Tuesday, August 11, 2020

सुरेश सेन निशांत

समकालीन हिन्दी कविता के नवें दशक के उत्तरार्ध से बेहद सक्रिय साथी , और विजेन्द्र जी के परम्परा को आत्मसात करते लोकधर्मी कवि सुरेश सेन निशांत आज 59 के हो गए । समकालीन हिन्दी कविता के अपने समीचीनो में वे एक बिल्कुल अलग काव्य मुहावरो के लिए पहचाने गए । किसानी संवेदना उनकी कविता का आधारभूत मौलिक ढांचा है । जन की बात और मन की बात ही उनकी कविताओं में आकार लेता है । एक ओर निरीह और कातर संवेदना के कवि आत्मप्रवंचना में डूबे इतरा रहे हैं वही सुरेश सेन निशांत बाहरी शोरगुल और लब्बोलुआब के झांसे से परे बेसिकली कवि और कविता का जीवन जीते प्रचार की दुनिया से किनारा किए आगे बढ़ रहे हैं । साथी का आज जन्मदिन है उन्हें ढेरों बधाई व शुभकामनाएं

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( सुरेश सेन निशांत पर मेरे एक पोस्ट को फिर लगा रहा हूं )

हिन्दी में लोक स्वर कुछ मौका परस्त पाखंडियों के हाथों कैद होती दिखी । पर प्रतिरोधी स्वरों ने अपनी पुरजोर कोशिशों से लगभग इसे बचा ही लिया । यह सुखद बात है कि दिल्ली के निष्फल कवि , आलोचक इसमें असफल हुए और मुख्यधारा की कविता अपनी जीवटता  में जीती रही । वैश्विक साहित्य के पन्नो में उकेरे जितने भी लोकधर्मी कवि हुए हैं उनमें से -- अमरीकन कवि वाल्ट ह्विटमैन , जर्मन कवि बर्टोल्ट ब्रेख्त , रसियन कवि मायकोवस्की ,अर्जेन्टीनियाई पाब्लो नेरूदा , स्पेनिश कवि फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का तथा टर्की के नाज़िम हिकमत ,की बात करें तो ठीक उन्हीं के परस्पर हिन्दी कविता में भी एक विशाल लोकधर्मी कवियों की परंपरा रही है जो छायावाद के घोर रूदन और प्रलाप को ध्वस्त कर आए आधुनिक हिन्दी कविता के कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' से प्रारंभ होकर केदार , नागार्जुन , त्रिलोचन , शमशेर से होते हुए विजेन्द्र तक की परंपरा के रूप में ख्याति अर्जित करता दिखता है । यह संयोग है कि इनका लोक दिल्ली की तरह न वायावी ही हुआ और न बातूनी ही । यहां तक इनका प्रतिरोध भी बनिस्बत इनके ; अपने कार्यव्यवहार से मानवीय संवेदना को , जीवन व मूल्यों को संरक्षित करता है ।  यानी यह आदमी और उसकी आदमियत को जिंदा रख पाने की एक बड़ी कोशिश के रूप में सार्थक उपस्थित दर्ज कराती है । कहना न होगा इस परंपरा को पोषित करने वाले कवियों के यहां मार-धाड़ , छल-प्रपंच से भरा विद्रोह कम ; बल्कि ये कवि असीम विश्वास से लबालब भर लौटते रहे जीवन की संभावनाओं का पता लगाते खेत- खलिहान , गंवई -गांव , मिल -मजूरो के संग । ये कवि पार करते रहे तमाम और बमुश्किल अवरोधों को । हिन्दी कविता का लोकधर्म मुझे दो तरह का दिखलाई पड़ता है । एक वे हैं जो प्रतिरोध की आग को हवा दे रहे हैं और दूसरे वे हैं जो संवेदनागत हैं । इन दूसरे तरह के कवियो के साथ मैं उतना ही खड़ा हो पाता हूं जितना कि पहले तरह के कवियों के साथ होता हूं । बल्कि मैं तो कहना चाहूंगा कि मुझे कविता में यह दूसरे तरह का लोकधर्म कहीं ज्यादा उत्प्रेरित करते हैं , प्रभावित करते हैं । लोकधर्मी कवियों की इस परंपरा को कुछ महत्वपूर्ण नामों में मैं निराला , केदार , नागार्जुन , त्रिलोचन , शमशेर तथा विजेन्द्र के अलावा उस परम्परा के कवियों में सुरेश सेन निशांत का नाम इसलिए जोड़ना चाहूंगा कि मैं देख रहा हूं एक तेज़ प्रतिरोधी है तो दूसरा अपने यथार्थ के असमान्य दबावों , संकटों से जूझ लेने का दुस्साहस भरा साहसी । यह कोई कम बात नहीं है । ये वो कवि हैं तथा इनकी ख़सियत यह रही कि ये अपने समय के संकटों उसकी जटिलताओं तथा यथार्थ को यथावत् और सदृश रख प्रश्नाकुल हो स्पेस का रचाव कर रहे होते हैं । समकालीन हिन्दी कविता में सुरेश सेन निशांत का सरोकार यही से बिम्बित होता है । 

 गेहूं
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गेहूं उगेगी 
तो लौटेगी 
पिता के गुतो मे लय
मां की आवाज़ में रस
भाई के चेहरे पर खुशी
गेहूं उगेगी  तो

हिन्दी की समकालीन कविता में ऐसा पारदर्शी विश्वास शायद ही ,और कहीं - कहीं है । यह कहते मुझे तनिक संकोच नहीं है । सुरेश सेन निशांत में जो संवेदनशीलता है वह विरल और अधिक यथार्थवादी है । उनमें जो उत्साह है अथवा भरोसा है वह अवश्यंभावी है । एक किसान अथवा उनका परिवार और उनकी निर्भरता उनके द्वारा ऊपजाये जाने वाले फसल पर ही सन्निहित है । कहना न होगा देश के सकल घरेलू उत्पाद में एक बड़ा हिस्सा उनका है । पर आंकड़ों के इस देश में सबसे बड़ा शक्तिशाली होकर भी वह निरीह- सा है । सबसे अधिक संकटग्रस्त वही है । सबसे अधिक आत्महत्या वही कर रहा है । और तथाकथित जनतांत्रिक सरकारें इस दशा पर निस्पृह हैं । यह कहना लाजिमी होगा कि सरकारें मरी हुई हैं । पर सुरेश सेन निशांत यहां शोर शराबे कर रहे हैं न छाती पीट रहे हैं बल्कि वे विश्वास से भर- उठ कहते हैं

गेहूं जब अंगुल भर चढ़ेगी
तो पिता को याद आयेगे
पुरखो से सुने हूए गीत
वह उन्हें गुनगुनायेंगे 
मां को बादलो और सूरज में
दिखेगा ईश्वर
वह उन्हें पूजेगी
भाई का अपने श्रम पर
बढ़ेगा विश्वास
वह देर तक खडा रहेगा
मुंडेरो पर उनकी चौकीदारी करता  हुआ
गेहूं जब अंगुल भर बढ़ेगी

 सुरेश सेन की इस कविता में न कोई चमत्कृत फैंटेसी है और न कृत्रिमता । बस केवल एक कृषक परिवार का यथार्थ है । न कोई लब्बो-लुआब छल है न कोई ढकोसला है । है तो सिर्फ एक अपरिमित सत्य । एक ऐसा सत्य जो झकझोरता है , हिलोरता है । मानवीय संभावनाओ को ग्राह्य बनाता है । सुरेश के यहां सब कुछ मानव के सहज वृत्तियों का प्रतिफल है । उनके यहां मां को बहिन का कद बुरा नहीं लगेगा , कि पिता लेनदारो के सामने तनकर तभी खड़ा हो पाएगें , कि भाई के लाठी में ताकत तभी आ पाएगी जब

गेहूं की बालियो में 
भरने लगेगा जब रस
बहिन का बढ़ता कद
बुरा नहीं लगेगा  मां को
तन कर खडे हो जायेंगे 
पिता लेनदारो के सामने
भाई की लाठी में
लौट आएगी ताकत
गेहूं की बालियो में
भरने लगेगा रस

सुरेश के यहां सामूहिक हौसलाई है  । एक-दूसरे में आबद्ध  । और वही उनका ताकत भी है । कि सुरेश कहते हैं --

गेहूं के बीजो तुम सभी उगना 
एक दूसरे को हौसला देते हुऐ
गेहूं के पौधो 
बेधड़क बढना हर दिन अंगुल भर तुम
हंसना खूब
पहरेदारी मे खडा मिलेगा तुम्हे भाई
पुरखो के गीतो को
लोरी की तरह गुनगुनाते हुए
गुज़रेंगे तुम्हारे सामने से पिता
मां तुम्हारी ही कुशलता के लिए 
मांगेगी दुआ
गेहूं की बालियां
खूब लहराना तुम
अपने ही भार से इस तरह झुकना
कि लेनदार खिसियाते गुजरे
हमारे ऑगन के पास से 

सुरेश सेन पर यदि विजेद्र जी लिखते हैं निशान्त हमारे समय के महत्वपूर्ण लोक धर्मी कवि है । हिन्दी के समीक्षको का उधर ध्यान जाना जरूरी है । तो असहमति का तो प्रश्न ही नहीं उठता ।  

बढ़िए , सुरेश सेन निशांत
9098649505

( कवि सुरेश सेन निशान्त की कविता )
 
गेहूं
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गेहूं उगेगी 
तो लौटेगी 
पिता के गुतो में लय
मां की आवाज़ में रस
भाई के चेहरे पर खुशी
गेहूं उगेगी तो

गेहूं जब अंगुल भर चढ़ेगी
तो पिता को याद आयेंगे
पुरखो से सुने हूए गीत
वह उन्हें गुनगुनायेंगे 
मां को बादलों और सूरज में
दिखेगा ईश्वर
वह उन्हें पूजेगी
भाई का अपने श्रम पर
बढ़ेगा विश्वास
वह देर तक खड़ा रहेगा
मुंडेरो पर उनकी चौकीदारी करता हुआ
गेहूं जब अंगुल भर बढ़ेगी

गेहूं की बालियो में 
भरने लगेगा जब रस
बहिन का बढ़ता कद
बुरा नही लगेगा मां को
तन कर खडे हो जायेंगे 
पिता लेनदारो के सामने
भाई की लाठी में
लौट आएगी ताकत
गेहूं की बालियो में
भरने लगेगा रस

गेहूं के बीजो तुम सभी उगना 
एक दूसरे को हौसला देते हुऐ
गेहूं के पौधों 
बेधड़क बढना हर दिन अंगुल भर तुम
हंसना खूब
पहरेदारी मे खड़ा मिलेगा तुम्हे भाई
पुरखो के गीतो को
लोरी की तरह गुनगुनाते हुए
गुजरेगे तुम्हारे सामने से पिता
मां तुम्हारी ही कुशलता के लिए 
मांगेगी दुआ
गेहूं की बालियां
खूब लहराना तुम
अपने ही भार से इस तरह झुकना
कि लेनदार खिसियाते गुजरे
हमारे ऑगन के पास से
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निशान्त हमारे समय के व नवें दशक के उत्तरार्ध के महत्वपूर्ण लोकधर्मी कवि हैं । यह कविता उनके कविता संग्रह 'कुछ थे जो कवि थे' से है । 

सौजन्य व आभार विजेन्द्र जी

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