प्रतिरोध का सख्त़ मिजाज कम ही मुमकिन हो पाता है । भीतर तक हिला देने की सामर्थ्य से लैस इस कविता को कवयित्री अनुपमा तिवारी ने लिखा है । क्या बानगी है इस कविता की ! कथ्य में जितनी केन्द्रीकता और गंभीरता अपने विषय चयन को लेकर है उतनी ही इस कविता में वैशिष्ट्य शिल्प और जानदार भाषा का प्रवाह भी है । देश की तमाम राजनीतिक सत्ताएं अपने-अपने आईटी सेल चरमपंथियों को बलात् कुछ भी करने का जो साहस और छूट दे चुके हैं , वह ही इस कविता में केन्द्रीय भाव बना है । सवाल यह है कि आखिर ये सत्ताएं इन आईटी सेल और चरमपंथियों की मानसिक विकृतियों के सहारे देश व समाज को क्या देना चाहते हैं ? चिंतनीय है । चीज़ों की सैद्धांतिकी और नैतिकता भी कोई चीज़ है । पक्ष में खड़े हुए तो ठीक , नहीं तो 'रंडी' । सैकड़ों उदाहरण हैं जो इस कविता में दीपिका पादुकोण के परस्पर नामित होते हुए काव्य बिम्ब रूप में आए । यह अशोभनीय है , खेदजनक है कि एक कवयित्री को कहना हो रहा है ' मैं भी रंडी होना चाहती हूं ' चूंकि यह स्वभाविक नहीं है । यह विवशता या कि लाचारी भी नहीं है ,बल्कि परिस्थितियों से मुकाबला की तैयारी है ।जो अनुपमा तिवारी ने कर ली है । भाषा व्यवहार व नैतिक मूल्य के इस 'अवसान काल' को दर्ज कराती अनुपमा तिवारी की इस कविता से मैं हिल सा गया हूं । बहुत दुखी हूं और निराश भी 'विश्व गुरु' बनने , बनाने के सपनों का इस इस देश इस परिणित अवस्था में है कि एक लड़की जेएनयू जाकर खड़ी क्या हो जाती है उसे 'रंडी' कह कर ट्रोल किया जाता है उसका बहिष्कार किया जाता है । निस्संदेह इन दिनों देश संक्रमण से गुजर रहा , देश में प्रतिरोध का स्वर ऊंचा हुआ है , देश को खतरा का भान हुआ है ।'अपने लोग' अपने ही लोगों का देशद्रोही कह लींचिंग का प्रयास कर रहे हैं । देश को असल खतरा वस्तुत इनसे है । जो थेथर और चोंचल चातुर्य से देश को भरमाने में अपनी पूरी ऊर्जा झोंक रहे हैं । हालांकि इन तथाकथित राष्ट्रवादी नौजवानों के तानों को बेअसर बनाती अनुपमा तिवारी यही नहीं ठहरती वे आगे जातीं हैं और कहती हैं
"अब रंडी गिरा हुआ शब्द नहीं है
क्षोभ और गर्व से मिश्रित शब्द है"
उनसे इस वक्तव्य के लिए असहमति जताते हुए सहमत हूं इन मायनों में कि
''समय के साथ शब्दों के अर्थ बदलते जाते हैं ''
उन्हें जो लगा , वस्तुत वह सही भी है चूंकि अपने विचारों , सम्मानों , स्वतांत्र्य बोध की बलि चढ़ा कर केवल जलील होना है । जिल्लत ज़लालत से बेहतर है है कि जुटें , कुछ तगड़ा करें , कहें और मन से कहें
आभार , अनुपमा तिवारी
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रंडी
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कल से दीपिका पादेकोण को रंडी लिखा पढ़ रही हूँ
तस्लीमा, घोषित रंडी है
नीलिमा चौहान, उभरती रंडी है
मैं भी रंडी होना चाहती हूँ.
अब रंडी गिरा हुआ शब्द नहीं
क्षोभ और गर्व से मिश्रित शब्द है
समय के साथ शब्दों के अर्थ बदलते जाते हैं
मुझे लगता है
इस देश और दुनिया को अब देवियों की नहीं,
रंडियों की ज़रुरत है
मेरी कामना है
कि इन जैसी इस दुनिया में तमाम रंडियां जन्म लें !
~ Anupama Tiwari
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