Indra Rathore के यौनिकता सम्बन्धी एक पोस्ट पर दी गयी टिप्पणी कुछ इस तरह है-
ये खाए पिए अघाए हुए लोग हैं जिन्हें जन की व्यथा न दिखाई देकर योनि और गुदा दिखाई दे रहा है| रीतिकाल का विरोध क्यों किया जाता है? क्यों आदिकालीन साहित्य को जनता का साहित्य नहीं कहा जाता? यह उनसे पूछिए जो अश्लीलता को उचित ठहरा रहे हैं| खाली दिमाग ऐय्यास होता है| सम्पन्न कवि सुरा और सुंदरी खोजता है| अशोक वाजपेयी, शुभम श्री, मोनिका कुमार, अम्बर पाण्डेय जैसे कवियों के समय और भी कवि हैं जिनके यहाँ नंगई नहीं है| मैथुन और थ्रीसम जैसी परिकल्पना नहीं है| इसलिए नहीं कि वे भारतीय कला और शास्त्र से परिचित नहीं हैं, इसलिए कि उन्हें जन-जीवन का चित्रण करने उनकी यथा-व्यथा को अभिव्यक्ति करने से ही फुर्सत नहीं है|
रीतिकाल के कवि जहाँ दरबारी ऐय्यासी की उपज थे वहीं इस काल के अधिकांश ऐसे कवि पोर्न मोवीज के उपज हैं| यह कार्य महज कविताओं में नहीं है| कहानी में इससे भी अधिक दुर्दशा है| गीताश्री जैसी कथाकार फेसबुक पर चैट करते करते स्त्री पात्र से पुरुष पात्र को सम्भोगरत दिखाती हैं, ऐसा रसात्मक वर्णन करती हैं कि पूछिए मत, यह मामूली बात नहीं है| साहित्यकार अपने जीवन के संचित अनुभवों से ही विषयों को विस्तार देता है| उचित हो कि व्यक्तिगत कुंठाओं को परोसने की अपेक्षा कुछ सामाजिक हित की बात की जाए|
हो सकता है कि कुछ लोग खजुराहो आदि को उचित ठहराएं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कला और साहित्य में अंतर है| इस प्रकार के साहित्य को हिंदी साहित्य में लुगदी साहित्य कहा जाता है| सरस सालिस, मनोहर कहानियां, आदि पत्रिकाएँ यहीं सब कर रही हैं| वे भी करें कौन रोक रहा है लेकिन गम्भीर साहित्य की परिधि से उन्हें दूर ही रखा जाए|
फ़िल्में बन रही हैं कुछ पारिवरिक बन रही हैं, कुछ सामाजिक बन रहीं हैं| कुछ केवल बालिगों के लिए बन रहीं हैं| वहीं कुछ ऐसे भी कलाकार हैं जो पोर्न मूवीज बना रहे हैं| पोर्न बना रहे हैं उन्हें समाज में दिखाना अनुचित माना गया है| तो ऐसे लोगों का विधिवत बहिष्कार किया जाए| चर्चा ही न किया जाए| मैं तो यही समझता हूँ|
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