कोई अधिक अथवा अधिकारिक जानकारी नहीं है मुझे । परन्तु यह केवल एक कविता ही है जो मुझे एकता नाहर का मुरीद बनाती है । पेशे से पत्रकार साथी एकता नाहर विद्रोही तेवर की हैं । अपनी उपस्थिति को सीधी सपाट बयानी में दर्ज़ करती हैं । हालिया प्रकाशित उनके काव्य संग्रह 'सूली पर समाज' की कविता साभार वेब पत्रिका 'अपना मोर्चा डाट काम' से ।
इस कविता को पोस्ट करने की वजह और आशय साफ है समकालीन हिंदी कविता में यौनिकता के मार्फत आती अश्लीलता के बनिस्बत इस कविता से कवि कुछ यथार्थ को पकड़े ना कि अश्लील संवाद अथवा रेखाचित्र बनाएं । जहां एक उत्कृष्ट रचना अपनी रचनात्मकता में पूरी तरह समाजिक होती है। समाज में फैले वैमनस्य भावों को ठीक-ठीक रेखांकित करती है , सवाल खड़ा करती है । न्यूनतम के प्रति ईमानदार होती है । वही छद्म रचनाशीलता आपको पब्लिश करायेगा । आह ,वाह से नवाजेगा । सरोकारी नहीं बना पाएगा । यह समझने की जरूरत है ।
सपाट सीने वाली लड़कियां
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सपाट सीने वाली लड़कियां हर जगह से ठुकराई गयीं
रिश्ते की बात करने आए लड़के वालों ने
जब नजर भर के उसे देखा तो फिर
उसका कोई और हुनर मायने न रहा
पुलिस की नौकरी में आवेदन करने से भी,
लोक सेवा आयोग ने शर्तों में लिखा है
कि कितने इंच का होना चाहिए सीना
किसी चित्रकार ने अपने खूबसूरत चित्रों में
जगह नहीं दी उस स्त्री को
जिसके सीने पे उभार न था
चित्र बनाने के लिए सुडौल शरीर का बिम्ब सबसे आकर्षक था.
आए दिन देखा तिरस्कार
सहेलियों की बातों में, पति की नज़रों में
अंतरंग क्षणों में भी वो प्रेमी के सामने सहमी-सहमी सी रही
कभी खुद को ही आइने में देख हुई शर्मिंदा
कभी पैडेड ब्रा में छिपाती रही खुद से खुद को ही
उसके लिए छाती पर दुपट्टा डालना
भरे बदन वाली लड़की जितना ही जरूरी था
ताकि वो बचा सके खुद को उस पर हंसती हुई लालची नज़रों से
हां...भरे बदन का मतलब भरी हुई छातियों से ही है शायद.
ये लोग नहीं कर सके उन्हें पूरा प्रेम
लेकिन इन सबने चुटकुले बना कर हंसा उन पर खूब
क्योंकि हम बड़े हुनर बाज हैं
हर चीज को अपने चुटकुलों में जगह देते हैं.
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