Wednesday, October 28, 2020

शंभू बादल

शंभू बादल बहाव में नहीं बहे । बहाव के विपरीत रहे और प्रतिरोध को रचते रहे । साबूत हाथ पांव के होते आदमी घुटनों के बल नहीं आता , नहीं टेकता मत्था । वह टकराता है अपने समय के तमाम - तमाम जटिलताओं से और उन छद्मों को भी बेनकाब करता है जो अदृश्य रूप में हमारे ही बीच पैठ बनाए फिरता है । यह वही स्वभाव है जो हमें मनुष्य होने के बोध से जोड़े रखती है । यद्यपि नामचीनों की श्रेणी में वे बड़े कवि नहीं भी हैं पर हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि तो जरुर हैं । उनकी यह कविता इसी प्रतिरोध की पुष्टि भी करती है

एक बात बताऊँ ?
तुम्हारी पुस्तक पढ़ी है
उसके तो शब्द-शब्द
झूठे अर्थ के दबाव से
फूट-फूटकर रोते हुए
बिखर जाते हैं

फिर नये लोभ से
नए-नए शब्द
बुलबुले की तरह उगते
युवा होते

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