Saturday, May 29, 2021

कुमार प्रांजल राय

                      दिल्ली
===============================
देखो धुंध की अभेद्य चादर में लिपटी हुई
ये दिल्ली है
भारतवर्ष की राजधानी,
राजपथ बनाम जनपथ के संघर्षो के इतिहास
जिसके चेहरे पर दर्ज हैं ।
शताब्दियों के खंडहर पर उगा नामचीन शहर,
खांडवप्रस्थ का बुढ़ापा 
और इंद्रप्रस्थ की जवानी साधे,
स्वर्ण की नोंक पर टिका
सपनों की रंगीनियों में जीता है ।
छवियों को बनाता बिगड़ता है ये शहर
और छवियों के नीचे धँस जाता है सत्य ।
अनवरत दौड़ता भागता ये शहर
अपने पाँवों से बहते लहू से भी अनजान है ।
इस शहर में भारत का एलीट क्लास
और मजदूर एक साथ सोता है,
साम्य का कैसा अनगढ़ समीकरण है,
जिस पर समय भी रोता है ।
जहाँ कार्बन और सल्फर ने गुप्त संधि की है,
मौसम के खिलाफ ;
चन्द रोज पहले सुनी मैंने
खुद के पैदा किए विचारों के मलबे में
दिल्ली के धँस जाने की खबर ।
कई बार सोचता हूँ
कि दिल्ली शहर नहीं 
खुद को दोहराता हुआ 
एक पैटर्न है
और हर इंसान का चेहरा 
सूचनाओं का एक लिफ़ाफ़ा भर ।

 

कुमार प्रांजल बढ़िया लिख रहे हैं इन दिनों । राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली , और दिल्ली के दरबार तथा उसकी रंगीनियो पर सार्थक हस्तक्षेप करती कुमार की इस कविता से जहां चाल और चरित्र के दोहराव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है ; वही कुमार यहां बदलते रिश्ते , बदलते मुहावरे के मध्य , जीवन और इतिहास के बीच लटकती अन्तर्कथाओं , अन्तर्विरोधों का  पुनर्पाठ प्रस्तुत करने में कामयाब दिख रहे हैं । कुमार को वैसे मैं ज्यादा पढ़ा भी नहीं , बस यह उनकी दूसरी- तीसरी कविता है मेरे लिए पर इस कवि की संभावनाओं से आश्वस्त हूं  । बढ़िए निरंतर , कुमार प्रांजल । शुभकामनाएं ,अशेष ।

 "कई बार सोचता हूँ
कि दिल्ली शहर नहीं 
खुद को दोहराता हुआ 
एक पैटर्न है
और हर इंसान का चेहरा 
सूचनाओं का एक लिफ़ाफ़ा भर।"


यह एलीट को लेकर बनने वाली आम धारणा है । प्रत्येक समाज के बुनावट में एक क्लास है,  एक लेयर है , और यही क्लास कि लेयर आदमी को खंडित करता है । हिंदी इससे अछूता नहीं है ।

Tuesday, May 25, 2021

इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता में स्त्री कविता का बढ़ता दायरा

नई सदी की हिंदी कविता में 'स्त्री कविता' अपने पीले पड़ चुके रूदाली चेहरे के बनिस्बत और कहीं न कहीं , स्त्रीवाद की सीमाओं का अतिक्रमण कर ,वह आज एक बड़े प्लेटफार्म में आ खड़ी हुई है ; तो इस विरुदावली का श्रेय भी आज की युवा कविता को जाता है । जिसमें #कात्यायनी , #निर्मला पुतुल , #अनामिका Vandna Tete  #जेसिंता केरकेट्टा , Mukta Toppo  Seema Azad  , Vandana Kengrani Pragya Rawat सोनी पाण्डेय  शाहनाज़ इमरानी  #vishwashi , पूनम वासम Mridula Singh , Vishakha  Pallavi Mukherjee  Jyoti Deshmukh  , Rupam Mishra  , Kavita Krishnapallavi  , Anupama Tiwari  , Arti Tiwari  , Shruty Kushwaha  , Archana Lark  , जैसी कवयित्रियां है । गौरतलब है कि स्त्री कविता कभी भी इतनी चेतना संपन्न नहीं दिखीं कि राजनीतिक,  सवालों , समाजिक,  आर्थिक संघर्षों से इस रूप में कभी दो-चार की हों , जो आज कर रही हैं । हमारे समय के उन तमाम उपादानों , जटिल संघर्षों के बीच यदि ये 'कवि' टकरा रहे हैं तो मैं उनकी जीवट चेतना और समझ-बूझ का दाद देता हूं । कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं कि हमारे समय के परस्पर ये कवि अपने अदम्य साहस के बल खड़े और संघर्ष की परम्परा के वाहक साबित हो रहे हैं ।

तांत्रिक के खेल का खत्म होना ही जादू का टूटना है ; और जैसे ही जादू टूटता है , यकीन मानिए सच बाहर आता है , फिर दबता नहीं । वस्तुत: यथार्थ नंगा होता है । वह अपने ही तरह सबको नंगा कर देता है । कोरोना संकट के इस दौर में जो कुछ अदृश्य था , जितना कुछ भरमाया गया था , रचा जा सका था तिलस्म , अब वह दृश्य में है , काल्पनिक कि निवृतमान की जगह वर्तमान में है । मिता दास बीसवीं सदी के बाद नई सदी की हिंदी कविता से पहचानी गई कवि हैं । जो इस मुग्ध भ्रम को बड़ी ही सरलता में इन दो ही पंक्ति से बेपर्दा कर रहीं हैं

"कैसा समय है यह , कई महीनो से लाशें गाड़ रहे हैं , 
जला रहे हैं और कुछ लाशों को समंदर में फेंक रहे हैं |"

 निश्चय ही इस डरावने समय के वीभत्स दृश्य में कल के छुपाव के बनिस्बत आज का सच है । जो मिता दास काफी बेहतर से रख गईं हैं । हालांकि मिता की इस कविता में आई इन पंक्तियों को देखें

"कहां हो धनवंतरी , कहां हो.... धनवंतरी" 

और माने तो , जो विलाप , आर्तनाद दिखाई दे रहा है वह मार्फत ए मिथक निरूपायता को दर्शाता है । मैं फिर कह रहा हूं "मिथक सच नहीं है" । किन्तु यह नकारा भी नहीं जा सकता कि साहित्य में मिथक की आवाजाही जरूरतों के अनुरूप बना ही रहेगा । इस पर "हिंदी साहित्य के इतिहास को लिखते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य को देश की जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिंब कहा और साहित्य की परख के लिए उसकी प्रसिद्धि को भी एक आधार माना है।" यानी मितादास की विलाप को उस संरचनागत आधार पर मैं भी जायज़ ही मानता हूं कि यह एक कवि के पहले ,एक आम जन मानस की चित्तवृत्ति है ।  जो यक-ब-यक , बिना जोड़ घटाव के सरसराहटों में आते हैं ।

लाशें माँगता हुआ समय
------------------------------------
                            
कैसा समय है यह , कई महीनो से लाशें गाड़ रहे हैं , 
जला रहे हैं और कुछ लाशों को समंदर में फेंक रहे हैं | 
लाशें हैं कि थमने का नाम ही नही ले रहीं 
कहाँ हो धनवंतरी , कहाँ हो ......

भौकाल में रुका हुआ कॅरोना काल
जैसे पेड़ पे लटका हुआ बेताल 
बगैर खोपड़ी तोड़े जायेगा नही 
कहाँ हो धनवंतरी , कहाँ हो .....

गिद्धों की चांदी हो गई है
पर अब उनका भी स्वाद बिगड़ चुका है
ऊब गए हैं वे भी 
लाशें हैं कि थमने का नाम ही नही ले रहीं ।

भौकाल में ही रुका हुआ है कॅरोना काल 
और लॉक डाउन में तो हो गई है अचल
ट्रेनें भी अप और डाउन
बगैर खोपड़ी तोड़े जायेगा नही ...  

पेड़ से उतर पीठ पर लदा हुआ है
और 
पेट पर लात मारता जाता है बेताल ।।

वज़ूद दांव पर है और वर्चस्ववाद चरम पर । चरम वर्चस्ववाद सबसे पहले बाजार को चमकीले वस्तु से सजाता है । फिर बाजार के रास्ते , जिसे वह बाजार मानता है ; को अर्धसत्य पूंजी का , अर्ध वितरण करता है और मध्यमवर्गीय जीवन शैली को चपेट में लेता है । विद्रूप वर्चस्ववाद सुविधायाफ्ता बना , मध्यमवर्ग के मन को मारते हुए , आगे उनकी सोच को मारता है । चूंकि यह मध्यमवर्ग , दुनिया के सबसे अधिक उपभोक्तावादी , सुविधाभोगी वर्ग है। अतः वर्चस्ववाद के आगे सबसे कमज़ोर और निहत्था भी , वही है । शनै: शनै: उसका मारा जाना तय हो चुका है । वह निरुपाय है , यह बात वर्चस्ववाद की समझ में दुरस्त है । किन्तु मध्यवर्ग के भीतर से अब यह मरने लगा है । इसलिए जो भी स्थितियां सृजित हुए हैं उसका बड़ा जिम्मेदार वह ख़ुद ही है । बाक़ी शेष स्थितियों-परिस्थितियों को मिता दास अपने इस कविता में शिद्दत से दर्ज कर चुकी हैं । समय का इस तरह से भयावह और संवेदनहीन हो जाना मरणासन्न की प्राप्ति नहीं है  तो क्या है ?  किंतु मिता दास यह कह  

"बस दुःख होगा इस बात पर 
कि मेरा देश इस बात पर चुप्पी साधे बैठा है 
हवाई दौरों के सफ़र में मशरूफ़ 
 दूरबीन से हवाई पट्टी को ताकता हुआ विमान की खुली खिड़की से 
उन्हीं बच्चों की लाशों के ऊपर से हवाई उड़ान भरकर 
हर वो सरहद पार कर लेगा 
 अपनी हदें पहचानने और भुनाने के लिए  अधमरे , खून से लथपथ बच्चों की लाशों पर से गुजर जायेगा 
फिर न उफ़ न आह बस एक गंभीर हँसी लपेटे 
बढ़ जायेगा अपने दौरे के अगले पड़ाव की ओर"

या फिर यह कह
 

"ये चुप्पी तुम्हे महँगी न पड़े
बच्चे माफ़ नहीं करेंगे कभी तुम्हे 
नींद तुम्हें भी आ ही जाएगी 
राजसी ठाठ - बाट में पर 
रक्त के सूखते धब्बों की गंध 
नहीं दब पायेगी किसी रूम फ्रेशनर से या न ही 
टेलीविजन पर विज्ञापित किसी डियोड्रेंड से ही | "

हमारे चेतन अवचेतन  विद्यमान ,बची मनुष्यता को झिंझोड़ देता हैं । मिता दास का यह हस्तक्षेप सजगता में है , पक्षधरता में है । यह हमारे अवचेतन चेतन और इंद्रिय बोध के रास्ते , एक मुकम्मल सच और रास्ते की तलाश है ।

वैश्विक चिंताओं और तत्कालीन जनसंघर्षों को लेकर हिंदी की जमीन भी अपनी उर्वरता और प्रमाणिकता में कभी कम  नहीं रहा । साठ के दशक के "मगध" कवि श्रीकांत वर्मा की कविताएं भी उन्हीं मुक्तिकामी विचारों और सीमाओं को तोड़ती रही । इधर फिलिस्तीनी मुक्ति संग्राम और उसके वीभत्स परिणामों को लेकर सतीश छिम्पा , Bhaskar Choudhury  ,  Anil Pushker , जैसे युवा कवियों की भी महत्वपूर्ण कविताएं मिता दास की चिंताओं से इत्तेफाक रखते दिखे हैं । 

फिलिस्तीनी कविता पढ़ते हुए
--------------------------------------
नवजान दरवीश कहते है - फ़ादो , औरों की  तरह नींद मुझे भी आ ही जाएगी इस गोली बारी के दरमियान ..

 हाँ हाँ हाँ 
 रक्त की गंध में भी मुझे नींद आ ही जाएगी 
चीखते बिलखते बच्चों के खुनी फौवारों से नहा कर भी , 
मुझे नींद आ ही जाएगी 
बस दुःख होगा इस बात पर 
कि मेरा देश इस बात पर चुप्पी साधे बैठा है 
हवाई दौरों के सफ़र में मशरूफ़ 
 दूरबीन से हवाई पट्टी को ताकता हुआ विमान की खुली खिड़की से 
उन्हीं बच्चों की लाशों के ऊपर से हवाई उड़ान भरकर 
हर वो सरहद पार कर लेगा 
 अपनी हदें पहचानने और भुनाने के लिए  अधमरे , खून से लथपथ बच्चों की लाशों पर से गुजर जायेगा 
फिर न उफ़ न आह बस एक गंभीर हँसी लपेटे 
बढ़ जायेगा अपने दौरे के अगले पड़ाव की ओर 

ये चुप्पी तुम्हे महँगी न पड़े
बच्चे माफ़ नहीं करेंगे कभी तुम्हे 
नींद तुम्हें भी आ ही जाएगी 
राजसी ठाठ - बाट में पर 
रक्त के सूखते धब्बों की गंध 
नहीं दब पायेगी किसी रूम फ्रेशनर से या न ही 
टेलीविजन पर विज्ञापित किसी डियोड्रेंड से ही | 
     

वस्तु या कि रूप का बदलना गतिकीय प्रक्रिया है । परन्तु यथार्थ के ऊपर  छाया घटाटोप उसे जादुई कर देता है । इधर सम्प्रदायिकता के खतरे जो बढ़े हैं , उसमें भी यही जादुई घटाटोप है । उसने यथार्थ को खारिज़ कर उसे जड़ और आभासी बना दिया । क्रियाशील और गतिमान मनुष्य के भीतर टूट का यह दृश्य रहमान और चंचल के प्रति बोए गये अविश्वास में अंजाम पाता है ।  गोकि कविता बहुत छोटी और एक रेखिक है । परन्तु संदेह के बीज के परोपण को गहरे अर्थों में व्यंजित करती है । अतः यह एक जरूरी कविता है । जो दृष्टव्य पंक्तियों से देखे समझे जा सकते हैं

"रहमान को आवाज देते लब 
आज चंचल को देते हैं हिदायत 
आज दो कप ही लाना तीन नहीं"

**काली चाय खौल रही है**
-------------------------------------                      
आज पूरब के गांव में 
मुर्गों ने नहीं दी बांग 
दूध के बगैर काली चाय 
खौल रही है केतली में 
रहमान को आवाज देते लब 
आज चंचल को देते हैं हिदायत 
आज दो कप ही लाना तीन नहीं 
रहमान अख़बार लेने नहीं आ पायेगा 
और बंदूकची
चाय नहीं पीते  .....

मिता की कविता  "क्या बचेगा" की यह पंक्तियां

हम अपना गणतंत्र मनाएं या बचाएं
बेहद दुविधा में हूं जननायक !

मारक व्यंजना में एक समग्र काव्य पंक्ति हैं । जो अपने सरल , जिज्ञासु सवालों और अंतर्विरोधों से आते हैं । कहना न होगा नायक झूठ्ठा भी है और लबार भी । जो कुख्यात है ।  मिता  नायक के आधारहीन बातों , तथ्यहीन प्रचारों की अप्रासंगिकता जिस सरल और मार्मिक हो रख गईं  न नायक को बताने की जरूरत है न किसी से और कुछ कहने की

       क्या बचेगा 

---------------------------------------                          

हम अपना गणतंत्र मनाये या बचाएं 

बेहद दुविधा में हूँ जन नायक ! 

देश बचायें या देशभक्ति 

बेहद दुविधा में हूँ प्रजा नायक !

धर्म बचायें या मठ , पीर - पैगम्बर 

बेहद दुविधा में हूँ राष्ट्र नायक ! 

राष्ट्र भाषा बचायें या राष्ट्र 

बेहद दुविधा में हूँ अधिनायक !

मातृभाषा बचायें या आदि भाषा 

बेहद दुविधा में हूँ परिधान नायक !

खेत बचायें या जन्मभूमि 

बेहद दुविधा में हूँ खलनायक ! 

                 

जब विघटनकारी , घोर चरमपंथी , सम्प्रदायिक शक्तियां ताकतवर हो , खुमारी में विजयोल्लास मना रहे हों , तब थकी हारी मायूस जनता आत्म समर्पण न कर करूणा से भर संवाद करें , सवाल करे तो इसे निरूपायता की स्थिति में दर्ज , प्रतिरोध के रूप में देखा जाना चाहिए  । मैं इसे मितादास की कविताई सामर्थ्य के तौर पर देखता हूं कि वे इस दुविधा जनक स्थिति और खराब समय के बाद भी जवाबदेह से सीधे संवाद करती हैं । यह अद्भुत , विश्वसनीय और अतुलनीय साहस है । इस कविता में

"विजय कहीं और नहीं पर विजय का जयकारा जरुरी है" 

 कह मितादास ने उस चाल और चरित्र की खूब खूब टोह भी ली , अवलोकन किया । पराजित नायक अपनी अपार, असीमित शक्तियों का दुरूपयोग अपनी ही जनता खिलाफ किस दुस्साहस से करता है कि कायरता भी शर्मशार हो जाए । किन्तु वे बल हैं ताक़त हैं , बिजली हैं , टूट पड़े हैं शाहीन बाग में !

विनाश लीला और शाहीन बाग़
-----------------------------------                                   
तुम कम्बल खींच ले जाओ , 
रोट बनाते तंदूर में पानी डाल जाओ ,
गहन अँधेरे में , सघन कोहरे में , हाड़ कँपाती शीत लहर में  ....
न हारी हैं , न हारेंगी ये शाहीन बाग़ की औरतें  ..... 
दुधमुहों के संग बैठी हैं जिद पे हम कागज नहीं दिखायेंगे !

बेरहम हैं समय , बेरहम है सत्ता 
चिरकुट हैं भांड , मिरासी जिन्हे सत्ता की मिली है शाबासी 
भेष , देश , भांड , सत्ता बेरहम आज पत्ता - पत्ता
जब हारती है सत्ता तब हो जाती है और बेरहम  
ओ शाहीन बाग़ की औरतें सलाम तुम्हे , 
तुम्हारे जज्बे रहें सलामत 
दिखता है उन्हें अपनी पराजय इसलिए क्रूर हो रही है पल - पल 
क्यों साहेब !

पराजय का भार उठाना नहीं होता आसान 
कीड़ों की तरह खोद - खोद कर 
छलनी कर देता है समूचा झोला - मकान 
पराजय अपने लोभ से 
पराजय अपने क्षरण से 
पराजय अपने घमंड से 
पराजय अपने चलन से 
पराजय अपने झूठ से 
पराजय अपने विचारों से 
पराजय अपने खरीदे टट्टुओं से 
पराजय अपने नए - नए ठीकरों से 
पराजय अपने नए - नए फतवों से 
पराजय अपने रोज - रोज की बदकारियों से 
पराजय अपने अमानुषिक व्यवहारों से 
विजय कहीं नहीं पर  ..... विजय का जयकारा जरुरी है 
पर विनाशलीला का कीड़ा कुरेदता रहता है सारे अस्तित्व को और उससे उपजी झल्लाहट पराजय का चरम बोझ 
नकली मुस्कुराहट में बदल कर हुंकारता है 
एक इंच भी नहीं देंगे जमीं 
पर खुद खोखल में खड़ा है हुंकारते वक़्त यह क्यों भूल जाता है !             
                           

मणिपुर की आयरन लेडी नाम से जानी गई , प्रख्यात मानव अधिकार कार्यकर्ता चानू शर्मीला इरोम ने केन्द्र के  विशेष सशस्त्र बल कानून अफ़्सपा के खिलाफ 4 नवंबर 2000 से लगातार 9 अगस्त 2016 तक एक तरफा भूख हड़ताल की । बेदाग चाल और चरित्र के बल डटे रही । यदि काव्य विषय चरित्र को बनाए जाएं तो निःसंदेह इनके जैसे बेमिसाल चरित्र का रचा जाना लाजिम है ।

              इरोम 
----------------------------------------
                      

इरोम 

शहद हथेली पर रख खूब रोई तुम 

जब बाएं हाथ की ऊँगली से शहद को छुकर 

जीभ से लगाया तुमने 

अजीब सा मुंह बनाया था तुमने

और तुम्हारी आँखे बह निकली इरिल और खोर्दाक नदी सी

सोलह बरस बहुत लंबा सफर
हाँ सोलह बरस  
एक लड़की के लिए बेहद महवत्पूर्ण होते हैं 

ये सोलह बरस इरोम 
ये सोलह बरस चनू 
ये सोलह बरस , हाँ हाँ हाँ शर्मीला
इन सोलह बरसों में
जिसकी जीभ ने कोई स्वाद ही नही चखा
इन सोलह बरसों में

इसलिए शहद की मिठास को भी भुल गईं तुम या भुला दिया तुमने 
अजीब सा मुंह बनाया था तुमने
देखकर एक पल को लगा तुम इस स्वाद को पहचानने से इंकार कर रही हो !

चनू ......

शहद मीठा होता है 
बिलकुल कोंग्पाल गाँव की तरह 
तुम्हारे जन्म पर तुम्हारी माँ ने 
पहली बार जो चटाया था
वह शहद ही तो था 

मालोम गाँव , इम्फाल वैली
दस देह , स्कूल से लौटते बच्चे  
बासठ साल की झुर्री दार चेहरे वाली बूढ़ी 
अट्ठारह साल का वीरता पुरष्कार पाने वाला 
श्री नाम चंद्रमणी शूट आउट 

अफ़्सपा  ...... 

इतने सालों की तपस्या
कड़वाहट  
अफ़्सपा  ...... 

तुम्हारे जीभ के लार में घुल गई थी 
जिसे तुम कैमरे के सामने छुपा नही पाई
जब सैकड़ों लोगों की आँखें और 
रिपोर्टरों के कैमरे , माइक 
अंटे थे चारों तरफ 

स्वतः ही सब साफ़ हो गया था
बगैर आंदोलन के । 

शहद हथेली पर रख खूब रोई तुम !

सांत्वना श्रीकांत की कविताएं स्त्रीवादी रूझान की लगती जरुर है ; पर है नहीं वैसा

आजादी के बाद  ,अर्थात् स्वाधीन भारत की हिंदी कविता के अधिकांश रचाव को देखें तो कह सकते हैं कि यश प्रतिष्ठा मान-सम्मान पुरस्कार व अन्य सभी महत्वपूर्ण कार्य क्षेत्रों पर एकतरफा आधिपत्य पुरूषों के ही रहे ; तो बड़ा कारण और कमियों में मौज़ूदा दौर की स्त्री कविता का रूदाली चेहरा तथा गंभीर हस्तक्षेप का न होना रहा । यहां तक कि अपने हिस्से की लड़ाई को भी 'वे' न लड़ , वाक ओवर दे छोड़ दीं थीं । कुछेक कवयित्रियों को छोड़ भी दें , फिर भी शेष बचे में सामाजिक राजनीतिक व आर्थिक चेतना का अभाव तो रहा ही ! अतः इन मायनों में स्त्री बहुत पीछे छूटी रह गई । संदेह नहीं , स्त्री के संघर्ष का इतिहास जानें तो वह प्रागैतिहासिक है । मुकाबले और तुलनात्मक हर मोर्चे पर वे पुरूषों की अगुवाई की हैं तथा उसके बड़े भागीदार भी रहीं हैं । मैं तो मानता हूं कि आदमी के मनुष्य बनने की कड़ी की वे पहली सूत्रधार हैं । किन्तु समय के रथ का पहिया और आखेट मनुष्य के पराक्रमी ज़िद और हठ के आगे , तथा किन्हीं मायनों में अपनी शारीरिक संरचनाओं से वे कमजोर हो , रूढ़ सामाजिकता से परास्त हुईं हैं । तत्पश्चात ही वे पितृसत्तात्मक व्यवस्था का अंग हुईं । अब यह दुर्भाग्य ही कहें कि तब से ही स्त्री , इसी जड़ , पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अधीन रह , कराहती हुई दिखीं हैं , छटपटाती हुईं दिखीं हैं , कभी स्व अस्तित्व को भूल , अपने को पुरुष की आधी ही मान अंगीकार भी की । आज हमारे जीवन में यह व्यवस्था इस तरह पैवस्त है कि उससे विलग कोई भी नई चेतना , प्रगतिशील विचार हमें खटकने लगते हैं । सांत्वना श्रीकांत इसी ज़ठर विषाद के बीच कुछ तेरा , कुछ मेरा , कुछ हम दोनो का ; के भाव के साथ हिंदी कविता में दस्तक दे रहीं हैं , चुनौती प्रस्तुत कर रहीं हैं और बता रही हैं कि कहां खोट है , कहां कमियां हैं , कहां धूर्तता और धृष्टता है , कहां कीमियागरी है । कहीं प्रत्यक्ष वीरांगना सी , तो कहीं अप्रत्यक्ष साहसी विदुषी-सी सचेत् और चौकसी लिए मानक तय, कर रही हैं ! आधुनिक भारत को एक अनुकूलन स्ट्रक्चर देने प्रयास कर रहीं हैं !! बताना न होगा , स्त्री की भागीदारी को सुनिश्चित किए बगैर कि दृढ़ता से रखे बगैर , कि क्या वांछित है , क्या अवांछित है , पुरुष के पुरुषार्थ में !!! यह वे स्त्री के पुरुषार्थ से परिभाषित कर रहीं हैं । स्त्री का पुरुषार्थ क्या है ? कैसे होता है स्त्री में पुरुषार्थ ?? तो कहना न होगा इसकी बानगी सांत्वना की कविताओं में , उसके वैविध्य रंगों में दिखाई देगा । 
गोकि बताना न होगा कि सांत्वना श्रीकांत की इस 'स्त्री का पुरुषार्थ' संग्रह के सभी चारों 'स्त्रीकाल' में स्त्री के संघर्ष का संघीय रुप व दीप्त मन की आकांक्षाओं का वेग है । बाज के डैनो सा हवा के विपरीत कहीं गतिमान , तो कहीं सरल प्रवाह और उड़ान लिया हुआ है । सांत्वना श्रीकांत इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक की उदीयमान कवयित्री हैं । अभी हालिया प्रकाशित 'स्त्री का पुरुषार्थ ' उनका पहला संग्रह है । जो सर्व भाषा ट्रस्ट न‌ई दिल्ली से प्रकाशित है । कवयित्री को उदीयमान इसलिए ही कह पा रहा हूं कि बहुत कुछ अच्छा होने के बाद भी उनके कहन में अभी , अधिक और अप्रत्याशित लरजता तथा समर्पण है । निसंदेह यह स्त्रियों के नैसर्गिक गुण हैं । परन्तु स्त्री पर दासता लादने में कि आक्रमण का सबसे नितांत सुलभ मार्ग भी यही से बना है । यक़ीनन सांत्वना की यह कोशिश , उनके द्वारा बिखराव को रोकने / टूटने को सहेजने / बचाने की मंशा से है । कुछ घटे , कि पहले जोड़ लेनें की दृढ़ता से है तथा काफ़ी हद तक भौतिकवाद के विरूद्ध सांस्कृतिकवाद की जड़ों को मजबूती प्रदान करने के सामर्थ्य में है । फिर भी,  चूक पर चूक कुछ ज्यादा सध जाए कि लद जाए , पहले मैं कहूंगा स्त्री को खुद को परखने उन्हें एक नई सौंदर्य दृष्टि विकसित करने की महती जरूरत है , और यह उन्हें ही हासिल करना है । संग्रह में प्रकाशित कविताओं को सांत्वना श्रीकांत ने 'स्त्रीकाल' के नाम से जिस तरह से नियोजित किया है वह काव्य के वैशिष्ट्य से पहले एक स्त्री के जीवन वैशिष्ट्य को गहराईयों में उतार , देख पाने की समग्रता में आया है ।

"तुम भींचना मत 
अपनी मुट्ठियां
कहीं पसीजती हुई हथेलियों से
रिस न जाऊं मैं।" 

सांत्वना श्रीकांत की कविताएं नायक और नायिका के मूल भाव-भेद से उपजती है और वह एक ऐसे लौकिक जगत और लोक में विचरण करती है जहां उनके सोचने ,समझने चाहने को नायिका की प्रधानता में रख देखा गया । यह एक तरह से काव्य का रीतिकालीन रूपक है । जैसे प्रचलित तोता मैना की कहानियों में गढ़ी गई , किस्सागोई में हुआ ।   

स्व से आरंभ कविता जब अपने वैयक्तिक पीड़ाओं, आकांक्षाओं की सीमा को लांघने लग जाए तो उसका वास्तविक रूप सौन्दर्य , निखर बाहर आता है । वह सिर्फ निजी और एकांतिक अनुभूति न रह, निर्वैयक्तिक और व्यापक समाज में प्रक्षेपित होता है । दुख के संदर्भ में तो यह अकाट्य है कि दुख का रंग दुखों के अलग-अलग होने के बावजूद एक-सा अपना होता है । कविता इस परिस्थिति में समाजिक आचरण व व्यवहार का भाग बन , सहारा बनती है । इधर सांत्वना की ढेरों कविताएं इसी तरह से निजी अनूभूतियों के रास्ते समाजिक परिप्रेक्ष्य में दस्तक देने वाली हैं ।

सांत्वना की कविताएं हैं तो असलत: स्त्रीवादी कविताएं ही । मोड कि माडल के वैविध्य में एकांगिक न रहकर वह स्त्री पुरुष के आत्मिक मेलजोल को मजबूती देने के प्रयत्न की कविताएं हैं तथा कठिन बंधनों के परिष्कृत रूप सौन्दर्य की कविताएं हैं । वे अपनी कविताओं में स्त्री के परस्पर ही पुरुष को रखती हैं । जवाबदेही , एकतरफा  न स्त्री पर लादती हैं न पुरुष पर बल्कि दोनों ही के प्रेम और मुक्ति का  विन्यस्त रुप है सामने लाती हैं । कि जोड़ीदार को वह प्रेम में बुद्ध बना देती है

गरम सांसों की छुअन,
होठों की चुभन
समाधि तक चलेगी साथ,
वहीं घटित होगा प्रेम।

और तब देना

मेरे शरीर के 
हर हिस्से पर अपना नाम,
वहां पर बीज बो दूंगी मैं, 
जब आखिरी बार मिलोगे
तब वह बन चुका होगा
बोधिवृक्ष
और-
तुम उसकी छांव में 
बैठ कर
बुद्ध बन जाना।

प्रमाणिक जीवन यथार्थ न कपोल कल्पित स्वप्न- सा होगा , और न ठस्स वैचारिक-सा , होगा तो वह जीवन सम्मत ही होगा

"आंखें मूंद कर भी
तुम्हारी छुअन ही टटोलती है
मेरे अंतस को,
जाते-जाते आखिर में तुम
थोड़ा बच जाते हो मुझमें.."

सांत्वना की इस कविता में अहसास व अनुभूति की प्रबलता है । जो नितांत और निजी है । बावजूद वह निजता के दयारों को फांद अपनी स्पंदन‌ अहसासों से सामाजिक जीवन का रचाव करती है । उनकी इस कविता के बिम्बों को झांकें तो उसमें एक ऐसे जीवन पर्यन्तता से भरा रूह लम्हा और ताज़गी है कि जिसके सहारे जीवन की जटिल दुर्गम रास्तों का पार पाना भी संभव प्रतीत होता है । चूंकि यह अंतस का उभार है , थोड़ा बचे रह जाने का आंतरिक प्रक्षेपण है । स्पंदन अहसासों के खूबसूरत स्त्रोतों से झरनों का फूटना है । यह दीगर है कि इस तरह की कविता में वह जीवन यथार्थ नदारद होते रहे हैं जहां संकट के साथ संघर्ष व टकराव बनता है । अतः लोक जीवन के काव्यवस्तु के तौर ये निष्प्रभावी हो जाते हैं । बतौर एक कवि /कवयित्री को देर सबेर इन संदर्भों से छूटना ही वांछनीय है अन्यथा यह लिजलिजा होगा । 

"तुम्हारे स्वयं में होने के मायने
कर दिए है लिपिबद्ध"

सांत्वना की अधिकांश कविताओं की पृष्ठभूमि में स्त्री का पुरुष में लीन समर्पण है । जो उसके स्वत्त्व से समिष्ट की मिश्रित व्यवस्था व भौगोलिकी में दिखाई देता है । स्त्री के पुरुष पर अधिकाधिक हस्तक्षेप तथा अधिकृत जुड़ाव में रूपायित होता है । सांत्वना के यहां भावात्मक बयार और बहाव से उत्पन्न यह एक विकट स्थिति है  कि "देना" ही देना हुआ ! और देना सुखकारी ही है । फिर अप्राप्य क्या रह जाता है ? कि वे कहती हैं

"अंकित कर दिया है
अपने वर्तमान और भविष्य में
तुम्हें..."

"ताकि सदियों तक जीवित रहे
अप्राप्य का सुख।"

इस अप्राप्य सुख की प्राप्ति का सवाल , कविता के पुनर्पाठ की मांग करती है ।

"तुम्हारे साथ सुख जीते जीते
दुख का आकार और गहराई भूल गई थी"

सांत्वना की कविता में संबंधों की जो रागात्मकता है वह अनुभूति के वैभव में है । यद्यपि एक का जाना और दूसरे का आना होता है । यह दूसरा जो आया है अथवा उपस्थित हुआ है अनुगामी व सहचर बन, आया है । किन्तु सांत्वना के यहां "जाना" ही कहां हुआ ? उनके यहां तो यह जाना क्रिया ही नहीं है । न कभी व्यतीत होने वाली है । बल्कि भीतर ही भीतर और निरापद घटित होने वाली है ।

दरअसल दुख ने मुझे अपने भीतर लील गया
और मैंने तुम्हारा जाना स्वीकार किया।
हालांकि इस तरह के गूढ़ और रहस्यवादी बातें अक्सर हमें भटका जाती है । ओरांग ऊटांग की सैर कराती तथ्य और लक्ष्य से दूर रखें रहती है । कविता किन्हीं मायनों में क्लिष्ट सी हो जाती है और थकावट भरी मशक्कत भी कराती है ।

कवयित्री सांत्वना श्रीकांत की कविताई चेतना एक लंबे और दीर्घ पठन-पाठन के बाद स्त्रीवादी रूझान में आ टिका है । इधर स्त्रीवाद में पुरुषार्थ के मायने को मैं सांत्वना की कविताओं से देख रहा हूं तो सांत्वना के यहां कि यह स्त्री पारंपरिक भारतीय प्रेयसी है ,अथवा पत्नी है । जो ढांचागत परिवार की बड़ी जरूरत है । जिसकी अपनी सोच का भी एक 'सीमित' आकाश है । सीमित इन मायनों में है कि वह अपनी स्थिति और जड़ जुड़ाव से खुद को अलगा नहीं पाती , कांधा बनने के जतन में कांधे से झूल जा रही है और झोल खा जाती हैं । मुंबईया फिल्मी पटकथा के किरदार की तरह , नायिका की भूमिका को जीने के यत्न में वह खोती अधिक और पाती कम हैं । लेकिन सांत्वना के यहां कम में भी तसल्ली अधिक है जिसे वे "अप्राप्य का सुख" भी कहती हैं

"मैंने तुमसे प्रेम किया
बैचैन हुई, नींद त्यागी,
तुम्हें जो पसंद था
इसलिए पसंद किया,
आखिर में मेरे पास
कुछ नहीं बचा मेरा।"

मैं फिर जोर देना चाहता हूं । प्रेम व्यवसाय नहीं है । सौदा भी नहीं है । किए को बताए जाने की अथवा अपेक्षाओं से भी पृथक है । विवश भी नहीं होता है प्रेम । समृद्धि का आधार है प्रेम । पसंद-नापसंद को इस तरह के जस्टीफाई की दरकार नहीं हुई , कभी भी प्रेम में ।

"तुम्हें जो पसंद था
इसलिए पसंद किया,"

सांत्वना की कविता में निश्चितता , अनिश्चितता और द्वंद्व का जो वितान है वह दृष्टव्य पंक्तियों में देखे जा सकते हैं

"और तुम हमेशा
इस प्रायश्चित में रहे
कि मुझे तुमसे प्रेम नहीं!"

"मैं जब कभी
बंद करती हूं आंखें
तुम मेरा माथा चूमते हुए
दिखाई देते हो मुझे,
बांहों में लेकर सुनाते हो
धरती की लोरियां,"

"हालांकि
वास्तविकता यह नहीं है।"

जीवन के क‌ई यक्ष प्रश्न , क‌ई यक्ष आशंकाओं के बावजूद सांत्वना की कविताई खूबी में विश्वास का जीवित रूप , उसके उलट-पलट भाव-विचार , भाव-विभोर , शिकवे-शिकायत भरे सौंदर्य उनकी कविताओं में दिखाई दे जाते हैं ।  यही वह तथ्य है कि सांत्वना जीवन के तार को पारंपरिक राग से छेड़ देती हैं

तुम ब्रह्मांड हो
जहां से हुआ उद्भव मेरा,
हम दोनों के लिए
प्रेम के मायने
इतने अलग हैं
जैसे-
मेरे मौन में तुम्हारा होना,
मेरे हर खयाल की
शुरुआत और अंत का
तुमसे होकर गुजरना।
यहां तक कि
प्रेम का पर्याय तुम हो।

सांत्वना की कविता  ज्ञानमार्गी उपदेश से नहीं , बल्कि भौतिक उद्देश्यपरक , घनीभूत विचार और यथार्थ से बुने गए हैं ।
 
सुनो लड़की ।
तुम छुपना मत,
आंखें नीची मत करना,
दुपट्टा कहीं खिसका तो नहीं,
इसकी भी परवाह न करना,

सिर उठाना और
नीची कर देना उनकी आंखेंं
अपने तेज से।

 सुनो लड़की !

तुम्हें इतिहास नहीं बनना,
तुम्हें पूज्य भी नही होना।
सामान्य जिंदगी चाहिए तुम्हें
जहां-
दहशत न हो अपनी देह
के नोचे जाने की,
फिक्र न हो दबोच कर
पर काटे जाने की,
जहां खिली रहे
तुम्हारी मुस्कुराहट
बिना इस डर के
 
सुनो लड़की सांत्वना श्रीकांत की एक मजबूत और बेहतरीन कविता है ।
इसमें कोई दो राय नहीं कि सांत्वना श्रीकांत की यह कविता , स्त्री विषयक कविताओं में अतुलनीय कविता है ! इसमें जरा भी संदेह नहीं कि सांत्वना की यह कविता एक स्त्री को लेकर बनी बनाई प्रचलित धारणाओं के खिलाफ साहस और बल की जीवंत कविता है । महत्वपूर्ण यह है कि वे इस कविता में स्त्रीवाद या कि उनकी रूदन से कहीं अधिक बल , उसके प्रतिरोध में दी है । स्त्री मुक्ति अथवा समानता की कामना जड़ता को तोड़ कर ही हासिल किया जा सकता है ! और स्त्री को ऐसा होना होगा !! ऐसा होना , उनके होने के दरकार में है !!!

"अफसोस यह है कि
इस प्रक्रिया में
हर बार वे
बदचलन "हो जाती हैं

 युद्धरत होने 
 तैयार हो जाती हैं
अगली दफा के लिए।

 कह , दशा और दिशाएं दोनों को ही सांत्वना ने इस कविता में बड़ी सजगता के साथ रखी है । औचित्य को बरकरार रखा है । मैं यह बार बार कह रहा हूं कि स्त्री अनगिन साजिशों का शिकार या कि अभ्यस्त न बने , प्रतिरोधी बनें । 

श्रीकांत वर्मा की कविता में राजनीतिक चेतना का एक ट्रेंड रहा

आज के राजनीतिक परिदृश्य पर श्रीकांत वर्मा कितने साफ़ थे । यह अलग है कि वे सत्ता के साथ थे । संभवतः उनमें निरुद्वेग , आवेगहीन जनता को लेकर हताशा आई हो  कि वे सत्ता के विद्रोही रुप को त्याग शरणागत हो गए । ऐसा , मैं इसलिए कह पा रहा हूं कि एक ओर आवारा पूंजी और अतृप्त इच्छाएं है और दूसरी ओर विचार धारा । सत्ता के साथ बने रहने की महत्वाकांक्षा ने आदमी को उसके आत्मसम्मान के न्यून स्तर तक ला खड़ा किया है ‌। स्थितियां यह कि "प्रतिवाद" से बेईमान शब्द आज कुछ और , है ही नहीं। सत्ता की जय-जयकार और यशगान में समाधिस्थ लोग कब जागोगे कि कहते ही रहोगे
महाराज की जय हो !

■ कोसल में विचारों की कमी है
-------------------------------------------------------------
महाराज बधाई हो; महाराज की जय हो !
युद्ध नहीं हुआ – लौट गये शत्रु ।

वैसे हमारी तैयारी पूरी थी !
चार अक्षौहिणी थीं सेनाएं
दस सहस्र अश्व
लगभग इतने ही हाथी ।

कोई कसर न थी ।
युद्ध होता भी तो नतीजा यही होता ।
न उनके पास अस्त्र थे
न अश्व न हाथी
युद्ध हो भी कैसे सकता था !
निहत्थे थे वे ।

उनमें से हरेक अकेला था
और हरेक यह कहता था
प्रत्येक अकेला होता है !
जो भी हो जय यह आपकी है ।
बधाई हो !
राजसूय पूरा हुआ
आप चक्रवर्ती हुए

वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गये हैं
जैसे कि यह –
कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता
कोसल में विचारों की कमी है ।


Tuesday, May 18, 2021

पल्लवी मुखर्जी कविता में स्त्री चेतना का आख्यान पाठ रचती हैं, से

आरंभ से मैं मानता आ रहा हूं कि स्त्री एक भरी पूरी नदी है । इसका यह आशय नहीं कि ष
,नदी दोहन की वस्तु है रीत लिए जाने तक । बल्कि स्त्री अपनी समग्र लुटा पाने में समर्थ वह जीवनदायिनी नदी है जो लुट पीस जाने के बाद भी उफ् नहीं करती । पर नदी का दुर्भाग्य तो देखो ! कि कैसे उसे रीत लिया जाता रहा । हिंदी की स्त्री कविता इस रीत लिए जाने की कसक और पीड़ा में अब तक धंसी ; कराह रही है तो उसका एक बड़ा और बुनियादी कारण हमारे पीढ़ी दर पीढ़ी से चली आ रही पौरूष ग्रंथि दोष तथा पितृसत्तात्मक बोध है । अतः नदियों की कसक को समझना , उसे आत्मसात करना जरूरी है । बिना उसे अंगीकार किए , स्वीकारे हम स्त्री पुरुष के बीच के रह ग‌ए टालरेंस नहीं भर पाएंगे और तब तक हिंदी की स्त्री कविता भी अपने मुकाम हासिल नहीं ही , कर पाएगी । यह अलग बात है कि इधर हिंदी में स्त्री विमर्श वह उनके स्वतांत्र्य को लेकर अनेक चर्चा परिचर्चा होती रही , पर जमीनी सच्चाई उसके परिणाम मूलक यथार्थ के धरातल पर कहीं नहीं टिका । चूंकि स्त्रीवादी विमर्श की मांग में क्षणिक लाभ , यौन अभिरुचि का मामला तथा सामाजिक दायित्व बोध के नकार से उपजी स्वतांत्र्य बोध शीर्ष पर रहा । खैर ! मैं पल्लवी की कविताओं पर अपने विचार व्यक्त करना चाहूंगा चूंकि ऊपर जो कुछ कहा वह हिंदी की स्त्री कविता और पल्लवी की कविता को लेकर कहा । पल्लवी मुखर्जी समकालीन हिंदी कविता के अंतिम दशक की कवि हैं । खान नगरी कोरबा से आती हैं व इन दिनों बिलासपुर में हैं । वे अपने समकालीन साथियों में कमलेश्वर साहू , बसंत त्रिपाठी ,गणेश गनी , किशन लाल , भास्कर चौधरी , संजय शाम , निर्मल आनंद , प्रशांत जैन , रामप्रसाद यादव , सतीश छिम्पा , विवेक चतुर्वेदी , पूनम विश्वकर्मा , विश्वासी एक्का , मृदुला सिंह , आरती तिवारी , अनुपमा तिवारी , अखिलेश श्रीवास्तव , सिद्धार्थ वल्लभ , कुमेश्वर कुमार ,अंजन कुमार , घनश्याम त्रिपाठी , राहुल बोयल , अमर दलपुरा , शिव कुशवाहा , रोहित ठाकुर , कुंदन सिद्धार्थ , मिथिलेश कुमार राय ,प्रेम नंदन के परस्पर अपना स्थान बना चुकी हैं । साथी कवियों के बनिस्बत वे निरंतर स्त्री अस्मिता के सवालों , उनकी स्वीकार्यता को लेकर अधिक मुखर रही हैं । उनकी कविताएं संवेदना की आंच से पक बृहद मनुष्यता का मांग करती है । कहना न होगा कि उनकी कविताएं द्वितीय दर्जे के चोटिल दास्तां के इतिहास परक यथार्थ का एक पूरा अभिलेख है । पिछले दिनों योगेन्द्र कृष्णा के प्रतिपक्ष पर उनकी कविता पढ़ी फिर उनकी अन्य रचनाओं को भी खंगाला तो उनमें एक अलग तरह का विश्वास बढ़ा । उनकी कविताओं में वह सब देखा-पाया जिस पर ईमानदार सृजनधर्मिता आकार पाता है । यानी स्त्री कविता के जो दो एकांगिक ढांचे इस बीच कविता में विकसित किए गए हैं उसका जरूरी स्वीकार-अस्वीकार उनकी कविताओं में साफगोई के साथ मौजूद है । वे कविता में स्त्री संवेदना के बनिस्बत उसके मानवीय रूप , रस , गंध , रिश्तों की अहमियत इत्यादि को स्वार्थपरक होने से बचाने की कवायद करती हैं । एक स्त्री अपेक्षाओं के अंबार से लदे रहती है । झुकी रहती है उसके बोझ तले ।  परन्तु दायित्व बोध से भरा होने का जो जीवन चित्र वह विकसित कर रही हैं व उसमें अपने को प्रसन्न बनाती है उसका मौजू दृश्य बिम्ब "रोटियां" कविता की इन दो स्टैंजो में काबिल ‌ए गौर है

                         01

वह रोटी बेल रही थी
गोल -गोल
और
साँस ले रहा था घर
इत्मीनान की 

                            02

पसीनें की बूंदें
चमक रही थी और
घर की फसल
लहलहा रही थी

इन दोनों काव्य पंक्तियों से दो बातें साफ होती है एक - उनकी एकनिष्ठ श्रम शीलता और दूजा उन पर किया जाने वाला भरोसा , जिस पर इत्मीनान की सांस लेता है घर और घर की फसल लहलहा रही होती । पर उसमें उसके इत्मीनान की सांसें ,  या कि उसके फसल के लहलहा उठने की परवाह ( ? ) नहीं होती । यह सिर्फ उस पर ही निर्भर रह जाता है । एक स्त्री के जीवन में ऐसे अनगिन विडंबनाएं है जो उनकी शेष और कविताओं में भी दर्ज हैं । मुझे लगता है स्त्री कविता में एक कवि के इस रूप में  पल्लवी की दर्ज किए गए हलफनामे को देखा जाना चाहिए , पढ़ा जाना चाहिए ।

                       रोटियां
___________________________

वह रोटी बेल रही थी
गोल -गोल
और
साँस ले रहा था घर
इत्मीनान की

आकाश का चाँद
मखमली रोटी की तरह
खिला-खिला था

सिर्फ
आँखों से ओझल थे
टप-टप करती
पसीने की बूंदें जो
माथे से आँचल को
भिगों रही थी

पसीनें की बूंदें
चमक रही थी और
घर की फसल
लहलहा रही थी

इधर वह
रोटी बेलती जा रही थी

                        तुम
___________________________

जिनके घर फूंक दिये जाते हैं
या रौंद दिये जाते हैं
किसी देह की तरह

उन घरों के दुःखों का
लेखा-जोखा
हिसाब-किताब
क्या तुम्हारे
बही खातों में
दर्ज है

या उन्हीं की तरह
भूल चुके हो तुम
जो सिर्फ़ पन्नें पलटते हैं
देखते हैं
सरसरी तौर पे
और
याद रखते है
बस
अपनी भूख

अंतहीन भूख से
मरती आत्मा दिखती नहीं

             दुखों का हिसाब 
____________________________

वह औरत
तमाम पीड़ाओं और दुःखों को
पकड़ती नहीं है मेरी तरह
उड़ा देती है सारी पीड़ाएं
जैसे कोई चिड़िया हो
आँगन की
आँसुओं से गिरती बूंदों में
टिमटिमाते हैं तारें
जुगनुओं की तरह
जो चूल्हे की आँच पर
और चमक उठते हैं
उसकी हांडी से
खदबदाते भात की सोंधी गंध में..
टकराती है
मेरी खिड़की से और
फैल जाती है पूरे कमरे और देश में
उसका मरद
महुए से सराबोर
देखता है उसे जैसे
कोई गिद्ध हो
वह औरत
उसकी आँखों में बैठे
गिद्ध को झपटने नहीं देती
देह की कसावट को
ढाक कर
मगन हो जाती है
भात की सोंधी गंध में

                  हम -तुम
___________________________

तुम जानते हो
मेरी
ज़रूरत भर का नमक
बित्ते भर के
आकाश का विस्तार
जिसमें
बोरी भर के
शब्द होतें हैं
एक भी शब्द के इतर
हमारी सुबह नहीं होती
शब्दों का
ताना-बाना बुनते है हम
रात के
अंतिम प्रहर तक
अंतिम छोर पर
तुम्हारी आँखों पर होती हैं
एकबूंद
उसी बूंद पर
मेरी सुबह होती है..

                     स्त्री
_________________________

स्त्री कोई सड़क नहीं
जिस पर चलकर
तुम ....
अपने लिए
रास्ते तय करते हो
न ही कोई
वटवृक्ष
जिसकी छाया के नीचे
बैठकर
सुस्ताना चाहते हो
स्त्री को
हरसिंगार का फूल भी
न समझना
जो
रातभर खिलकर
टपक जाता है
तुम्हारी हथेली में
मसलने के लिए
स्त्री
धरती की तरह है
जो
नम रहना चाहती है
मिट्टी की तरह
ताकि
एक बीज
फूट सके
उग सके
कोई पौधा
उम्मीद का..


युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...