Wednesday, April 28, 2021

फरीद ख़ान और देवेन्द्र आर्य की कविताओं में देश-काल


जब व्यक्ति महत्वाकांक्षा की पराकाष्ठा पर होता है तो वह मनुष्य नहीं रह जाता । वह दुनिया का सबसे निष्कृष्टम और अधम प्राणी होता है । उसके लिए देशकाल, समाज, भाषा, राजनीति, धर्म, न्याय, नीति, संस्कृति, परंपरा, कुछ भी मायने नहीं रखता । बावज़ूद कि निरी स्वच्छंदता और उन्माद से भरा यह मानव प्रकृति का हिस्सा है ; पर कहीं भी प्राकृतिक नहीं है । तथा वह प्राकृतिक हो भी नहीं सकता । जीवन और यथार्थ की कसौटी पर वह हमेशा अग्राह्य ही रहेगा । इसलिए कि यह वस्तु सत्य नहीं है । जीवन सम्मत सत्य का भाग नहीं है । वृथा और अप्रासंगिक है । तथा अवांछनीय है । यानी , सांसारिकता से परे , समाज का कोई भी सत्य ; सत्य नहीं है । मूल्यहीन और आधारहीन स्थापनाओं का वजूद थोथा ही साबित हुआ है । 
इस बीच देश में तीन अलग-अलग महत्वपूर्णं घटनाएं घटी । इन घटित घटनाओं से न मैं स्वयं को अलग कर पाया और न प्रबुद्ध साथी ही । पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर की एक बेटी ने भारतीय संविधान का हवाला दे न्यायिक प्रणाली और नागरिक अधिकार की आवाज़ उठा सन् 2002 से लगातार उस अमानवीय कानून के खिलाफ़ भूख हड़ताल पर लगभग 14 वर्ष तक रही और शून्य की दशा में आंदोलन को स्थगित भी की । संविधान का ऐसा माख़ौल किसने उड़ाया और क्यों उड़ाया कि नागरिक अधिकार की रक्षा भी संभव न हो पाई ? खैर चानू शर्मीला इरोम डिगी नहीं हैं । वह अब भी लौह स्त्री हैं । पर देश और उस प्रदेश की जनता ने आम चुनाव के बहाने जो घाव उसे दिया उसी का सच बयां करती है फ़रीद ख़ान की यह कविता हमें आश्वस्त करती है इरोम की मांगें जायज और न्यायिक है ।

यह कविता इरोम पर नहीं है
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यह कविता

उन लोगों पर है

जो गांवों, कस्बों, गलियों, मुहल्लों में

लोकप्रियता और खबरों से दूर

गांधी की लाठी लिए चुपचाप कर रहे हैं संघर्ष

यह कविता इरोम पर नहीं है

यह धमकी है उस लोकतंत्र को

जो फौजी बूट पहने खड़ा है

जो बंदूक की नोक पर इलाके में बना कर रखता है शांति

पिछले दस सालों में जितने बच्चे पैदा हुए हिमालय की गोद में

उन्होंने सिर्फ बंदूक की गोली से निकली बारूद की गंध को ही जाना है

और दर्शनीय-स्थलों की जगह देखी हैं फौज

जहां बर्फ-सा ठंडा है कारतूस का भाव

यह कविता इरोम पर नहीं है

बल्कि उस बारूद की व्याख्या है

जिसके ढेर पर बैठा है पूर्वोत्तर

बावज़ूद चानू आज मेरे लिए लीजैंड लेडी हैं । उनके इस अनथक संघर्ष यात्रा को सलाम ही नहीं ; लाल- लाल,लाल सलाम कहूंगा ।
 
दूसरी महत्वपूर्णं घटना देश में बेटियों पर होने वाली अनियंत्रित सेक्सुअल हरैसमेंट , बलात्कार , छेड़खानी , व हत्या आदि है । जो निर्बाध चल रही है । यह उतनी भी पीड़ा शायद देती जितनी पीड़ा मैनें महसूस किया तब , जब अपराधियों को बचाने तथाकथित राष्ट्रवादी , सेकुलर  लोग सड़क पर आए । वाह ! क्या रे मेरा हिन्दुस्तान ,कितना बड़ा छद्मी है तू । एक ओर बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ और दूसरी ओर हत्यारों की फ़ौज़ में भी तू ही तू । इस तरह मुझे फ़रीद ख़ान की यह दूसरी कविता भी झिंझोड़ रही है-- 

माफ़ी
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सबसे पहले मैं माफ़ी मांगता हूँ हज़रत हौव्वा से। 

मैंने ही अफ़वाह उड़ाई थी कि उस ने आदम को बहकाया था 

और उसके मासिक धर्म की पीड़ा उसके गुनाहों की सज़ा है जो रहेगी सृष्टि के अंत तक। 

मैंने ही बोये थे बलात्कार के सबसे प्राचीनतम बीज। 

 

मैं माफ़ी माँगता हूँ उन तमाम औरतों से 

जिन्हें मैंने पाप योनि में जन्मा हुआ घोषित करके 

अज्ञान की कोठरी में धकेल दिया 

और धरती पर कब्ज़ा कर लिया 

और राजा बन बैठा 

और वज़ीर बन बैठा 

और द्वारपाल बन बैठा 

 

मेरी ही शिक्षा थी यह बताने की कि औरतें रहस्य होती हैं 

ताकि कोई उन्हें समझने की कभी कोशिश भी न करे। 

कभी कोशिश करे भी तो डरे, उनमें उसे चुड़ैल दिखे। 

 

मैं माफ़ी मांगता हूँ उन तमाम राह चलते उठा ली गईं औरतों से

जो उठा कर ठूंस दी गईं हरम में। 

मैं माफ़ी मांगता हूँ उन औरतों से जिन्हें मैंने मजबूर किया सती होने के लिए। 

मैंने ही गढ़े थे वे पाठ कि द्रौपदी के कारण ही हुई थी महाभारत 

ताकि दुनिया के सारे मर्द एक होकर घोड़ों से रौंद दें उन्हें 

जैसे रौंदी है मैंने धरती। 

 

मैं माफ़ी मांगता हूँ उन आदिवासी औरतों से भी 

जिनकी योनि में हमारे राष्ट्र भक्त सिपाहियों ने घुसेड़ दी थी बन्दूकें 

वह मेरा ही आदेश था 

मुझे ही जंगल पर कब्ज़ा करना था। औरतों के जंगल पर। 

उनकी उत्पादकता को मुझे ही करना था नियंत्रित। 

 

मैं माफ़ी मांगता हूँ निर्भया से 

मैंने ही बता रखा था कि देर रात घूमने वाली लड़की बदचलन होती है 

और किसी लड़के के साथ घूमने वाली लड़की तो निहायत ही बदचलन होती है। 

वह लोहे की सरिया मेरी ही थी। मेरी संस्कृति की सरिया।  

 

मैं माफ़ी मांगता हूँ आसिफ़ा से।

 तीसरी कविता देवेन्द्र आर्य की है । जिसने सांप्रदायिक आग में  झोंक दिए गए ङां कफ़ील पर कविता लिखी । ङां कफ़ील भारतीय मानस पटल पर कभी धुंधले नहीं हो सकते ।और न धुंधला होगा गोरखपुर का वह अस्पताल । जहां महज एक आक्सीजन सिलेंडर की कीमत ने , न जाने कई मासूम बच्चों की जान ही ले ली ।और कई माताओं- पिताओं की गोद ही सूनी कर दी । जिस पर निरंकुश शासक वर्ग का रवैया देखते ही बन रहा था। देवेन्द्र आर्य की इस कविता का उद्देश्य मुझे नहीं लगता कि कफ़ील को बचाना और योगी को गरियाना ही है । यह देश के वर्तमान राजनीतिक हालात में निरंकुश शासक वर्ग द्वारा सत्य को असत्य में तब्दील करने की चालाकी भरे चाल और चरित्र का भी पर्दाफाश कर रही है । कविता व्ययंग की धार से शुरू होकर उसी व्यय॔ग से आबद्ध देश के कई राजनीतिक घटनाक्रमों ,उनके हराम पंथियों व कारगुज़ारियों का टोह लेती व्यय॔ग पर ही खत्म होती है ।
(गोरखपुर गैस त्रासदी के आरोपी डा. कफ़ील के लिए)

मौत का कोई शीर्षक नहीं होता 
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तेरी नालायकियत यह थी कफ़ील
कि तेरे कारण हमारी नालायकी उजागर हो गयी 
मुसलमान कहीं का !

कम थे मरीज़ क्या तेरे नर्सिंग होम में 
कि नींद नहीं आ रही थी उस रात
चला आया मसीहा बन बच्चों की घुटती साँस बचाने
अब गिन अपनी सांसें 
ऐसी सजा देंगे कि खाली सिलिंडर भी बोल उठेंगे 
हम तो लबालब भरे हैं मालिक 
रिसने को तैयार .

इतनी कमज़ोर नहीं नाक हमारी डाक्टर  
कि बच्चे काट ले जायं  
अब तो वो इलाज होगा कि पानी बोल उठेगा 
मैं इतना बेपानी नहीं सरकार
कि आप के सरोवर से दगा करूँ

मैं तो जापान कभी गया ही नहीं 
बुखार से मेरा कोई ताल्लुक नहीं 
मैं तो कब का टीका जा चुका हूँ 
देख लो अपना रजिस्टर 
असल में टीके का खेल तो फीका किया राप्ती ने .

राप्ती थरथराने लगी 
कसम गऊ माता की 
मैं तो मान की बेला में गोरखपुर थी ही नहीं 
चली गयी थी आसाम फिर बिहार रिश्तेदारी में 
वैसे भी मुझे मेधा से डर लगता है इन दिनों 
कब नर्मदा दीदी को छोड़ मेरे पीछे पड़ जाएँ
मैं ठहरी नमामि गंगे की 
सच्ची कहती हूँ सारा खेल हवा का है 
उसी ने आप के खिलाफ साजिश की है 
इतना भी कम नहीं था अनुदान 
कि आक्सीजन पर भारी पड़ जाय पिछवाड़े की हवा . 

क्यों री हवा ! 
तुझे रोज़ सुबह पवन कह कर मैं बछड़ों की तरह सहलाता रहा
इसी दिन के लिए 
कि तू योगी से मोहब्बत करते करते वियोगी हो जाय 
रोज़ देशी घी का धुआं पिलाया 
भेजे तेरे पास मेवा मिष्ठान्न अग्नि के हाथों 
इसी दिन के लिए म्लेक्छिन !

ऐसा न कहें सरकार 
हवा तो अभी भी आपकी ही है 
आपकी ही पालकी ढो रही है हवा 
ई ससुर अगस्तवा सब गड़बड़ किये है 
कई बार टोका कि सावन में साग 
और भादों में दही की चिंता छोड़ दिमाग की चिंता कर 
कि कहीं मुंह न फुला के बैठ जाये दिमाग 
मगर हुआ वही 
बाकिर गलती उसकी भी नहीं 
पूछ लो कलेक्टर साहब से 
अब तो लालकिला भी जान गया कि जब से 
विपदा को आपदा का ख़िताब मिला है 
उसका दिमाग फूल के कुप्पा हो गया है 
बड़े नहीं फंसे तो फुसला लिया बच्चों के दिमाग को 
संस्कारों की कमीं होगी तो यही सब होगा न !

जिद्दी होते हैं बच्चे 
मरने की ठान ली तो ठान ली
न जीने की फ़िक्र न मरने का गम 
उनके चक्कर में बदनाम हुए हम 

खैर छोड़ो 
बाबा गोरखनाथ की कसम 
ऐसी सजा देंगे कि डाक्टर इलाज करना भूल जाएंगे
और मरीज़ डाक्टर के पास जाना 
एक ही इलाज होगा 
हाथ दिखाना 
जाप कराना 
और मोदियाना 
बुखार छूट जायगा बुखार को 
रामदेव हैं न !

न रहेगा पानी न उगेगा धान
न जायेगी मासूमों की जान
है न मेरा देश महान .  
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17.8.2017

और अंत में यह कि फरीद ख़ान और देवेन्द्र आर्य दोनो ही की कविता में काव्य भाषा का सधाव , उसका पैनापन, उसकी संप्रेषणीयता कविता को उस शिखर तक ले पाने में सफल हुई दिख रही है जहां तक कि उसे जानी चाहिए जिसका कि वो हकदार है ।

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