कबीर में लोक मंगल की कामना , दिवा स्मृतियों की कोमलता के बनिस्बत ठस्स यथार्थ का एक ऐसा कड़वा अनुभव है कि धर्म सत्ता के जागीरी करने वाले ठेकेदारों को वे अपचनीय हो गए । कबीर के यहां तुलसी के जैसे वातानूकूलित सुविधा नही थी । वे धूप थे , बरसात थे , और कड़ाके की ठंड भी ।
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