संदेह ; जन्माती हैं चुप्पियां । पैदा करता है गलतफहमी । यह वक्त है निर्धारण का , तय करने का वक्त है यह । साथी संजय शांडिल्य अपनी मुखरता में लगभग यही बात बता रहें हैं-- कि रहना है हमें इस पार की उस पार ; हां के साथ या ना के साथ ; यह तय हो । माना जाना चाहिए कि साथ होना पड़ेगा हमें , किसी न किसी के साथ । कि चुनना ही पड़ेगा किसी एक को । वस्तुतः यह चुनने का ही वक्त है । एक बेहतरीन उद्घोषणा के साथ समुचित कार्रवाई की मांग करती इस कविता में अस्वीकार है , वितृष्णा है , उत्साह है , और चुनौतियों को स्वीकार करने का ताकत भी । नवें दशक के उत्तरार्ध के इस कवि के कहन में उनके जीवनानुभवों का सार व सामूहिक चेतना का आग्रह वस्तुतःज्यादा है । फिर ललकार , और उस ललकार के साथ आल्हादित करता , उत्प्रेरित करता स्वर है ; जिससे बचाई जा सकती है अपने शेष और असल हिस्से की धूप । कवि की मांग में समाप्ति का स्थान भी किसी विलुप्त नदी की तरह प्रवाहमान है । कह सकते हैं अनदेखा , अनचीन्हा और सतत् । यह सुखद बात है कि कवि वैचारिकता का आग्रह और प्रतिबद्धता की स्पष्टता चाहता है । वह लिज़लिज़े व बड़बोलेपन से भरे भौंडे प्रतिरोध का प्रतिकार करता है । वह सम्मोहन भरा जादुई स्पर्श नहीं करता , न पोस्टर ब्वाय होता है । हां अवश्य ही स्पष्टता का ध्वज वाहक होता है । समकालीन हिन्दी पट्टी में यह चिंता और उसका भार ढोने का जतन खट्टेपन के अहसासो से भरा हुआ है । पर इसे अधिक साहस से उठा पाने में समर्थ हुए और आगे आए साथियों में लोकधर्मी परम्परा के युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार ,अजीत प्रियदर्शी , अनिल पांडेय , व गनेश गनी ,लगातार मुखाफ़लत करते प्रतीत हो रहे हैं । गौर- ए - तलब है कि संजय शांडिल्य जिस छद्म आचरण के खिलाफ़ होना चाहते हैं वे अपने जिस कानसेप्ट को ,जो कि पूरी तरह - जैसा स्पष्ट है , वैसा ही स्पष्टता चाहते हैं । बजाय बीच के होने के , नपुंसकता का अस्वीकार करते हैं वह सब जनवादी लोकधर्मी कवियो के यहां अपनी विपुलता में मौज़ूद है । एकबारगी जनवादी लोकधर्मी कवियों या कि उनकी कविता को छोड़ दें तो मौजूदा समय के पहचान की यह एक बेहतरीन कविता है । कवि में गहरा असंतोष है । अपने गहराते संकट और समय को लेकर एक उच्च और उत्कट आकांक्षा का भाव है । प्रतिरोधी ताकतें निश्चय ही अभी अपने-अपने महत्वाकांक्षाओं से अपने प्रभाव को खोते दिख रहे हैं इन दिनों ; जबकि उनमें मतैक्य अथवा कि विचारों में समानता भरपूर है । इन तमाम बातों के बीच वस्तुतः जो निषेध या कि अलगाव है ; अलग-अलग खोके का बना रहना या फिर बनाए रखने की निरी हठ , वह बेसिकली वर्चस्ववाद और श्रेष्ठताबोध से प्रेरित है । बड़े होने के बोध से प्रेरित है व दंभता से प्रेरित है । दंभ मनुष्य का और मनुष्यता का सबसे बड़ा शत्रु है । वह मनुष्य को उसके आवेगो को क्षरित करता है । आमतौर पर वामपंथी बिखराव उनकी असल चिंता का सबब है । साथी के इस कविता को प्रस्तुत करने का मेरा उद्देश्य साफ़ है । साथी के इस बोधगम्य उद्गार का मैं प्रबल हिमायती हूं और मैं उनका साथ भी हूं । पाने की प्रक्रिया से खोने की प्रक्रिया ज्यादा दुःसह होती है । वामपंथ ने इस बीच पाया कम खोया ज्यादा है । और समय रहते हम चेते नहीं तो ( बिना डरे ही )हममें ही कोई अख़लाक़ होगा । तो कोई गौरी लंकेश , दाभोलकर और पंसारे ही । तय है यह ! चूंकि हत्यारे झुंड में है और झुंड अथवा भीड़ के पास कोई वैचारिक आधार नहीं होता ।
अस्तु संजय शांडिल्य की इस कविता को मैं उनके वक्तव्य और आह्वान के रूप में देख रहा हूं जो मनुष्य के बेहतरी के लिए कारगर सुझाव भी है ।
।। तय करना होगा ।।
तय करना होगा
हम इस पार हैं या उस पार
'हाँ'के साथ या 'नहीं' के साथ
यह तय करने का वक्त है, दोस्त,
और आवाज उठाने का
चुप बैठने से
अनेक गलतफहमियाँ पैदा हो रही हैं
एक साथ
जानता हूँ
यह जो चुप्पी है
यही बीच का वह रास्ता है
जिसमें विचार की नदी बहती है
और यह भी
कि इस नदी से
अंतहीन विचारों की असंख्य नदियाँ
निकलती हैं दसों दिशाओं में
तुम अपने दमदार विचारों के साथ
इनमें गोते लगाते रहोगे
और बहुत जल्द यह समय
अपने कूड़ेदान में तुम्हें फेंक देगा
केवल रचना में भी बात कहने का वक्त
यह नहीं है, दोस्त!
हमें किसी न किसी ओर होना पड़ेगा सदेह
'अन्याय का स्वीकार' और 'अन्याय का प्रतिकार' में
एक को चुनना ही पड़ेगा
यह चुनने का वक्त है, दोस्त,
और कार्रवाई करने का!
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