है ; हम कह जाएं तो ग़लत क्या!
असमाजिक तत्वों के जब्बर नुकीले दांत और ख़ूनी पंजों से बेटियों को बचाया जाना जरूरी है । एक कवि की चिंता में यह झलक रहा है कि खटकने लगी है तो निश्चय ही यह हमारी भी चिंता का सबब होना चाहिए । सुरेश शर्मा आम रचाव के इतर गहन मानवीय संवेदना , सावधानी और जरूरतों के कवि हैं जिनकी काव्यात्मकता भी उन आम रचाव के आगे की है ; जो एक रोड मैप तय करती है । चूंकि समय और परिवेश तथा परिस्थितियां अतिरिक्त सतर्कता का आग्रह लिए चौकन्ना रहने का समय है ! कि
लड़कियाँ खिलखिलाती हैं
सीखते हुए वर्णमाला और
गंध धूपबत्ती की फैल जाती है
आँगन में, मगर सावधान !
"यह बाज़ के झपटने का समय है"
कि
"लड़कियाँ गुनगुनाती है
अम्मा का दुःख बंटाते हुए
और घण्टियों की रुनझुन
बज उठती है मन में,मगर सावधान!"
"यह चीतों के घात लगाने का समय है"
कि
"लड़कियाँ बतियाती है
सपनों में, परियों से
बासंती हो जाती है हवा
और झूमने लगता है हरसिंगार
मगर सावधान!"
"यह तेजाबी हमलेका समय है"
कि
"लड़कियाँ बाजवक्त हिरनी होती है
कुलाचों में भरकर इरादे वह
नापती है ज़मीन,पहाड़ और
आसमान, मगर सावधान!"
"यह बेहद चौकन्ना रहने का समय है"
"आख़िर कौन इच्छाओं से,जन्म ले रही थी वे
और मार दी गई,कौन इच्छाओं से !"
यही वह गंभीर सवाल है , प्रश्न है हमारी भाव संवेदना और विचार दृष्टि पर कि सुरेश शर्मा की इस कविता में सवाल के परस्पर जवाब भी अपने समग्र चिंताओं में सन्निहित है । और यह तब तक कि जब तक हमारे भीतर बचा रहेगा कुछ आदिम राग और गंध । ये चिंताएं भी बची रहेगी पूरे जोश ओ खरोश में । हालांकि भाव संवेदना के स्तर पर इस कविता में जो मार्मिकता दिख रही है वह धरातल पर नहीं है यानी हम जितना भी प्रगतिशील होएं , दिखें , जब चुनना हो , तय करना हो हमारी प्राथमिकताएं हमारा विश्वास धरा का धरा रह जाता रहा है । यह सबसे दुखद पहलू है और कवि की कविताई सार्थकता इस बात पर है कि वह शोषित का पक्षकार है शोषक के विरूद्ध है ।
एक आदमी अपने जीवन में यदि नमक को कर्ज अदायगी रूप में चुकाने की जतन और चिंता कर रहा है तो मैं उसके विश्वास का हिमायती होऊंगा , उसकी नेक नीयती का पूरा सम्मान करुंगा कि हमारे भीतर आज भी मनुष्य के नमक और कर्ज के मोल को लेकर गंभीरता बनी हुई है । कोई तो है , जो उसे सस्ते उत्पाद अथवा वस्तु से अलग कर , सचेष्ट मूल्यवान रूप में देख रहा है । इन आशयों से मनुष्य के मनुष्य बने रहने में नमक की बड़ी भूमिका है । इसका होना कितना नितांत और जरूरी है यह इस कविता की केन्द्रीकता है । यकीनन इस जीव जगत में वस्तु , रूप , भाव, विचार के होने को वरीय प्राप्त है । परन्तु यह सचेत होने की बात है कि उसकी अधिकता ज़हर समान होगा , नासूर-सा होगा , अन्धत्व पैदा करेगा ( यह इस कविता में जो नहीं है दर्ज ) यदि नमक को हम सीमित अर्थ और सरोकारों में ले ले तो , कि बहुत ध्वनित अर्थ में ले तो भी यह इसी सैद्धांतिकी का भाग है । पर सुरेश शर्मा इस नकारात्मकता को पीछे ढकेल सकारात्मक बन जिस दृष्टि सम्पन्न चेतना लिए सामने आते हैं वहां हर्ज की क्या गुंजाइश रह जाए , यह तो खुशी देने वाली है । चूंकि सुरेश शर्मा की प्रस्तुत कविता का नमक ,ज़रूरी खारेपन से और जीवन सम्मत विचार में संश्लेषित है । कि वे कहते हैं
"किसी दिन
समंदर से लूँगा नमक
और रख दूंगा बेस्वाद जुबानों पर
कितना नीरस होता है जीवन नमक के बिना"
यह अभिधा कम व्यंजना और नेकनीयती कामना में
से तथा उसके वजूद से है कि कवि दर्ज़ करता है
"नमक से ही
वज़ूद होता है समंदर का
जैसे हौंसले से पहाड़ का"
चूंकि आज आदमी के भीतर आदमियत की जगह मक्कारी ने ले ली है
तो कहना लाज़िम है
"जीवन में
यदि बचा रहे नमक
तो आस बची रहती है
बची रहती है उम्मीद
भरोसा बचा रहता है
आदमी में आदमी का"
तय तो है ही और कहना भी न होगा कि यह जो 'बोओगे वहीं काटोगे' । भद्र होंगे तो भद्रता की प्राप्ति होगी । दुर्जन होओगे तो दुर्जनता की ही प्राप्ति होगी । तब समय कठिन होगा । अतः उस कठिन समय से बचने व उसके आने से पहले सुरेश शर्मा संगत कर सकने पर जोर देते हैं यकीन दिलाते हैं आशा , धैर्य , यश और विश्वास से अर्जित नमक का स्वाद
कठिन दिनों में
दूर तक साथ देता है नमक
और उतर जाता है आदमी
बाढ़,अकाल और आग की नदी से
इसलिए
बचाए रखो!
जैसे बचाए रखता है समंदर
जैसे बचाए रखता है पहाड़
बचाए रखो नमक
अपने वज़ूद के लिए!!
आइए पढ़िए Suresh Sharma की कुछ कविताएँ
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कठिन समय में
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कठिन समय में
बस!शब्दों का रहा साथ
ना सभा-समारोह,ना बहस बौद्धिक
ना छद्म व्यवहार,इसलिए!
भरोसे के कवियों में स्वीकार नही हुआ
कठिन समय में
ना लाल-पीला,ना हरा सलाम
ना मार्ग वाम,ना दाहिने से काम
छूटे,टेढ़े सब रास्ते तमाम इसलिए!
भद्रजनों की पंक्ति में शुमार नही हुआ
कठिन समय
के आग दिनों में
ना मंदिर में गया ना मस्ज़िद में...!
बचा!मंचासीन
भव्य पुरुषों की भव्यता से बचा..
रिरियाते विद्वजनों की दीनता से बचा..
जो थे 'कापुरुष' उनके पौरुषेय चिंतन से बचा
हर संभव,छल-छद्म और पाखंड से बचा..!
सहेजता रहा
आग और उम्मीद और कोंपल
का हरापन जो सुरक्षित था अभी
बुजुर्गों और बच्चों और पृथ्वी के पास
कठिन दिनों में
इस तरह शब्दों का रहा साथ !!
पिता
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(1)
पिता
घनी छाँह थे !
छाँह में पले-बढ़े, हम हुए खड़े
फिर/ बड़े..हम इतने बड़े हो गए
कि, पिता स्मृति में खो गए !
(2)
थे / पिता
तो अंगूठे पर था जमाना,
अब! जमाने के अंगूठे पर हम
था, पिता में कितना दम !!
(3)
बरसों-बरस रहे,
पिता के कांधे सवार!
घूमे शहर-शहर/ घूमे मेले हज़ार
पिता, एक ही बार..आए कांधे हमार
चले हम हरिद्वार!!
सच में
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जब बेहद जरूरी था
सच के समर्थन में खड़े होना
सबसे भरोसेमंद जा चुके थे नेपथ्य में
मंच
विदूषकों से भरे थे..
अट्टाहसों से गूंज रहे थे सभागृह
और उम्मीद थी जिनसे वे भव्य पुरुषों के
यशोगान में लीन थे
देश !
बाजार में बदल रहा था
बदल रहे थे आँगन और चौपाल
भाषा अपरिचय की दहलीज पर खड़ी थी
और फूहड़ता शनै शनै तब्दील हो रही थी
संस्कृति में
महानुभाव
इस विकट समय में/कौन जतन करें
कि थोड़ी-सी उम्मीद...प्रेम थोड़ा-सा
थोड़ा-सा भरोसा बचा रह जाए!!
राजन
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राजन!
बहुत कम चाहिए हमें
बहुत भव्य तुम्हारी दुनिया से
अनाज उतना!दे चिड़िया को पेट भर
जल उतना!दे सरोवर अंजुरी भर जितना
पृथ्वी
सारी तुम्हारी राजन
बस छाँह भर अपनी
जो सुख में दे दुख में काम!
राजन! भव्य होगा दरबार यकीनन
होंगे वजीर,सेनापति,सभासद-सलाहकार
होगी सेना चतुरंगिणी हाथी-घोड़े,पैदल सवार
मगर क्षमा करें
अभी बेहद जरूरी हैं कुछ काम
मसलन, बचाये रखना है नमक
जो गुम हो रहा जीवन से/बचाये रखनी है आग जो मद्धम हो रही लगातार...
बचाये रखना है, हँसी बच्चों की !
ऐसे में
संभव नही किसी मुनादी पर
शाही जलसे में शरीक होना
राजन ! क्षमा करें .. ! !
जैसे उड़ान भरती है चिड़िया
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पंख को चाहिए आकाश
बीज को जमीन
थोड़ा साहस पैरों को
और चाहिए संकल्प
एक जिंदा लड़ाई को
कि,जैसे
भूख को पीठ पर लादे
संकटों के पहाड़ चढ़ती है
मजूर औरत की आँखों में
उम्मीदें दूब-सी ऊगती है
कि,अनन्त काल से पृथ्वी को नापता
एक आदमी,भयावह सुरंग से गुजरता है आंगन में एक टुकड़ा छाँह का ठहरता है
कि,हवा के बवंडर में फंसी चिड़िया
एक लड़ाई पंखों से लड़ती है
बच्चों की चोंच में दाना आस का रखती है
ख़तरा
मौजूद है हर तरफ़
सारे सभागार और चौपाल
आंगन और क़िले,ज़द में है ख़तरों के
शुरू करनी ही होगी
स्थगित यात्राएं,स्थगित थी
जो खतरों के भय से
जैसे,शुरू करती है मंजूर औरत
जैसे,सुरंग से गुजरता है आदमी
जैसे,बच्चों की आस पर
उड़ान भरती है चिड़िया!
यह चौकन्ना रहने का समय है !
----------------------------------------
लड़कियाँ खिलखिलाती हैं
सीखते हुए वर्णमाला और
गंध धूपबत्ती की फैल जाती है
आँगन में, मगर सावधान !
यह बाज़ के झपटने का समय है
लड़कियाँ गुनगुनाती है
अम्मा का दुःख बंटाते हुए
और घण्टियों की रुनझुन
बज उठती है मन में,मगर सावधान!
यह चीतों के घात लगाने का समय है
लड़कियाँ बतियाती है
सपनों में, परियों से
बासंती हो जाती है हवा
और झूमने लगता है हरसिंगार
मगर सावधान!यह तेजाबी हमलेका समय है
लड़कियाँ बाजवक्त हिरनी होती है
कुलाचों में भरकर इरादे वह
नापती है ज़मीन,पहाड़ और
आसमान, मगर सावधान!
यह बेहद चौकन्ना रहने का समय है
माफ़ करना
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माफ़ करना
नवजात शिशुओं
नही बचा पाए दम घुटने से
कि जब बचाना था तुम्हें,
बचा रहे थे हम
महान देश के महा बाबाओं को!
माफ़ करना
असहाय बेटियों
नही बचा पाए हत्यारों से
कि जब बचाना था तुम्हें,
कोरस गा रहे थे हम
महान देश की महा संस्कृति का!
माफ़ करना
ख़ामोश करदी गई बुलंद आवाजों
कि इस कायर समय के भद्रजन
अपना समर्थन और विरोध भी
सुविधा से करते हैं,
हत्यारे से
सब डरते हैं..!!
लापता करोड़ बेटियाँ
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पता नही
समाज शास्त्रियों की गणना में
किस तरह शामिल हैं, वे!
दर्ज कितनी-कितनी / लापता कितनी
वे! जो धरोहर थी सृष्टि की
बेटियाँ पृथ्वी की !
धूप थी उनके हिस्से की
उनके हिस्से की हँसी,
बसन्त था,उनके हिस्से का
भरापूरा एक आसमान था उनका !
उनके सपने थे / सवाल थे उनके
आख़िर कौन इच्छाओं से,जन्म ले रही थी वे
और मार दी गई,कौन इच्छाओं से !
गुनाह नही थी वे..हादसा नही थी..
माताएँ थी उनकी..उनके भी जनक थे,
वे!जो धरोहर थी सृष्टि की,बेटियाँ/पृथ्वी की!
वे होती
तो करोड़-करोड़ हाथों से
बुहारती आंगन पृथ्वी का,
वे होती तो चाँद पर डालती झूले
लाँघती नदियाँ..पहाड़ और आसमान अंतरिक्ष तक गूंजती उनकी हँसी!
बेटियाँ
जो गुम हुई नदियों के बहाव में
बेटियाँ जो राख हुई..ख़ाक हुई आग में
जाने क्यों लौट रही
फिर सपनों में बारबार!!
नमक
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किसी दिन
समंदर से लूँगा नमक
और रख दूंगा बेस्वाद जुबानों पर
कितना नीरस होता है जीवन नमक के बिना
नमक से ही
वज़ूद होता है समंदर का
जैसे हौंसले से पहाड़ का
जीवन में
यदि बचा रहे नमक
तो आस बची रहती है
बची रहती है उम्मीद
भरोसा बचा रहता है
आदमी में आदमी का
कठिन दिनों में
दूर तक साथ देता है नमक
और उतर जाता है आदमी
बाढ़,अकाल और आग की नदी से
इसलिए
बचाए रखो!
जैसे बचाए रखता है समंदर
जैसे बचाए रखता है पहाड़
बचाए रखो नमक
अपने वज़ूद के लिए
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