Tuesday, March 30, 2021

कमलेश्वर साहू

आखिरकार कमलेश्वर साहू के पांचवें संग्रह 'कारीगर के हाथ सोने के नहीं होते' पर लिखना संभव हो ही गया । जो कि अंतिका प्रकाशन गाजियाबाद से प्रकाशित हुई है । कमलेश्वर साहू के इस संग्रह पर मेरी ख़ास अभिरूचि इसलिए भी थी कि मैं इसके माध्यम से बस्तर को उसके ठीक ठीक संदर्भों में जान सकूं । कमलेश्वर साहू अंतिम दशक के कवि हैं । यह उनके 'यदि लिखने को कहा जाए' कविता संग्रह 2003 , 'पानी का पता पूछ रही मछ्ली' 2009 , 'किताब से निकल कर प्रेम कहानी' कविता संग्रह' 2011 , व 'पके हुए फल का स्वाद' 2012 , के बाद पांचवां संग्रह है । विगत चार संग्रह के बाद कमलेश्वर साहू इस संग्रह में भी एक बार पुनः अपने वही तेज़ और ओज के अनुरूप नमूदार हुए हैं । कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वे अपनी धार को और भी ज्यादा प्रभावी , प्रबल और तेज़ कर पाए हैं । समकालीन हिंदी कविता का यह कवि चूंकि काफी लंबे अरसे से बस्तर में रह रहा है और निरंतर रचनाशील है तो उनके इस संग्रह पर यह उम्मीद अधिक बलवती रही कि बस्तर तो आएगा ही आएगा ; और अपनी व्यापकता में आएगा । बस्तर का जीवन , संघर्ष , जिजीविषा , तजुर्बा और अनुभव की व्यापकता , उससे उनकी तादात्म्य , संबंधों की तल्लीनता इस संग्रह में स्वभाविक रूप से उपस्थित होने की अनिवार्यता थी । जो इस संग्रह में मौजूद ही नहीं , उनकी संपूर्ण कवित्व की गवाही बन आई है । यह कमलेश्वर की काव्यात्मक प्रोन्नति है । समकालीन हिंदी कविता में बस्तर पर चंद्रकांत देवताले , लक्ष्मीनारायण पयोधि , मांझी अनंत , त्रिजुगी कौशिक , विजय सिंह , शाकिर अली , पूर्णचंद्र रथ , किशनलाल सरीखे अनेक साथियों ने अच्छी कविताएं लिखी , निश्चय ही 'अच्छी' कविताएं इसलिए कहूंगा कि वे 'अच्छी' थी । पर उन कविताओं ने वह प्रभाव नहीं छोड़ पाया जो कमलेश्वर ने छोड़ा है । उन रचनाओं की अपनी सीमाएं रही , अधिकांश उन रचनाओं में कल था । कल का बस्तर था । कह सकते हैं कि कल का 'पुरा' अनुभव और वैभव था । पर आज का बस्तर कहीं न कहीं छूट गया था , जो मुझे अभी कमलेश्वर के यहां दिखाई दे रहा है । हालांकि बस्तर पर बड़ा कार्य करने वाले लाला जगदलपुरी ,अदम गोंडवी , हरिहर वैष्णव भी हैं पर वे भी अपनी सीमाओं और समयकाल के चलते हमें वह नहीं दे पाए जो कमलेश्वर ने अपनी इस संग्रह की कविताओं के माध्यम से दिया । ताज्जुब होता है कि बस्तर में बैठे तत्कालीन राजनेताओं , समाज शास्त्रियों व अनुसंधानियों की समझ पर कि वे सघन विश्लेषण से वंचित कैसे रहे ? जबकि आज का बस्तर सच मायनों में जल रहा है , बारुद के ढेर में तब्दील हो चुका है । बताना न होगा कि कमलेश्वर के आंखों देखी सच को बहुत पहले वारियर एल्विन , और बाद में हिमांशु कुमार , संजय पराते , कनक तिवारी जैसे रचनाकारों ने काफी हद तक अपनी रचनाओं में , लेखों में पुष्टि की है ।
              तो मैंने कमलेश्वर साहू की प्रतिरोधी बातों से अपनी बात प्रारंभ की । यह कवि अपने पहली ही कविता 'लिखा जाना चाहिए में क्या कह रहे हैं बानगी देखिए

'यदि नदी में पानी लिखा जाना चाहिए
तो चट्टान में खनिज
पेड़ में पंछी
'और' फसल में किसान लिखा जाना चाहिए ।

कमलेश्वर में राइट टू रिकॉल का सैद्धांतिकी है । चीज़ों की पहचान है । और चीज़ों के पहचान में देशीपना है । वे बजाय लाग-लपट के सपाट कहते हैं

'यदि लिखा जाना चाहिए उपरोक्त
तो कुछ लोगों की नीयत पर
'शक' लिखा जाना चाहिए
लिखा जाना चाहिए
बिचौलिए , व्यापारी , उद्योगपति राजनेता
और अंत में लिखा जाना चाहिए 'सांठ-गांठ'

कमलेश्वर इस कविता में यही नहीं ठहरते , वे मानते हैं कि दुनिया कहीं समाप्त नहीं होती । और दुनिया जब समाप्त नहीं होती तो वे कहते हैं

'तो लिखे जाने के बाद
लिखा जाना चाहिए
सावधान !
यह जनसम्पत्ति है !!'

चीज़ों के प्रति सतर्क और दावा कैसा हो? कमलेश्वर की दो कविताएं एक 'जनकवि बोला' और दूसरी 'कविता हो बस पानी जैसी' आज के साहित्यिक समाज में पनप आए अभिजात्य चरित्र में कवि , आलोचकों के चयन और स्वाद पर अविश्वास करती है । इन कविताओं में कमलेश्वर कविता के गीतात्मक शैली में आते हैं और ठेठ तथा देशज मुहावरे की भाषा में होते हैं । यानी बतकही में वे अभिजात्य की सिंथेटिक कविता और आलोचना के बाड़े में घुस कर हिंदी आलोचना के आलोचकीय बेईमानी पर सटीक प्रहार करते हैं और वे कहते हैं

'आलोचक जी मुझको छोड़ो
गांव का निपट गंवारू ठहरा
कृपादृष्टि उन पर बरसाओ
बोलो उनकी कविता पर'

'महानगर के कवियों की है
चमचम करती चिकनी भाषा
कविता लगती महज़ तमाशा'

ऐसा धुर देशज और दो टूकिया प्रवृत्ति नागार्जुन , केदारनाथ अग्रवाल , और त्रिलोचन के यहां है । जो लताड़ती है , धिक्कारती है और बेईमानों को दरकिनार करती है ।

वे कहते हैं  --

'कविता हो जब भोर का सूरज
कविता हो मेहनत का किस्सा
कविता हो जीवन की रंगत
कविता हो जीवन का हिस्सा
कविता हो बस पानी जैसी
या कबीर की बानगी जैसी'

एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के बीच ऊंच-नीच , अमीर-गरीब अथवा वर्गीय बोध वाली विभाजन प्रकृति सम्मत , शाश्वत नहीं है । मानव जीवन में विभाजन की यह रेखा हमारे ही द्वारा खींची गई रेखा है । जन्मना मनुष्य वह सब कुछ लेकर पैदा होता है , जो एक अमीर आदमी लेकर होता है । परन्तु , इस फांक में उन्नत और सच्चा मनुष्य , हमेशा मनुष्यता का पक्षधर हुआ है । वह मानुष गंध से निजात नहीं पाता , वह उसे रचता है , उसका सृजन करता है उसके सृजन व निर्माण में भागीदारी को सुनिश्चित करता है । इस कड़ी में कमलेश्वर की कविता 'मानुष गंध' और 'बूढ़े पहरेदार की कविता' किरदार के लिहाज से अपने मानुषिक बोध और संवेदनशील काव्यात्मक रूप में एक बेहद मार्मिक कविता है । कमलेश्वर इस कविता में उन तल्ख सच्चाईयों को उजागर करने में कामयाब दिखाई देते हैं। जिसमें एक प्राणी के प्रति आदमी कितना गैर ज़िम्मेदार और संवेदनहीन है । मह द्विस्तरीय मानव मूल्यबोध का फलसफ़ा है ।
कमलेश्वर की कविताई असीमित है । और बहुस्तरीय है । भूमंडलीकरण, उदारीकरण के बाद नवपूंजीवाद के बाज़ारवादी संस्कृति में आम आदमी के हताशा निराशा , अभिजात्य ताकतों का भोग , ऐश्वर्य और विलासिता की शिनाख्तगी ख़ूब है । जिसमें उन्होंने उनकी खूब ख़बर ली है । 'मसलन मैं तो बाज़ार घूमने गया था' 'लव टिप्स' और 'जूते' शीर्षक कविता को ही लें । इन कविताओं में हैसियत और मनुष्य का विकार साफ़ है । उसका वस्तु और बाजार में बदलता चेहरा है , जो चकाचौंध रोशनी और भ्रम के कोलाहल में इतना डूबा और इतराया हुआ है कि अजनबियत का 'मान' ,  माने नहीं रखता । आत्मविश्वास ऐसा है मानो निकलें तो बाज़ार जेब में ! उतावलेपन का एक घटिया और लचर मूल्य दृश्य है । वहां केवल कीमती मोबाइल हैं , कारें हैं , वस्त्र है , आभूषण है और उसके आगे सब बौना । उत्पाद और सेल्स की इस दुनिया में सब कुछ मीठी है , रसीली है चमकीली है और वही 'आत्मीय' है ‌। लेकिन महत्वपूर्ण यह कि वह सच नहीं है । उपासक और आराध्य का ख़ालिस भेद है । गहराता संकट है । कमलेश्वर कहते हैं कि आत्मविश्वास से भरे इस अभिजन की यह पराकाष्ठा है जो

'किसी को खाली हाथ न जाने देने लिए प्रतिबद्ध 
ग्राहक के दिल और दिमाग के द्वंद में
बाज़ी मार ले जाने में हुनरमंद'

बाज़ारवाद के इस दुश्चक्र और अपसंस्कृति का हलफनामा दर्ज करते कमलेश्वर अघाते नहीं हैं , थकते नहीं हैं , निर्बाध गतिमान हो उसकी चालाकियों को परत-दर-परत रखते हुए आखिर दुख और क्षोभ से भर कहते हैं

'मैंने देखा
बाज़ार के मायाजाल में फंसे लोगों के पास
सब कुछ था
बस कंधा नहीं था
कि ज़रूरत पड़ने पर
दे सकें किसी दूसरे को सहारा'

यही दशा का बयां 'लव टिप्स' शीर्षक कविता में भी दिखाई देता है । प्रेम के जैविक रूप से परीचित कवि के लिए उसका यांत्रिकीकरण और आसन्न संकट , उसे स्तब्ध करता है । घायल , आहत कवि का मन और मर्म इस कविता में सवाल और संदेह में जन्मता है 

'मेरे मन के कोने में
चुभ रहा है कोई सवाल
हमारे जीवन से निकल कर क्या
लव टिप्स बेचने वालों की दुनिया में
बचा रह जाएगा प्रेम ?'

कमलेश्वर बाज़ारवाद के बढ़ते दुष्प्रभाव की अच्छी समझ रखते हैं कि चौतरफा होते हमलों की नब्ज जान चुके हैं जो कि उनके 'जूते' शीर्षक कविता में साफ़ साफ़ देखी जा सकती है

'रिश्तों से याद आया
बाज़ार किसी का संबंधी नहीं होता
नहीं होता किसी का रिश्तेदार
बल्कि सबसे पहले मारता है रिश्तों को बाजार'

। कमलेश्वर में जो विचार बोध है अथवा वैचारिकता है को ; यह सुनिश्चित करना असंभव है कि वे किस खोह में या पैमाने में रखे जाएं । बेहद उथल-पुथल, विविध विषय सामग्री , संदर्भों में अंटने बैठने के कारण अनिश्चितता दिखाई देता है । पर जन सरोकार , मानवीय संवेदना और उसके मार्मिक प्रस्तुति से उनके रुझानों को मैं वाम के खाते दर्ज करता हूं । और इन मायनों में कि उनके कहन में ठसक है , निश्चिंतता है । पुलिसिया धमक है । विद्रोह है , बाध्यता का अस्वीकार है ।  'अच्छा नहीं हो रहा है' और 'सुने' शीर्षक कविता में यह फलीभूत होता दिखता है । मनुष्य के जीवन शैली और लय में यांत्रिकीकरण एक वह परिघटना साबित हुई है जो मनुष्य के समग्र जीवन शैली को बदलने में अधिक समय नहीं लगाता वह चीज़ों के रूपांतरण का अग्रगामी विन्यास होता दिख रहा है । किन्तु उसमें भी एक खोट है कि वह मूलभावों का कन्वर्शन जिस तरह से कर रहा
 है वह नागवार है कमलेश्वर इस बात से बेहद खिन्न हैं, वे कहते हैं

'इस तरह से हो रहा है यदि बदलाव
तो यकीन मानिए
देशहित में
अच्छा नहीं हो रहा है'

'सुने' कविता बढ़ते राजनीतिक दबावों से उत्पन्न खतरों के प्रति हमें सचेत करती है । बताती है कि अभिव्यक्ति के खतरों के मध्य वस्तुस्थिति केवल सुना जाना ही रह गया है । यह सत्य का प्रकाट्य रूप बेहद वीभत्स है । कहना मनाही है और सुनना अकाट्य है । कमलेश्वर इस पीड़ा को, उस विडंबना को विभिन्न बिम्बों में रख कहते हैं

'वैसे भी
जिस जमीन पर खड़े हैं आप
उस जमीन से
सुना ही जा सकता है
कहा नहीं जा सकता

सुनें'

कमलेश्वर में यह पराजय बोध और माखौल का भाव अनायस ही नहीं है , यथार्थ का दिखता प्रतिबिम्ब है और वास्तविकता का स्वीकार है । यह आर्तनाद पूरे बस्तर का है , देश का है ।

देश में 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' का स्लोगन जोरो पर है । प्रियंका रेड्डी, निर्भया , कि कुलदीप सिंह सेंगर प्रकरण की पीडिता, या फिर चिन्मयानंद प्रकरण की पीडिता को लें , बेटी ही थीं। जिसका आखिर परिणाम करता हुआ ; से सब वाकिफ़ हैं । ऐसे में कमलेश्वर साहू की कविता  'उन पिताओं में नहीं हूँ मैं' बडा़ माने रखती है । यह कविता समाजिक विसंगतियों और उसके विद्रूपता पर कड़ा प्रहार करती है व हमें आश्वस्त करती है कि तमाम- तमाम घटनाओं , परिघटनाओं के बाद भी रूकना नहीं है । कालांतर में बेटी का होना अभिशप्त माना जाता रहा है । किन्तु , कमलेश्वर की कविता में सोच का बदलाव है साफ़ है । भले ही वह अनुपात में सीमित है। वांछनीय के मुकाबले नाकाफी है , एक बडा टालरेंस बना हुआ है । कमलेश्वर इस टालरेंस को जीरो टालरेंस में देखने की कवायद करते हैं ।

'चांद चुराने वालों की कविता'  'बिना पते की चिट्ठी' 'ईश्वर के बहाने कुछ बकबक :चार कविताएं' 'उत्तर आधुनिक व्यक्ति की प्रार्थना :तीन कविताएँ' वैचारिकता के धरातल पर नहीं ठहरती, अपना कोई प्रभाव नहीं छोडती । पर ये कविताएं आम जन के जीवन में समाहित स्थितियों- परिस्थितियों उनके हास- परिहास की मोहक प्रस्तुति हैं ।  ये कविताएं अदृश्य और काल्पनिकता का रचाव करती हैं । आंशिक फैंटेसी भी है पर अधिक प्रभावी नहीं है।

'खबरों का सिलसिला जारी रहेगा' बाजारवाद , आवारा पूंजी के बरक्स प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आए पतनशीलता का नोट्स तैयार की हुई कविता है। जिसमें साधन संपन्न लोग और मीडियाकरों के सनसनीखेज, सांठगांठ, फिर ताकत के रौब पर आम जीवन को बाधित करने के कुत्सित प्रयासों की निंदा है।

'आधा' 'हर बार बाजी' 'जब भी लडना' 'मिलना जुलना' 'मगर जब गोली चली' 'तो फिर' आदि कविताएं राजनीतिक जागरूकता व चेतना से संपन्न कविताएं है।
'हर बार बाजी' शीर्षक कविता में कमलेश्वर राजा व मसख़रा को चरित्र के स्तर पर एक ही करार देते हैं। दृष्टव्य है

जन के जीवन का
सबसे बड़ा यथार्थ है यह
और सबसे बड़ी त्रासदी कि
हर बार या तो
मसख़रा    राजा होता है
या फिर राजा    मसख़रा
जो गाता है——

कमलेश्वर इस कविता में राजसत्ता के संघीय चरित्र को उजागर तो करते ही हैं वे जनता के समीप जाते हैं  और वस्तुस्थिति से अवगत कराते हैं , वे कहते हैं

'हर बार दांव लगाकर
हर बार बाजी
जनता ही हारती है

न मसखरे का कुछ बिगड़ता है
न राजा का कुछ जाता है'

यह राजनीतिक सत्य है। जीवन और अनुभव सत्य है कि सत्ता के हाथों अंततः छली जाती है जनता। 

संग्रह की कविता 'मिलना जुलना' को तत्कालीन घटनाओं के मद्देनजर इसलिए देखना अनुचित नहीं होगा कि नागरिक और राजनेता के खड़ा होने के माने किन मायनों में अलग हो जाता है, किन अर्थों में विभाजित हो जाती है मसलन नवजोत सिंह सिद्धू के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ खड़े होना , और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के घर चुपके से बिरियानीबाजी करते खड़े होने का माने करता और कैसे निकाला जा सकता हैं ? अधिनायक वाद का चरमोत्कर्ष इन पंक्तियों में दृष्टांत है

'एक राष्ट्र के नागरिक का
दूसरे राष्ट्र के नागरिक से मिलने में
संदेह /शंकाएं /सवाल/ बवाल
जबकि एक राष्ट्र का राष्ट्राध्यक्ष से
जब भी मिलता है
जनगणमन गाता है'

कमलेश्वर इस कविता के माध्यम से उस खतरनाक विद्रूप स्थितियों को रखने में सबल और कामयाब हैं जहां एक नागरिक की नागरिकता को संदिग्ध बनाए जाने का छद्म राष्ट्रवाद चलायमान है ।

'मगर जब गोली चली' 'तो फिर' कविता को संग्रह की अति महत्वपूर्ण कविताओं की श्रेणी में रखा जाना चाहिए । यह कविता नई सदी के मुहाने में किसान आंदोलन और उनके संघर्ष को निर्ममता पूर्वक व्यवस्था द्वारा कुचले जाने के दास्तान का दस्तावेजीकरण है । यह वह समय है जब दिल्ली की सल्तनत ने किसानों की मांगों
को न मानने की जिद पर अड़ी रही और किसान भूखे रह चूहे , सांप , छूछंदर अथवा अपने ही मल मूत्र खाने बाध्य हुए । वे इस कविता में चुटीले तेवर में पूंजीवादी सत्ता व्यवस्था की पोल खोलते हैं

'मगर जब गोली चली 
 दिल्ली नहीं 
 मारा गया मंजूर
 मारा गया किसान
मारा गया इस देश का आम आदमी 

 दू $$$ र 
 दिल्ली तो खड़ी रही
 अपने पूरे वैभव के साथ'

 अड़ी रही !      

            
एक चीज है —कमलेश्वर की कविता को पढ़ आप तय नहीं कर पाएंगे कि कवि की कविताई में यथार्थ और फैंटेसी आखिर  उनके भटकाव से उतपन्न होती है कि जिया यथार्थ से कि वैचारिकता आग्रह से ! यह इसलिए कि उनकी कविताएं बार-बार आपको अलग अलग दृश्य , रंग , संवाद से न केवल गुजारती ही है , बल्कि चमकाती है और विस्मित भी करती है । मुझे ऐसा लगता है कि कमलेश्वर में वैचारिकता का अतिरिक्त दबाव नहीं है। बल्कि जीवन के जिए और भोगे यथार्थ के निमित्त उनकी कविताई अविरल बहती है । वे मूर्त और अमूर्त दोनों में निर्बाध गोते लगाते हैं। यानी ठहराव या कि विराम नहीं है। गतिशीलता है । वैसा ही

'वही कबीर का ताना-बाना
भीतर बाहर एक समाना'

कमलेश्वर की कविता का एक खूबसूरत पहलू यह कि वे अनेकों कविताओं में सवाल के परस्पर संवाद करते हैं । नाट्य दृश्य रचते हैं । पर्दा गिरता है, पर्दा उठता है । चीजें छिप जाती है , फिर दिखने लगता है । कई-कई संवाद आत्मालाप, एकालाप की भी होती है । 'मसलन अमरकंटक एक्सप्रेस में मैं, भास्कर चौधरी और अंजान सहयात्री' 'आधा' ' एक दिन'  'इस दुनिया से जाने के बाद' मुहावरे का वजन' आदि कविताएँ अपने आस्वाद के अनुरूप ही मनुष्यता की वापसी में उसके जद्दोजहद में हमें शामिल कराती है। हमारे ठगे होने के बाद भी ठगे होने के अहसास और पीड़ा से हमें मुक्त कराती है । यह एक तरह का नया सौंदर्य दृष्टि है ।
 'कारीगर के हाथ होने के नहीं होते'
कमलेश्वर साहू की यह कविता उनके संग्रह की शीर्षक कविता है । कमलेश्वर इस कविता में श्रमशील , श्रमजीवी जनता के शक्ति का उत्पादन में भूमिका तथा उनके साथ होने वाले बहुतायत उपेक्षा , अपेक्षा को केन्द्रीय बनाते हैं । मानव जीवन में साधन, संपदा इत्यादि का सीधा संबंध उत्पादन की शक्ति पर निर्भर है । बावजूद उत्पादकों ने इसका अनदेखा किया और उनके इस अदेखेपन के बाद भी श्रम से लदे 'वे मनुष्य' अधिक जीवंत हैं कि उन्होंने उत्पादक को अस्वीकारा नहीं , नहीं कहा 

' वे यह भी कह सकते थे 
 सोने के हाथों में
 नहीं होता हुनर 
 हमारे हाथों वाला !!!

कुल मिलाकर चालीस कविताओं का यह संग्रह अपने चयनित कविताओं , उसके तेवर , और कलेवर के भरोसे यकीन दिलाता है कि कमलेश्वर बहुविध , अधिक सधे हुए , मंजे हुए कलाकार हैं । 

आज बड़े समीक्षक बने फिर रहे हैं इन्द्र कुमार राठौर अच्छी बात है ।जिनके आगे पीछे आज कल है इन लोगों के चक्कर शुरू शुरू में खूब लगाया था, जब इस नवोदित रचनाकार को कोई घास नहीं डाला था तो मेरे पास आयें थें इसे सराखों पर बिठाया था ,छोटे भाई जैसे स्नेह देकर साहित्य बिरादरी में पहचान दिलाया था ,घर बुला बुला कर खाना तक खिलाया था बेरोजगार था ठेकेदारी में श्रीवास्तव साहब को बोलकर काम दिलाया था। लेकिन इस एहसान फरामोश ने इसका उल्टा सिलह दिया । अहसान फरामोशी लोग कतई साहित्यकार नहीं हो सकते हैं, इधर-उधर से नकल मारके जबरन कवि लेखकों को महिमामंडित करके समीक्षक बनकर खुश करना आसान है । समीक्षा पढ़ चुका पर मुझे एकदम सामान्य सी लगा । अपनी रचनात्मक प्रगति छोड़ कर वाहवाही लेना हो तो समीक्षक बन जाओ, कमलेश्वर साहू मेरे भी मित्र है अच्छी रचना लिखते हैं मैं भी कई बार तारीफ कर चुका हूँ, पर मित्रता वश नहीं, निष्पक्ष होकर । इन्द्र कुमार राठौर को जब मेरे माध्यम से साहित्यिक विरादरियो के बीच पहचान बनी तो उनमें बहुत बड़े साहित्यकार होने का अहं आ गया था,शुरू शुरू में उसे अपने साहित्य लिखने का या रचना लिखने की ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाया था, पर इतना अहंकार हो गया था कि बाद में हर चीज में मुझसे बहस करना शुरू कर दिये थे, एक अखबार के जी हुजूरी करके कुछ दिन समीक्षा लिखने का भूत सवार हो गया था । जो व्यक्ति अपने राह दिखाने वालों का सामान्य अहसान तक नहीं मानता उसे मैं साहित्य विरादरियो के लायक भी नहीं समझता हूं, भले ही उसे दूसरे लोग कितने बड़े समीक्षक या रचनाकार क्यों न मानता हो ।

आज बड़े समीक्षक बने फिर रहे हैं इन्द्र कुमार राठौर अच्छी बात है ।जिनके आगे पीछे आज कल है इन लोगों के चक्कर शुरू शुरू में खूब लगाया था, जब  इस नवोदित रचनाकार को कोई घास नहीं डाला था तो मेरे पास आयें थें इसे सराखों पर बिठाया था ,छोटे भाई जैसे स्नेह देकर साहित्य बिरादरी में पहचान दिलाया था ,घर बुला बुला कर खाना तक  खिलाया था बेरोजगार था  ठेकेदारी में श्रीवास्तव साहब को बोलकर काम दिलाया था। लेकिन इस एहसान फरामोश ने इसका उल्टा सिलह दिया । अहसान फरामोशी लोग कतई साहित्यकार नहीं हो सकते हैं, इधर-उधर  से नकल मारके जबरन कवि लेखकों को महिमामंडित करके समीक्षक बनकर खुश करना आसान है । समीक्षा पढ़ चुका पर मुझे एकदम सामान्य सी लगा । अपनी रचनात्मक  प्रगति छोड़ कर वाहवाही लेना हो तो समीक्षक बन जाओ, कमलेश्वर साहू मेरे भी मित्र है अच्छी रचना लिखते हैं मैं भी कई बार तारीफ कर चुका हूँ, पर मित्रता वश नहीं, निष्पक्ष होकर । इन्द्र कुमार राठौर को जब मेरे माध्यम से साहित्यिक विरादरियो के बीच पहचान बनी तो उनमें बहुत बड़े साहित्यकार होने का अहं आ गया था,शुरू शुरू में उसे अपने साहित्य लिखने का या रचना लिखने की ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाया था, पर इतना अहंकार हो गया था कि बाद में हर चीज में मुझसे बहस करना शुरू कर दिये थे, एक अखबार के जी हुजूरी करके कुछ दिन समीक्षा लिखने का भूत सवार हो गया था । जो व्यक्ति अपने राह दिखाने वालों का सामान्य अहसान तक नहीं मानता उसे मैं साहित्य विरादरियो के लायक भी नहीं समझता हूं, भले ही उसे दूसरे लोग कितने बड़े समीक्षक या रचनाकार क्यों न मानता हो ।

Friday, March 26, 2021

माइंड ब्लोइंग अनुभवों से गुजारती है शीलकांत पाठक की कविताएं

दो पाटों के बीच पीस जाने के त्रासद सच को शीलकांत पाठक जितनी बखूबी से इन कविताओं में उजागर किए हैं , वह अतुलनीय है । विगत काफ़ी दिनों से वे मेरे राडार में थे । इस बीच उन्होंने जितनी भी कविताएं हिन्दी के पाठकों को दी , उसे लेकर मैं एक पाठक के तौर पर माइंड ब्लोविंग अनुभवों से गुजरा । प्रतीकात्मक बिम्ब , सांकेतिक उपादानों में हमारे समय के सच , संताप, संघर्ष और जिजीविषा को उबार लाने के सामर्थ्य से लैस उनकी इन कविताओं में निरपराध होकर भी आत्मबोध से उपजी आत्मग्लानि है । अपनी सीमा से आगे बढ़ कर , अपेक्षित और वांछनीय नहीं दे पाने की पीड़ा और मलाल है । आत्मश्लाघा , आत्ममुग्धता प्रभावहीन है ।  विचारधारा के प्रति तन्मयता व मनुष्य के प्रति तादात्म्यता ने उनमें अकूत धैर्य तथा वह विश्वास दिया है कि वे आक्रामक होने के बाद भी भाषाई और मुद्द‌ई  हैं । उन्हें जो कहना है , कह रहे हैं और ठहर नहीं रहे । नाउम्मीदी में उम्मीद , भय व संशय के बाद भी जीवन के  संघर्ष पथ पर अडिग हैं । कहना न होगा कि  बेहतर भविष्य की तलाश , जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्थावान  जीवन शैली ही जन भाव रहे हैं ।  पारंपरिक स्त्रोत , साधन , संपन्नता का निर्माण क्रियाशील मनुष्य का स्वभाव है । परन्तु इन दिनों जनतांत्रिक मूल्यों के हनन ने एक ऐसे स्पेस का विनिर्माण किया है कि जन पराजय की स्थिति में है । बहुत दुखी और असहाय तथा असहज महसूस कर रहा है । लेकिन यह अच्छा है कि वह ठहर नहीं रहा है तथा उस त्रासद सच के प्रति और मुखर हो शाहीन बाग पर अथवा उसके तर्ज पर सीएए , एन‌आरसी एनपीआर  कि किसानों के आंदोलन के साथ , विरोध में लोग घर से बाहर आए हैं , इस दास्तां को कवियों ने अपने काव्य विषय बनाए तो अभिजन को अपनी भाषा में लपेटे में भी लिया है । इन अर्थों में शीलकांत पाठक एक  रूग्ण ,अवसाद और भयग्रस्त मानसिकी के विरूद्ध एक  चेतना संपन्न व साहस से भरे हुए कवि हैं । उनका कथ्य , काव्य भाषा , शिल्प , बिम्ब विधान में वैविध्यता इतनी अधिक और प्रचुर है कि इतिवृत्तात्मकता के रास्ते समसमायिक संदर्भ अपने समकालीन यथार्थ बोध में साफ़ दृष्टिगोचर होता है । शीलकांत पाठक की कविताएं जरूरी नागरिक दायित्व बोध की कविताएं हैं , जागरण की कविताएं हैं , मानवीय संवेदना और उन्हें अधिकार संपन्न बनाने के संघर्ष से लैस ह्रदयहीनता के विपरीत ऊर्जावान मनुष्य की कविताएं हैं । सस्नेह आभार

।। विश्व-ग्राम के श्रेष्ठ नागरिक ।।

इस 
सारे खेल में

जो
जनता के लिए है

वही 
आश्चर्यजनक रूप से 
गायब है

है भी तो

लड़ाकू मुर्गों की तरह

पंजों में
जिनके

एक-दूसरे के
विरुद्ध

तीखे फल वाले 
चाकू

बाँध दिए गए हैं

और
उन्मादी अफीम की

अधिकतम उत्प्रेरक खुराक
दी गई है

लड़लड़कर लहुलुहान हो रहे हैं 
वे
मालिक के लिए

कभी अंधेरी-रातों में छिप 
डरते-डरते 
वार करने वाले शैतान

अब दिन-दहाड़े  

इंसानियत का मानचित्र

बेधड़क
बदलने लगे हैं

विश्व-ग्राम के
नये नक़्शे में

पुराने संकेत-चिन्ह
हटाकर 
नए-नए लिए जा रहे हैं

शैतानियत और इंसानियत

एक ही संकेत-वर्ग में रखे गए हैं

और हृदयहीन ,

सहृदय-निवेशक की
परिभाषा में
 
विश्व-ग्राम के सर्वश्रेष्ठ-नागरिक
घोषित किये गए हैं

सब कुछ खरीद लेता है
एक 
सहृदय-निवेशक

आकाश-हवा-पानी-बुद्धि

नहीं भी बिकना चाहेंगे 
आप,

तो 
आपके
नीचे की
आधार-जमीन खरीद लेगा

अधर में लटका देगा
आपके
समूचे इंसानियत भरे अस्तित्व को

ऐश्वर्यशाली इंद्र के
विचारहीन-गुण
गाने पर ही

आपका त्रिशंकु 
उस स्वर्ग में प्रविष्ट होगा

और 
तारीफ यह कि

विकास की तबाही का
बैरंग डाक 
जबरन डाल

विश्व-ग्राम का 
अर्थ-लोलुप डाकिया
जो कि एक
पण्य-केन्द्र में परिवर्तित हो चुका है

जुर्माना
हमारी ही
बदहाली से 
क्रूर-निर्ममता से
वसूल रहा है

सत्ता, संस्कृति और निवेश के 
मयखानों में

बेहोशी की हद तक 
बेतहाशा
पी रहे हैं 
अपने ही आत्मीयजन

पुनर्निर्माण की 
" ट्रिस्ट विद डेस्टिनी " की
इस अघोषित महान
पुण्यबेला में

मदहोशी के दुष्कर्मों का
देह-विष

राष्ट्रात्मा की 

अंतरात्मा के अतिसुरक्षित 

" रस गगन झरै " जन की इयत्ता तक

धीरे-धीरे

धीमा पर निश्चित मृत्युकारक

देह विष फैल रहा है

जिव्हा के
स्वाद-निमित्त 
की गई गलतियाँ

कितनी तकलीफ देती है

मछली के कांटे-सी

गले में फँस आज

राष्ट्र-जीवन का उन्मुक्त श्वास ही
हमसे छीने लेती है !

।। राजपुत्रों का यशोगान...।।
        

हमने 
अमृत पान किया
और 
सूर्य पर अधिकार किया

हमने
अमृत पान किया
और
चन्द्र को तमाछन्न किया

हमने
वृहस्पति से विद्या सीखी
और
गुरु पत्नी से जार किया

हमने
धरती की सौगंध ली
और
उससे उप पत्नी सा व्यवहार किया

हमने
राजसूय यज्ञ किया
निरीहों की बलि चढ़ाई

हमने
मिडास की तरह
नि: स्वार्थ आत्माओं को छुआ
और
उन्हें
ठोस सोने में बदल दिया

हमने
रोटियां सेंकी
जिनसे
खून टपकता था

हमने
जरूरतमंदों को
महल में बुलाया
उनकी
मजबूरियों से
बलात्कर किया

हमने
दस सिरों को
धारण किया

दसों दिशाओं में
भ्रांतियां
फैलाईं

दसों दिकपालों से
जी हुजूरी करवाई

पैरों तले
उनके सम्मान को
दाबे रखा

हमने
अपनी नाभि में
अमृत कुंड
स्थापित किया

और

अमृत कुंड की स्थापना को
अवैध घोषित किया

हमने
अपने
तृप्त पेटों पर
हाथ
फेरते हुए

भूखों
की
अनवरत मृत्यु पर
शोकगान गाया

रेशमी वस्त्र
पहनकर
नंगों की
शोकसभा को
संबोधित किया

हमने
अपने
महल के किनारे
बसी झोंपड़ियों को
बेदखल कर
बेघरों को
घर
देने का
वादा किया

हम हैं
कभी न अघाने वाले
रक्त चूषक
राज पुत्र

हमने
जो किया
आज तक
किसी ने
नहीं किया

               ।।  चुप रहो ।।

चुप रहो
कि देश
जाग रहा है

चुप रहो
कि लपटें
नाच रहीं हैं

चुप रहो
कि आंच
तेज बहुत है

चुप रहो
कि सख्तियां
बेरहम हैं

चुप रहो
कि सपने
टूट रहे हैं

चुप रहो
कि इंसानियत
हांफ रही है

चुप रहो
कि कोई
कांप रहा है

चुप रहो
कि कोई
कांख रहा है

चुप रहो
कि कोई
राख हुआ है

चुप रहो
कि देश अब
जाग रहा है !

            ।।  मि. मिनिस्टर ।।

जबकि यहां
फोटो का
कोई भी
प्रबंधन नहीं है

क्या इसीलिए

मि. मिनिस्टर
आप
इस
बीमार-लाचार-निराधार बच्चे को
आज 
पुचकारेंगे भी नहीं

जबकि 
यहां पर केवल

हम दोनों ही हैं

और

आपकी सुरक्षा का
भयानक एकांत है

मि. मिनिस्टर
अब बता ही दें कि

शराबबंदी---
नोटबंदी की तरह

रातों रात
क्यों लागू नहीं हो सकती

पीनेवाले या
पिलानेवाले

किसके मन में खोट है !

जबकि
रात्रि के 
रति-एकांत में

आप

धर्म के बारे वस्त्र
उतार चुके हैं

मि. मिनिस्टर
यह तो बता ही दें कि

जब श्रीराम ने
शरणागत विभीषण को भी
रावण की लंका में
वापस भेजने का
मंतव्य नहीं दिया

तब
वापस भेजने वाला
यह निरर्थक
शोरोगुल क्या है !

जबकि
रूस के पास

हमसे ज्यादा युद्धास्त्र थे

पर रोजगार नहीं थे

---अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी

अपने ही भार से वह
खुद ढह गया

मि. मिनिस्टर
अर्थ और रोजगार को छोड़

हमें
किस मोर्चे पर
अब 
लड़ना है

मि. मिनिस्टर
बतायेंगे प्लीज---

---हमें सोने की चिड़िया बनना है

---शेर बनना है

---सवा शेर बनना है

---(अ) धार्मिक भक्त बनना है

---या रिमोट कहीं और हो
    ऐसा डिजिटल बनना है

आपकी प्रिय जनता को
भारी भ्रम है

बता ही दें प्लीज !

    ।।  तेज मिजाज का समय ।।

लिहाज का 
समय चला गया

यह
मिजाज का
समय है

गर्म मिजाज का
तेज मिजाज का
खौलते मिजाज का

एक उठे हुए
पंजे वाले
शेर का
समय है

यह
शेर के
शिकार-भोज में
शामिल
हो जाने का
समय है

यह
उसूलों के
रोस्टेड-टांगों को
प्रेम -पूर्वक
मजे लेकर
खा
जाने का
समय है

यह
दुर्दांत
जिन्न के
ऐतिहासिक
पिरामिड से
निकल आने का
समय है

अब
भयानक युद्ध से
विरत हो

शांत हुये अशोक 
के 
चिन्हों-शांति स्तूपों

राहगीर का
अभिनंदन करती धर्मशालाएं

प्यास बुझाते प्याऊ

छाया देते
घने
आत्मीय
वृक्षों का
समय नहीं

यह
ज्ञान के
शांति के
प्रबुद्धता के

बोधिवृक्षों का समय नहीं

यह
बहसों से निकले
निष्कर्षों का
समय नहीं

यह
उस
ऋषि का
समय नहीं

जिसने
सिकंदर को
निर्बाध सूर्य-किरणों की राह से
हटने
कहा था

यह
युद्धरत अशोक का
समय है

यह
माफ करने का
समय नहीं

यह
पुराना लिखा 
सब
साफ
करने का
समय है

अगर
साफ ही
करने का
समय है

तो

यह
दिमाग के
प्रकोष्ठों में

पुराने बुने
असामाजिक
जालों को

साफ
करने का
समय
क्यों नहीं !

   ।।काबुल के बाजार में नीलाम ...।। 
  

सच 
शपहले जो था 
रोटी 
मेहनत से कमाया 

हो गया है अब 
डिब्बाबंद जूस

अधिकतम कमीशन देते 

झूठ का 
विज्ञापन करता 
जगह-जगह 

सुभाषितों से सजी 
ऊर्जस्वी एक कक्षा 

पढ़ते थे हम सभी जिसमें 

आज 
अपनी ही फटी बनियान को 
डस्टर बना 

पोंछ रहे हैं हम 
अपनी सारी स्थापनाएं

गाढ़े रंग की एक 
विज्ञापित शर्ट 
और कन्ट्रास्ट की 
खूबसूरत केप पहनकर 

कम्प्यूटर की स्क्रीन पर 
हम लिखते हैं 

इन्डिया 
फिर उसकी समस्याएँ 

और 
बिन प्रयास 
उभर आये समाधान को देखकर

अचरज करते हैं 
कि इतिहास में 

यह देश 
क्योँ पीडि़त रहा 
न सुलझ पानेवाली 
भीषिकाओं से 

तैमूरलंग के घोड़े 
दौड़ रहे हैं सरपट 

इतिहास से भविष्य तक 
दिल्ली और 
सूबाई राजधानियों में 

कम्प्यूटर स्क्रीन के बाहर 

उसकी सेनाएँ 

गाँवों को 
फसलों को 

रोजी-रोटी को 
स्वावलंबन को 

संतोष को 
सत्यवृत्ती को 
सत्य बुद्धि को 

जला रही हैं 

स्क्रीन के बाहर 

पूज्य मानसिक मूर्तियां 
तोड रहे हैं लुटेरे 

देश-स्थापत्य के 
सज्जित नीति-स्तम्भ 

तोड़कर 
लादे जा रहे हैं 
कूबड़ वाले ऊंटों पर 

एक दिशाहीन 

रेगिस्तानी सफर के लिए! 

और काबुल के बाजार में 

नीलाम करने के लिए हमें 

किसने किया
ये सरंजामे-सफर है 

और 
इस बार
सफर में 
निकलने के पहले 

सुघड़ जीवन के लिए 

माँ से की गई 
कोई भी प्रतिज्ञा 
साथ नहीं है 

माँ का ममतालु 

संतोषी और धैर्य भरा 

सत्तू भी साथ नहीं है 

पिता के लगाये 
पेड़ों की छाया 
साथ नहीं है 

और 
राह में 
पड़नेवाली नदियों में 
पवित्र-तर्पण-मोक्ष-मुक्ति-स्नान का
कोई
मूल्य-संकल्प भी साथ नहीं है 

और सबसे बड़ी बात 
नीलाम हो जाने के बाद 

फिर इसी घर लौटकर 

आने की कोई गांठ भी 

मन में 
बँधी(-खुली) नहीं है 

हम समय को 
बिना समझे 

टॉलस्टॉय के कहानी के पात्र की तरह 

न लौटने के लिए 
बेतहाशा दौड़ रहे हैं! 

दुस्साहस 
-----------

मेरा दुस्साहस देखिए कि
जब बड़े-बड़े युद्धक जहाज समुद्र में उतारे जा रहे हैं /
मैं बांस की टोकरी से नदी पार जाना चाहता हूं / 

जब अट्टालिकाओं की भव्यता से भी लोग संतुष्ट नहीं हैं /
मैं दर्जिन चिड़ि के घोंसले को देखकर खुश हो रहा हूँ /

जब ऊंचे से ऊंचे रेस्तरां के नान रोटियों में भी लोग नुख्स  निकाल रहे हो/
मुझे भुने शकरकंद और आम- पनहा की बेइंतिहा याद आ रही है /

जब अतिव्यस्तता और समयाभाव से लोग विकल हैं 
मैं नदी या झरने के किनारे लेटकर पूरा दिन गवां देना चाहता हूं 

जब पेट्रोल पंपों /शराबखानों के आवंटन में लोग अपनी समस्त प्रतिभा को झोंक रहे होते हैं /मैं गुलाब-छडियां बेचनेवाली बुढ़िया के पास पीपल-छैयां में बैठकर बतियाना चाहता हूं 

जब लोग शहरी चौराहों पर 
अपने पार्टी नेताओं की मूर्तियां लगाने झगड़ रहे होते हैं /
मैं निंदाई के लिये खेत की ओर जाते हुए /
झुर्रियों भरे बूढ़े हलवाहे की अदम्य जिजीविषा को देख खुश होता हूँ

।।  घृणा के महा-अरण्य में दृश्य-दर्शन।।

खंडहरी
लोकतंत्र के

गर्भगृह से

गायब है

इष्ट-मूर्तियां

वेदी पर
ऊपर

हंसते हैं
देव

निष्प्राण

अप्रतिष्ठ हंसी

घृणा के
महा-अरण्य में

घूम रहे
हिंस्त्र-महापशु
यत्र-तत्र-सर्वत्र

लोकतांत्रिक-खंडहर का
भग्न-कलश है
जन- मन

अवगुणों का
प्रायोजित
प्रमोटेड

रम्य-पर्यटन-महा-अरण्य

हम
तमाशबीन

ढूंढते हैं

बुद्ध की शांति

महावीर का तप

शंकर का अद्वैत

पंचतारा पर्यटक-सुविधाओं को
भोगते

देखते हैं

अशोक चिन्ह का 
संरक्षित सिंह

रक्त-पिपासु हो

हममें से ही
किसी एक का
फुर्ती भरा शिकार
करते हुए

खुश होते
लौटते हैं
पर्यटन-महावन से

दैखकर

अपने ही
विनाश का
भव्य-शिकार-सौंदर्य

धन्य ! धन्य ! धन्य !

लोकतांत्रिक -हिंस्त्र -महाअरण्य 

             वोटतंत्र
----------------------------------------
" लांग लिव द न्यू किंग "
उत्तर आजादी के 
राज-सामंत 
अमर रहें

उनके 
पुत्र-पौत्र
फलते-फूलते रहें

वोट 
देने के लिए
उन्हें

अपनी 
झुलसी-कलिकाओं के साथ
जैसे-तैसे
हर हाल में हम
बचे रहें

इंद्र के पुत्र
जयंतों की 
जय हो

चोंच मारने के
सारे अपराध
उन्हें
क्षम्य हों

दिन-ब-दिन
चेहरे उनके
सुर्ख रम्य हों

उनकी सत्ता

और

अपना गर्त

हमारे
काम्य हों

उनका शासन चले---धन्य हों

भले ही हमें
दुखी होना---इसकी कीमत हो

पर वे

उत्तरोत्तर
आनंदित हों

हम
झुकती कमर के साथ
वोट डालें

गुजरती उमर के साथ
वोट डालें

मोहग्रस्त हो
वोट डालें

अंधभक्त हो
वोट डालें

शून्य विवेक हो
वोट डालें

धर्म स्थलों में
धर्म की
मीटिंग कर
वोट डालें

यह हमारा धर्म है
मन से जिन्हें
अस्वीकार कर चुके---

उन्हीं को
स्वीकार करने
हम
फिर
वोट डालें

लांग लिव द न्यू किंग
हम
चाहे मरें

केंसर-ग्रस्त
राजनीति
अमर हो

उत्तर-आजादी के
राजसामंत
अमर हों

उनके
गर्भस्थ-संतानों के प्रति भी
हम
राजभक्त 

          इतनी हंसी 
------------------------------------------
इतनी हंसी
कहां से
लाती हो 
प्रिये !

मैंने
कितने बंधनों में
तुम्हें
जकड़ा

तुम्हारी
हर सौजन्यता पर
अकड़ा

तुम्हारे
हर समर्पण पर
बिफड़ा

तुम्हारी 
रुचियों को
अपराध समझा

इच्छाओं को
नजरबंद किया

स्वप्नों पर
अध्यादेश लाया

आवाजाही पर
टोल टैक्स लगाया

रोजगार की खुशियों का
विमुद्रीकरण किया

पर
इस हंसी के सहारे
तुम
हर मुश्किल से
निकल आईं !

इतनी हंसी
कहां से
लाती हो प्रिये !

तुम
हर मुश्किल पर
एक
सच्चे
देशवासी की तरह
हंसती ही
रहती हो !

यह
देश भी
तुम्हारी ही तरह
हंसते ही रहता है प्रिये !

इतनी हंसी
कहां से
लाती हो
प्रिये !

           वह चुप है 
-----------------------------------------------
वह चुप है 
क्योंकि अभी अवसर नहीं आया 

वह चुप है 
क्योंकि यह सही अवसर नहीं है 

वह चुप है 
क्योंकि अभी समय बुरा है 

वह चुप है 
क्योंकि कोई सुन नहीं रहा 

वह चुप है 
क्योंकि हर कोई बोल रहा 

वह चुप है 
कि कोई बोल क्यों नहीं रहा 

वह चुप है 
क्योंकि उसे ऐसे कहा गया 

वह चुप है
क्योंकि शोर में उसकी धीमी आवाज दब जाती है 

वह चुप है 
क्योंकि उसकी तेज़ आवाज़ खुद एक शोर है 

वह चुप है 
क्योंकि उसकी कोई सुनता नहीं 

वह चुप है 
क्योंकि उसके पास प्रश्नों के जवाब नहीं 

वह चुप है 
क्योंकि उसका मौन विरोध है 

सभी चुप हैं 
क्योंकि बोलने वाले को ऐसा न लगे 
कि विरोध हो  रहा है

गोरख पाण्डेय : उसको फांसी दे दो

भक्त तो तब भी रहे ! पर जिस तादाद में वे पनपे आज हैं कुकुरमुत्तों-सा ;और फिर जो अपने कायरता और बर्बरता का मुज़ाहिरा कि नंग‌ई प्रदर्शन अब कर रहे हैं ; उसके लिए यह कहना लाज़िम है कि गोरख पाण्डेय हिंदी कविता के एक अति विशिष्ट और कालजीवी कवि हुए ! कि उनकी यह कविता कितनी खरी और सच्ची है आज !!  नहीं तो इतने दिनों बाद क्या यह कविता पहले से भी अधिक सघन , घनीभूत और सजीव प्रतीत होती ? बिल्कुल नहीं ; परन्तु ऐसा हो रहा है , ऐसा हुआ !!! तो यह गोरख पाण्डेय की दृष्टि संपन्नता चेतना का प्रभाव है । आज जिस संभावित खतरे को आप हम देख रहे हैं कि समझ पा रहे हैं , उसे गोरख बीसियों बरस पहले किस शिद्दत से महसूस किए कि यह कविता भी उतरी ; आप भी पढ़िए हमारे समय के प्रगतिशील जनवादी सांस्कृतिक मूल्यों के प्रिय कवि गोरख पांडेय को

        उसको फाँसी दे दो 
-------------------------------------------
उसको फांसी दे दो
वह कहता है उसको रोटी-कपड़ा चाहिए
बस इतना ही नहीं, उसे न्‍याय भी चाहिए
इस पर से उसको सचमुच आजादी चाहिए
उसको फांसी दे दो।

वह कहता है उसे हमेशा काम चाहिए
सिर्फ काम ही नहीं, काम का फल भी चाहिए
काम और फल पर बेरोक दखल भी चाहिए
उसको फांसी दे दो।

वह कहता है कोरा भाषण नहीं चाहिए
झूठे वादे हिंसक शासन नहीं चाहिए
भूखे-नंगे लोगों की जलती छाती पर
नकली जनतंत्री सिंहासन नहीं चाहिए
उसको फांसी दे दो।

वह कहता है अब वह सबके साथ चलेगा
वह शोषण पर टिकी व्‍यवस्‍था को बदलेगा
किसी विदेशी ताकत से वह मिला हुआ है
उसकी इस ग़द्दारी का फल तुरत मिलेगा
आओ देशभक्‍त जल्‍लादो
पूंजी के विश्‍वस्‍त पियादो
उसको फांसी दे दो

गोरख पाण्डेय

आलोक धन्वा की गोली दागो पोस्टर

अपने युग को जीता कवि का युगीन चेतना जब अपने समकालीन यथार्थ के व्युत्पन्न थरथराहटों से टकराता है तो कविता तत्कालीन विषमता को, पहले केन्द्रीय बनाता है । 'गोली दागो पोस्टर' के कवि आलोक धन्वा की इस कविता को देखें और माने तो उनका यथार्थ बोध , सन्निकट किसानों पर गहराता संकट , उनके आंदोलन में पहले से कहीं अधिक संश्लिष्ट दिखाई देता है । अतः किसानी चेतना या कि आंदोलनों का पृथकीकरण रूप आज की कविताओं में सर्वाधिक वांछनीयता की स्थिति तक है । आठवें दशक के इस ख्यात और चर्चित कवि आलोक धन्वा के कहन के निहितार्थ में जाएं कि

"यह कविता नहीं है
यह गोली दागने की समझ है
जो तमाम क़लम चलानेवालों को
तमाम हल चलानेवालों से मिल रही है।"

तो यह एक वास्तविक समझ वाली स्वाभाविक बात होगी । आलोक धन्वा यदि इस भय और आशंका के व्युत्पन्न में जो देख रहे कि सवाल कर रहे हैं अथवा कह रहे हैं कि

जिस ज़मीन पर
मैं अभी बैठकर लिख रहा हूँ
जिस ज़मीन पर मैं चलता हूँ
जिस ज़मीन को मैं जोतता हूँ
जिस ज़मीन में बीज बोता हूँ और
जिस ज़मीन से अन्न निकालकर मैं
गोदामों तक ढोता हूँ
उस ज़मीन के लिए गोली दागने का अधिकार
मुझे है या उन दोग़ले ज़मींदारों को जो पूरे देश को
सूदख़ोर का कुत्ता बना देना चाहते हैं

यह आज की ताज़ातरीन स्थिति है जो कि एक खुर्राट और खूंखार सत्ता की तलवे चाट भूख का परिणाम है ।

   गोली दागो पोस्टर
______________________

यह उन्नीस सौ बहत्तर की बीस अप्रैल है या
किसी पेशेवर हत्यारे का दायाँ हाथ या किसी जासूस
का चमडे का दस्ताना या किसी हमलावर की दूरबीन पर
टिका हुआ धब्बा है
जो भी हो-इसे मैं केवल एक दिन नहीं कह सकता !

जहाँ मैं लिख रहा हूँ
यह बहुत पुरानी जगह है
जहाँ आज भी शब्दों से अधिक तम्बाकू का
इस्तेमाल होता है

आकाश यहाँ एक सूअर की ऊँचाई भर है
यहाँ जीभ का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है
यहाँ आँख का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है
यहाँ कान का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है
यहाँ नाक का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है

यहाँ सिर्फ दाँत और पेट हैं
मिट्टी में धँसे हुए हाथ हैं
आदमी कहीं नहीं है
केवल एक नीला खोखल है
जो केवल अनाज माँगता रहता है-

एक मूसलधार बारिश से
दूसरी मूसलाधार बारिश तक

यह औरत मेरी माँ है या
पाँच फ़ीट लोहे की एक छड़
जिस पर दो सूखी रोटियाँ लटक रही हैं-
मरी हुई चिड़ियों की तरह
अब मेरी बेटी और मेरी हड़ताल में
बाल भर भी फ़र्क़ नहीं रह गया है
जबकि संविधान अपनी शर्तों पर
मेरी हड़ताल और मेरी बेटी को
तोड़ता जा रहा है

क्या इस आकस्मिक चुनाव के बाद
मुझे बारूद के बारे में
सोचना बंद कर देना चाहिए?
क्या उन्नीस सौ बहत्तर की इस बीस अप्रैल को
मैं अपने बच्चे के साथ
एक पिता की तरह रह सकता हूँ?
स्याही से भरी दवात की तरह-
एक गेंद की तरह
क्या मैं अपने बच्चों के साथ
एक घास भरे मैदान की तरह रह सकता हूँ?

वे लोग अगर अपनी कविता में मुझे
कभी ले भी जाते हैं तो
मेरी आँखों पर पट्टियाँ बाँधकर
मेरा इस्तेमाल करते हैं और फिर मुझे
सीमा से बाहर लाकर छोड़ देते हैं
वे मुझे राजधानी तक कभी नहीं पहुँचने देते हैं
मैं तो ज़िला-शहर तक आते-आते जकड़ लिया जाता हूँ !

सरकार ने नहीं-इस देश की सबसे
सस्ती सिगरेट ने मेरा साथ दिया

बहन के पैरों के आस-पास
पीले रेंड़ के पौधों की तरह
उगा था जो मेरा बचपन-
उसे दरोग़ा का भैंसा चर गया
आदमीयत को जीवित रखने के लिए अगर
एक दरोग़ा को गोली दागने का अधिकार है
तो मुझे क्यों नहीं ?

जिस ज़मीन पर
मैं अभी बैठकर लिख रहा हूँ
जिस ज़मीन पर मैं चलता हूँ
जिस ज़मीन को मैं जोतता हूँ
जिस ज़मीन में बीज बोता हूँ और
जिस ज़मीन से अन्न निकालकर मैं
गोदामों तक ढोता हूँ
उस ज़मीन के लिए गोली दागने का अधिकार
मुझे है या उन दोग़ले ज़मींदारों को जो पूरे देश को
सूदख़ोर का कुत्ता बना देना चाहते हैं

यह कविता नहीं है
यह गोली दागने की समझ है
जो तमाम क़लम चलानेवालों को
तमाम हल चलानेवालों से मिल रही है

अनिल करमेले

जब हमारी चेतना सचमुच में जागृत होती है , तब जाकर हम ऐसे सवालों के साथ खड़ा हो पाते हैं । ऐसा सख्त प्रतिरोध तभी संभव हो पाता है जब हम तथ्यात्मक हो निर्लज्ज नुमाइंदों-सा , स्पेस नहीं बनाए रखते । यह एक खरी-खोटी है कि क‌ई कुछ अनर्थ के होते हुए भी , अर्थ तलाशे जाते रहे । क्या कम है, यह उस पाषाण साम्राज्यवाद नीतियों के दुश्चक्र की परख के लिए ; कि उनके द्वारा घोषित बिम्ब और मुहावरों से भरे अभद्र संकेतों को समझने के लिए , कि संप्रदायिकता के नंगेपन की शिनाख्तगी के लिए । अस्तु असंख्य सवालों और झंझावातों से घिरे मानव के लिए अनिल करमेले जैसा काव्य तर्क उपस्थित कर हैं वह मुझे अधिक मूल्यवान लगता है , यानी अधिक संगत और स्वभाविक भी ।  यदि समकालीन हिंदी कविता के नवें दशक के सक्रिय कवियों को नामित किया जाए तो अनिल करमेले अपनी चित्रकारी के साथ कविता के इस प्रांगण के वे खूबसूरत गुलदस्ता हैं जिनमें प्रचुर मानवीय मूल्य बोध और और उसके वैविध्य से भरा रंग समाया हुआ है । हिंदी कविता में वैचारिक आग्रह और वैज्ञानिक तर्क़ को मूर्त करने वाले चित्रकार कवि अनिल करमेले की काव्य यात्रा इस दशक के समृद्ध कवियों में मदन कश्यप , कुमार अंबुज शरद कोकास ,अनवर शमीम , देवीप्रसाद मिश्र , दिनेश कुशवाह , हरिओम राजोरिया , बुद्धि लाल पाल के साथ का है । जो निरंतर ऊर्जस्वित हैं और धारा को बल देते आए हैं । आज पढ़िए साथी कवि चित्रकार अनिल करमेले की कविताएं
 

|| देवताओं को सोने दो ||

जब बहुत ज़रूरत थी मनुष्यों को देवताओं की
वे निद्रा में थे अपनी आरामगाहों में

कथित नुमाइंदे निर्लज्ज तरीके से लगे हुए थे
अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए
वे वोटिंग मशीनों तक गायों को खींच लाए थे
वे बता रहे थे 
हमारे सोने की चिड़िया रह चुके देश में
अब बहुत अच्छा समय आ गया है
अब कोई दलित नहीं, कोई ग़रीब नहीं बचा

स्त्रियाँ अभी भी शर्मसार थीं
बच्चे अभी भी फुटपाथों पर, प्लेटफार्म पर, होटलों में काम करते थे
भ्रूण परीक्षणों में लगे हुए थे धंधेबाज
बेरोज़गारों को गायों को बचाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी
अल्पसंख्यक मारे जा रहे थे
गरीबों और मजलूमों की होली जलाकर
अमीर दिवाली मना रहे थे

देवता सो रहे थे चैन की नींद

देवता सोते ही रहेंगे चैन की नींद
उनके नाम पर किए जा रहे तांडव से
हमें ही बचानी होगी यह दुनिया
हमें बढ़ाना होगा आपसी प्रेम
भूखे पेटों को रोटियाँ देवता नहीं खिला पाएँगे

वे उठेंगे तो उनकी ज़रूरतें
हम कहाँ पूरी कर पाएँगे

उन्हें सोने दो मित्रो
वे कहीं भी रहें
इस पृथ्वी पर उनकी ज़रूरत नहीं रही।

        गोरे रंग का मर्सिया
-----------------------------------------

सौन्दर्य की भारतीय परिभाषा में
लगभग प्रमुखता से समाया हुआ है गोरा रंग
देवताओं से लेकर देसी रजवाड़ों के राजकुमारों तक
सदियों से मोहित होते रहे इस शफ़्फ़ाक रंग पर
कुछ तो इतने आसक्त हुए
कि राजपाठ तक दाँव पर लगा डाला

अपने इस रंग को बचाने के लिए
बादाम के तेल से लेकर
गधी के दूध तक से नहाती रहीं सुन्दरियाँ
हल्दीे, चन्दन और मुल्तानी मिट्टी को घिस-घिस कर
अपनी त्वचा का रंग बदलने को आतुर रहीं
हर उम्र की स्त्रियाँ
कथित असुन्दरता के ख़िलाफ़ अदद जंग जीतने के लिए

जंग जीतने के लिए राजाओं ने ऐसी ही स्त्रियों को
अपना अस्त्र बना डाला
साधन सम्पन्न पुरुष अक्सर सफल हुए गोरी चमड़ी को भोगने में
कुछ पुरुष अन्धे हो गए इस गोरेपन से
कुछ हो गए हमेशा के लिए नपुंसक
और कुछ ने तो इसकी दलाली से पा लिया जीवनभर का राजपाठ

गोरे रंग के सहारे कामयाबी की कई दास्तानें लिखी गईं
पूरी दुनिया में अक्समर मिलते रहे ऐसे उदाहरण
जब चरित्र पर गोरा रंग भारी पड़ता रहा
दरअसल गोरेपन को पाकीजगी मान लेना
हर समय में दूसरे रंगों के साथ अत्याचार साबित हुआ

इसी गोरेपन से
किसी लम्पट के प्रेम में पडक़र
असमय इस दुनिया से विदा हो गईं कई लड़कियाँ

उजली और रेशमी काया से उत्पन्न
उत्तेजना के एवज में
अक्सर मर्सिया दबे हुए रंगों को पढ़ना पड़ा
आख़िर गोरा रंग हमेशा फकत रंग ही तो नहीं रहा ।

            उनकी भाषा
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एक ऐसी भाषा का उपयोग करते हैं
कि हम अक्सर
असमर्थ हो जाते हैं
उनकी नीयत का पता लगाने में

हम भरोसे में रहते हैं
और भरोसा धीरे-धीरे भ्रम में बदलता जाता है
जब छँटता है दिमाग से कोहरा
नींद छूटती है सपनों के आगोश से
आँखें जलने लगती हैं सामने की तस्वीर देखकर

लेकिन हमारी मुट्ठियाँ तनें
और उबाल आए बरसों से जमे हुए लहू में
उससे पहले
आते हैं हम में से ही कुछ
बन कर उनके बिचौलिए
डालते हैं ख़ौफ़नाक तस्वीरों पर परदा
और लगा देते हैं हमारे गुस्से में सेंध

अपने लाभ और लोभ में घूमते हुए
हम भटकते रहते हैं इधर से उधर
और कायरों की तरह
अपनी भाषा की तमीज़ में
लौट आते हैं...

    हम न‌ई राह की तैयारी में है
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हम उस मिट्टी में पैदा हुए मित्र
जहाँ महीनों पड़ोस से अंगार लेकर
जल जाता था चूल्हा
जहाँ सूरज
फूटता था था औजार की नोक पर
और धरती हरी हो जाती थी
वहाँ बहुत कम लोगों ने पढ़ी थीं किताबें
बहुत सारे लोग
भोपाल का नाम भर जानते थे

उस समय हम अपने कदम जमाने
और एक तरह से
अपना कद ऊँचा करने की
कोशिश कर रहे थे लगातार
हमारे पास
ऊबी हुई शामों
गहराती हुई खाली और काली
और बेचैन रातों के सिवाय
कुछ अपने थे तो सपने ही थे

मनहूस रातों की
दिल पर लगातार ठक-ठक
और बेहिसाब करवटों से घबराकर
ये सपने
चढ़ते सूरज के साथ रोज़ बढ़ते
और पश्चिम में सूरज के साथ ढह जाते

हमारे मन में हर सुबह
उम्मीद के साथ
छोड़ जाती पारे की तरह कई सवाल
इन फिसलते सवालेां की दुनिया में
हम बेकार थे और बेजार भी थे

और यह कहना भी सरलीकरण होगा
कि हम दोपहर उम्र की तरह काटते थे
हमने अपनी डायरी में
तमाम बड़े शहरों के निवासी
अपने रिश्तेदारों के पते दर्ज़़ किए
बड़ी ललक के साथ
उन पतों पर पहुँचे थी कई बार

और बहुत उम्मीदों भरी
मगर बेहद मजबूर रातें गुजारीं
उनके बच्चे हमें एकदम गँवार
और इसलिए तिरस्कार के योग्य समझते रहे

मगर लड़कियों के पिताओं की ऑंखों में
दूर भविष्य के लिए
एक गहरी चमक दिखाई देती रही
वे इतिहास की सारी नवाबी भूलकर
बराबर मनुहार से
पेट भर रोटी खिलाते रहे

हम बेहद मज़बूर थे
मगर हमें लगा मज़बूरी के भी कई रंग हैं
वैसी ही गहरी तासीर के साथ
ग्लानि शर्म और आक्रोश को दबाकर
तन और मन को चूर करने वाले

हमारी प्रेमिकाएँ
हमारे खालीपन से लगातार परेशान होने के बावजूद
हम पर बेतरह विश्वास में मुब्तिला थीं
वे पीली रंगत की इकहरी देह वाली
बेहद शर्मीली लड़कियां थीं
छत से ताकना और हवा में चुंबन उछालना
उन्हें ज़रूर आता था
मगर वे अंधेरे से डरती थीं
और उजाले में अपनी ही देह से परेशान

उनके परिवार के
पहले और आखिरी फरमान की घड़ी में
उनके प्रेम की अकाल मौत तय थी
हमारे मन में
अपनी मासूम आवारगी को छोड़कर
उन्हें अपने बच्चे की मॉं बनाने का
खूबसूरत सपना था
हमारे जीवन की पूंजी
और भविष्य की ठोस जरूरत से उपजा हुआ
मगर हमारे सामने और सवालों की तरह
यह भी कोई आसान सवाल नहीं था

हमारे पिताओं के पास
अपनी दो-चार साल की बची नौकरी
या दो-तीन बीघा ज़मीन
या सेठ की मुनीमी
और गहरे उच्छवासों के अलावा कुछ नहीं था

पढ़े-लिखे नातेदारों के आने पर
उनके पास सफाई के लिए
नए बहाने तक नहीं बचे थे
ऐसे मौकों पर हम तो
मुँह दिखाने के काबिल भी नहीं थे

हमारे पास खोने के लिए
अब सिर्फ ईमान बचा था
वही ईमान हमें दर-ब-दर किए हुए था

हमें बुजुर्गों ने बार-बार चेताया
कि चालाक होने से बेहतर है हार जाना
ज़रूरी है चालाकियों को समझना
उन्हें भेदना
एक नई राह निकाल ले जाना
हम ईमान को बचाते हुए
नई राह निकालने की तैयारी में हैं।
विचारधारा के रूप में वाम, मनुष्यता की अग्नि परीक्षा है यह नैसर्गिक और मार्क्स से भी पहले का है । मार्क्स ने इसे डिजाइन किया ।

पितृसत्ता द्वंदात्मक भौतिकवाद का एक कुरूप सच है

पुरुष अंततः पितृसत्तात्मक राज व्यवस्था का अधिपति हैं ! उनके मुकाबले स्त्रियां मुझे अधिक सहनशील व प्रगतिशील लगती हैं । पर उनमें भी एक खोट है ; कि वे परम्परा और रूढ़ के महीन फर्क से निजात नहीं पातीं । इससे क‌ई-क‌ई बार वे स्त्री विरोधी भी होने लगती हैं । विरासती पितृसत्ता इसी फांक व द्वंद से ही कामयाब होते रहे हैं और यह सत्ता अपने चरमोत्कर्ष का जश्न मनाती है । कहना न होगा कि इन मायनों में देश , समाज , पूंजी , बाजार सब लकवाग्रस्त और बीमार हैं ।

दुष्ट षड्यंत्रकारी छल के मासूमियत में न जाएं

"अब तो समय ऐसा हो गया कि पतले दूध की शिकायत करो तो ग्वाला भी गाय का मनोबल गिराने का आरोप लगाता है "। इसे हमारे आज के भारतीय समाजिक राजनीतिक ,दशा के निहितार्थ में भी देखा-समझा जा सकता है । भक्त मंडली का यह  मनोचित दशा सिर्फ यही आ,  नहीं ठहरते , बल्कि आरोप-प्रत्यारोप और शक्ति संपन्नता का सामंती अवशेष अब तो कला रूपों में भी अभिव्यक्त होने लगा है ।

प्रतिरोध के प्रति उदासीन जनता अपना ही बेड़ा गर्क करती है

साथी हिमांशु कुमार गांधीवादी चिंतक तथा सामाजिक कार्यकर्ता हैं । जनता के काफी निकट और पक्षधर होकर भी वास्तविक सच को नकारते नहीं । वे कहते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में क‌ई नामचीन हस्तियों का जो हश्र हुआ उसके लिए कोई सरकार या सत्ता कि विपक्षी राजनीतिक दल दोषी नहीं थे । जिसे वे एक  सामान्य सी कहानी के माध्यम से साफ़ करने की कोशिश कर रहे हैं । वस्तुत: हम लगातार हताश निराश जनता शोर-शराबा तो बहुत करते हैं पर जब घड़ी निर्णायक स्थिति को अपनी विजय में बदल पाने के लिए आती है तब सही कार्रवाई से खुद को अलग कर जनतंत्र का गला घोंटने में मददगार बन जाते हैं । यह हमारे लिए ज़लालत भरा काम है । आओ साथियों पुनर्विचार करें और अपनी गलतियों को सुधारें निकट विधानसभा चुनाव में नीति का वरण करें , दुर्नीति का त्याग करें , ताकि स्वस्थ्य समाज के निर्माण में हम ईमानदार और कारगर बन सकें ।
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पिछली बार ईरोम शर्मिला चुनाव हार गई,

सोनी सोरी चुनाव हार गई,

दयामनी बारला चुनाव हार गईं,

मेधा पाटकर चुनाव हार गईं,

खलील जिब्रान की एक कहानी में उन्होंने लिखा है कि मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते ?

तो उस फ़कीर ने कहा कि तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़ कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है. 

पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिये इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है 

और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है .

धार्मिक, जातीय घृणा, रंगभेद और नस्लभेद से बीमार इस मानवता का इलाज करने की कोशिश करने वालों को पहले तो हम मार डालते हैं . 

उनके मरने के बाद हम उन्हें पूजने का नाटक करने लगते हैं .

 ० Himanshu Kumar की वाल से साभार.

अस्मिता और पहचान

अस्मिता और पहचान की राजनीति ने देश को न सिर्फ धार्मिकता और अंधविश्वास के गर्त में ढकेला, बल्कि जाति और श्रेष्ठता बोध के रास्ते हमें काफी संकीर्ण और संकुचित भी बना दिया . यह यही न संभल कर , इस कदर हमें तुच्छ और तुष्टिकरण के मार्ग में ले गया है कि हम जातिवाद जातिबोध के बैनर उठाये हिंसक हो बैठे हैं. यह समाज के लिए अनुपयोगी तो है ही देश को तोड़ने वाला भी है. साथी हिमांशु कुमार का यह पोस्ट विचार और दृष्टि से आज पुनर्विचार की मांग कर रहा है कि हम कुछ तो सुधरें कुछ तो बदलें . 

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अस्मिता और पहचान की राजनीति की एक सीमा होती है,

दलित अस्मिता,आदिवासी अस्मिता, अल्पसंख्यक अस्मिता आन्दोलन की ज़रुरत तो है,

लेकिन इंसान को अस्मिता के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए होता है,

दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक को रोज़गार,शिक्षा तरक्की की ज़रुरत भी है,

अस्मितावादी आन्दोलनों के साथ मेरे दोस्ताना सम्बन्ध रहे हैं,

मुझे यह देख कर बेचैनी होती है कि इन आंदोलनों में कुछ लोग अतिवादी हो गए हैं,

ये लोग अपनी समूह अस्मिता के अलावा दूसरी अस्मिता और पहचानों से नफरत करने लगते हैं,

यहाँ तक कि मैंने कुछ दलित अस्मितावादियों में जाटव कार्यकर्ताओं को बाल्मीकियों के खिलाफ लिखते देखा है,

अनेकों कार्यकर्ता तो इतिहास के बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं,

व्हाट्सएप पर गलत जानकारियों से भरे मेसेज पढ़ कर उनकी नफरत और गहरी हो गयी है,

जाति मुक्त और साम्प्रदायिकता मुक्त समाज बनाने की जगह जातिगत घृणा फैलाई जा रही है,

गांधी के खिलाफ भयंकर माहौल बनाया जा रहा है,

पिछले दिनों भंवर मेघवंशी भाई बता रहे थे कि गांधी की मृत्यु के बाद अम्बेडकर साहब वहाँ पहुँच गए और आधी रात तक वहीं गांधीजी के शव के पास बैठे रहे,

आंबेडकर साहब गांधी की शव यात्रा में पैदल चल कर गए,

लेकिन आज संघी गांधी के खिलाफ कम ज़हर उगलते हैं खुद को अम्बेडकरवादी कहने वाले गांधी के खिलाफ ज्यादा घृणा फैला रहे हैं,

कई  बार खुद को अम्बेडकरवादी कहने वाले जाकर भाजपा और शिव सेना में शामिल हो जाते हैं,

अम्बेडकर जातिनाश चाहते थे,

लेकिन कुछ लोगों ने अम्बेडकर को किसी ख़ास जाति की दूकान में बिकने वाले माल की तरह एकाधिकार कर लिया है,

मेरा जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ क्या यह मेरा अपराध है ?

क्या इसलिए मैं अम्बेडकरवादी नहीं हो सकता क्योंकि मैं किसी ख़ास जाति में पैदा नहीं हुआ ?

कुछ लोग तो इतना ज़हरीला लिख रहे हैं और सारी ज़िन्दगी आदिवासियों दलितों और अल्पसंख्यकों की समानता के लिए काम करने वाले और कुर्बानियां देने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की जातियों के कारण उनकी आलोचना कर रहे हैं,

यह तो जातिवाद को बढाने वाली हरकत ही है,

देश भर के वंचित और शोषित लोगों की समस्याओं को समझना और उनके आन्दोलनों की आपसी एकता एक ज़रूरी काम है,

लेकिन ऐसा करने की बजाय अगर आप नफरत फैलाने को फायदे का काम समझ रहे हैं,

तो आप अपने न्याय की लड़ाई को ही नुकसान पहुचाएंगे,

सुरेश शर्मा

सुरेश शर्मा बीसवीं सदी के नवें दशक के कवि हैं । मानवीय मूल्यों के स्थापत्य के प्रति कटिबद्ध तथा निरंतर चिंतनशील कवि हैं । उनकी रचनाशीलता समाज सापेक्ष घटनाओं- परिघटनाओं से जुड़कर सामाजिक ताना-बाना का न सिर्फ रचाव करती है , बल्कि समाजोपयोगी जरूरतों का ख्याल रख , ईमानदार सामाजिकता अथवा कि मानवीय सरोकार के भी होते हैं । यानी उसका कायांतरण वे जिस सरल-सुलभ ,अनूठे सौन्दर्य बोध में रचते हैं बतौर पाठक मुरीद होना ही , होता है । हालांकि तमाम सहमति-असहमति के, बतौर ग़ालिब कहें तो

'ग़ालिब' बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे 
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे "

 चचा ग़ालिब के इस शेर का उद्धरण मैं इसलिए ही दे पा रहा हूँ कि इतनी बेहतरीन भाव ,संवेग , कला , सौंदर्य दृष्टि , जीवन बोध जिनकी कविताओं में हो , वह कवि आखिर परिदृश्य पर उस तरह से क्यों नहीं देखा जा सका , जिस तरह से समकालीन साथी देखे जा सके हैं ? तो इसका एक बड़ा कारण एक तो यह है कि कि सुरेश शर्मा की कविता में अधिक मानवीय तटस्थता है । जीवन को अधिक व्यवहारिक रूप में देखने का तटस्थ नजरिया है । तथा दूसरा बड़ा कारण हिंदी का दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति भी है कि हिंदी समाज में मान का व्यक्ति पूजन नजरिया , व्यक्ति केन्द्रित और ईर्द-गिर्द का है । जिसका कि ड्रा बैक इस रूप में सामने आता है । एक संपन्न और समृद्ध कला अपने कलावादी मानकों से अधिक ससंपन्न, परिष्कृत,और समृध्द तो दिखता है परन्तु वह मुकाबले अपाहिज और विपन्न इसलिए है कि पक्ष में स्पष्टता का अभाव प्रतीत होता है । यह तब हो रहा है जब हम एकांगी हो बहुविध, बहुरंग को नकार गए होते हैं । तथापि अब कहना न होगा कि हिंदी कविता में ठहराव या कि संकुचन की इस प्रवृत्ति का प्रभाव उसके नकार की प्रवृत्ति खेमों के , विचारों के , आग्रहों के प्रचलन में साफ़ और स्पष्ट रूप में पहले से कहीं अधिक गहराए हुआ दिख रहा है । यानी सुरेश शर्मा की कविता का एक बड़ा पाठक वर्ग होने के बावजूद यदि वे नामित नहीं दिखाई देते हैं तो इस तरह के प्रश्न या कि जिज्ञासा का होना लाजिम है ।

यह सच है कि कठिन समय पर सिर्फ अपनी ईमान और निष्ठा ही हमें बचाता है । तमाम छद्म या कि आडंबर स्वत: विरक्ति लिए चला जाता है । उस समय बस!शब्दों का रहता है साथ । शब्द ही बनाए रख सकते हैं विश्वास । कहना ना होगा

"ना सभा-समारोह,ना बहस बौद्धिक
ना छद्म व्यवहार"

बचा पाएगी हमें । 
चूंकि

"कठिन समय में
ना लाल-पीला,ना हरा सलाम 
ना मार्ग वाम,ना दाहिने से काम"

 चलेगा ! 
चूंकि छूटे,टेढ़े-मेढ़े सब रास्ते तभी संग साथ होते और रहे हैं जब तक कि चीजें आपसे नियंत्रित होता है अन्यथा सब कुछ तमाम हो जाता है । यह बात और उस समय को एक सजग कवि जल्दी ही समझ जाता है । इसलिए ''वे लोग" उसे क्या नकारेंगे , वह खुद ही

"भद्रजनों की पंक्ति में शुमार नही हुआ"

एक पक्षधर कवि का मनोविज्ञान यह बखूबी जानता है , जानता है कि कठिन समय के आगे के दिनों में उसका विश्वास ही मूल्यवान है । इसलिए वह

" ना मंदिर में गया ना मस्ज़िद में...! "

और वह भरपूर

"बचा!मंचासीन 
भव्य पुरुषों की भव्यता से बचा.. 
रिरियाते विद्वजनों की दीनता से बचा.. 
जो थे 'कापुरुष' उनके पौरुषेय चिंतन से बचा

हर संभव,छल-छद्म और पाखंड से बचा..!"

फिर 

"सहेजता रहा 
आग और उम्मीद और कोंपल
 का हरापन जो सुरक्षित था अभी" भी

बुजुर्गों और बच्चों और पृथ्वी के पास 

‌वस्तुत: यह लौटना है कठिन दिनों में , शब्दों के सहारे शब्दों के साथ लौटना है । 

मनुष्य के जीवन में रिश्ते भी बुनियादी जरुरत की तरह हुए । बुनियादी जरूरतों को मनुष्य ने काफी हद तक अपने ही संघर्ष से हासिल किया । किन्तु रिश्ते को वह प्रयास से कभी हासिल नहीं कर सका । यह संभव भी नहीं है । रिश्ते जज्ब करने की बात है, अनुभूत करने की बात है, यह त्याग और समर्पण तथा मान के मांग के बाद स्वत: करीब आई बात है । हिंदी कविता में कि वैश्विक कविता में जो दर्जा मां को मिली है वह शायद ही किसी और को मिला , मिला भी तो लगभग प्रेम में डूबे प्रेमी जोड़ों को मिला । इन मायनों में पिता संभवतः दूसरे नम्बर पर है । इस बीच पिता पर जो कविताएं मुझे दिखी उसमें नीरज नीर #Vijay Kumar #Rajat Krishna #Mohan Kumar Nagar #Vivek Chaturvedi #Santwana Shrikant मिथिलेश कुमार राय की कविता भी उल्लेखनीय कविताएं हैं । उसी कड़ी में छोटे छोटे टुकड़ों पर लिखी सुरेश शर्मा की यह कविता भी काव्य के संप्रेषण ,संवेदना ,भाषा और शिल्प के मामले में स्तरीय रहकर उनके उपस्थिति-अनुपस्थिति से बने अभावों और प्रभावों का एक रूपक बिंब बनाती है । मसलन कि

"पिता
घनी छाँह थे !
छाँह में पले-बढ़े, हम हुए खड़े"

 प्रभाव साफ़ है
और अभाव उतना ही स्पष्ट

"फिर/ बड़े..हम इतने बड़े हो गए
कि, पिता स्मृति में खो गए !"

इसी तरह इस दूसरी , तीसरी कविता में भी

"थे / पिता 
तो अंगूठे पर था जमाना,"

पहले प्रभाव है , उसके बाद अभाव । देखिए

"अब! जमाने के अंगूठे पर हम
था, पिता में कितना दम !!"

"बरसों-बरस रहे,
पिता के कांधे सवार!
घूमे शहर-शहर/ घूमे मेले हज़ार"

"पिता, एक ही बार..आए कांधे हमार
चले हम हरिद्वार!!"

प्रतिरोध का यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह राजनीतिक सत्ता का ही विरोधी रहे । विरोध के लिए सैकड़ों वैकल्पिक मोर्चे हमारे ही आसपास मौजूद हैं । जिसे छूना जरूरी ही नहीं उस पर समान रुप से आक्रमण करना भी आवश्यक है । यानी उनमें से एक ,यह भी है कि जिस पर सबसे अधिक विश्वास किया और उसका ही नेपथ्य में चला जाना है ! बाकी तो यह मंच विदूषकों के अट्टाहस से भरा हुआ है । कहना न होगा कि अभी , इन बहुरुपियों का शिनाख्त बेहद जरूरी के साथ कम मुश्किल काम नहीं है । चूंकि ये वो लोग हैं जो दांए-बांए सबमें खड़े भव्य पुरूषों के यशोगान में मुग्ध हैं । जबकि वस्तुस्थिति यह है कि

देश !
बाजार में बदल रहा था 
बदल रहे थे आँगन और चौपाल 
भाषा अपरिचय की दहलीज पर खड़ी थी 
और फूहड़ता शनैः शनैः तब्दील हो रही थी 
संस्कृति में

इसलिए सुरेश शर्मा के इस कथन का मान और भी अधिक बढ़ जाता है कि

इस विकट समय में/कौन जतन करें 
कि थोड़ी-सी उम्मीद...प्रेम थोड़ा-सा
 थोड़ा-सा भरोसा बचा रह जाए!!

मसलन कि किसान आंदोलन को लेकर जो फब्तियां कसी जा रही है जो अविश्वास पैदा किए जा रहे हैं 

इस विकट समय में/कौन जतन करें

विद्रोह के तरीके और तेवर ईजाद करने के मामले में कुछ टूल्स बड़े मायने रखते हैं ; एक तो कवि की मजबूती के साथ रखा गया कथ्य , दूजा नक्काशी की बारीकियों में यानी करीने से भाव व विचार को बिल्कुल सही-सही जगह रख जाए वह शिल्प । तिसरका उसके टकसाल से सुगठित ढाला गया देशज बिम्ब । जो एक कवि के कविता के भीतर उसके काव्य भाषा , मुहावरों , और कहन की शैली यानी , कथनीयता से आते हैं और काव्य के संप्रेषण को बहुत दूर तक ले जा पाने समर्थ होते है । बताना न होगा कि इस संदर्भ में प्रत्येक कवि का रकबा-खसरा अपना-अपना होता है । यही बात सुरेश शर्मा के विरोध और तेवर के संदर्भ में कहा जाए तो सुरेश शर्मा बिल्कुल ही उन अलहदा कवियों में शुमार हैं जो तेज व्यंग्यात्मकता में शालीन विद्रोह को रचते हैं । मांग के मुकाबले पूर्ति अहम् है । किन्तु जरूरत भर मांग के आगे दरकार भर पूर्ति की संभावनाएं क्षींण हो तो , जो शक्ल से आदमी होगा , भाव विचार से मनुष्य होगा वह , उसके बेचारगी का शोक मनाते कहेगा ही

"राजन!
बहुत कम चाहिए हमें
बहुत भव्य तुम्हारी दुनिया से"

 वह मांगेगा भी तो

"अनाज उतना!दे चिड़िया को पेट भर
जल उतना!दे सरोवर अंजुरी भर जितना"

सुरेश शर्मा की इस कविता की भाव भंगिमा जो प्रत्यक्षत: दिख रही है वह करूण तरूणाई में है किन्तु अदृश्य में तथा अप्रत्यक्ष में जो वे कह रहे हैैं वह कम अप्रत्याशित अट्टाहस में, नहीं निकली है । उसके लिए ; जिन्होंने ने हमारे हिस्से की मुट्ठी भर धूप और छांह को कैद कर रखा है, उनके लिए वे कहते हैं

"पृथ्वी 
सारी तुम्हारी राजन
बस छाँह भर अपनी 
जो सुख में दे दुख में काम!"

सुरेश शर्मा की इस कविता के कैनवास को देखें तो यह व्यंजना से कहीं अधिक अभिधा में , शालीन विरोध की साफ़गोई में , सही और जरूरी के चुनाव में है । 

"जो गुम हो रहा जीवन से/बचाये रखनी है आग जो मद्धम हो रही लगातार... 
बचाये रखना है, हँसी बच्चों की" !

के लिए साफ़ इंकार भी करती है

"ऐसे में 
संभव नही किसी मुनादी पर
शाही जलसे में शरीक होना
राजन ! क्षमा करें .. ! !"

सुरेश शर्मा की कविताओं में उनका मानवीय प्रेम का कायांतरण अभिभूत करने वाले हैं । चालू मुहावरों के बनिस्बत साहसी प्रतिरोध का अलख जगाता एक लामबंद सामूहिक चेतना का आविष्कार करता है । अतः प्रचलित चालू मुहावरों के वैशिष्ट्य से आगे

"शुरू करनी ही होगी 
स्थगित यात्राएं,स्थगित थी 
जो खतरों के भय से"

सुरेश शर्मा की कविता अनुकूलन-प्रतिकूलन के उर्ध्व में खड़े रह , अनुकूल का तलाश तो करती ही है ; प्रतिकूल का तराश करने में भी मुस्स‌असल लिए आरोह में बनी रहती है ।

"पंख को चाहिए आकाश
बीज को जमीन
थोड़ा साहस पैरों को 
 और चाहिए संकल्प 
एक जिंदा लड़ाई को"

 वह कैसे ? 
इसका भी , प्रत्युत्तर रचते वे कहते हैं

"कि,जैसे 
भूख को पीठ पर लादे 
संकटों के पहाड़ चढ़ती है 
मजूर औरत की आँखों में 
उम्मीदें दूब-सी ऊगती है" 

मनुष्य के साहस गाथा का जो बिंब , वृतांत , वृत्त चित्र सुरेश की कविता में आए हैं वह असीमित अपरीमित और पक्षीय विश्वास से आए हैं ।

"कि,अनन्त काल से पृथ्वी को नापता 
एक आदमी,भयावह सुरंग से गुजरता है आंगन में एक टुकड़ा छाँह का ठहरता है" 

मौजूदा खतरों के जद़ में कौन नहीं है ? बचा कौन है ?? इसकी बेहतर शिनाख्तगी तथा उन शिनाख्त बिंबों के मार्फत सुरेश शर्मा हर-एक को अपने चिंतनशील विचारों से अवगत कराते ,आश को दीप्त रखते हैं । ठीक वैसे ही

जैसे,शुरू करती है मंजूर औरत
जैसे,सुरंग से गुजरता है आदमी
जैसे,बच्चों की आस पर 
उड़ान भरती है चिड़िया!

दुनिया उम्मीद पर टिकी है और कायम भी है तो ऐसे विश्वासों से भरे रह सकने के कारण है ; हम कह जाएं तो ग़लत क्या!

असमाजिक तत्वों के जब्बर नुकीले दांत और ख़ूनी पंजों से बेटियों को बचाया जाना जरूरी है । एक कवि की चिंता में यह झलक रहा है कि खटकने लगी है तो निश्चय ही यह हमारी भी चिंता का सबब होना चाहिए । सुरेश शर्मा आम रचाव के इतर गहन मानवीय संवेदना , सावधानी और जरूरतों के कवि हैं जिनकी काव्यात्मकता भी उन आम रचाव के आगे की है ; जो एक रोड मैप तय करती है । चूंकि समय और परिवेश तथा परिस्थितियां अतिरिक्त सतर्कता का आग्रह लिए चौकन्ना रहने का समय है ! कि

लड़कियाँ खिलखिलाती हैं 
सीखते हुए वर्णमाला और 
गंध धूपबत्ती की फैल जाती है 
आँगन में, मगर सावधान ! 

"यह बाज़ के झपटने का समय है"

कि

"लड़कियाँ गुनगुनाती है 
अम्मा का दुःख बंटाते हुए 
और घण्टियों की रुनझुन 
बज उठती है मन में,मगर सावधान!"

"यह चीतों के घात लगाने का समय है"

कि

"लड़कियाँ बतियाती है
सपनों में, परियों से
बासंती हो जाती है हवा 
और झूमने लगता है हरसिंगार 
मगर सावधान!"

"यह तेजाबी हमलेका समय है"

कि

"लड़कियाँ बाजवक्त हिरनी होती है
कुलाचों में भरकर इरादे वह 
नापती है ज़मीन,पहाड़ और 
आसमान, मगर सावधान!"

"यह बेहद चौकन्ना रहने का समय है"

"आख़िर कौन इच्छाओं से,जन्म ले रही थी वे 
और मार दी गई,कौन इच्छाओं से !"

 यही वह गंभीर सवाल है , प्रश्न है हमारी भाव संवेदना और विचार दृष्टि पर कि सुरेश शर्मा की इस कविता में सवाल के परस्पर जवाब भी अपने समग्र चिंताओं में सन्निहित है । और यह तब तक कि जब तक हमारे भीतर बचा रहेगा कुछ आदिम राग और गंध । ये चिंताएं भी बची रहेगी पूरे जोश ओ खरोश में । हालांकि भाव संवेदना के स्तर पर इस कविता में जो मार्मिकता दिख रही है वह धरातल पर नहीं है यानी हम जितना भी प्रगतिशील होएं , दिखें , जब चुनना हो , तय करना हो हमारी प्राथमिकताएं हमारा विश्वास धरा का धरा रह जाता रहा है । यह सबसे दुखद पहलू है और कवि की कविताई सार्थकता इस बात पर है कि वह शोषित का पक्षकार है शोषक के विरूद्ध है ।

एक आदमी अपने जीवन में यदि नमक को कर्ज अदायगी रूप में चुकाने की जतन और चिंता कर रहा है तो मैं उसके विश्वास का हिमायती होऊंगा , उसकी नेक नीयती का पूरा सम्मान करुंगा कि हमारे भीतर आज भी मनुष्य के नमक और कर्ज के मोल को लेकर गंभीरता बनी हुई है । कोई तो है , जो उसे सस्ते उत्पाद अथवा वस्तु से अलग कर , सचेष्ट मूल्यवान रूप में देख रहा है । इन आशयों से मनुष्य के मनुष्य बने रहने में नमक की बड़ी भूमिका है । इसका होना कितना नितांत और जरूरी है यह इस कविता की केन्द्रीकता है । यकीनन इस जीव जगत में वस्तु , रूप , भाव, विचार के होने को वरीय प्राप्त है । परन्तु यह सचेत होने की बात है कि उसकी अधिकता ज़हर समान होगा , नासूर-सा होगा , अन्धत्व पैदा करेगा ( यह इस कविता में जो नहीं है दर्ज ) यदि नमक को हम सीमित अर्थ और सरोकारों में ले ले तो , कि बहुत ध्वनित अर्थ में ले तो भी यह इसी सैद्धांतिकी का भाग है । पर सुरेश शर्मा इस नकारात्मकता को पीछे ढकेल सकारात्मक बन जिस दृष्टि सम्पन्न चेतना लिए सामने आते हैं वहां हर्ज की क्या गुंजाइश रह जाए , यह तो खुशी देने वाली है । चूंकि सुरेश शर्मा की प्रस्तुत कविता का नमक ,ज़रूरी खारेपन से और जीवन सम्मत विचार में संश्लेषित है । कि वे कहते हैं

"किसी दिन 
समंदर से लूँगा नमक 
और रख दूंगा बेस्वाद जुबानों पर 
कितना नीरस होता है जीवन नमक के बिना" 

यह अभिधा कम व्यंजना और नेकनीयती कामना में 
से तथा उसके वजूद से है कि कवि दर्ज़ करता है

"नमक से ही 
वज़ूद होता है समंदर का 
जैसे हौंसले से पहाड़ का"

चूंकि आज आदमी के भीतर आदमियत की जगह मक्कारी ने ले ली है
तो कहना लाज़िम है

"जीवन में 
यदि बचा रहे नमक 
तो आस बची रहती है 
बची रहती है उम्मीद 
भरोसा बचा रहता है 
आदमी में आदमी का"

तय तो है ही और कहना भी न होगा कि यह जो 'बोओगे वहीं काटोगे' । भद्र होंगे तो भद्रता की प्राप्ति होगी । दुर्जन होओगे तो दुर्जनता की ही प्राप्ति होगी । तब समय कठिन होगा । अतः उस कठिन समय से बचने व उसके आने से पहले सुरेश शर्मा संगत कर सकने पर जोर देते हैं यकीन दिलाते हैं आशा , धैर्य , यश और विश्वास से अर्जित नमक का स्वाद

कठिन दिनों में 
दूर तक साथ देता है नमक 
और उतर जाता है आदमी 
बाढ़,अकाल और आग की नदी से 

इसलिए 
बचाए रखो! 
जैसे बचाए रखता है समंदर 
जैसे बचाए रखता है पहाड़ 

बचाए रखो नमक 
अपने वज़ूद के लिए!!

          

आइए पढ़िए Suresh Sharma की कुछ कविताएँ
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            कठिन समय में 
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कठिन समय में 
बस!शब्दों का रहा साथ
ना सभा-समारोह,ना बहस बौद्धिक
ना छद्म व्यवहार,इसलिए!
भरोसे के कवियों में स्वीकार नही हुआ

कठिन समय में
ना लाल-पीला,ना हरा सलाम 
ना मार्ग वाम,ना दाहिने से काम 
छूटे,टेढ़े सब रास्ते तमाम इसलिए!
भद्रजनों की पंक्ति में शुमार नही हुआ

 कठिन समय 
 के आग दिनों में 
 ना मंदिर में गया ना मस्ज़िद में...! 

बचा!मंचासीन 
भव्य पुरुषों की भव्यता से बचा.. 
रिरियाते विद्वजनों की दीनता से बचा.. 
जो थे 'कापुरुष' उनके पौरुषेय चिंतन से बचा
हर संभव,छल-छद्म और पाखंड से बचा..!

सहेजता रहा 
आग और उम्मीद और कोंपल
 का हरापन जो सुरक्षित था अभी 
बुजुर्गों और बच्चों और पृथ्वी के पास 

कठिन दिनों में 
इस तरह शब्दों का रहा साथ !!

                  पिता
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                    (1)

पिता
घनी छाँह थे !
छाँह में पले-बढ़े, हम हुए खड़े 
फिर/ बड़े..हम इतने बड़े हो गए
कि, पिता स्मृति में खो गए !

                     (2)

थे / पिता 
तो अंगूठे पर था जमाना,
अब! जमाने के अंगूठे पर हम
था, पिता में कितना दम !!

                    (3)

बरसों-बरस रहे,
पिता के कांधे सवार!
घूमे शहर-शहर/ घूमे मेले हज़ार
पिता, एक ही बार..आए कांधे हमार
चले हम हरिद्वार!!

             सच में 
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जब बेहद जरूरी था 
सच के समर्थन में खड़े होना 
सबसे भरोसेमंद जा चुके थे नेपथ्य में 

मंच 
विदूषकों से भरे थे.. 
अट्टाहसों से गूंज रहे थे सभागृह 
और उम्मीद थी जिनसे वे भव्य पुरुषों के
 यशोगान में लीन थे 

देश !
बाजार में बदल रहा था 
बदल रहे थे आँगन और चौपाल 
भाषा अपरिचय की दहलीज पर खड़ी थी 
और फूहड़ता शनै शनै तब्दील हो रही थी 
संस्कृति में

 महानुभाव 
इस विकट समय में/कौन जतन करें 
कि थोड़ी-सी उम्मीद...प्रेम थोड़ा-सा
 थोड़ा-सा भरोसा बचा रह जाए!!
                
               राजन
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राजन!
बहुत कम चाहिए हमें
बहुत भव्य तुम्हारी दुनिया से
अनाज उतना!दे चिड़िया को पेट भर
जल उतना!दे सरोवर अंजुरी भर जितना

पृथ्वी 
सारी तुम्हारी राजन
बस छाँह भर अपनी 
जो सुख में दे दुख में काम!

राजन! भव्य होगा दरबार यकीनन
होंगे वजीर,सेनापति,सभासद-सलाहकार
होगी सेना चतुरंगिणी हाथी-घोड़े,पैदल सवार

मगर क्षमा करें
अभी बेहद जरूरी हैं कुछ काम
मसलन, बचाये रखना है नमक
जो गुम हो रहा जीवन से/बचाये रखनी है आग जो मद्धम हो रही लगातार... 
बचाये रखना है, हँसी बच्चों की !

ऐसे में 
संभव नही किसी मुनादी पर
शाही जलसे में शरीक होना
राजन ! क्षमा करें .. ! !

जैसे उड़ान भरती है चिड़िया
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पंख को चाहिए आकाश
बीज को जमीन
थोड़ा साहस पैरों को 
 और चाहिए संकल्प 
एक जिंदा लड़ाई को

कि,जैसे 
भूख को पीठ पर लादे 
संकटों के पहाड़ चढ़ती है 
मजूर औरत की आँखों में 
उम्मीदें दूब-सी ऊगती है 

कि,अनन्त काल से पृथ्वी को नापता 
एक आदमी,भयावह सुरंग से गुजरता है आंगन में एक टुकड़ा छाँह का ठहरता है 

कि,हवा के बवंडर में फंसी चिड़िया 
एक लड़ाई पंखों से लड़ती है 
बच्चों की चोंच में दाना आस का रखती है 

ख़तरा 
मौजूद है हर तरफ़
सारे सभागार और चौपाल
आंगन और क़िले,ज़द में है ख़तरों के

शुरू करनी ही होगी 
स्थगित यात्राएं,स्थगित थी 
जो खतरों के भय से

जैसे,शुरू करती है मंजूर औरत
जैसे,सुरंग से गुजरता है आदमी
जैसे,बच्चों की आस पर 
उड़ान भरती है चिड़िया!
          

यह चौकन्ना रहने का समय है !
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लड़कियाँ खिलखिलाती हैं 
सीखते हुए वर्णमाला और 
गंध धूपबत्ती की फैल जाती है 
आँगन में, मगर सावधान ! 
यह बाज़ के झपटने का समय है

लड़कियाँ गुनगुनाती है 
अम्मा का दुःख बंटाते हुए 
और घण्टियों की रुनझुन 
बज उठती है मन में,मगर सावधान!
यह चीतों के घात लगाने का समय है

लड़कियाँ बतियाती है
सपनों में, परियों से
बासंती हो जाती है हवा 
और झूमने लगता है हरसिंगार 
मगर सावधान!यह तेजाबी हमलेका समय है

लड़कियाँ बाजवक्त हिरनी होती है
कुलाचों में भरकर इरादे वह 
नापती है ज़मीन,पहाड़ और 
आसमान, मगर सावधान!
यह बेहद चौकन्ना रहने का समय है
             

           माफ़ करना
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माफ़ करना
नवजात शिशुओं
नही बचा पाए दम घुटने से 
कि जब बचाना था तुम्हें,

बचा रहे थे हम
महान देश के महा बाबाओं को!

माफ़ करना
असहाय बेटियों
नही बचा पाए हत्यारों से
कि जब बचाना था तुम्हें,

कोरस गा रहे थे हम
महान देश की महा संस्कृति का!

माफ़ करना
ख़ामोश करदी गई बुलंद आवाजों
कि इस कायर समय के भद्रजन
अपना समर्थन और विरोध भी
सुविधा से करते हैं,

हत्यारे से
सब डरते हैं..!!

         लापता करोड़ बेटियाँ 
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पता नही 
समाज शास्त्रियों की गणना में 
किस तरह शामिल हैं, वे!

दर्ज कितनी-कितनी / लापता कितनी 
वे! जो धरोहर थी सृष्टि की 
बेटियाँ पृथ्वी की !

धूप थी उनके हिस्से की 
उनके हिस्से की हँसी, 
बसन्त था,उनके हिस्से का 
भरापूरा एक आसमान था उनका !

उनके सपने थे / सवाल थे उनके 
आख़िर कौन इच्छाओं से,जन्म ले रही थी वे 
और मार दी गई,कौन इच्छाओं से !

गुनाह नही थी वे..हादसा नही थी.. 
माताएँ थी उनकी..उनके भी जनक थे,
वे!जो धरोहर थी सृष्टि की,बेटियाँ/पृथ्वी की! 

वे होती 
तो करोड़-करोड़ हाथों से 
बुहारती आंगन पृथ्वी का, 
वे होती तो चाँद पर डालती झूले 
लाँघती नदियाँ..पहाड़ और आसमान अंतरिक्ष तक गूंजती उनकी हँसी!

बेटियाँ 
जो गुम हुई नदियों के बहाव में 
बेटियाँ जो राख हुई..ख़ाक हुई आग में 
जाने क्यों लौट रही 
फिर सपनों में बारबार!!
      

                नमक
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 किसी दिन 
समंदर से लूँगा नमक 
और रख दूंगा बेस्वाद जुबानों पर 
कितना नीरस होता है जीवन नमक के बिना

नमक से ही 
वज़ूद होता है समंदर का 
जैसे हौंसले से पहाड़ का 

जीवन में 
यदि बचा रहे नमक 
तो आस बची रहती है 
बची रहती है उम्मीद 
भरोसा बचा रहता है 
आदमी में आदमी का

कठिन दिनों में 
दूर तक साथ देता है नमक 
और उतर जाता है आदमी 
बाढ़,अकाल और आग की नदी से 

इसलिए 
बचाए रखो! 
जैसे बचाए रखता है समंदर 
जैसे बचाए रखता है पहाड़ 

बचाए रखो नमक 
अपने वज़ूद के लिए


हरिओम राजोरिया

कविताएं , मुझे जब तक बेचैन नहीं कर देतीं , किसी जरूरी बातों के लिए उद्देलित नहीं कर देते ; मतलब , बहुत सारी पीड़ाओं और यातना गृह की यातनाओं से मेरे भीतर सिहरन पैदा नहीं कर देती , उस पर एक लफ्ज़ भी बोलना या कि लिखना मेरे वश का नहीं रहता । अमूमन रोज़ दस बीस कविताओं से मेरा वास्ता होता ही है , पर सभी कविताओं के साथ ऐसा नहीं होता , जैसा कि हरिओम राजोरिया की कविताओं से रूबरू होते हुए आज हुआ । हरिओम राजोरिया अशोक नगर इप्का के रंगकर्मी साथी हैं समकालीन हिंदी कविता के नवें दशक की हिंदी कविता से पहचाने गए । वे नासिर अहमद सिकंदर , बुद्धि लाल पाल , शरद कोकास ,आलोक वर्मा , पूर्णचंद्र रथ , शाकिर अली , विजय सिंह , निरंजन श्रोत्रिय , मदन कश्यप , कुमार अंबुज , देवीप्रसाद मिश्र ,  मोहन कुमार नागर के समानांतर जैसे आए हैं , वैसे ही गतिमान बने हुए हैं । बल्कि पहले के मुकाबले अधिक गतिशील और  एक्टिविस्ट की भूमिका में मोर्चा संभाले दिखाई दे रहे हैं । यहां दर्ज कविताएं इसकी ही पुष्टि है । ये कविताएं हमारे समय के सबसे मुश्किल और जटिल दौर की कविताएं हैं । जहां पक्ष और पहचान भी मुश्किल था ।  पर हरिओम राजोरिया ने बहुत खूबी के साथ अपना पक्ष बता दिया है । इस मुश्किल दौर में हरिओम राजोरिया की कविताएं जनता से सीधे रूबरू हो संवाद स्थापित करती हैं । ऐसा इसलिए भी कि इन कविताओं में आज को रचा गया । इस बर्बर समय को रचा गया । मनुष्य के विरुद्ध होने वाली साजिश को रचा गया । हरिओम की इन कविताओं में तात्कालिकता और सपाटबयानी के प्रभाव को लेकर आलोचक खड़े होंगे , कहेंगे इन कविताओं के जीवन व मर्म पर बहस भी छोड़ देंगे ? कालजीवी होने पर संदेह जताते फिरेंगे । मैं फिर कह रहा हूं 'कवि अपने आज को लिखें '
जिन कविताओं में अपना आज नहीं वह कालजीवी भलि कैसे हो सकता है ? आप अपने समय , साक्ष्य , निष्कृष्ट और बर्बर इतिहास के दस्तावेजीकरण को नकार कैसे काल को जीना चाहेंगे । यानी , वे कविताएं ही क्या जिनमें अपने समय के सच और संताप को कहने , जीने का सामर्थ्य भी न रहे । उसके दुख संतापो को देख पाने का सुविचारित नजरिया न रहे ; बल्कि उससे टकराने की जगह घालमेल करते बगल खड़े हो जाए । मूर्त कलाएं कभी फ़ासिज़्म का शिकार नहीं हो सकती , वह विद्रोह पैदा करेगा । चुनौती बनेगा । इन मायनों में निश्चय ही तात्कालिक प्रतिक्रिया अथवा स्टेटमेंट के बरक्स हरिओम राजोरिया की कविताएं सम समायिकता का अतिक्रमण करती हैं और काल को जीती कविताएं हैं ।

   डर लगता है
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कौन नहीं डरता
डराए जाने के बाद
विश्वविद्यालय में निर्दोष छात्र पिटते हैं
और झूठ बोलती है पुलिस
मंत्री जवानों को सलाह देते हैं
तनिक नरमी से काम ले पुलिस

कौन नहीं डरता
अपनी पहचान और चेहरा छुपाए जब
आम जन पर लहराई जाती है लचीली लाठी 
आप पूछ तक नहीं पाते कि क्यों ?
क्यों कर ऐसा होता है कि पूरा तंत्र
एक दिन सत्ता के झूठ में शामिल हो जाता है

कौन नहीं डरता
जब झूठ बोल रहा होता है तंत्र 
और संकट में होता है जन
ऐसे समय में प्रधान कुमार जी 
विचित्र तरह से विचित्र विषयों पर 
करने लगते हैं मन की बात
कभी श्रृंगार करते , कभी जाकेट बदलते
कभी किसी बच्चे के कान उमेठते
टी वी स्क्रीन पर दिखाई पड़ जाते हैं
उधर विश्वविद्यालयों में प्रयोग करती पुलिस
देश के होनहार छात्रों पर 
लाठियां फटकार रही होती है

हो सकता है फिलहाल 
आपको न लगता हो डर
पर एक चालाक न्यूज एंकर की भंगिमाएं
आपको भीतर तक डरा सकती है
जो विद्यार्थियों को नागरिक की तरह नहीं
विधर्मियों की तरह चित्रित कर रहा होता है - 
" एक आंख ही तो गई है
एक हाथ काम नहीं भी कर रहा तो क्या
दूसरा तो अब लगभग ठीक है
दोनों पैर भले ही काम न कर रहे हों
पर चेहरा तो पूरी तरह ठीक है "1

एक दिन ऐसा भी आता है
जब छाता तलवार बना दिया जाता है
और बटुआ पत्थर का ढेला
झूठ को इस तरह परिष्कृत किया जाता है
कि आपको नए सिरे से लगने लगता है डर
आप एक साधारण से नागरिक को
धीरे - धीरे एक दंगाई में तब्दील होते हुए देखते हैं 
तब सचमुच लगता है डर
देश के इस विकृत नव मानस से
प्रधान कुमार जी एक वरिष्ठ दंगाई की तरह
प्रशिक्षु दंगाइयों की ढाल बन जाते हैं
तब वे आम नागरिकों को भी
कपड़ों से पहचानने की बात करते हैं

आप तरह तरह से जय बोल रहे होते हैं
और इस हिंसक जयकारे के बीच
कुछ भी ठीक से सुनाई नहीं पड़ता
प्रधान कुमार जी जहरीली हंसी हंसते हैं
और इस हंसी की जड़ में कहीं
छुपी होती है हिंसा की प्रेरणा

तब , जब न्याय के पक्ष के लिए
समर्थन में उठते हैं कुछ हाथ
और राजद्रोही के रूप में
चिन्हित कर लिये जाते हैं
तब होती है डर लगने की शुरूवात 
स्वप्न में सुनाई पड़ती है कहीं
हिटलर के फिर लौटने की आहट
तब लगने लगता  है डर
लगातार अपरिचित होते जाते 
अपने ही आसपास से ।
                    
  
                        
            डील
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डील होने ही वाली है
डील अब होकर ही रहेगी
डील तो होनी ही चाहिए
भारत भी चाहता है कि डील हो
अमेरिका भी चाहता है कि डील हो
सारी दुनिया की नज़र डील पर है
फिर दिक्कत क्या है
होने को तो  कुछ भी नहीं 
पर चूकि डील हो ही रही है
इसलिए डील को हो ही जाना चाहिए

डील देशहित में हो रही है
डील होने के लिए ही नहीं हो रही 
कारोबारियों का कारोबार टिका है डील पर
डील पर ही देश का सारा दारोमदार है
डील के लिए राष्ट्र प्रमुख मिल रहे हैं
डील के पक्ष में सटोरिए भी कुछ कह रहे हैं
डील तो अन्ततः होकर ही रहेगी 
बडी अगर न भी हो सकी
तो उससे कुछ  छोटी डील होगी

डील एक तरह का पेंचीदा मसला है
डील भूमंडलीकरण से पैदा हुआ
एक षडयंत्रकारी शब्द भर नहीं है
कहीं भी होती हुई डील में से कुछ 
गडबड होने की गंध आती है

डील होने का मतलब 
अकेली डील होना ही नहीं होता
आप देख पा रहे होते हैं कि
इधर डील हो रही होती है
और उधर दिल्ली में दंगा  ।

         नोमोस्ते इंडिया 
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भाड़े के गायक आए हैं
भाड़े के नर्तक
भाड़े के वादक
स्कूलों से बच्चे छोड़ दिए गए हैं
महंगे स्वागत द्वार बने हैं
तरह तरह से विचित्र सा कुछ हो रहा है
अद्भुत , अविश्वसनीय , अकल्पनीय
इंतजाम से भी बड़ा इंतजाम 
सुरक्षा ही सुरक्षा 
परिंदा पर नहीं मार सकता 
परिंदे की औकात ही क्या है ?

दोस्त आया है
दोस्ती का पैगाम लाया है
हथियार बेचने वाले देश का प्रमुख आया है
उतरते ही साबरमती आश्रम जा रहा है

प्रधान कुमार बोल रहे हैं
प्रधान कुमार को समझने की कोशिश कीजिए
अभिभूत , अचंभित जन सुन रहे हैं

नया इतिहास बन रहा है
मेरे दोस्त ट्रंप 
अमेरिका से सीधे यहां साबरमती पहुंचे हैं
दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी में
ये आसमान तक गूंजती हुई आवाज
और प्रेसीडेंट
और फर्स्ट लेडी और परिवार
और ग्रेटर और क्लोजर रिलेशनशिप
हम नमन करते हैं
हम नमस्ते करते हैं
मिस्टर प्रेसीडेंट
इस शंकर भाषा में आपका स्वागत है

नमस्ते स्वीकार करें
एक ने सबसे बड़ी मूर्ति लगाई
और दूसरा हमारे बीच है
हम दोनों एक दूसरे के बीच हैं
मुझे खुशी है
भारत अमेरिका की फ्रेंडशिप गहरी हुई है
फ्रेंड्स 
ट्रंप बड़ा सोचते हैं
फर्स्ट लेडी ट्रंप
आप बच्चों के लिए बड़ा कर रही हैं

इंवाका दोबारा भारत आईं हैं
इनके पति लाइम लाइट से दूर रहते है
उच्चारण की समस्या न होती
तो उनके पति का नाम भी हम लिखते

पूरी दुनिया आपको सुनना चाहती है
माइ फ्रेंड को सुनने ...
नमस्ते ट्रंप
नमस्ते ट्रंप
130 करोड़ भारतीयों का नमस्ते

नोमोस्ते इंडिया !!

         प्रश्न अभ्यास 
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दंगे पर कविता लिखिए 
पुलिस की छूट की व्याख्या कीजिए
दंगाइयों के पांच प्रकार बताइए
भक्त से दंगाई होने की आशंका और
संभावनाओं पर विचार कीजिए
हिंसक समय का क्रमिक विकास लिखिए

बच्चों को घृणा करना कैसे सिखाएं
निर्लज्जता से झूठ बोलने की विधियां लिखिए
दंगों में जय बोलने के महत्व 
और गालियों से आक्रमकता पैदा करने के 
प्रयोग पर एक सारगर्भित टिप्पणी करो
चाचाजी पहले अंश कालीन दंगाई थे
उनके पूर्णकालिक दंगाई बनने की यात्रा का
विस्तार पूर्वक चित्रण कीजिए
दो दंगाई विचारकों के नाम बताइए
दंगे और नरसंहार में अंतर स्पष्ट कीजिए

मनुष्य होने की हानियां लिखिए
" दंगा होता नहीं है करवाया जाता है "
इस प्रचलित झूठ पर  निवंध लिखिए
पढ़ो और पढ़ने दो की जगह
लड़ो और लड़ने दो को रेखांकित कीजिए
दंगाइयों को कपड़ों से पहचानने का
सचित्र वर्णन कीजिए

एक प्रतिबद्ध दंगाई की प्राथमिकताएं बताइए
अग्निशमन यंत्र और देशी कट्टे का रेखाचित्र खींचिए
' आभासी भय और दंगा ' 
इस वाक्य की दंगों के संदर्भ में
विस्तार पूर्वक व्याख्या कीजिए
दंगों में प्रयुक्त हथियारों के प्रकार लिखिए
ईट फेंकते दंगाई का भाव चित्रण कीजिए

इस तरह के दंगा केन्द्रित प्रश्न अभ्यास से
अपने कुछ मौलिक प्रश्न तैयार कीजिए ।
                 

  
हमारे मतलब उनके विचार
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हम चाहें तो 
घंटा भर में रास्ता खाली करवा सकते हैं
हम चाहें तो डंडा बजा सकते हैं
आपको पता होना चाहिए 
कि हमने अभी तक कुछ चाहा नहीं
आप अगर कहें तो हम 
यहीं खड़े - खड़े आपका न्याय कर सकते हैं
जब- जब भी न्याय नहीं हो पाता
तो जो होता है वह अन्याय ही होता है

दो महीने से कोई बैठा - बैठा न्याय मांग रहा है
तो न्याय मांगने की भी एक हद होती है
अब आप ही बताओ
किसी भी तरह के नागरिक को 
अपने भीतर की घुटन से बचने के लिए
भारत सरकार ने सड़कें थोड़े ही बनवाईं हैं
कि जब जी चाहे यहां आकर बैठ जाएं
और अपने भीतर की बेचैनी दूर करें

हम गोली भी चलवा सकते हैं 
( हालांकि हम चलवा भी चुके हैं )
पर न्याय नहीं कर सकते
हम बुर्के पर चुटकुले बना सकते हैं
आंदोलन में बच्चो के इस्तेमाल पर
भावुकता से भरा वक्तव्य दे सकते हैं 
कह सकते हैं आपके खाबिंद घर पर हैं
और आप मोहतरमा आप 
आप यहां चौराहे पर आकर बैठी हैं ।

हम अच्छी तरह जानते हैं
और धार्मिक पुस्तकों में भी लिखा है
कि स्त्री की जगह घर में ही है 
पढ़ने और लड़ने की जरूरत नहीं
कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं
न नागरिक कभी थीं 
न नागरिक अभी हो
स्त्री के सड़ने की जगह घर में है ।

नया भारत बन रहा है
...........................

लाचारों की भीड़ में से 
चिन्हित किया जा सकता है आपको
संभव है बगैर सहमति और मर्जी के 
आप ट्रायल पर ले लिए जाओ
नव निर्मित बैक्सीन का टीका
कोई आपके कूल्हे पर ठोककर चला जाये
बन गई है जो बनी हुई व्यवस्था 
इस व्यवस्था ने कितना आसान बना दिया है
कि वे जब चाहें छीन सकते हैं
गरीब-गुरबों से जीने का प्राकृतिक अधिकार 

आप अब नए भारत के नागरिक हैं
इसे डिजीटल इंडिया भी कह सकते हो
यहां आपकी बग़ैर मर्जी के 
सरकार आपका भला कर सकती है
इन्कार करने का 
विकल्प नहीं रहा आपके पास
घंटा और शंख बजाने के विकल्प ज़रूर खुले  हैं

पता नहीं क्या-क्या होने लगा है इन दिनों
एक सुरीले गले वाली  स्त्री 
बार-बार  फ़ोन मिलाती रहती है और फिर फिर
शून्य ब्याज दर पर लोन लेने की सलाह देती है 
वर्क ऐट होम पर सुबह से ही एक पिता 
अपने बेटे को काम करता हुआ देखता है
और उसे एक अंजाना असुरक्षाबोध 
दबे पांव आकर दबोच लेता है
इन दिनों जिस खबर को पढ़ने  को 
आप अखबार खोलते हो
उसी खबर को अखबार से गायब पाते हो

छल बढ़ रहा है
जहां पहले से ही अघोषित कर्फ्यू था
वहां और पुलिस बल बढ़ रहा है
आप सरकार से असहमत नहीं रह सकते 
इस जनतन्त्र में आपको हुंकारें भरने
और जय बोलने का नियमिय अभ्यास होना चाहिए
भीतर एक राष्ट्रभक्ति की लौ जलती रहनी चाहिए 
आपके मन में राष्ट के प्रति
सकारात्मकता और आस्था का भाव होना  चाहिए 

बन रहा है नया भारत
नए भवन , नए पथ , नए कानून बन रहे हैं
खुलता जा रहा है विकास का दरवाजा 
यहां से आप स्मार्ट सिटी में प्रवेश करेंगे 
आप देर रात घर के पलंग पर ही सोयेंगे 
पर सुबह न्यू इंडिया में खुलेगी आपकी आंख ।

                 

       हरिओम राजोरिया

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...