उन्हें मैं पहले , कामरेड साथी कहता हूं । चूंकि कविता से पहले उनमें ग्राउंड आया । जमीनी चेतना और संघर्ष आए । फिर उस जमीन को जोतने की मेहनतकशी के परिणामत: ही उनमें संवेदना और कविता फूटी । इसलिए प्रथमतया यह कवि ग्राउंड एक्टिविस्ट हुआ , फिर कवि । जी हां मित्रों यहां बात मैं शशिप्रकाश की कर रहा हूं । जिनका कि इस बीच 'कोहेकाफ़ पर संगीत-साधना' तथा 'पतझड़ का स्थापत्य' दो-दो काव्य संग्रह परिकल्पना प्रकाशन लखनऊ से कात्यायनी एवं सत्यम के संपादन में छपकर आया है । कहना ना होगा कि शशिप्रकाश की कविताओं के संदर्भ और फलक को जानने -समझने के लिए हमें संपादक द्वय के संपादकीय टीप को पढ़ा जाना , बेहद जरूरी है । ताकि यथार्थ के जमीन और स्थापत्य को लेकर कोई एक गहरी और वास्तविक समझ या। कि अन्तर्दृष्टि विकसित हो सके । चूंकि इन कविताओं का ताल्लुक़ात ऐतिहासिक आंदोलन परक रिपोर्ताज में दर्ज़ है । बीती सदी के पिछले चार दशकों पर नजर डालें तो विभिन्न संघर्षों व आंदोलनों का यह एक पुष्ट दस्तावेजीकरण भी है । अतः शशि प्रकाश के लिपिबद्ध दस्तावेज़ीकरण में कोई अशुद्धि या कि असावधानी कि कोई घालमेल हो ; बचा जा सके । इसलिए यह जरूरी है ।
शशि प्रकाश के कवि कर्म के फलक की बात मैंने की , तो यह 'अराकान के उस पार' इरावदी , चिन्दविन और सालविन के तटीय कछार में उसके पानी के खारे बनाए जाने की गाथा व व्याख्यान में संदर्भित है । जहां तानशाही का
"सैलाब पीछे को हट रहा है कुछ समय के लिए
रुक रहा है फिलहाल अंडमान समुद्र और बंगाल की खाड़ी में उठा हुआ तूफ़ान"
जिसने अभी-अभी देखी है आलाकमान और चिन की पहाड़ियों से टकराकर भीषण शोर मचाती त़ूफ़ानी हवाएं । अराकान के उस पार छह हजार मांओं की नन्हीं बच्चियों , बेटियों को बलात्कार के बाद झील में डुबो दिया गया । कैसे तानाशाही से पड़ोसी मुल्क म्यांमार में एक फिलिस्तीन , एक अल साल्वाडोर व पेरू ने जन्म ले लिया कि नक्श़ कदम पर हम भी खड़े हैं । समय कम बड़े नहीं हैं , कि मासूम सवालों की समझ के बनिस्बत जारी है अट्टाहस में परदे दारियां । जबकि संभावित खतरों विरत नहीं हैं हम। चूंकि प्रत्येक
"तानाशाह उन स्मृतियों से डरते हैं
जो मांओं के जेहन और बच्चों के मासूम सवालों में पलती हैं"
शशि प्रकाश की कविता में वैश्विक दृष्टि व उसके फलक का अंदाजा तो लगता ही साथ ही , इस बात की ताकीद भी होती है कि पड़ोसी मुल्क के आग की लपटें हैं ; हो सकता है ! कल हो न हो यहां भी यह मुकर्रर करे
"दूर से आ कर गिरती चिंगारियां
वर्साय के महल और जा़र के शीत प्रासाद की कहानियां दुहराई जाएंगी यहां भी कभी न कभी
शायद जल्दी ही
शशिप्रकाश की कविता में यह जो अंदेशा है वह चेतावनी में प्रक्रियाधीन है । इसीलिए ही वसंत का उम्मीद बरकरार है । व तैयारियों के आगाह में है । चूंकि देश में सतत नाटक के मंचन की तैयारियां ख़ूब है, जो बहुत जल्दी में और जंगल तंत्र के रूप में , जोरों पर है । खैर! इन वारदात ए वाकये से शशि प्रकाश ठहर नहीं रहे बल्कि जन अधिकार के आंदोलन को जरूरी रसद से भी भर रहे हैं कि कविता अपने पर्याय वह लक्ष्य में बढ़ती है।
"बर्मा के मेरे भाइयों !
तुम्हारा एक हिंदुस्तानी दोस्त तुम्हें सलाम देता है"
जरूरी है कि मैं साफ़ करता चलूं , कि मैंने कविता के फलक की बात कही है । तो यह है फलक कि कवि बर्मा के साथियों को सीधे संबोधित है और बात पड़ोसी मुल्क के साथ भारत की अनदेखी नहीं करा , कहा कि ब्रह्मापुत्र गंगा और यमुना के मैदानों से लेकर हिमालय की तलहटी तक बूटों की धमक यहां भी गूंज रही है / यहां भी
"विश्वविद्यालयों में शिक्षा की नई-नई नीतियों के साथ
बनाई जा रही हैं सेना पुलिस की छावनियां
यहां भी हवा संवेदनशील हो उठी है"
शशि की यह कविता मुद्दों सिद्धांतों संस्कारों अधिकारों की कविता है। मेहनतकश संघर्ष जनता की कविता है इसलिए इसमें वैचारिक आवाजाही इतनी विपुल और भरपूर है कि सामूहिक गान और उत्स एक-सा हो जाता है
"मेरे बर्मी साथियो ! कुछ देर से ही सही , पर
यहां से भी जरूर उठेगी आवाज
बसंत का आह्वान करना
एक बार फिर सीखेंगे यहां के नौजवान भी"
यह भी कि
"बढ़ेंगे आगे _ कदम से कदम मिलाकर मार्च करते हुए"
पता नहीं यह मैं कितनी बार दोहराते रहूंगा कि शशि प्रकाश की कविता का फलक बेहद बड़ा है । वह कहीं स्थानिक है तो कहीं अपनी सीमाओं के अतिक्रमण से , कैसे वैश्विक हो जाता है ? मूल्यबोध के विचार कैसे प्रबल होने लगते हैं ? आदिम मानुष राग निषेध के बनिस्बत में कैसे लड़ाके विचारों को प्रवृत्त होता है
"शब्द वह कौन सा होगा
जीवन का स्थानापन्न
और यह भी की प्रयोजन को हटाकर
क्यों हो रही है
लड़ने-न लड़ने की बातें ?"
अर्थ-अनर्थ के भौतिक द्वंद और व्यवहारिकी में , संदेह नहीं लड़ना क्रियाशील और गत्यात्मक प्रविधि है । वेजालियास ,स्पेंग्लर , फूकोयामा या कि कुकनूस की भी पूरी प्रक्रिया एक संघर्षशील प्रविधि में ही आकार लिया है जो अपने अपने क्षेत्रों के सर्जना में सतत् गतिकी के साथ खड़ा रहा । पीछले दिनों कवि कात्यायनी ने सरल किस्म के आशावाद पर कविता लिख एक बड़ी बहस तलब बात की । यहां उस आशावाद का खंडन एक सुगठित संघर्षमय रूप में आता है ।
मानव जीवन के संघर्ष और उसके गतिकी में निरंतरता के बरक्स उतार चढ़ाव कभी भी , मामूली नहीं हुए । किंतु विचारधारा का स्वीकार है कि एक विचारशील व्यक्ति के चिंतन में वायवीय विचलन तनिक भी प्रभावी नहीं हो पाता । यानी कि हम जब प्रतिबद्धता की बात करते हैं तो यह उन विचारों और मूल्यों के प्रति हमारी नैतिक आस्था और विश्वास को लेकर, माना जाता है । परन्तु इसी मध्य हम या कि शशि प्रकाश अपने इर्द गिर्द जो देखे हैं वह 'एक रिटायर्ड कामरेड से' कविता में एक कोलाज बन हमारे कड़वे अनुभवों में दर्ज़ हुआ है ।
शशि चूंकि ग्राउंड एक्टिविस्ट कवि हैं । एक अंतहीन यात्रा में खड़े मुक्तिकामी कवि हैं । कि संशय के साथ ज़िद और जद्दोजहद भी कम न करे हैं । मौज़ू कविता उनकी 'एक सागर यात्री का आत्मकथन' में यह आत्म कथात्मक बयानी में दृष्टिगोचर होता है कि लक्ष्य जिजीविषाओं, ज़िद और जद्दोजहद में परिणाम मूलक संस्थापन से प्रशस्त होता है
"हम अपनी डोंगियो में सीने से चिपकाए होते थे अपना द्वीप !"
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