दिल्ली
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देखो धुंध की अभेद्य चादर में लिपटी हुई
ये दिल्ली है
भारतवर्ष की राजधानी,
राजपथ बनाम जनपथ के संघर्षो के इतिहास
जिसके चेहरे पर दर्ज हैं ।
शताब्दियों के खंडहर पर उगा नामचीन शहर,
खांडवप्रस्थ का बुढ़ापा
और इंद्रप्रस्थ की जवानी साधे,
स्वर्ण की नोंक पर टिका
सपनों की रंगीनियों में जीता है ।
छवियों को बनाता बिगड़ता है ये शहर
और छवियों के नीचे धँस जाता है सत्य ।
अनवरत दौड़ता भागता ये शहर
अपने पाँवों से बहते लहू से भी अनजान है ।
इस शहर में भारत का एलीट क्लास
और मजदूर एक साथ सोता है,
साम्य का कैसा अनगढ़ समीकरण है,
जिस पर समय भी रोता है ।
जहाँ कार्बन और सल्फर ने गुप्त संधि की है,
मौसम के खिलाफ ;
चन्द रोज पहले सुनी मैंने
खुद के पैदा किए विचारों के मलबे में
दिल्ली के धँस जाने की खबर ।
कई बार सोचता हूँ
कि दिल्ली शहर नहीं
खुद को दोहराता हुआ
एक पैटर्न है
और हर इंसान का चेहरा
सूचनाओं का एक लिफ़ाफ़ा भर ।
कुमार प्रांजल बढ़िया लिख रहे हैं इन दिनों । राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली , और दिल्ली के दरबार तथा उसकी रंगीनियो पर सार्थक हस्तक्षेप करती कुमार की इस कविता से जहां चाल और चरित्र के दोहराव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है ; वही कुमार यहां बदलते रिश्ते , बदलते मुहावरे के मध्य , जीवन और इतिहास के बीच लटकती अन्तर्कथाओं , अन्तर्विरोधों का पुनर्पाठ प्रस्तुत करने में कामयाब दिख रहे हैं । कुमार को वैसे मैं ज्यादा पढ़ा भी नहीं , बस यह उनकी दूसरी- तीसरी कविता है मेरे लिए पर इस कवि की संभावनाओं से आश्वस्त हूं । बढ़िए निरंतर , कुमार प्रांजल । शुभकामनाएं ,अशेष ।
"कई बार सोचता हूँ
कि दिल्ली शहर नहीं
खुद को दोहराता हुआ
एक पैटर्न है
और हर इंसान का चेहरा
सूचनाओं का एक लिफ़ाफ़ा भर।"
यह एलीट को लेकर बनने वाली आम धारणा है । प्रत्येक समाज के बुनावट में एक क्लास है, एक लेयर है , और यही क्लास कि लेयर आदमी को खंडित करता है । हिंदी इससे अछूता नहीं है ।
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