यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्पल उज्जैन की कविताओं से रूबरू होइए !!! मेरा आशय यहां से शुरू होता है-- आज समूचा विश्व अपने राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मुद्दों , संबंधों में कहीं न कहीं अधिक उत्पीड़ित और आक्रांत है । एक छद्म से भरे वीर भाव , शौर्य और पराक्रम की मन:स्थिति ने उन पर ऐसा भार लाद दिया है कि वह खच्चर होता जा रहा है । नतीजतन एक शीतयुद्ध सतत् उनके भीतर , बाहर जारी है ।
इतिहास फिर-फिर लौटता है अपने पुराने दिनों में । अच्छे दिनों में , और बुरे दिनों भी । परन्तु वर्तमान और भविष्य की चिंता ने मनुष्य के भीतर एक अलहदा किस्म का नकार भाव पैदा करता आया है । जो युद्ध से उपजे हिंसा , घृणा और नफरतों के नासूर घावों का आंकलन करती है , वह देखती है और पाती है कि तबाही का भयंकर मंजर है । दुनिया में अधिकांश युद्ध एक अवैज्ञानिक और अदूरदर्शी सोच की सनक से होती आई है , उसने क्या कुछ तबाह नहीं किया ! इतिहास भी इसकी गवाही देता है । वस्तुत: युद्धोन्माद , सत्ता की चरित्र अब भी बनी हुई है । वह हमेशा अपनी ताकत का विस्तार चरमपंथ के रास्ते करती है । एक चरमपंथी , अति भावुक , उग्र राष्ट्रवाद का ढकोसला एक देश को ऐसे भड़काती है कि देश विवेकहीन हो , राष्ट्रीय गौरव का अंध अनुयायियों में स्वयं को शामिल पाता है । वह अपने पड़ोसी और मित्र मुल्कों को शक के घेरे में ले दुश्मन मान लेने की भूल करता है । इस बीच ऐसे ही चरमपंथियों के हवाले भारत-पाकिस्तान सहित अनेक राष्ट्र हैं । जिनकी भोली-भाली जनता असल और जेनुइन जरुरतों को दरकिनार कर एक बम में बदल रही है । जीवन विहीन स्थितियों में भी जनता के इस पागलपन का बड़ा से बड़ा नमूना पड़ोसी मुल्कों के अलावा खाड़ी के देशों में है । इस ख़तरनाक अंधराष्ट्रवाद के बरक्स पूंजी पर आधिपत्य जमाने का यूरोपीय , अमेरिकी नीति , जो ईंधन पर एकाधिकार जमाने का है ; सर्वथा निंदनीय और दु:साहसिक है । नीलोत्पल उज्जैन की इन कविताओं का कथ्य बहुत मजबूत है और बिल्कुल साफ़ है । बजाय युद्ध के शांति की दरकार कितनी जरूरी है । नीलोत्पल की इन कविताओं की यह खूबी है कि वह पाठक से , आम जन समुदाय , अपने लोगों से सीधे संवाद स्थापित करती है । अफीमी चेतना को झकझोरती है । जगाती है । वे युद्ध के संदर्भ में और ज्ञात भय तथा उसके दुष्परिणाम पर कहते हैं
'युद्ध केवल युद्ध नहीं होता
अंत में
अधिक हिंस्र
अधिक अमानवीय बन जाता है'
वस्तुत:यह युद्ध की परिणिति का सबसे बड़ा सच है ।
एक कवि जब युद्ध बनाम 'शांति' को कविता की केन्द्रिकता में रखता है तो कवि, कविता के सबसे अधिक सापेक्ष होगा और यह तभी ही लिखा जा सकता है । इसलिए इन कविताओं में कवि की उपस्थिति , उसकी सापेक्षता उसके घोषणाओं भी उतना ही सध जाता है जितनी कि भाव संवेग , व शिल्प से सधता है । मसलन
'युद्ध करुणा का अंत है'
नीलोत्पल उज्जैन युद्ध की जटिलता को केवल दो , दस देशों के निहितार्थ बाह्य रूपों को ही नहीं देखते , आंतरिक रुपों संरचनाओं की जटिल प्रक्रियाओं में भी देख रहे होते हैं
' वे जो लाइनों में लगे हैं
जो 13 रोस्टर का विरोध कर रहे हैं
जिन्हें पिछले कई सालों से चिन्हित नहीं किया गया
वे जो बेमियादी हड़ताल पर ही सद्गति को प्राप्त हुए
वे किसान जो बार बार दिल्ली आकर
शासन के बहरे कानों में
अपना दर्द को सूखते हुए देखते हैं'
नीलोत्पल उज्जैन की अब तक दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ।पहला संग्रह 'अनाज पकने का समय' जो कि भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित है और दूसरा संग्रह 'पृथ्वी को हमने जड़ें दीं' बोधि प्रकाशन से है ।
01
युद्ध केवल युद्ध नहीं होता
अंत में
अधिक हिंस्र
अधिक अमानवीय बन जाता है
वह बाज के पंजों में दबी
नन्ही चिड़िया का आर्तनाद है
सरहद से जो लौटा नहीं
उस प्रतीक्षा में पथराई आंखें हैं
जो डूब जाएंगी
मैं इनकार करता हूं
दुनिया के सारे युद्धों से
युद्ध करुणा का अंत है.
02.
हालांकि
युद्ध चारों तरफ़ है
जो लिख रहे हैं
जो नहीं लिख रहे हैं
वे सब एक युद्ध में है
वे जो लाइनों में लगे हैं
जो 13 रोस्टर का विरोध कर रहे हैं
जिन्हें पिछले कई सालों से चिन्हित नहीं किया गया
वे जो बेमियादी हड़ताल पर ही सद्गति को प्राप्त हुए
वे किसान जो बार बार दिल्ली आकर
शासन के बहरे कानों में
अपना दर्द को सूखते हुए देखते हैं
वे जिन्हें मुआवजा नहीं मिला
अपनी आवाज़ उठाते उठाते
निरूपाय से लगते हैं
सफाई कर्मी, अतिथि शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता
जो सड़कों के हवाले से हुमच रहे हैं
न्याय करने वाले जज
ख़ुद न्याय की शरण में
बाहर सड़कों पर बैठ गए हैं
वे सभी युद्धरत है.
03.
युद्ध सिर्फ़ उस वक़्त युद्ध नहीं होता
जब लड़ा जाता है
पहले और बाद में
वह भी मारे और पराजित किए जाते हैं
जिन्हें अंत तक कुछ पता नहीं चलता.
04
युद्ध दो देशों या अन्य देशों के बीच या खिलाफ़ नहीं होता
थोड़ा वह सीमा के भीतर भी चलता है
ज्यादातर मांओं के साथ होता है
कुछ दोस्त है अलहदा
वे बेचैन चील की तरह
शहर के ऊपर मंडराते हैं
सरहद की गोलाबारी से सहमे परिंदे
लौटते नहीं
उनके जर्जर घोंसले और मृत अंडे
समय का भयावह मंजर है
दिलों को तोड़ना यह भी युद्ध है.
05
जिन्हें युद्ध चाहिए
अंत में मारे जाते हैं
जिन्हें युद्ध नहीं चाहिए
अंत में वे भी मारे जाते हैं
युद्ध के बाद
कोई उम्मीद नहीं बचती.
06
जंगल की लड़ाई
जंगल में ही समाप्त हो जाती है
हमने लड़ते हुए
कई सरहदें लांघी हैं
यह जानते हुए कि
युद्ध एक क्षरण है
हमारी तमाम उपलब्धियों का
फ़िर भी हमने विसंगतियां बनाए रखी
उन्माद हमारा नया हथियार हैं.
07
युद्ध के अनेक परिणाम है
लेकिन एक स्थायी है
कि वह कभी ख़त्म नहीं होता.
08
डाल से सिर्फ़ पत्ते नहीं झड़ते
थोड़ा नमक
थोड़ा आंसू भी गिरता है
आंखें यह देख नहीं पाती
विदा होने का एक अर्थ
यह भी है कि पत्ते ही नहीं
एक दिन पेड़ भी गुम हो जाता है
युद्ध में हम शव नहीं गिन सकते
सारे आंसू चीत्कार और भीतर के दंश को नहीं समझ सकते
एक दिन यह भी समाप्त हो जाता है.
09
जिन्हें नहीं पता
युद्ध की हानियाँ
जब वे भी युद्ध का समर्थन करते है
मुझे यह समझने में दिक्कत होती है
कि हम सिर्फ़ कॉलर के भीतर ही शरीफ़ हैं
अन्यथा तो हमने जैसे कोई
हिंसक पशु भीतर पाल रखा है
समय बीतता है
और एक दिन हम मारे जाते हैं
उन मरे हुए लोगों में
एक युद्ध जितना ही सन्नाटा
और चीत्कार बची होती है.
10
हर युद्ध पिछले युद्ध की तरह
अंतिम और निर्णायक घोषित किया जाता है
पिछली बार की तरह
शांति और समझौतों पर बहस होती है
शहीदों की संख्या और उनके शौर्य के किस्से लिखे जाते हैं
लोग जिन्हें युद्ध और सिनेमा में
लगभग समान दिलचस्पी रहती है
अंत में उबकर अपनी सीट छोड़कर
बाहर निकल जाते हैं.
11
एक दिन आपसी जंग में
बहुत सारी चीटियां मारी गईं
उनकी उजड़ी बस्ती
और लाशों के ढेर के बीच
कई सारे गिद्द आ बैठे
जंगल का यह पुराना नियम है
जो मार दिया जाता है
उनके निशान भी मिटा दिए जाते हैं.
12
हम अपने बनाए जंगल में रहते हैं
हम निशान मिटाने के बाद
इस बात पर बहस करते हैं
कि दूसरा पक्ष हमेशा क्रूर होता है
जबकि लड़ाई का बिगुल
हम साथ मिलकर बजाते हैं.
13.
सीमाओं के दोनों और कितने है
जो लगातार इस कोशिश में रहते है
कि किसी भी बिंदु पर
कोई सहमति नहीं बने
ख़ासकर जब रक्तपात मुंहबाए खड़ा हो
इनकी शक्ल इतनी कॉमन है
कि कभी-कभी ये हममें भी शामिल हो जाते हैं
और समर्थन में साथ साथ चल पड़ते है
कुछ फासलों के बाद
अंतर पाटना मुश्किल हो जाता है
हम जिसे राष्ट्रवाद कहते हैं
और असहमतियों से डरते हैं
वह शांति और इंसानियत से बड़ी नहीं
सच बोलना भी देश के लिए है
अतिवादियों से बचना भी देश बचाना है
हल को समझना भी देश समझना है.
14
सिर्फ़ देश कहने से देश नहीं बचता
लोगों के बीच जाकर हांकना
और कहना कि देश आज सुरक्षित है
वह नहीं बचता
वह पड़ोस को कोसने से भी नहीं बचता
देश एक धागा है
आदि से अंत तक
हमारे आंसू, पसीने, प्रेम, दोस्ती, शांति
और भावनाओं में गुंथा हुआ है
देश अपने तट पर हिलता मस्तूल है
जिसे हर हाथ ने थाम रखा है
15
समय थोड़ा असभ्य और बनावटी है
इसलिए यह कहना कि
हमने समझ लिया देश को
एक महीन लकीर को काटने जैसा है
समझ पैदा होते नहीं आती
वह तब भी नहीं आती
जब सारी सनक एक होकर चिल्लाती है
कि देश बचाओ!!!
कभी-कभी यह देश
हमारे मानसिक विकार को भी ढोता है,
सहता है
युद्ध दो तरफा नहीं होता
एक तरफा ही खेल है
जो दोनों ओर से दिखाया जाता है.
16
राजनीति बड़ी क्रूर होती है
वह अन्य अन्य परिस्थितियों में
पहचाने जाने लायक
बहुत कम सवाल छोड़ती है
जो सवाल वह छोड़ती है
वह कभी सुलझाने लायक नहीं होते
राजनीति उवाच है
बड़ा उवाच
और हम उसका बड़बड़ाना
हम बिखरे को समेटते हैं
राजनीति समेट कर बिखेर देती है.
17
बहेलिया अपने ख़ाली जाल में
बहुत सी चिड़ियों को फांस लेता है
चिड़ियां शोर करती हैं
बहेलिया दूर से शांत होकर देखता है
थोड़ी देर में आकाश
चीत्कारों से भर जाता है
चीत्कार शांत होने पर
बहेलिया नृशंस हंसी हंसता है
जबकि
हम सब भूल जाते हैं
चिड़ियां विद्रोह नहीं
अपनी आज़ादी को कह रही थीं.
18
शांति के लिए
यदि युद्ध जरूरी है
तो ऐसी शांति भी अशांत है
19
इंसान से इंसान के बीच का संबंध इतना है
कि जितनी भी सीमाएं और रेखाएं
खींच दी जाती रही
हमने उन्हें पार किए बिना भी
संबंध बनाएं
चाहे उनका मक़सद एक दूसरे से भिन्न और व्यक्तिगत हो
20
यह जानना समझना कि
हिंसक और क्रूर बातों में
शामिल होने के लिए
हम कभी तैयार नहीं रहे
हमने ऐसा कोई पाठ नहीं पढ़ा
जो अपने समकाल में या आगे चलकर
हथियार उठाने या हिंस्र हो जाने के लिए कहता हो
तब भी इस पृथ्वी पर
अनगिनत युद्ध हुए हैं
लोग मारे जाते रहे
सदियों रक्त बहा
यह जानना समझना कि
देवताओं ने कितने युद्ध लड़े और क्यों लड़े?