Friday, July 10, 2020

आरती तिवारी की कविताएं स्त्री प्रतिरोध का जीवंत दस्तावेज़ हैं

पिछले ही दिनों युवा आलोचक अजित प्रियदर्शी ने हिन्दी के किन्हीं एक कुकवि , यानी अशोक वाजपेयी की कुकविता को अपनी ही वाल से पोस्ट करी थी । यह महज संयोग है कि उस कुकवि की कुकविता का प्रारंभ भी सद्य स्नाता स्त्री थी और आरती तिवारी भी अपनी इस कविता का आरंभ सद्य स्नात स्त्री से ही कीं । पर दोनो की व्यवहारिक स्थिति में पन्न विपन्न की जो स्थिति निर्मित हुई है वह काबिल ए गौर है । सौन्दर्य बोध पर ऐसी अव्यवहारिक स्थिति का बनना मुझे लगता है एक कवि और कुकवि के मध्य का स्वाभाविक फर्क है । सौन्दर्य बोध से प्रारंभ होती दोनो 'कविता' में ऐसा क्या फर्क रह गया कि एक , सिर्फ और सिर्फ उच्छृंखल हो , परिसीमन का अतिक्रमण करने को लालायित दिखता है और दूसरा स्त्री के उस दूसरे पक्ष के साथ पूरी निष्ठा और ईमानदारी से खड़ा हो उनके महत्व को रेखांकित करता है । परिणामतः हिन्दी आलोचना के तमाम धुनक्कड़ों के लिए मानो द्वार खुल जाता है  ; और कोई कुछ सुनने को तैयार ही नहीं रहता और सुने भी तो क्यों ? आखिर हिन्दी आलोचना किसी कुकवि को ऐसे ही क्यों और कब तक ढोयेगा ? जिन्हें  एक सद्य स्नात स्त्री की विडंबनाओं , दुख , संत्रास , पीड़ा व उनके समाज के निर्माण में महत्वपूर्णं योगदान आदि ही ; नहीं दिखलाई पड़ता हो । दिखता भी है तो उसे वह कोमलांगी कामिनी ही , वह अपनी यौनानूभूतियों यौन आचारों के महिमामंडन में इतना पारंगत और विशिष्ट हो जाता है कि उस पर अलग से शोधकार्य ही किया जाना बनता है । हिन्दी आलोचना कम से कम अब यह बर्दाश्त नही ही करेगा  ? विजेंद्र जी , गणेश गनी , अजित भाई , उमाशंकर , नासिर अहमद सिकंदर ,कमलेश्वर साहू और  वल्लभ भाई तथा अन्य  साथियों ने इस पर बड़ी अच्छी और व्यापक उपस्थिति दर्ज कर यह बता दिया कि मठ और धाक के दिन नहीं रहे । ये सभी साथियों ने यह माना कि सौन्दर्य की असीमता और बुनियादी संघर्ष को यौन भावो में परिवर्तित नहीं किया जा सकता । सौन्दर्य बिल्कुल अलग चीज़ है , वह प्राइमरी है । और प्राइमरी बातों की अपनी अर्थवत्ता रहती है जो कि कायम रहना चाहिए । यहाॅ प्रस्तुत आरती तिवारी की इस कविता की विषय वस्तु और अशोक वाजपेयी की विषय वस्तु में एक बड़ा फर्क है , बुनियादी फर्क कहूंगा ; वह लाजवाब है । आरती की स्त्री , वह सद्य स्नात स्त्री नहीं ही है , जो यौनानूभूति , यौन आवेगों , आकांक्षाओं से संक्रमित एक रूग्ण विचार से संपन्न कुकवि की है । आरती अपनी इस कविता मे कुलीनतावाद का न केवल मुखर विद्रोह करती नज़र आ रही हैं अपितु स्त्री के मानव सभ्यता के विकास में उनके योगदानो , प्रतिरोधों को भलिभांति रख पा रही हैं । 
यह कहने में मुझे तनिक संकोच नहीं आरती तिवारी हिन्दी की समृद्ध व दृष्टि संपन्न कलाकार हैं ।  उनकी कविता में गहन समाजिकता औसत के विपरीत , बेहद सूक्ष्म और अपने तरल रूप में प्रस्तुत होती है । उनकी इस कविता में कामायनी सौन्दर्य के बनिस्बत स्त्री का एक दूसरा अध्याय उद्धृत होता है जो कि आज के मर्दवादी हताशा और कुंठा को ज़ार -ज़ार कर देता है । दक्षिणी भारत के केरल प्रांत में स्थित शबरी माला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश पर निषेध का फैसला आरती को इसलिए भी आश्चर्य करता है कि वह मंदिर और उसमें विराजित अय्पपा स्वामी का उस देशकाल परिवेश से गहरा नाता है । पौराणिक कथाओं , मान्यताओं के अनुसार अयप्पा स्वामी के आगमन से ही भीलनी स्त्री शबरी को मुक्ति मिली थी । यह बेहद खेदजनक है कि सृष्टि की संपूर्ण रचना , यहां तक की उसके रचयिता व पालनहार ने भी अपने को स्त्री के गर्भ गृह में संरक्षित पाया । कई-कई युद्ध में विजय पाई । अतः  समूची सृष्टि की संपन्नता में स्त्री के कर- कमलो का अनदेखा नहीं किया जा सकता ।पर पता नहीं हमारा समाज और इसके ठेकेदारों में स्त्रियों के प्रति इतनी हीन भावना कहां से और कैसे जन्मते हैं ? वे भी तो किसी स्त्री की नाल हैं उनसे ही जायी हुई हैं । सवाल बड़ा गहरा है । और ऐसे गहराते सवाल को आरती ने अपनी कविता का कथ्य बनाया । निश्चय ही यह आरती का साहसिक विद्रोह है । मैं विनोद मंगलम के फ्रांसीसी लेखिका सिमोन द बुआ के 'सेकंड सेक्स' के उद्धरण और उसके बाद की स्थिति से सहमत हूं कि स्त्री जयशंकर प्रसाद के कामायनी की तरह अब श्रद्धा की वस्तु नहीं है । वह सजीव है  ; और श्रद्धा निर्जीव । इसका प्रतिकार होना चाहिए और यह प्रतिकार केवल स्त्री लेखिकाओं के हिस्से का दायित्व में ठहर जाए और एक नई कुंठा जन्म ले उससे पहले उन तमाम जनवादी प्रगतिशील मूल्य बोध के लेखकों को भी अपनी हिस्सेदारी का दायित्व निर्वाह करना होगा । यह कतई नहीं स्वीकारा जाना चाहिए कि पुरूष प्राथमिक है और स्त्री द्वितीयक । 
आरती अपनी इस पूरी कविता में एक युवा स्त्री को केन्द्र में रखती समाज के बहुरूपिए सौदागरों से मुखातिब होती हैं जो कि अपने पुरुष होने के दंभी आकंठ में डूबे हैं । वे उनकी पूरी बात  एक-2 कर कि स्त्री कैसे और किस सम्मोहन के वशीभूत पुरुष के निकट आई । कहती हैं---

तुम बढ़े आगे
तुम मुग्ध हुए
वो भी खिंची
तुम्हारी मर्दानी गन्ध के भरोसे में
एकाकार हुए दो स्वप्न
तुम रिक्त हुए
भर भर गई वो

आरती की कविता की इस पंक्ति में वह जज्ब और विश्वास साफ़ है कि जरूरतें इकतरफा ही नहीं होती । जरूरतें और सहमतियां पारस्परिक है । 

आरती की इस कविता में घोर असहमतियां है । व्यंग्य है । क्षोभ है । सीख है । ज्ञान और उजास की पूरी संभावना है । पर उससे भी बड़ी बात है आक्षेपण का न होना । दुराग्रह का न होना । 

तुम भी जन्मे थे
जैसे सहस्त्राब्दियों से जन्मता आ रहा था तुम्हारा पितृ-पुरुष
हाँ सुनो तुम भी एक योनिजा हो
रुधिर और श्वेत स्राव में लिपटे
क्षत-विक्षत करते हुए उसके कोमलांग
भूमि पर

आरती की इस कविता की भाषा व बानगी अपने खुरदुरेपन तथा पैनेपन से सध गई । जो आक्रामक भी लगती है और संयम भी बरकरार रखती है अतः कहना न होगा कविता अपने भाषाई पकड़ बिंबात्मक प्रस्तुति में मारक है । असरकारक है । 
संघर्ष सतत् प्रक्रियाधीन होगी । वह निरंतर जारी रहेगा ; कभी न खत्म होनेवाला । वह विस्थापित होता रहेगा  । स्वरूप बदलेगा , चीज़ें बदलेगी पर वह चीज़ खत्म नहीं होगी । वामपंथ इस प्रक्रिया में प्रक्रियाधीन ही रहेगा । उसे लगातार प्रतिक्रियावाद के खिलाफ़ अपनी लड़ाई जारी रखना होगा । मैं यहां भूमाता ब्रिगेड की चीफ तृप्ति देसाई व मुस्लिम महिला आंदोलन की प्रणेता नूरजहां साफ़िया नियाज़ तथा जाकिया सोमन को कोड करना चाहूंगा और उनका उल्लेख इसलिए भी जरूरी समझता हूं कि वे पारंपरिक भारत के घोर जड़वादी तथा प्रतिक्रियावादी समाज की ही अंग हैं । पर उन्होंने पिछले ही दिनों जहां हाज़ी अली के दरगाह पर चादर चढ़ाई और नासिक स्थित कपालेश्वर मंदिर में पूजा अर्चना की वही औरंगाबाद जिले  के शनि  शिंगणापुर में शनि के चबूतरे पर चढ़ साढ़े चार सौ पुरानी जड़ता को तोड़ा । यह आसां नहीं था  ।

||  गर्भगृह के बाहर खड़ी स्त्री  ||

ऋतु-स्नान के पश्चात्
लहरा रहे थे उसके चमकीले रेशमी केश
उसका सद्य स्नात सौंदर्य
भोर की प्रथम रश्मि सा
फूट कर प्रविष्ट हो रहा था
सृष्टि के सूक्ष्म कण में

तुम बढ़े आगे
तुम मुग्ध हुए
वो भी खिंची
तुम्हारी मर्दानी गन्ध के भरोसे में
एकाकार हुए दो स्वप्न
तुम रिक्त हुए
भर भर गई वो

तुम्हारा बीज धारण कर
धरती हो गई वो
उसके रज से
देह में पनपा एक और जीवन
उसके गर्भाशय का कोटर
तुम्हारे बीज का अभेद कवच था
नौ महीने अंकुरण से भ्रूण् यात्रा में
उसके रक्त से पोषित 
एक और पुरुष
बढ़ते और बनते रहे तुम
खिलते रहे शुक्लपक्ष की चंद्रकलाओं से

वाद्य-यंत्र सी
बजती रही उसकी कोंख
गर्भनाल से तुम्हे चुगाती रही चुग्गा
तुम्हे पोषने तुम्हारे लिए ही
खाती रही पौष्टिक आहार
चाहे मन कभी कुछ न खाना चाहे तो भी

तुम भी जन्मे थे
जैसे सहस्त्राब्दियों से जन्मता आ रहा था तुम्हारा पितृ-पुरुष
हाँ सुनो तुम भी एक योनिजा हो
रुधिर और श्वेत स्राव में लिपटे
क्षत-विक्षत करते हुए उसके कोमलांग
भूमि पर आये थे

वात्सल्य के झरने में नहला
ममत्व की चिकनाई से
मलकर पुष्ट करती वो
तुम्हारा शैशव
अपने स्तनों से उड़ेलती अमृत धार
तुम्हारे छोटे से मुँह में
और झाँकती तुम्हारी झपझप करती आँखों में
पढ़ लेती तुम्हारी तुष्टि
तुम्हारी किश्तों में पूरी होती नींद
घटा देती उसकी नींद
घण्टों से मिन्टो में

और आज तुम एक पूर्ण पुरुष हो
अपने पिता की तरह

तुमने निषिद्ध कर दिए है
उसके प्रवेश किन्ही विशिष्ट मन्दिरों में
गर्भगृहों में

उसकी देह एक मन्दिर है
जिसकी अंतर्यात्रा तय करके
बाह्य-जगत में आये हो तुम

जिसके लिए अस्पृश्य घोषित किया उसे
उसी संसर्ग उसी रज उसी रक्त से निर्मित तुम
उसी गर्भगृह में रहे नौ माह
 स्त्री शुचिता की परिभाषा तय करने वाले

जिस मार्ग से आये बाहर
वो अपवित्र ?

उस मन्दिर में जिस दिन हो जायेगा
तुम्हारा प्रवेश वर्जित
रह पायेगी क्या दुनिया
और तुम्हारे बनाये नियम भी?

      आरती तिवारी
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