पाकिस्तानी शायर सुलेमान हैदर की इस कविता से एक बात मोटे तौर पर साफ़ हो जाती है कि विश्व के तमाम सत्तासीन लोगों का चरित्र एक- सा है । वे असहमति के विचारों को उतना ही स्वीकार पाते हैं जितना कि उनकी कुर्सी के लिए बर्दाश्त है । अन्यथा आप ईरान में रहें कि अमेरिका में , पाकिस्तान में रहें कि भारत में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे । अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में महारत ये लोग बेसिकली मनुष्य विरोधी विचारों से ओतप्रोत हैं । ये कभी धर्म के नाम , तो कभी जाति के नाम , या कि भाषा अथवा क्षेत्र के नाम हंगामा मचाए ही रहेंगे । अब लो न ये मनुष्य विरोधी लोगों का जत्था ही को लो देखो किसी सम्प्रदाय विशेष के लोगों को लक्षित कर उन्हें काफ़िर करार देने तुल गए हैं । जल जंगल और जमीन के लिए संघर्षरत लोगों को उनके जमीन के मालिकाना हक से , कैसे उन्हें वंचित कर राहत कैंपों में बंधक बना लेने को ठाने पूंजी पोषित ये कबरबिज्जू नित नए - नए प्रयोगों से देश को हलाकान किए फिर रहे हैं । इस कड़ी में ये संविधान को ताक पर रख क्रूरतम से क्रूरतम और पेचीदा कानून को अमलीजामा पहना रहे हैं । जो कि सर्वथा निंदनीय कृत्य है । विश्व का ऐसा कोई ऐसा भू-भाग नहीं बचा है जहां इस प्रजाति ने अपनी दानवी प्रवृत्ति से नरसंहार तक को जायज़ नहीं माना । परन्तु प्रतिरोध का यह स्वर हमेशा इनके सामने खड़ा है और दो-दो हाथ करने नहीं चूका । सलमान हैदर इसी असहमति का नाम है । जो काफ़िर क्या है ? कैसा है को इस कविता में अभिव्यक्त कर रहे हैं पढ़िए उनकी इस अद्भुत कविता
'मैं भी काफिर तू भी काफिर,
मैं भी काफिर, तू भी काफिर
फूलों की खुशबू भी काफिर, शब्दों का जादू भी काफिर
यह भी काफिर, वह भी काफिर,
फैज और मंटो भी काफिर
नूरजहां का गाना काफिर,
मैकडोनाल्ड का खाना काफिर
बर्गर काफिर, कोक भी काफिर,
हंसी गुनाह और जोक भी काफिर
तबला काफिर, ढोल भी काफिर,
प्यार भरे दो बोल भी काफिर
सुर भी काफिर, ताल भी काफिर,
भांगड़ा, नाच, धमाल भी काफिर
दादरा, ठुमरी, भैरवी काफिर,
काफी और खयाल भी काफिर
वारिस शाह की हीर भी काफिर,
चाहत की जंजीर भी काफिर
जिंदा-मुर्दा पीर भी काफिर,
भेंट नियाज की खीर भी काफिर
बेटे का बस्ता भी काफिर, बेटी की गुड़िया भी काफिर
हंसना-रोना कुफ्र का सौदा,
गम काफिर, खुशियां भी काफिर
जींस और गिटार भी काफिर,
टखनों से ऊंची बांधो तो अपनी यह सलवार भी काफिर, फन काफिर फनकार भी काफिर
जो मेरे फतवे ना छापें, वो सारे अखबार भी काफिर
यूनिवर्सिटी के अंदर काफिर,
डार्विन का बंदर भी काफिर
फ्रायड पढ़ने वाले काफिर,
मार्क्स के सब मतवाले काफिर
मेले-ठेले कुफ्र का धंधा, गाने-बाजे सारे फंदा
मंदिर में तो बुत होता है, मस्जिद का भी हाल बुरा है
कुछ मस्जिद के बाहर काफिर,
कुछ मस्जिद के अंदर काफिर
मुस्लिम मुल्क में मुस्लिम भी काफिर,
बाकी सब तो हैं ही काफिर
काफिर-काफिर मैं भी काफिर,
काफिर-काफिर तू भी काफिर,
काफिर काफिर दोनों काफिर,
काफिर दोनों जहाँ ही काफिर।
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