समकालीन हिंदी कविता के विगत तीन चार दशक निश्चय ही लोक बनाम महानगरीय बोध , फिर प्रतीकात्मक ब्यौरों , चीज़ों और घटनाओं का ज्ञान पाठ का रहा । पर अंतिम दशक अथवा नई सदी के आते-आते कविता के ये तय प्रतिमान अथवा काव्य धारा भी अस्थिर होता दिखा । इन मायनों में सदी का अंतिम दशक जिसमें कमलेश्वर साहू , बसंत त्रिपाठी , भास्कर चौधरी ,सतीश कुमार सिंह, कुमेश्वर कुमार , रजत कृष्ण , संजय शाम , निर्मल आनंद , नंदकुमार कंसारी,,विश्वासी एक्का , पूनम विश्वकर्मा , युगल गजेन्द्र सरीखे छग से संबद्ध कवियों के अलावा संतोष चतुर्वेदी , गणेश गनी , ब्रज श्रीवास्तव , सुरेश सेन निशांत , मणि मोहन मेहता , सिद्धार्थ वल्लभ , कुंदन सिद्धार्थ , अखिलेश श्रीवास्तव आदि कवियों ने भी अपने - अपने काव्य सृजन का लोहा मनवाया । यह ठीक है कि इन कवियों की कथ्य , शिल्प और भाषा तथा उसकी अंतर्वस्तुएं अलग-अलग रही है पर वे सृजन के स्तर प्रचलित ढर्रे से बाहर निरंतर नवोन्मेष , नव प्रयोग करते दिखे । किशन लाल भी इन्हीं कवियों में से हैं ।
किशन के इस संग्रह को पढ़ते हुए एक चीज मुझे बार बार ठिठकने को विवश किया और मैंने नोट किया कि उनके कुल रचनात्मकता के केन्द्र में प्रमुख किरदार 'भोग्या' है , भोगा यथार्थ है , उनका अपना जीवन अनुभव और उसका निचोड़ है । जो कि मानव के वस्तु रूप में हो रहे रुपांतरण तथा उसके संघातों को न केवल चिन्हांकित कर उसे क्रमबद्ध ही करता है बल्कि उसका विरोध भी करता है । यही नहीं ; लोक अथवा महानगरीय बोध , प्रतिकात्मक ब्यौरों और चींजों तथा घटनाओं के बीच किशन की कविता में मुझे एक नया स्वर दिखलाई दे रहा है ; दलित चिंतन और स्त्री विमर्श का स्वर । जो उन्हें अपने समकालीनों से भिन्न बनाती है ।
किशन जेनुइन कवि हैं । उनकी कविता में जीवन तथा अनुभवों का सान्द्र संसार है। संवेग का स्तर काफी गहरा है । समाजिक सरोकार वे उसका ताना-बाना उनकी कविता में जैसी आई दिखी वैसा छग के काव्य परिदृश्य पर कम ही दर्ज हुई । यानी उससे भी अच्छी बात यह कि इसमें वे जीवन की रागात्मकता से बनी बनाई वाली कुलीनतावादी काव्य धारा से खुद को अलग कर ढांचागत परम्परा तोड़ा वे जीवन से उसके संघर्ष से जुड़ आगे आए । यह किशन का तेवर है कि उसने बदलाव की सूरत तय की , इबारत लिखी । जो कि उनकी 'ईक्कीसवीं सदी' शीर्षक कविता में दिखलाई पड़ता है । यह कविता किशन के कई-कई और गंभीर आपत्तियों को एक साथ हमारे दृश्य पटल पर रख गई । किशन इस कविता में जहां अपने लोक के साथ भ्रमण , विचरण करते दिखाई देते हैं वहीं उनका वर्ल्ड चेतना भी उठ खड़ा होता है । यकीनन यह किशन का अपना लोक है और उसके प्रति समर्पण भी । यद्यपि किशन की कविता में वैचारिक आग्रह व प्रतिबद्धता एक सीध पर है पर यह उनका स्वचलित राडार ही है कि वे समाजिक अश्पृश्ता और वैमनस्यता से भरे इस संसार को देख समझ रहे होते हैं नि:शब्द नहीं रहते न गोया छाती पीटते हैं अपितु दलित लेखन और स्त्री विमर्श को एक आधारभूत ढांचा प्रस्तुत करते हैं । मसलन 'नारी साक्षरता' 'नहीं' 'किसनुवा' 'ईंट भट्ठे की एक सुबह' 'घृणा' इत्यादि व संग्रह की पहली कविता 'अभिवादन' में यह देखा जा सकता है ।
यह 'अ'
तुम्हारी वह शक्ति है
जो कल खेत पर
ज़मींदार की कुदृष्टि से बचाएगा
जरुरत पड़ने पर
यह थप्पड़ का आकार लेता हुआ
उसके गाल से चिपक जायेगा
किशन चूंकि एक मंझे हुए कलाकार हैं अतः उनकी कविताओं में जिस शिद्दत के साथ समाजिक सहभागिता , जागरूकता , मूल्यों के स्थापन्न वर्गीय चेतना के आरोह वह वैविध्यता का एक बड़ा जखीरा भी किशन की कविताओं में परिलक्षित होता है । यह कम ,विरल नहीं है । कवि के संग्रह की शीर्षक कविता 'जहां कवि होगा' व 'अगर कटते रहे पेड़' में वे अपने उन चुनौतियों के सत्यापन उस दायित्व का भलिभांति निर्वहन करते हैं जो कि उनका है
संग्रह की दो कविताएं ख़ास कर 'नदी के लिए' और 'नदी का मर जाना' इन अर्थों में एक सशक्त कविता है कि नदी एक जीवित इकाई है । एक पूरी सभ्यता है । और बगैर उसके समूची सृष्टि का मर जाना है ।पर पूंजी वे बाज़ार के दबावों में बैसाखी पर टिकी हुई सरकारें तथा दलाल पूंजीपतियों , औद्योगिक घरानों की मिश्रित व्यवस्था ने तमाम जानकारी और खतरों के बावजूद उसके उत्खनन , दोहन वे जल अधिग्रहण कानून ला पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों , मूल्यों को ध्यान किया। यहां कवि का समाजिक चिंतन व आग्रह बड़े ही मार्मिक रूप में अभिव्यक्त होती है ।
किशन को अपने गंवई -गांव , कस्बे , उसके चौक - चौराहे , हाट-बाजार , दिनचर्या व जिजीविषा से गहरा आत्मीय जुडाव है 'धमतरी' सीरीज की कविताओं में कवि के अपने समय के सापेक्ष तथा उसके इर्द - गिर्द घटित घटनाओं , ब्यौरों से एक सम्पूर्ण समाजिक परिदृश्य ,जीवन दशा का भान होता है जहां कवि धमतरी के रोमानियत को रिक्शे पर सवार स्कूल की ओर जाते देखता है तो उसके स्याह को बच्चों के प्लास्टिक कांच बीते कि मकई चौक पर बिकते मजूरों , कि कोष्टापारा में बीड़ी बनाती स्त्रियों या कि आदिवासी बालाओ की तीस पैंतीस रूपये में दिन भर खटती दशा व दरिद्र में देखता है।
यह अनायस ही नहीं है तमाम अवरोधों असहमतियों के बावजूद किशन का बार बार धमतरी के सौंदर्य के लिए ठिठकना , रूकना और अपनी आतुरता और विकलता के बीच रागात्मक होना । यह किसी कवि गहरे समाजिक बोध और सरोकारों से आती है ।
किशन की सम्प्रदायिक सौहार्द पर लिखी कविता 'एक पल के लिए' एक बेहतरीन व मार्मिक कविता है । यह ऐसे समय में हमें ढांढस बधाती है विश्वास जगाती जब सम्प्रदायिक शक्तियां कुनबों से निकल कर नग्न प्रदर्शन करते अपनी ताकत का मुजाहिरा कर रहे हो कभी 'लव जिहाद' कभी गौ रक्षा ,कभी बीफ के संदेह में, तो कभी गौरी लंकेश , दाभोलकर , कलबुर्गी , पानसरे की नृशंस हत्या करके ही । तब भी किशन का मानव मूल्य के प्रति आस्था उन्हें ज्यादा प्रमाणिक और सत्य बनाती है जो कि इस कविता में दृष्टि गोचर होती है
अपने ख़ास मित्रों के जिक्र में
बसंत त्रिपाठी , कुमेश्वर कुमार के बीच
कैसे भुला दूं
फरहत , सलीम , और नासिर अहमद सिकंदर को
यह कवि का अपना राग है । वह विभाजित नहीं करता , अलग नहीं करता वह देखता है तो उनमें बसे विशाल महामानवों को जिन्होंने उनके जीवन के भीतर मनुष्य होने की समझ पैदा की । उसे गति वाले दिशा प्रदान की ।
किशन की कविता में लोक भाषा लोक मुहावरे तथा लोक जीवन की व्यवहारिकी , बारिकी , मूर्त्त वस्तुएं वह उनका सूर्या रंग विपुल है । यह उनके लोक जीवन लोक , परम्पराओं से गहरे सानिध्य वे सरोकारों से आती है । किशन अपनी कविता उस लोक का प्रतिनिधित्व करते हैं जो तत्कालीन व्यवस्था की नादानी ,छद्मों और आडम्बरो से मारे जा रहे हैं । वे व्यवस्था के इस सशंकित चेहरे व स्वास्थ्य से खासी नाराज़ होते हैं । वे उस अमानवीय और क्रूर व्यवस्था के चरित्र और रहस्यों से न केवल पर्दा गिराते हैं अपितु उन लोक जन से मुखातिब होते हैं उन्हें संबोधित करते हैं तथा वैकल्पिकता का मार्ग भी प्रशस्त भी करते हैं । वे कहते हैं
बारसूर कुटुमसर की
अंधेरी गुफाओं से बाहर निकलो
और बीच का
रास्ता तलाशना छोड़कर
सोचों कि
जीने लिए
कोई तीसरा विकल्प क्या है
किशन की इस कविता से गुजरते हुए एकबारगी लगा कि किशन श्रीकांत वर्मा के मगध के तीसरा रास्ता से प्रभावित है जहां तीसरा रास्ता क्या है (? )का साफ़-साफ़ चित्र नहीं बनता । परन्तु किशन की इस कविता में वह स्पस्ट परिलक्षित होता है जो कि प्रतिकार का है , विद्रोह का है और संगठित विद्रोह का है
किशन के इस संग्रह में वर्ग चेतना की पूरी एक समृद्ध परंपरा का भी दृष्टिपात होता है । चूंकि वे ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो श्रम के अवमूल्यन विघटन के कारणों को उसके ठीक - ठीक रूप में पहचान तो करते ही हैं साथ ही उसके महत्व को रेखांकित करने कसर नहीं छोड़ते ।
धमतरी को जानना हो
तो पहुंचो मकई चौंक
और देखो अपनी आंखों से
बिकते हुए मजूरों को
कवि अपनी इस कविता में अपने आग्रह के जरिए संवाद को बढ़ाता है । मजूर और नियोक्ता के बीच के फांक को स्पष्ट करता है ।
संग्रह में अनेक ऐसी कविताएं हैं मसलन 'पीपी के लिए' 'भाभी: छह कविताएं' विशुद्ध परिवार पृष्ठभूमि की कविताएं हैं जो हमारे आदिम राग तथा मनुष्य का मनुष्य से रिश्ता और उसके अंतर्संबंधों को गहन सामाजिक अर्थ प्रदान करती है
यानी , कुल मिलाकर किशन का यह संग्रह उनके कवि होने के दायित्व बोध में पूर्णतः खरा है और अपनी अंतर्दृष्टि में नया भी ।
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