अमिताभ बच्चन नाम सुनते ही बरबस एक बार तथाकथित महानायक का चित्र उभर आता है । परन्तु हिन्दी जगत में जिस अमिताभ बच्चन का मैं नाम ले रहा हूं वे बिल्कुल ही उस भव्यता और भ्रम के चाम से विछिन्न हैं । वे सतत संघर्षशील मनुष्यता का आवाज़ बन महानायकत्व से मुठभेड़ करते दिखलाई देते हैं । वे न कभी महानायक हुए , और न कभी ऐसी मंशा ही रखें ।
"मुझे दुख है कि मैं महानायक भी नहीं बना"
इस कविता के कथ्य का मूल भाव वस्तुत: इस पंक्ति में ही आकर , नहीं ठहरती । बल्कि यह व्यंजना में कहा गया उक्ति वैचित्र्य है । ऐसा इसलिए भी कि उस तथाकथित महानायकों की चिंता में जो खच्चरपना है , वह बिल्कुल साफ़ दिखाई देता है । जो उत्पादकों के उत्पाद पर अच्छी कीमत लगवा लेता है , ब्रांडिंग बढ़िया करवा लेता है । अपनी ही भावी नस्ल की चिंता में दो - चार होता कभी पलटकर आधी आबादी को जिसने नहीं देखा , उन आधी आबादी का संघर्ष , स्वतांत्र्य बोध , जिसे समझ न आया । ऐसा महानायक किस काम का । जिसके पास आधी आबादी की चिंता काफूर है । उनका संघर्ष और मूल अधिकार सरोकारी नहीं है । निश्चय ही ये इलीट क्लास का पैरोकारी ताकतवर हैं , उतार- चढ़ाव से घबराते नहीं हैं , पीठ पर मैला लादे हिनहिनाते भागते हैं सरपट । परन्तु मनुष्य के जद में शामिल नहीं हैं । अमिताभ बच्चन इन मायनों में सरोकार के कवि ही नहीं महानायक भी कहे जा सकते हैं ।
एक कवि , कलाकार जब संदेह जताते हैं , तो जरूर उनके अंदेशे में सिर्फ आज ही नहीं रहता । बल्कि दीर्घकाल का दृश्य चित्र आकार ले रहा होता है । यानी वह उस दीर्घकालिक सच को देख रहा होता है जो आम जन के जीवन में शनै:शनै: प्रवेश कर ,असमय उनकी कब्रें खोद देता है । कविता में वस्तुत यह यथार्थ के निमित्त उनकी तात्कालिक प्रतिक्रिया रहता है पर भावी पीढ़ी के लिए इतिहास बोध भी होता है । प्रस्तुत है हमारे समय के 'जागरण काल' के कवि अमिताभ बच्चन की कविताएं
01
मुझे ईर्ष्या है महानायकों से
---------------------------------
मुझे ईर्ष्या है महानायकों से
उनकी तरह मैं मजबूत घोड़ा
ताक़तवर खच्चर नहीं बन सका
जो उतार-चढ़ाव से नहीं घबराते
सारा कूड़ा-करकट
पीठ पर लाद हिनहिनाते भागते
सबकी नैया पार लगाते
टूटते सितारों को कन्धा देते
मुझे दुख है मैं महानायक भी नहीं बना ।
02
वे जीने के बारे में सोच रहे हैं
-------------------------------------
वह दूध लेने गया था.
तुमने उसे मार डाला.
वह शादी के बर्तन मांजने आया था.
तुमने उसे मार डाला.
अरसे बाद वह अपने घर आया था.
तुमने उसे मार डाला.
वह प्रार्थना करके बाहर आया था.
तुमने उसे मार डाला.
वह अल्हा अल्हा चिल्ला रहा था
तुमने उसे मार डाला.
वे सुबक रहे हैं मरने वालों को याद कर रहे हैं
मारे जाने का इंतजार नहीं कर रहे हैं
सोच रहे हैं मरने वालों के बगैर जीयेंगे कैसे
हां वे जीने के बारे में ही सोच रहे हैं
और तुम उन्हें मारने के बारे में सोच रहे हो
03
निहा खातून
------------------------------------
एनआरसी और कैब निहा खातून को निश्चय ही
हेस्टिंग्स रोड, निकट बाबा मजार, कोलकाता से
किसी डिटेंशन कैंप में पहुंचा देंगे
वहां से वह कहां ले जाई जाएगी
किसी को नहीं मालूम
वह गुम हो जाएगी
इससे क्या फर्क पड़ेगा
विक्टोरिया मेमोरियल के गेट के बाहर
कुछ रहमदिल इंसानों के आगे-पीछे दौड़ते हुए
वह कुछेक गुलाब की कलियों का ही तो सौदा कर पाती है
मैं भी क्या कर सकता हूं फिलहाल
उसकी एक तस्वीर, एक फूल ले लेने के अलावा
उसके गाल थपथपा देने के अलावा
04
कल जब तुम .....
----------------------------------------
कल जब जामिया विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में घुसकर
बच्चों को तुम बेरहमी से पीट रहे थे
जसीडीह के किसी गांव में पैदा हुआ बनारस में रहने वालाा एक बुजुर्ग कवि
बड़े जोश से कोलकाता में पढ़ रहा था
एक बंगालन लड़की के प्यार में डूबी अपनी बहुत पुरानी कविता
कल जब जामिया विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में घुसकर
बच्चों को तुम बेरहमी से पीट रहे थे
एक मामूली आदमी अपने ही विभाग के एक बड़े अधिकारी से बता रहा था
कि उसके दोनों बड़े बेटों ने दूसरे धर्म की लड़कियों से ब्याह रचा लिया
हम क्या करें साहब
कल जब जामिया विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में घुसकर
बच्चों को तुम बेरहमी से पीट रहे थे
बुलंदशहर का एक आदमी बड़े गर्व से बता रहा था
कि उसे अपनी मराठी बहू की जाति का नहीं पता
और हां, वह जिस बिहारी को ये सब बता रहा था
उसे अपने मराठी दामाद की जाति का पता नहीं था
कल जब जामिया विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में घुसकर
बच्चों को तुम बेरहमी से पीट रहे थे
बंगाल का एक पांचवी पास आदमी जो गेस्ट हाउस का स्वीपर है
और जिसका नाम मेघनाथ सरदार है
बड़ी शान और खिली हुई मुस्कान के साथ बता रहा था
कि हां, वह मेघनाथ साहा को जानता है
वे बहुत बड़े वैज्ञानिक थे
कल जब जामिया विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में घुसकर
बच्चों को तुम बेरहमी से पीट रहे थे
दो धर्मों के दो रसोइये एक साथ
दो दर्जन लोगों के रात के खाने की तैयारी में इस तरह जुटे हुए थे
जैसे देश कुछ नहीं होता, धर्म कुछ नहीं होता
ग्लास और प्लेट को चमकना चाहिए
फलों को काटकर इस तरह परोसा जाना चाहिए
कि आदमी की मरी हुई भूख जाग जाए
No comments:
Post a Comment