Friday, March 26, 2021

अनिल करमेले

जब हमारी चेतना सचमुच में जागृत होती है , तब जाकर हम ऐसे सवालों के साथ खड़ा हो पाते हैं । ऐसा सख्त प्रतिरोध तभी संभव हो पाता है जब हम तथ्यात्मक हो निर्लज्ज नुमाइंदों-सा , स्पेस नहीं बनाए रखते । यह एक खरी-खोटी है कि क‌ई कुछ अनर्थ के होते हुए भी , अर्थ तलाशे जाते रहे । क्या कम है, यह उस पाषाण साम्राज्यवाद नीतियों के दुश्चक्र की परख के लिए ; कि उनके द्वारा घोषित बिम्ब और मुहावरों से भरे अभद्र संकेतों को समझने के लिए , कि संप्रदायिकता के नंगेपन की शिनाख्तगी के लिए । अस्तु असंख्य सवालों और झंझावातों से घिरे मानव के लिए अनिल करमेले जैसा काव्य तर्क उपस्थित कर हैं वह मुझे अधिक मूल्यवान लगता है , यानी अधिक संगत और स्वभाविक भी ।  यदि समकालीन हिंदी कविता के नवें दशक के सक्रिय कवियों को नामित किया जाए तो अनिल करमेले अपनी चित्रकारी के साथ कविता के इस प्रांगण के वे खूबसूरत गुलदस्ता हैं जिनमें प्रचुर मानवीय मूल्य बोध और और उसके वैविध्य से भरा रंग समाया हुआ है । हिंदी कविता में वैचारिक आग्रह और वैज्ञानिक तर्क़ को मूर्त करने वाले चित्रकार कवि अनिल करमेले की काव्य यात्रा इस दशक के समृद्ध कवियों में मदन कश्यप , कुमार अंबुज शरद कोकास ,अनवर शमीम , देवीप्रसाद मिश्र , दिनेश कुशवाह , हरिओम राजोरिया , बुद्धि लाल पाल के साथ का है । जो निरंतर ऊर्जस्वित हैं और धारा को बल देते आए हैं । आज पढ़िए साथी कवि चित्रकार अनिल करमेले की कविताएं
 

|| देवताओं को सोने दो ||

जब बहुत ज़रूरत थी मनुष्यों को देवताओं की
वे निद्रा में थे अपनी आरामगाहों में

कथित नुमाइंदे निर्लज्ज तरीके से लगे हुए थे
अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए
वे वोटिंग मशीनों तक गायों को खींच लाए थे
वे बता रहे थे 
हमारे सोने की चिड़िया रह चुके देश में
अब बहुत अच्छा समय आ गया है
अब कोई दलित नहीं, कोई ग़रीब नहीं बचा

स्त्रियाँ अभी भी शर्मसार थीं
बच्चे अभी भी फुटपाथों पर, प्लेटफार्म पर, होटलों में काम करते थे
भ्रूण परीक्षणों में लगे हुए थे धंधेबाज
बेरोज़गारों को गायों को बचाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी
अल्पसंख्यक मारे जा रहे थे
गरीबों और मजलूमों की होली जलाकर
अमीर दिवाली मना रहे थे

देवता सो रहे थे चैन की नींद

देवता सोते ही रहेंगे चैन की नींद
उनके नाम पर किए जा रहे तांडव से
हमें ही बचानी होगी यह दुनिया
हमें बढ़ाना होगा आपसी प्रेम
भूखे पेटों को रोटियाँ देवता नहीं खिला पाएँगे

वे उठेंगे तो उनकी ज़रूरतें
हम कहाँ पूरी कर पाएँगे

उन्हें सोने दो मित्रो
वे कहीं भी रहें
इस पृथ्वी पर उनकी ज़रूरत नहीं रही।

        गोरे रंग का मर्सिया
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सौन्दर्य की भारतीय परिभाषा में
लगभग प्रमुखता से समाया हुआ है गोरा रंग
देवताओं से लेकर देसी रजवाड़ों के राजकुमारों तक
सदियों से मोहित होते रहे इस शफ़्फ़ाक रंग पर
कुछ तो इतने आसक्त हुए
कि राजपाठ तक दाँव पर लगा डाला

अपने इस रंग को बचाने के लिए
बादाम के तेल से लेकर
गधी के दूध तक से नहाती रहीं सुन्दरियाँ
हल्दीे, चन्दन और मुल्तानी मिट्टी को घिस-घिस कर
अपनी त्वचा का रंग बदलने को आतुर रहीं
हर उम्र की स्त्रियाँ
कथित असुन्दरता के ख़िलाफ़ अदद जंग जीतने के लिए

जंग जीतने के लिए राजाओं ने ऐसी ही स्त्रियों को
अपना अस्त्र बना डाला
साधन सम्पन्न पुरुष अक्सर सफल हुए गोरी चमड़ी को भोगने में
कुछ पुरुष अन्धे हो गए इस गोरेपन से
कुछ हो गए हमेशा के लिए नपुंसक
और कुछ ने तो इसकी दलाली से पा लिया जीवनभर का राजपाठ

गोरे रंग के सहारे कामयाबी की कई दास्तानें लिखी गईं
पूरी दुनिया में अक्समर मिलते रहे ऐसे उदाहरण
जब चरित्र पर गोरा रंग भारी पड़ता रहा
दरअसल गोरेपन को पाकीजगी मान लेना
हर समय में दूसरे रंगों के साथ अत्याचार साबित हुआ

इसी गोरेपन से
किसी लम्पट के प्रेम में पडक़र
असमय इस दुनिया से विदा हो गईं कई लड़कियाँ

उजली और रेशमी काया से उत्पन्न
उत्तेजना के एवज में
अक्सर मर्सिया दबे हुए रंगों को पढ़ना पड़ा
आख़िर गोरा रंग हमेशा फकत रंग ही तो नहीं रहा ।

            उनकी भाषा
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एक ऐसी भाषा का उपयोग करते हैं
कि हम अक्सर
असमर्थ हो जाते हैं
उनकी नीयत का पता लगाने में

हम भरोसे में रहते हैं
और भरोसा धीरे-धीरे भ्रम में बदलता जाता है
जब छँटता है दिमाग से कोहरा
नींद छूटती है सपनों के आगोश से
आँखें जलने लगती हैं सामने की तस्वीर देखकर

लेकिन हमारी मुट्ठियाँ तनें
और उबाल आए बरसों से जमे हुए लहू में
उससे पहले
आते हैं हम में से ही कुछ
बन कर उनके बिचौलिए
डालते हैं ख़ौफ़नाक तस्वीरों पर परदा
और लगा देते हैं हमारे गुस्से में सेंध

अपने लाभ और लोभ में घूमते हुए
हम भटकते रहते हैं इधर से उधर
और कायरों की तरह
अपनी भाषा की तमीज़ में
लौट आते हैं...

    हम न‌ई राह की तैयारी में है
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हम उस मिट्टी में पैदा हुए मित्र
जहाँ महीनों पड़ोस से अंगार लेकर
जल जाता था चूल्हा
जहाँ सूरज
फूटता था था औजार की नोक पर
और धरती हरी हो जाती थी
वहाँ बहुत कम लोगों ने पढ़ी थीं किताबें
बहुत सारे लोग
भोपाल का नाम भर जानते थे

उस समय हम अपने कदम जमाने
और एक तरह से
अपना कद ऊँचा करने की
कोशिश कर रहे थे लगातार
हमारे पास
ऊबी हुई शामों
गहराती हुई खाली और काली
और बेचैन रातों के सिवाय
कुछ अपने थे तो सपने ही थे

मनहूस रातों की
दिल पर लगातार ठक-ठक
और बेहिसाब करवटों से घबराकर
ये सपने
चढ़ते सूरज के साथ रोज़ बढ़ते
और पश्चिम में सूरज के साथ ढह जाते

हमारे मन में हर सुबह
उम्मीद के साथ
छोड़ जाती पारे की तरह कई सवाल
इन फिसलते सवालेां की दुनिया में
हम बेकार थे और बेजार भी थे

और यह कहना भी सरलीकरण होगा
कि हम दोपहर उम्र की तरह काटते थे
हमने अपनी डायरी में
तमाम बड़े शहरों के निवासी
अपने रिश्तेदारों के पते दर्ज़़ किए
बड़ी ललक के साथ
उन पतों पर पहुँचे थी कई बार

और बहुत उम्मीदों भरी
मगर बेहद मजबूर रातें गुजारीं
उनके बच्चे हमें एकदम गँवार
और इसलिए तिरस्कार के योग्य समझते रहे

मगर लड़कियों के पिताओं की ऑंखों में
दूर भविष्य के लिए
एक गहरी चमक दिखाई देती रही
वे इतिहास की सारी नवाबी भूलकर
बराबर मनुहार से
पेट भर रोटी खिलाते रहे

हम बेहद मज़बूर थे
मगर हमें लगा मज़बूरी के भी कई रंग हैं
वैसी ही गहरी तासीर के साथ
ग्लानि शर्म और आक्रोश को दबाकर
तन और मन को चूर करने वाले

हमारी प्रेमिकाएँ
हमारे खालीपन से लगातार परेशान होने के बावजूद
हम पर बेतरह विश्वास में मुब्तिला थीं
वे पीली रंगत की इकहरी देह वाली
बेहद शर्मीली लड़कियां थीं
छत से ताकना और हवा में चुंबन उछालना
उन्हें ज़रूर आता था
मगर वे अंधेरे से डरती थीं
और उजाले में अपनी ही देह से परेशान

उनके परिवार के
पहले और आखिरी फरमान की घड़ी में
उनके प्रेम की अकाल मौत तय थी
हमारे मन में
अपनी मासूम आवारगी को छोड़कर
उन्हें अपने बच्चे की मॉं बनाने का
खूबसूरत सपना था
हमारे जीवन की पूंजी
और भविष्य की ठोस जरूरत से उपजा हुआ
मगर हमारे सामने और सवालों की तरह
यह भी कोई आसान सवाल नहीं था

हमारे पिताओं के पास
अपनी दो-चार साल की बची नौकरी
या दो-तीन बीघा ज़मीन
या सेठ की मुनीमी
और गहरे उच्छवासों के अलावा कुछ नहीं था

पढ़े-लिखे नातेदारों के आने पर
उनके पास सफाई के लिए
नए बहाने तक नहीं बचे थे
ऐसे मौकों पर हम तो
मुँह दिखाने के काबिल भी नहीं थे

हमारे पास खोने के लिए
अब सिर्फ ईमान बचा था
वही ईमान हमें दर-ब-दर किए हुए था

हमें बुजुर्गों ने बार-बार चेताया
कि चालाक होने से बेहतर है हार जाना
ज़रूरी है चालाकियों को समझना
उन्हें भेदना
एक नई राह निकाल ले जाना
हम ईमान को बचाते हुए
नई राह निकालने की तैयारी में हैं।

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