Monday, December 28, 2020

राजेश सक्सेना

स्त्री के संघर्ष की गाथा प्रागैतिहासिक है । तब तुलनात्मक पुरूष के स्त्री बराबर की भागीदार थी । सहभागी रही । वह सहअस्तित्व के सिद्धांत पर सत्तासीन थी । पर समय का पहिया घूमता गया और लिखित अथवा ऐतिहासिक काल के आते-आते स्त्री के वजूद पर पुरूष का हस्तक्षेप बढ़ने लगा । जो स्त्री अपने वजूद को लेकर प्रारंभ से ही स्पष्ट रही शनैः शनैः पुरूष के आधिपत्य को स्वीकारने लगी । उनमें यह भाव और आगे आकर ज्यादा ही बलवती होती रही । वह रक्षात्मक होने लगी । या कह सकते हैं सुरक्षा के लिहाज से ही सही पर दासत्व भाव उनमें पनपने लगा । पर यह पूरा का पूरा सच भी नहीं है । चूंकि तब भी स्त्री में संघर्ष और अपनी मुक्ति की कामना मौजूद थी , और रही । उनमें कुशल नेतृत्व क्षमता का विपुल भंडार था । जिसका कि रजिया बेगम , रानी लक्ष्मीबाई , रानी अवंती बाई के नेतृत्व से लेकर आज तक विभिन्न राष्ट्रों के शीर्ष पदों को सुशोभित कर चुके विदुषियों के ताकतों से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है । ये भी आसमान से उतरी कोई उड़नपरी थी न कोई जादुई  जिन्न । ये भी हमारी- तुम्हारी तरह बच्चा जनने वाली स्त्रियां ही थी। हमारी-तुम्हारी तरह तमाम तरह के परिवारिक, समाजिक और राजनैतिक दायित्वों का निर्वहन करती स्त्री थी । हां जरूर ये कोई पद्मावती नहीं थीं । और न इन्हें पद्मावती होना चाहिए । एक स्त्री  में केवल और केवल पद्मावती (जायसी के) का चरित्र जो लोग देखते हैं  वे निश्चित ही ढपोर संघी तथा काम पिपासा से आह्लादित हैं । वे दकियानूस लोग स्त्री की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर सदैव मंडराते रहे ,पहरेदारी करते रहे । उनका यह ऐतराज स्त्री को उसी तरह देखना और ठिठका हुआ रहना चाहता है जैसा कि बाज़ार की वस्तु को लेकर नज़र -ए -आम है । वे स्त्री के संघर्ष और  मुक्ति की कामना को सिरे से ख़ारिज करने के यत्न में लगे हैं । यद्यपि यहां प्रस्तुत  राजेश सक्सेना की कविता स्त्री के पक्ष से प्रारंभ होती है और प्रथम दृष्टया स्त्री संवेदना पर एक बेहतरीन कविता जान पड़ती है ;  चूंकि स्त्री को लेकर इस कविता में उतनी ही चिंताऐ ,उतना ही कंटेंट समाहित है जितना कि पारंपरिक मूल्य बोध के ठेकेदारों की आवश्यकता है । भय उनकी आवश्यकता का प्रथम सोपान है । और इस पर वे अपनी सफलता की ताकीद मुकर्रर भी करते हैं । राजेश सक्सेना की इस कविता में संवेदना स्तर इतना गहरा है कि थाहना मुश्किल  हो जाता है और व्यक्ति गोते लगाने के उपक्रम पर शामिल रह जाता है ।  कंगना रानावत एक बेहतरीन अदाकारा हैं और स्त्री मुक्ति की कामना को उनकी तमाम गतिशीलता से निश्चय ही बल भी मिलता है ; तो इसमें दिक्कत क्या है ? कवि डर क्यों रहा है ! कंगना न तो उसकी बहन है , न बेटी और न मित्र भी । तो क्या कवि को कंगना अच्छी लगती है इसीलिए मात्र , वह डर रहा है । एक बेहतर स्त्री , एक बेहतर प्रकृति भी है और एक बेहतरीन समाज भी ।उसे बचाए जाने की जिम्मेवारी हम सबका है । पर उस स्त्री के बेहतर को सामने आने से ; क्या एक तरह से उसे, यह रोकने के जैसा नहीं है ?
पूरी कविता में असंगत किस्म का भय मुझे दिख रहा है जो कि कंगना के बहाने स्त्री की स्वतंत्रता व मुक्ति की कामना में शामिल स्त्रियों को समझाने का प्रयत्न प्रतीत हो रहा है अथवा कि उस पर दबाव बनाया जा रहा है या कि उन्हें  डराया जा रहा है । माना कि समय भयानक और बहुत ही बुरा है तो क्या बुरे वक्त के खिलाफ़ 'अच्छे दिनों' की आश की तमाम लड़ाई व यात्राएं स्थगित कर दी जानी चाहिए ?

'तुम्हारे दोषों में शामिल है
तुम्हारा लड़की होना
तुम्हारी हंसी भी खटकती है
बाजवक्त हमारे समय को
सवाल करना तो सबसे 
बड़ा जुर्म है ही स्त्रियों का
यह धरती फट चुकी है
स्त्रियों के सवालों से'

देखा जाए तो यह एक पूरी मुकम्मल कविता की पंक्ति है ।आम स्त्री की कविता है ।
पर---

'पता नहीं क्या तुम्हे कंगना ?'

कह
 राजेश सक्सेना इतने निजी और एकांगिक कैसे हो सके ? जबकि एक होनहार कवि अपनी निजता में भी समाजिक संसार का ताना-बाना और प्रगतिशील मूल्यों की रक्षा करता समाजिक मूल्यों , दायित्वों का बिंब स्थापित करता है ।

'क्यों बोलती हो
अपनी दिक्कतों के बारे में 
आदर्श सुशोभित वाक्यों की आत्मा के
निविड़ एकांत में 
सुस्ता कर रो लिया करो
निथार लिया करो ये खारापन

राजेश का यह व्ययंग भाव पूरी तरह, स्त्री के पक्ष का होकर भी उसका नहीं रह जाता । बल्कि इसके उलट एक विदुषी व विद्वान स्त्री के मनोबल को कमज़ोर करने लगता है ।

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