शिव कुशवाहा इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक की समकालीन कविता से लगभग पहचाने जा चुके हैं । कहना न होगा कि कथित दलित विमर्श से लेखन की शुरुआत कर वे मुख्यधारा की हिंदी कविता में आए और अपनी पहचान के लिए मुखर होते गए । इस बीच उन्होंने जरूरी ऊर्जा से खुद को न सिर्फ मांजा ; परिष्कृत भी किया ।
साहित्य का धर्म , जाति , भाषा , क्षेत्र के आधार पर विभाजन किन्हीं मायनों में अविश्वास पैदा करता है । यह विवाद पैदा करने वाला होता है । किन्तु पिछली सदी की हिंदी कविता ने अपने काव्य प्रवृत्तियों के बल इस तरह के वाद-विवाद तथा संवाद का भरपूर गुंजाइश और जो प्लेटफार्म अपने अंदाज ए गुफ़्तगू में दिया है ; वह आज भी कायम है तथा पूरे अपने नए यथार्थबोध में है ।
बावजूद मेरा मानना है कि आज की समकालीन हिंदी कविता के परस्पर जो कविता दलित विमर्श , आदिवासी विमर्श ,स्त्री विमर्श के रूप में आए हैं , या कि कश्मीर अथवा पूर्वोत्तर के राज्यों से आए , वस्तुत: वे भी मुख्यधारा की ही कविताएं हैं । भले ही साहित्य के अलग-अलग मठ उसे किसी भी रूप में नामित करते रहें । संशय नहीं होने चाहिए ।
अतः मैं कहना चाहूंगा कि यह अलग से कोई वाद नहीं है , बल्कि केवल एक काव्य प्रवृत्ति है ।
ऐसे विवाद वस्तुत: जनरेटेड विवाद हैं । हमें यह समझना होगा कि इसके पीछे वैश्विक पूंजी व बाजार व्यवस्था की गहरी चाल कुंडली मारे बैठा है । जो आज के मुख्यधारा की हिंदी कविता की प्रखरता से चिंतित है और सुनियोजित ढंग से अब ऐसे विवादों को जन्म दे , अपना हित साधने में लगा हुआ है ( जिसमें वे मठ भी शामिल हैं ) ताकि साहित्य की प्रखरता टुकड़ों में विभाजित हो , अपनी धार खो दे और वे अपनी मंशा में कामयाब हो सकें ।
ऐसा ही इन दिनों हिंदी में एक बड़ा नैरेटिव वर्ग भी दिखाई दे रहा है जो व्यवस्था विरोध या कि वैचारिक आग्रह की कविताओं , कवियों पर लाठी भांजते मुख्यधारा की कविता को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हानि पहुंचाने के उपक्रम में बढ़
आए हैं । परन्तु मेरे लिए यह बेहद सुखद बात है कि शिव कुशवाहा उन तमाम छद्म को दरकिनार कर मुख्यधारा की राह को चुन क्रियाशील हैं ।
शिव कुशवाहा की कविताएं वस्तुत: मनुष्यता के आग्रह में , उसके दुख , पीड़ा ,संताप , विडंबना बोध से उपजने वाली कविताएं हैं । यहां उनकी प्रस्तुत कविता 'बेरंग हो चुकी धरती पर' हमारे समय के मानवीय मूल्यों में आ रही गिरावट को जज़्ब करती तरल संवेदना से उपजी एक बेहद मार्मिक कविता है । जो अभिधा के परस्पर व्यंजना में है । उनकी इस कविता में आई व्यंजना की माने तो वाकई
'कविता भी असमर्थ हो गयी है
चंद शब्दों की व्यथा-कथा कहने में'
अद्भुत और पारदर्शी व्यंजना है । पतनोन्मुखी समाज में बड़े बुजुर्गो की हैसियत , उनकी उपयोगिता या कि अर्थवत्ता में क्षरण को 'शब्द' नहीं गढ़ पा रहा , भोथरा हुआ जा रहा है उसके प्रतिघात से ; 'जबकि शब्द ही मारक है' । कुछ भी नहीं छूटता उसकी मार से , कुछ भी नहीं बचता ! यह नमूदार प्रस्तुति है कि
'कदम दर कदम जब साथ चलना जरूरी होता है
तब संताने छोड़ देती है उनका हाथ'
इसलिए ही शिव कुशवाहा सीधे अभिधा में कविता को व्यक्त करते हैं । शिव कुशवाहा की कविताओं में अभिधा का आना परिवेश व परिस्थितियों से उत्पन्न हुई व्यग्रता के कारण हैं । जो उस व्यग्रता में , अधिक तकनीक को गैर वाजिब मानता है ।
'ठूठ हो चुके संबंधो में
अब पानी की कमी जाहिर हो चुकी है'
बेरंग हो चुकी धरती पर
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ठूठ हो चुके संबंधो में
अब पानी की कमी जाहिर हो चुकी है
कदम दर कदम जब साथ चलना जरूरी होता है
तब संताने छोड़ देती है उनका हाथ
उनके ध्वंस होते हुए सपनों ने
देख ली है संबंधों की हकीकत
कराह रही मानवीय संवेदना को
अब पढ़ लिया है उनकी पथराई आंखों ने
उन्मुक्त आकाश की ऊचाइयों पर
डेरा बनाने वाले पक्षी की तरह
उनकी बेरंग हो चुकी जिंदगी भी
अब निर्द्वन्द जीना चाहती है अपना जीवन
साथ ही साथ देखना चाहती है वह सब कुछ
जो एक जीवन जीने के लिए होता है जरूरी
जाहिर हो चुका है
कि भाषा ने भी तोड़ दिया है अपना दम
कवि की कलम कांप जाती है बार बार
कविता भी असमर्थ हो गयी है
चंद शब्दों की व्यथा-कथा कहने में
हम बेरंग हो चुकी धरती पर सीखें रंग भरना
क्योंकि बेरंगी में तब्दील हो रही दुनियां
अब बाट जोह रही है फिर अपने रंग में वापस होना..
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चूंकि शिव कुशवाहा पूर्व में यह कह चुके हैं
'कविता भी असमर्थ हो गयी है
चंद शब्दों की व्यथा-कथा कहने में'
तो बेहद जरूरी है यह बताना कि उन्होंने उसे व्यंजना में कहा । एक शब्दकार भला शब्द से विश्वासघात कैसे करे ? वह फिर-फिर शब्दों में आता है , लौटता है शब्दों में , शब्दों से गढ़ता अपने अरूप समय का प्रतिसंसार । जिसे वह चीन्हता हैं शब्दों में , दर्ज करता हैं शब्दों में ।
नेपथ्य में चलती क्रियाएं
बहुत दूर तक बहा ले जाना चाहती हैं
जहाँ समय के रक्तिम हो रहे क्षणों को
पहचानना बेहद मुश्किल हो चला है
और मुहर लगाते हैं कि--
बिखर रही उम्मीद की
आखिरी किरण सहेजते हुए
खत्म होती दुनिया के आखरी पायदान पर
केवल बचे रहेंगे शब्द,
और बची रहेगी कविता की ऊष्मा..
बचे रहेंगे शब्द
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नेपथ्य में चलती क्रियाएं
बहुत दूर तक बहा ले जाना चाहती हैं
जहाँ समय के रक्तिम हो रहे क्षणों को
पहचानना बेहद मुश्किल हो चला है
तुम समय के ताप को महसूस करो
कि जीवन-जिजीविषा की हाँफती साँसों में
धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं हमारी सभ्यताएं
स्याह पर्दे के पीछे
छिपे हैं बहुत से भयावह अक्स
जो देर सबेर घायल करते हैं
हमारे इतिहास का वक्षस्थल
और विकृत कर देते हैं जीवन का भूगोल
हवा में पिघल रहा है
मोम की मानिंद जहरीला होता हुआ परिवेश
और तब्दील हो रहा है
हमारे समय का वह सब कुछ
जिसे बड़े सलीके से संजोया गया
संस्कृतियों के लिखित दस्तावेजों में
बिखर रही उम्मीद की
आखिरी किरण सहेजते हुए
खत्म होती दुनिया के आखरी पायदान पर
केवल बचे रहेंगे शब्द,
और बची रहेगी कविता की ऊष्मा..
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शिव कुशवाहा के यहां तृष्णा है , विरक्ति नहीं है । भविष्योन्मुखी आज है , आरंभ है । पतनोन्मुखी समापन के अंदेशे के मध्य खात्मा के विरूद्ध सतत क्रियाशीलता का गतिज संसार है । जो खत्म होने से पहले नवसृजन के प्रति आश्वस्ति से भरा , हरा है । जो
गहराती हुई शाम के धुंधलके में
कुछ स्मृतियां उभर आती हैं
कुछ पीड़ाएँ भी देती हैं दस्तक
और याद आता है वह सब कुछ
जो आंखों के सामने कुछ अधूरेपन के साथ
एक रील की मानिंद खुलती जाती है हमारे सामने
के बाद भी चलायमान है । जैसे
दिन के ढल जाने पर भी
मनुष्य चलना नहीं छोड़ता
चिड़िया उड़ना नही छोड़ती
नदियां बहना नहीं छोड़ती
उसी तरह सूरज भी नहीं बदलता अपना रास्ता
खत्म होती शामों के साथ
पक्षी लौटते हैं बिखरे हुए अपने घोंसलों में
तमाम-तमाम परिस्थितियों के बाद भी ऐसे लौटना , और लौटने की जिजिविषा से भरे रहना अभूतपूर्व साहस से संभव है । यह लौटना , लौटने की खौफ़नाक क्रियाओं के बाद का है ।
खत्म होती शामों के साथ
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दिन के ढल जाने पर भी
मनुष्य चलना नहीं छोड़ता
चिड़िया उड़ना नही छोड़ती
नदियां बहना नहीं छोड़ती
उसी तरह सूरज भी नहीं बदलता अपना रास्ता
खत्म होती शामों के साथ
पक्षी लौटते हैं बिखरे हुए अपने घोंसलों में
अंधेरा बढ़ जाने के बावजूद
किसान को कोई फर्क नहीं पड़ता
वह अपनी फसलों को
सर्द हुए मौसम में सींचता है
और मजदूर अपनी खटराग में उलझे
दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम करता है
जैसे अंधेरे के साथ रोशनी
दिन के साथ रात और दुख के साथ सुख
कभी साथ नहीं छोड़ते एक दूसरे का
वैसे ही रास्ते भी नहीं छोड़ते किसी राही का साथ
गहराती हुई शाम के धुंधलके में
कुछ स्मृतियां उभर आती हैं
कुछ पीड़ाएँ भी देती हैं दस्तक
और याद आता है वह सब कुछ
जो आंखों के सामने कुछ अधूरेपन के साथ
एक रील की मानिंद खुलती जाती है हमारे सामने
खत्म होती शामों के साथ
अंकित होते हैं पूरे के पूरे बीते हुए दिन
जिन पर लिखा होता है समूचे देश का इतिहास,
कि कुछ घटनाएं दर्ज हो जाती हैं
स्याह हो रहे समय के माथे पर
जिन्हें याद करने पर कलेजा सहम उठता है.
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कोरोना के भय और इस महाविपद समय को लेकर हिंदी कविता में सभी कवियों ने कविताएं लिखी , ढेरों कविताएं आईं । उनमें विरेन्दर भाटिया , हरिओम राजोरिया , मीतादास , विनय कुमार , अदनान कपिल दरवेश , पंकज चतुर्वेदी , वासुकि प्रसाद , आत्मारंजन , राज्यवर्धन , गणेश पाण्डेय , आदि शामिल हैं ; के बरक्स शिव कुशवाहा की कविताएं भी मौजूद हैं ।
वैश्विक महामारी कोरोना ने किसी भी धर्म संप्रदाय को लक्षित नहीं किया । पर तथाकथित धर्म के पहरूओं ने एक संप्रदाय विशेष को इस संक्रमण काल में भी लांक्षित करना नहीं छोड़ा । उनके थूक से लेकर थाली , कटोरी , चम्मच तक को जूठा किए जाने का प्रचार ऐसा किया मानों कोरोना को उन्होंने ही पैदा किया । षड्यंत्रकारी वहीं थे । वही थे समाज के असली दुश्मन । परन्तु थाली , घंटा , घड़ियाल कि बेहुदे आतिशबाज़ी या कि पुष्प वर्षा के सनकी प्रोपेगंडा के बाद देशभर में इस बीमारी के मरीज पांच लाख के पार हो चुके हैं । ऐसे में शिव कुशवाहा की कविताई अपने आशय और धैर्य से जो स्थापना रचना चाह रहा है वह मुमकिन है और जरूरी भी ।
वे नहीं चीन्ह पाते
इंसानियत का उजला रास्ता
भेडों की पंक्ति की मानिंद
चले जा रहे एकदम सीधे
रास्ते के अगल-बगल
नहीं देख पाते गहरी खाईयां
वे नहीं मानते इंसानियत
उनके लिए धर्म है सबसे ज़रूरी
शिव कुशवाहा की यह कविता वस्तुत: किसी धर्म विशेष की आलोचना नहीं है । बल्कि उसके अफीम की आलोचना है और जो मोटे तौर पर सभी धर्मों में व्यापित है । इसीलिए वे कहते हैं
समझाना होगा उन्हें
कि उनकी पीढियां बढ़ रही हैं
आगे...बहुत आगे
इस संक्रमण के मुहाने पर
धर्म की व्याख्याएं हो रही हैं असंगत
अब पहचान लिया गया है
धर्म से पहले इंसान का होना जरूरी है
जब इंसान नहीं होंगे
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गहरे अंधेरे अदृश्य पथों पर
असंख्य लोग चले जा रहे कतारबद्ध
दयनीयता की मनोदशा से
जंग लग चुकी बुद्धि
जो हो चुकी है गिरवी,
विज्ञान और तर्क से दूर
बढ़ रहे लगातार
धर्मान्धता की ओर
वे नहीं चीन्ह पाते
इंसानियत का उजला रास्ता
भेडों की पंक्ति की मानिंद
चले जा रहे एकदम सीधे
रास्ते के अगल-बगल
नहीं देख पाते गहरी खाईयां
वे नहीं मानते इंसानियत
उनके लिए धर्म है सबसे ज़रूरी
वे आशाओं को धूमिल कर
शर्मसार कर रहे हैं इंसानियत
उन्हें नहीं जगा पा रहे हैं
उनके धर्म के पहरुआ
वे नेस्तनाबूद करने पर उतारू हैं
इस खूबसूरत दुनिया को
उनके लिए सवेरा नहीं होता
वे धर्मान्धता को मानते हैं
अपने जीवन आखिरी रास्ता
समझाना होगा उन्हें
कि उनकी पीढियां बढ़ रही हैं
आगे...बहुत आगे
इस संक्रमण के मुहाने पर
धर्म की व्याख्याएं हो रही हैं असंगत
अब पहचान लिया गया है
धर्म से पहले इंसान का होना जरूरी है
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'मजदूर होना ही उनका दुर्भाग्य था' और 'तब तुम्हें कैसे लगेगा' दोनों ही ही कविताएं समसामयिक घटनाओं से उत्पन्न और लाकडाऊन - 1 के बाद की कविताएं हैं । जब देश में जगह-जगह 'कोरोना के रोकथाम' के लिए पुलिस बल तैनात किए गए थे । यात्रा के सारे साधन स्थगित कर दिए गए थे । तब महानगरों से बेकाम हुए मजदूरों के लिए 'मजदूर होना ही उनका दुर्भाग्य था' की स्थिति बनी । जिसमें शिव कुशवाहा महानगर से लौटते मजदूरों की दयनीय दशा और यात्रा के दौरान रेल पटरी में कट कर हुए उनके त्रासद अंत का मार्मिक चित्रण करते हुए यह भी बताते हैं कि उनके अभागापन में वह शहर भी शामिल हैं जिसे
वे आजीवन सींचते रहे अपने रक्त से
महानगरों की असुंदर देह
संक्रमण के विस्फोटक समय में
वे छोड़ देना चाहते थे शहरी सभ्यता
जहां मानवता की कलगियां सूख रही थीं
और दरक रहे थे संवेदना के दरख़्त
उस शहर का दरख़्त खो चुका है अपना हरापन
मजदूर होना ही उनका दुर्भाग्य था
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वे चल रहे थे रात और दिन
मील नहीं हज़ारों किलोमीटर पैदल
उनके कंधों पर उनके छोटे बच्चे थे
और रास्ते में भूंख शांत करने के लिए कुछ सामान
वे लौट रहे थे राजधानी से गांव की ओर
संक्रमण ने निगल लिया था उनका रोजगार
भूंख पांव पसार रही थी बहुत तेज़ी से
सरकारें नहीं रोक पा रही थीं उनका पलायन
वे आजीवन सींचते रहे अपने रक्त से
महानगरों की असुंदर देह
संक्रमण के विस्फोटक समय में
वे छोड़ देना चाहते थे शहरी सभ्यता
जहां मानवता की कलगियां सूख रही थीं
और दरक रहे थे संवेदना के दरख़्त
भूख और जिजीविषा की जद्दोजहद में
वे चल रहे थे लगातार अपने अंतिम गंतव्य तक
छा गया था उनकी आंखों में अंधेरा
रोशनी की धूमिल उम्मीद के अहसास में
उनके कदम शहर-दर-शहर पार करते रहे
रात के सघन अंधकार में
उनके पदचाप छोड़ रहे थे अमिट निशान
चलते-चलते जब वे थक गए
तब हाइवे के फुटपाथ बन गए उनके लिए बिछौने
महादेश के घोषित लॉक डाउन में
अपने जीवन को बचाये रखने के लिए
उनका चलना ही आखिरी विकल्प था
दर दर भटकने को स्वीकार न करके
वे चल दिए अपने अपने गांव
रेल की पटरियां उनके लिए बन गए रास्ते
लाखों मजदूर इन पटरियों के रास्ते
सकुशल पहुंच गए अपने घर
किंतु कुछ के हिस्से में पटरियां बन गयीं
उनका अंतिम रास्ता
वे नहीं देख पाए अपने गांव
और नहीं देख सके अपने हिस्से की बिखरी रोटियां
विश्व की 'पांच ट्रिलियन' अर्थव्यवस्था को सहेजे
इस महादेश में
मजदूर होना ही उनका दुर्भाग्य था
और दुर्भाग्य था उनका
नंगे पांव अपने घर पहुँचना..
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शिव कुशवाहा की कविताओं में मानव मूल्य और संवेदना का सघन पक्ष जितने अपने सरल रूप में अभिव्यक्त होते हैं उतने ही मारक व्यंग्य में भी वह बना रहता है । मसलन कि वे कहते हैं
विश्व की 'पांच ट्रिलियन' अर्थव्यवस्था को सहेजे
इस महादेश में
मजदूर होना ही उनका दुर्भाग्य था
तब तुम्हें कैसा लगेगा' कविता महज़ सवाल की कविता नहीं है । सोच और विचार की कविता है । चूंकि बकैती आज के इलीट क्लास से भी कहीं अधिक मध्यमवर्गीय आचरण का हिस्सा बन चुका है । सोशल मीडिया के इस ख़तरनाक समय में हर दूसरा शख्स अपनी "कै" उलीच रहा है और निशाने में अपने कमजोर आदमी को सहजता से रख देता है । क्षुद्र ज्ञान की शेखी बघारते यह वर्ग भी स्वभाव से इलीट हुआ जा रहा है । अतः उन्हें यथार्थ की जमीन का मुआयना कराया जाना जरूरी है । शिव कुशवाहा इसमें सफल दिखाई देते हैं ।
तब तुम्हें कैसा लगेगा
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चार बाई छः की खोली में
रहने को दिया जाय तुम्हें
और दिनभर कराया जाय काम
सोने को दी जाय
केवल दो ग़ज़ जमीन
देश की घोषित तालाबंदी में
जब चला जाय रोजगार
और खाली हों राशन के कनस्तर
चूल्हा भी बुझ चुका हो
बच्चे बिलबिला रहे हो भूख से
और पढ़ाया जाय
उसी समय आत्मनिर्भरता का पाठ
तब तुम्हें कैसा लगेगा.
तपती दोपहर में
तुम्हें सड़कों पर
चलाया जाय पैदल
कंधे पर रखाया जाय समान
और परिवार सहित
भूखे पेट चलाया जाय
तब तुम्हें कैसा लगेगा.
संक्रमण के खतरे के बनिस्बत
पेट पर भूख के संक्रमण को भांपते
जब तुम लौट रहे होते अपने गांव
और लौटते समय बीच चौराहे पर
पुलिस द्वारा पीट पीट-कर
कराया जाय अधमरा
तब तुम्हें कैसा लगेगा.
रेल की पटरियों पर
तुम्हारे भाई चलते चलते
थक कर सो जायँ
और रात के अंधेरे में ट्रैन
उनके चिथड़े उड़ा दे
तब तुम्हें कैसा लगेगा.
तुम्हारी गर्भवती बहन बेटियों को
सड़कों पर चलने के लिए
किया जाय अभिशप्त
और वे चलते चलते प्रसव से कराह उठें
तब तुम्हें कैसा लगेगा.
।
विकास की प्रक्रिया में , कि उसके जद में , आने वाले तमाम चीजों का विस्थापन तय है । यद्यपि विकास हमें नयापन के अहसास से भरता है और सुखद भी लगता है , परन्तु उसके एवज में कई कुछ हमें खोना होता है । जो आदमी को , उसकी संवेदना व जुड़ाव को झकझोर देता है । भीतरी दबाव के साथ निराशा पैदा करता है । चीजों के गुम के बरक्स नया का अधिक प्रभावी होना हमारे स्वभाव के ललचाने से है । यानी यह सब मानव सुविधा के भोग वृत्ति से अधिक पैदा हुआ । यह प्रकृति सम्मत न होकर , प्रकृति के नियमों विपरीत हैं । अत: प्रकृति की स्वभाविकता का प्रेमी , उस गत्यात्मकता से दुखी होता है । मनुष्य स्मृति जीवी प्राणी है । वह आज को अपने स्मृतियों में तलाशता है । परन्तु आज के निर्बाध प्रवाह पुराने को ध्वस्त कर देता है । शिव कुशवाहा की यह कविता नए के एवज पुराने के राग संबंध का वृत्तांत कथा है जहां चीजों का ध्वस्त होना निरर्थक होने के बाद भी तय है । हालांकि संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती , 'गांव एक संभावना है' शीर्षक कविता में शिव कुशवाहा की माने तो यकीनन हर उस आदमी के भीतर गांव न केवल संभावना ही है , जरुरत भी है । यह उनमें गहरे में पैठ बनाता है जिन्होंने किसी न किसी सुख की तलाश में गांव को बरसों पहले छोड़ आया ! शिव इस कविता में लाकडाऊन के बाद और विपत्ति के दुस्सह स्थिति का वर्णन समकाल के प्रभाव में आकर कर रहे हैं और इसलिए कर रहे हैं कि गांव वास्तव में उन लोगों के लिए सच का एक दीप्त आश है । जो बचा रहेगा अपने अवशेष में । यही वह बात है जो शिव को विश्वास दिलाता है कि
सभ्यता के पुराख्यान का एक पूरा ग्रन्थ
गांवों ने रचना नहीं भूला है
सदियों के बाद भी वहां खड़े हुए हैं दरख़्त
फैली हुई हैं उनकी बड़ी बड़ी शाखाएं
गांव के पक्ष में व्यक्त चीजों के बीच अव्यक्त और छूटे हुए संदर्भ भी हैं जिसे मैंने यथासंभव रखा । बाक़ी जो है , वो हैये है । शुक्रिया शिव कुशवाहा ; निरंतर गतिमान रहें अपार संभावनाएं लेकर चले हैं तो मकाम तो बनेगा , कारवां पीछे-पीछे और आप आगे-आगे
गाँव अब भी संभावना है
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सभ्यता के पुराख्यान का एक पूरा ग्रन्थ
गांवों ने रचना नहीं भूला है
सदियों के बाद भी वहां खड़े हुए हैं दरख़्त
फैली हुई हैं उनकी बड़ी बड़ी शाखाएं
गांव के चबूतरों पर सुस्ताते हुए लोग
मिथकीय चरित को जीवित कर
एक नई बहस को जन्म देकर
विचरते हैं एक कल्पनालोक में
जहां दिवास्वप्न में खोए हुए
कुछ किसान खेतिहर लोक संवादों का
एक बड़ा पिटारा खोलकर
डूब जाते हैं गंवई रूप,शब्द और रस में
जैसे सांझ होने पर पक्षी लौटते हैं
अपने घोसलों की ओर
उसी तरह सैकड़ों मील चलकर आए हुए लोग
लौट आए हैं अपनी जड़ों की ओर
घर की स्त्रियां चूल्हे की मंद आंच पर
फिर सेकेंगी रोटियां
और पतेली पर चढ़ी दाल की खदबदाहट
सन्नाटे को चीरते हुए
फिर भूख की गहनता का कराएगी अहसास
गांव के खुले आसमान में
खरखटी चारपाई पर
दिखेंगे वे फिर अधूरे सपने
जिन्हें पूरा करते हुए
खप गया है उनका पूरा जीवन
देर रात में टिमटिमाते तारों को देखकर
पलकों की कोर थोड़ी नम होकर
कराएगी अहसास
विस्थापन के अनकहे दर्द का
जैसे अपनी जगह से उखड़े हुए पेड़
फिर दूसरी जगह मिट्टी और पानी पाकर
हो जाते हैं लंबवत
ठीक उसी तरह गांव को लौटे हुए लोग
खड़े होना सीख रहे हैं अपनी जमीन पर
अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है उनके लिए
वे चल दिए हैं खेतों की ओर
हांथ में खुरपी, फावड़ा और कुदाल लेकर
अब कत्तई इंकार नहीं किया जा सकता
कि वे तलाश ही लेंगे अपनी भूख के लिए ईंधन
शहरों से बेदखल हुए लोगों के लिए
गांव अब भी संभावना है.
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