हिंदी कविता और दलित चेतना के मुखर स्वर असंग घोष के सन्दर्भ में कि ------
वे कवि इसलिए हैं ;
'केशव पांडेय स्मृति कविता सम्मान' के काबिल इसलिए हैं ।
शम्बूक!
तुमने रामराज्य में
तपस्या कर
सशरीर स्वर्ग जाना चाहा
तुम्हारी यही तपस्या
सही नहीं गई
ब्राह्मणों, क्षत्रियों व
खुद राजा राम तक
सबने षड्यंत्र रचा, और
तुम्हारा सिर धड़ पर न रहा
तुम मारे गए बेकसूर
राजा राम के हाथों
रामराज्य में तब से
हत्यारा राजा राम
महिमामंडित हो
भगवान श्री राम हो गया।
ओ कजरवारा की मोना!
तुम मरीं
भूख से
बुखार से
कुत्ता काटने से
उपेक्षा से
या अपनी अभिरक्षा से
वंचित हो मरीं,
व्यथित हो मरीं
क्या तुम नहीं जानतीं?
गरीब-गुरबा मरते हैं
झुलसती गर्मियों में लू से
कड़कड़ाती ठण्ड में शीत से
बरसात में बाढ़ से
गाज गिरने से
मौका लगे तो
दूसरों की लगाई आग से
इलाज के अभाव में
बीमारी से, पर
खाने को जब तक होती हैं
हवा, घास, भीख या रहम
तब तक गरीब नहीं मरते
कभी भूख से
ओ मोना!
कजरवारा में तो
दावों-प्रतिदावों के बीच
यह सब था
फिर तुम मरीं क्यों?
शासन नहीं कहता
तुम्हारी लाश उखाड़े बिना
बिना चीरफाड़ किए
तुम्हें भूख ने मारा
बुखार ने मारा
अभाव ने मारा, या
मौत ने मारा
ओ मोना!
तुम मरीं क्यों?
धर्म!
तुम भी एक हो
मेरे पैदा होने के बाद
जाति के साथ
चिपकने वाले।
कमबख्त जाति को
मैं नहीं त्याग सकता
यह सदियों पूर्व से
मेरे पुरखों के साथ
थोपी गई है।
यदि मैं
जातिबोधक शब्द न लगाऊँ तो
तुम्हारा घाघ पुरोधा
जासूसी कर
मेरी जाति खोज लाता है
लेकिन मैं
तुम्हें तो त्याग ही सकता हूँ
भले ही
तुम्हारा बाप बामन
घड़ियाली आँसू बहाए
लाख कहे हमारा दोष क्या है
हम बामन के घर पैदा हुए, पर
वह पीठ पीछे वार करना नहीं भूलता
तुम्हारा ठेकेदार जो है
फिर मैं
तुम्हें क्यों न छोडूँ
लो
मैं तुम्हें तिलांजलि देता हूँ।
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