Friday, October 30, 2020

कैलाश मनहर

एक रिवाज सा चल निकला है इन दिनों , पनाहगाह के लिए बेरुखी , बेमुरव्वत । यह हादसों के शहर में हद से कही दूर , और आगे तक है । ज़ालिम जमाने ने दस्तूर ए ख़ास के अर्थ को तार-तार कर दिया है । ऐसे वीभत्स और डरावने समय में स्वार्थ के अलावा कोई नजदीकी भी नहीं , सब अपनी माने खो रहा हो , तब कैलाश मनहर जैसे साथी उस टिमटिमाते दीपक के लौ की तरह हाजिर होते रहे हैं और आश्वस्ति से भरते रहे हैं कि कुछ हाथ अब भी है बिल्कुल सही सलामत और साबूत । विश्व पर्यावरण दिवस पर लिखी इस कविता के अनेकार्थ कम सटीक और जीवन्त नहीं है , बजाय इस मीडियोकरी समय के छद्म से जो प्रकृति , पर्यावरण के प्रति संजीदगी में आए हैं और व्यापक मनुष्य के जीवन में बड़ा हस्तक्षेप कर बड़े बुजुर्गो के प्रति मान सम्मान के नज़रिये को प्राथमिक बनाए जाने के गुण से हमें सम्पन्न बनाता है । कैलाश मनहर की इस कविता के विजुअल से कहीं अधिक अन सीन में दृश्य है । जिसे समझने के लिए मनुष्य में जैविक दृष्टि की वांछनीय दरकार है 

धूप बहुत तेज़ है
और मैं जिस पेड़ की छाया चाहता हूँ
वह धूप में खड़ा है

#विश्व_पर्यावरण_दिवस

Wednesday, October 28, 2020

विनय कुमार

समकालीन हिंदी कविता में कुछ बेहतर लिख रहे कवियों की कविता में मौजूद यथार्थ बोध , उनकी गहन दृष्टि संपन्न चेतना व अनुकरणीय  संघर्षशीलता , हमेशा मुझे आकर्षित करता रहा है । मुझे याद आता है इस बीच शाहीन बाग और लाकडाऊन को लेकर लिखे कविताओं के मजबूत पक्ष के बराबर अब तक किसी भी विषय संदर्भ में इतनी कविताएं , शायद ही कभी लिखे गये हों । प्रतिरोध का इस तरह से जागना आश्वस्ति प्रदान करता है । परन्तु इसी के परस्पर विनय कुमार ने बहुत ही आत्मीय और दाम्पत्य प्रेम की कविताएं लिखा है । यह गौर किया जाना चाहिए कि अपने समय के त्रासद सच को एक कवि दूर देश में बैठी पत्नी तक अपने 'पाती' के माध्यम से कैसे पहुंचाता है !
 विनय कुमार की इस कविता की बड़ी ख़ास बात यह है कि इसमें भी वही त्रासद सच , विडंबना बोध ,  नागरिक व्यथा का यथार्थ गहरे अर्थों  में अभिव्यंजित हो रहा है और वह भी शांति में । विनय कुमार के यहां इस कविता में न कोई ताबड़तोड़ गुस्सा है और न निरुपायता ही । किन्तु भाव और संवेग से रची इस प्रेम कविता (स्वकीया प्रेम )की अपनी अंतर्दृष्टि है । जो न‌ई है । Vinay Kumar

पढ़िए विनय कुमार की कविता 'पाती' साभार जानकीपुल
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 इन दिनों घर में अकेला हूँ। बेटी मेडिकल कॉलेज में मरीज़ों की सेवा में और पत्नी न्यू जर्सी,अमेरिका मे बेटे के पास ।कल अरसे बाद उसके नाम कोई पाती लिखी। उसे भेजी तो बोली – सबको पढ़ा दो। सो, अपना या ख़त दरबार ए आम में-
 
 
                  पाती
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                      १

लोगों के फ़ोन बहुत आ रहे
पूछते हैं – कैसा हूँ
यह जानकर सहानुभूति चचकारते हैं
कि में अपने घर में निपट अकेला हूँ
 
परेशान हो जाता हूँ कई बार
तो पैर बहलाते हैं
चलो छत पर
पंछी आ रहे होंगे
 
जवाब देते हैं दो हाथ
और दस उँगलियाँ
सारी की सारी इंद्रियाँ
 
आँखें कहती हैं –
मेरे पास सूर्य
और चंद्रमा दोनों की रोशनी है
 
कान कहते हैं
मेरे पास बेगम अख़्तर की आवाज़ है
लता और किशोर और जगजीत की भी
 
नासिकाएँ यक़ीन दिलाती हैं
कि उनके पास फूलों की ही नहीं
पहली बारिश में भीगती सूखी मिट्टी की साँस भी है
 
जीभ कहती है – बोलो क्या चाहिए
इतना लंबा मेन्यू है मेरे पास
पढ़ते – पढ़ते नींद आ जाएगी
और हथेली दोस्तों के नाम गिनाने लग जाती है !
 
                      २
ख़ुद को बहलाने की भी एक हद होती है
पेड़ों और फूलों और पंछियों के चेहरे याद हो गए हैं
 
मोहल्लों के कुत्तों को
उनकी आवाज़ से पहचानने लग गया हूँ
समझने लगा हूँ कि सारे कौए इसी मुहल्ले के नहीं
कुछ राजेंद्रनगर और बाइपास के पार से भी आते हैं
और वे अपनी गोष्ठियों में कोरोना के ख़िलाफ़
कविता नहीं पढ़ते
 
                         ३
इस विवश एकांत से अधिक कौन जानता है
कि हज़ारों मील दूर
बच्चों को गोद में लिए एक मचान पर बैठी हो तुम
मृत्यु की ख़बरें बाढ़ के पानी की तरह बढ़ रही हैं
 
किसी मार खाए बच्चे की तरह
परदे की ओट से झाँकते हैं वे दिन
जब दूरियों की पैमाइश घंटों में होती थी
 
मील अपनी लम्बाई लिए वापस आ गए हैं
 
रोटी हम दोनों के पास है तकिए भी
लेकिन नींद
खिड़की के शीशों पर
ओस की तरह टपकती है
शीशे धुंधले हो जाते हैं और सो जाते हैं
आँखें जागती हैं
मगर शीशों के पार कुछ भी दिखाई नहीं देता
तुम्हारा डर समझाता है
खिड़कियाँ मत खोलो
मूँद लो आँखें और सोने की कोशिश करो
और तभी अशुभ आवाज़ों वाली गाड़ियाँ
पत्रहीन वृक्षों की ठूँठ नींद को चीरती गुज़र जाती हैं
 
अच्छी चीज़ें बूँद-बूँद बह रही हैं उधर
जिधर जाना मना है
 
                      ४
उत्तरी अमेरिका एक महादेश है
कई महानताएँ बसती हैं वहाँ
सोने के पर्वत रखने की गगनचुंबी तिजोरियाँ
और बर्फ़ के विस्तार के नीचे सोने का नगर
वे हथियार जो सब कुछ ख़त्म कर सकते हैं
 
सबको मार सकने की ताक़त जिसके पास
तीन-चार फ़ीट गहरे गड्ढे खोद रहा है
 
गलियाँ यहाँ भी सूनी हैं
मगर बुलेवार्ड का सूनापन अंतरिक्ष जैसा लगता है
ठीक कहती हो तुम
यह झोपड़ी और महल के गिरने का फ़र्क़ है
 
जो भी ही संयम का मचान कभी नहीं गिरता प्रिये
कह देना बच्चों से
कि पुरखों की यह बात अमरदीप है
जिसकी रोशनी में
पृथ्वी के सबसे पुराने नागरिकों में से एक -भारत – ने सहस्राब्दियाँ पार की हैं
 
                     ५
यहाँ का समाचार अच्छा है
हवा साफ़ है आसमान नीला
कल बारिश हुई थी
मैं बालकनी में बेंत की कुर्सी पर देर तक बैठा
लगा, रामगिरि पर बैठा हूँ
 
                       ६
पंछियों का दाना-पानी बदस्तूर जारी है
कुत्तों की रोटियाँ भी
 
पड़ोसी की गायों का रंभाना अच्छा लग रहा इन दिनों
उनके लम्बे और छोटे आलाप
ऋगवेद के गायत्री छंद की याद दिलाते हैं
 
मुहल्ले का कोई समाचार नहीं मिला है
यानी ठीक ही होगा सब
अपना मुहल्ला तो पहले भी शरीफ़ों का था
अब तो सामाजिक दूरी को
क़ानून का दर्जा ही मिल गया है
 
सुरक्षा सबसे बड़ा सरोकार है
भला आदमी वह जो दो मीटर दूर से मिले
संदेह को स्वभाव में बसाने को कोशिश जारी है
 
                      ७
मुल्क का क्या कहें
पहुँचती ही होंगी ख़बरें तमाम
मलाई की परत पतली हो गयी है
पराठे रोटियों में बदल गए हैं
कल की तमाम उड़ानें रद्द हैं
अचानक लगे ब्रेक के बावजूद
पहिए घूम रहे हैं
जगह-जगह जलते टायर की गंध है
 
बजती थालियों, जलते दीयों और बरसते फूलों के बीच
बहुत चूल्हे ठंडे हो गए हैं
राजाओं को कहाँ रहता ध्यान
कि पैरों और हाथों के बीच पेट भी होता है
 
जो ठीक से षडरस नहीं जान पाए
क्या जान पाते कि वाइ-रस क्या बला है
जिनके पास ताले ही नहीं
कैसे समझ पाते कि क्या होती तालाबंदी
बहकावे सिखावे और बहलावे के वोटर
क्या बूझ पाते कि ‘सर्वजन सुखाय’ बोलती
सियासत के मन में क्या है
 
बाँसों से घिरे हैं रास्ते
भूख के बाड़े में बँधे हैं करोड़ों पेट
 
मज़दूरी की शान
कारख़ानों और इमारतों की उदासी में दफ़्न हो गयी है
 
सूबों और तहसीलों की सरहदों पर
भय है भूख है भीख है
नहीं है तो भरोसा
 
नेह के नमक के लिए दौड़ रहे लाखों पैर
क़ानून की लाठियों
घृणा की ठोकरों और मौत के मोड़ों के बावजूद
 
बापू ने गमछे को मास्क बना लिया है
 
 
                   ८
मन बहुत उदास है बहोत
वजह क्या बताऊँ
ग़म ए जानां और ग़म दौरां एक हो गए हैं
 
चलो चाय पीते हैं
 
मेरे हाथों में शाम की चाय है
और तुम्हारे हाथों में सुबह की
मेरी दार्जिलिंग तुम्हारी असम
मेरी फीकी तुम्हारी शीरीं
चलो आज चुस्कियाँ टकराते हैं –
और चीयर्स की किताब में नया क़ायदा जोड़ते हैं
 
और चुस्कियाँ भी वो नहीं
जो तहज़ीब की अटारी पर
बैठी चिड़िया की तरह चुपचाप बोले
खुलकर पीते हैं आज अपनी दादियों की तरह
और चाय के सुड़कने की आवाज़
उन केबल्स में बहने देते हैं
जो मृत्यु भय से सहमे महासागरों
और महादेशों के हृदय से गुज़रते हैं !
 
                        ९
जब तुम कॉल करती हो तो कहता हूँ –
रुको, अभी लगाता हूँ
दरअसल मैं उन तकियों को हटाने लग जाता हूँ
जिनका बिस्तर पर होना
शब ए फ़िराक़ की शिद्दत का सबूत है
 
जब तुम कॉल करती हो तो कहता हूँ –
रुको, अभी लगाता हूँ
और मैं उन किताबों को हटाने लग जाता हूँ
जो फ़सीलों की तरह मुझे घेरे रहती हैं
क्योंकि जानती हो तुम
कि ये मेरे “पारा-पारा हुआ पैराहन ए जान “
के पेपरवेट हैं
 
इन्हें हटाकर तुझे बताना चाहता हूँ
कि मैंने आँधियों को बाएँ पैर के अँगूठे से दबा रखा है
 
पृथ्वी घूम रही है मगर हम नहीं घूम सकते
हवाओं की आवाजाही जारी है
मगर हम महदूद
क्या आवास और क्या प्रवास
पंछियों की चोंचें
एक दूसरे को नेह के दाने खिला रही हैं
और हम पाबंदी ए रोज़ा के ग़ुलाम
 
एक वाइरस मौत और मज़हब का रिश्ता तय कर रहा है!
 
                      १०
तुम्हारे मंदिर में हड़ताल है
रूठे हैं सारे विग्रह
एक जैसे फूलों और फलों के प्रसाद से ऊब गए हैं वे
 
सपने में आते हैं अक्सर और कहते हैं
कि यार गोंद के लड्डू और काजू कतली खाए
महीनों हो गए
 
सोचता हूँ, उज्जैन में काल भैरव का क्या हाल होगा
कैसे तैरता होगा मछली-मछली मन
सूखी हुई दूबों पे ओस के बिखराव में
 
आस्तिकता कानों में फुसफुसाती है –
शराब की दुकानें उन्हीं की मर्ज़ी से खुली हैं!
 
                     ११
तुम जब गयी थी परदेस
आम की फुनगियाँ सूनी थीं
दिखाया था न तुम्हें कि कैसे मँजरा गयी थी
अपनी आम्रपाली
पिछवाड़े का बीजू भी पीला हो गया था
अब दोनों ही अपनी पीली आभा खो चुके हैं
और नन्हीं-मुन्नी अमियों के हरापन से भरे हैं
 
कभी-कभी कहते हैं वे कूदती गिलहरियों से –
समय तो काल है
मत देखो उसे
ऋतुएँ बाहर नहीं रगों में बहती हैं
रुको कुछ दिन, लौटेंगे फिर से मंजरियो के रंग
आर्द्रा की खीर में टपकेगा मेरा प्यार
स्वाद और सुगंध की दावत होगी ज़रूर होगी !
 
                       १२
कुछ ही कमरे खुले हैं घर के
बाक़ी बंद हैं
ताले सिर्फ़ सरकार के पास ही नहीं
गृहिणियों के पास भी होते हैं
और वह जब घर में नहीं हो
तो चाबियाँ दौलत हो जाती है
 
ख़ुशी होगी जानकर तुम्हें
कि मैं इन चाबियों की झंकार
पाज़ेब की तरह सुनता हूँ
और उन्हें दिल की तिजोरी में बंद रखता हूँ!
 
                     १३
लिखना बंद नहीं हुआ है
सच तो यही कि बहुत लिखने लगा हूँ
होड़-सी लगी है
कि सन्नाटा जीतता है या छंद
ख़ालीपन की ख़बरें जीतती हैं
या फ़सलों से भरे खेतों और
बच्चों के शोर से भरे आँगनों के गीत
सूना आसमान जीतता है
या चूमे हुए होंठ सा खिला चाँद !
 
                     १४
अपने मेडिकल कॉलेज में
मरीज़ों के आँसू पोंछती बेटी थोड़ी बड़ी हो गयी है
समझदार भी
 
याद है न खिचड़ी की तरफ़ देखती तक नहीं थी
अब खाती भी है और बनाती भी
 
छोटी कविताएँ लिखकर चल देनेवाली छुटकी
हज़ारों शब्द लिखकर भी नहीं ऊबती
 
हाय रे भागती हुई दुनिया
तू जो ठहर गयी है तो बच्चे
अपने भीतर लौटने लगे हैं !
 
                     १५
तुम जहाँ हो वह जेल नहीं घर है
हमारे टूँसे हैं वहाँ
हमारे होने का अर्थ
हमारी शाखाएँ हैं वहाँ
जिसके साये में सरहद की खाट नहीं
मनुष्यता की जाजिम है
 
पुकारना तो चाहता हूँ तुम्हें उस तकिए की तरह
जिसके गिलाफ़ कई महीनों से रजनीगंधा बालों के इंतज़ार में धुलते-धुलते फीके पड़ गए हैं
मगर जब देखता हूँ
कि गुन्नू के होठों से तुम्हारी
और तुम्हारे होंठों से गुन्नू की हँसी झर रही
तो इस जादू के आलोक में ठिठक जाता है
मेरी आवाज़ से उठता तुम्हारा नाम
जिसे उचारते-उचारते
मैं तोता से हंस में बदल गया हूँ!
 
: विनय कुमार

शंभू बादल

शंभू बादल बहाव में नहीं बहे । बहाव के विपरीत रहे और प्रतिरोध को रचते रहे । साबूत हाथ पांव के होते आदमी घुटनों के बल नहीं आता , नहीं टेकता मत्था । वह टकराता है अपने समय के तमाम - तमाम जटिलताओं से और उन छद्मों को भी बेनकाब करता है जो अदृश्य रूप में हमारे ही बीच पैठ बनाए फिरता है । यह वही स्वभाव है जो हमें मनुष्य होने के बोध से जोड़े रखती है । यद्यपि नामचीनों की श्रेणी में वे बड़े कवि नहीं भी हैं पर हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि तो जरुर हैं । उनकी यह कविता इसी प्रतिरोध की पुष्टि भी करती है

एक बात बताऊँ ?
तुम्हारी पुस्तक पढ़ी है
उसके तो शब्द-शब्द
झूठे अर्थ के दबाव से
फूट-फूटकर रोते हुए
बिखर जाते हैं

फिर नये लोभ से
नए-नए शब्द
बुलबुले की तरह उगते
युवा होते

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...