इधर विनोद कुमार शुक्ल की कविताई के जितने प्रबल समर्थक दिखे हैं आनुपातिक आलोचक कम हैं । हिंदी कविता में कलावादी कविताओं का एक दौर रहा है ; उन कलावादियों में विनोद कुमार शुक्ल भी रहे , पर उन्होंने अपने सामर्थ्य और अगुआई से लगभग उस जड़ता को तोडा । पृथक रास्ता बनाया । यही नहीं , हिंदी के माफियावादी संस्कृति से निकट का संबंध भी नहीं बनाया । वे लगभग पर्दे के पीछे के दृश्यों से बेखबर व अंजान रहे हैं । जो उनकी सादगी के प्रतिफलन है । सेलेक्टिव लेखन की दो प्रवृत्तियां रही है जिसमें एक व्यवस्था का विरोध करता है असहमति जताता है दूसरी में यह किनारा लिया होता है । विनोद कुमार शुक्ल की काव्य प्रवृत्ति दूसरे तरह का है ।
Saturday, July 11, 2020
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युद्ध करूणा का अंत है
यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...
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