आज के राजनीतिक परिदृश्य पर श्रीकांत वर्मा कितने साफ़ थे । यह अलग है कि वे सत्ता के साथ थे । संभवतः उनमें निरुद्वेग , आवेगहीन जनता को लेकर हताशा आई हो कि वे सत्ता के विद्रोही रुप को त्याग शरणागत हो गए । ऐसा , मैं इसलिए कह पा रहा हूं कि एक ओर आवारा पूंजी और अतृप्त इच्छाएं है और दूसरी ओर विचार धारा । सत्ता के साथ बने रहने की महत्वाकांक्षा ने आदमी को उसके आत्मसम्मान के न्यून स्तर तक ला खड़ा किया है । स्थितियां यह कि "प्रतिवाद" से बेईमान शब्द आज कुछ और , है ही नहीं। सत्ता की जय-जयकार और यशगान में समाधिस्थ लोग कब जागोगे कि कहते ही रहोगे
महाराज की जय हो !
■ कोसल में विचारों की कमी है
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महाराज बधाई हो; महाराज की जय हो !
युद्ध नहीं हुआ – लौट गये शत्रु ।
वैसे हमारी तैयारी पूरी थी !
चार अक्षौहिणी थीं सेनाएं
दस सहस्र अश्व
लगभग इतने ही हाथी ।
कोई कसर न थी ।
युद्ध होता भी तो नतीजा यही होता ।
न उनके पास अस्त्र थे
न अश्व न हाथी
युद्ध हो भी कैसे सकता था !
निहत्थे थे वे ।
उनमें से हरेक अकेला था
और हरेक यह कहता था
प्रत्येक अकेला होता है !
जो भी हो जय यह आपकी है ।
बधाई हो !
राजसूय पूरा हुआ
आप चक्रवर्ती हुए
वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गये हैं
जैसे कि यह –
कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता
कोसल में विचारों की कमी है ।
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