एक रिवाज सा चल निकला है इन दिनों , पनाहगाह के लिए बेरुखी , बेमुरव्वत । यह हादसों के शहर में हद से कही दूर , और आगे तक है । ज़ालिम जमाने ने दस्तूर ए ख़ास के अर्थ को तार-तार कर दिया है । ऐसे वीभत्स और डरावने समय में स्वार्थ के अलावा कोई नजदीकी भी नहीं , सब अपनी माने खो रहा हो , तब कैलाश मनहर जैसे साथी उस टिमटिमाते दीपक के लौ की तरह हाजिर होते रहे हैं और आश्वस्ति से भरते रहे हैं कि कुछ हाथ अब भी है बिल्कुल सही सलामत और साबूत । विश्व पर्यावरण दिवस पर लिखी इस कविता के अनेकार्थ कम सटीक और जीवन्त नहीं है , बजाय इस मीडियोकरी समय के छद्म से जो प्रकृति , पर्यावरण के प्रति संजीदगी में आए हैं और व्यापक मनुष्य के जीवन में बड़ा हस्तक्षेप कर बड़े बुजुर्गो के प्रति मान सम्मान के नज़रिये को प्राथमिक बनाए जाने के गुण से हमें सम्पन्न बनाता है । कैलाश मनहर की इस कविता के विजुअल से कहीं अधिक अन सीन में दृश्य है । जिसे समझने के लिए मनुष्य में जैविक दृष्टि की वांछनीय दरकार है
धूप बहुत तेज़ है
और मैं जिस पेड़ की छाया चाहता हूँ
वह धूप में खड़ा है
#विश्व_पर्यावरण_दिवस
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