यह खालिस डर नहीं है
किसी पागल के तन पर अटका
पैबन्दों से भरा चीथड़ा
संगीन की नोक पर
हवा में ध्वज की तरह लहराएगा
उसके हाथ की रोटी
उसमे चक्र की तरह स्थापित हो जाएगी
फूल नहीं बरसेंगे आसमान से
रक्त की एक धार निकलेगी
खून के छींटे बिगाड़ देंगे
कुछ चेहरों का मेकअप
झोपड़ियाँ चिता बन जाएँगी
उनसे निकलता धुआँ
जेट के धुएँ की तरह
दिखाया जायेगा आसमान में
झूठ से लबालब भरे दिलों में
बेमौत मरनेवालों के लिये
दो शब्द भी नहीं होंगे सांत्वना के
हद तो तब होगी
जब चीख से हिलते होंठों की
फिल्म उतारी जायेगी
उन्हें डब किया जायेगा
किसी दूसरी भाषा में
जैसे आप गा रहे हों
सारे जहाँ से अच्छा
देश यह हमारा ।
शरद कोकास
(कविता : "हद तो तब होगी" । कविता संकलन 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' से )
हमसे तो बेहतर हैं रंग संग्रह को प्रकाशित हुए काफी दिन हो गए हैं । तब समय यह नहीं था जो अब है । संभवतः आहट मात्र थी चीज़ो के उत्पाद में बदलने और उस तकनीक के ईजाद की । बाज़ार पांव पसार रहा था । लेकिन शरद चौकन्ने थे , पहचान रहे थे वीभत्स आज का---
हद तो तब होगी
जब चीख से हिलते होंठों की
फिल्म उतारी जायेगी
उन्हें डब किया जायेगा
किसी दूसरी भाषा में
जैसे आप गा रहे हों
सारे जहाँ से अच्छा
देश यह हमारा ।
शरद की रचना प्रक्रिया में ख़ासी मशक्कत है । थोड़ी कठिनाई है । पर भाषा- शिल्प और उसके लय से वे पूरी कविता कोऔहैं अंत तक । शरद छ ग से संबद्ध नवें दशक के एक महत्वपूर्णं कवि हैं । वे छग की पावन माटी में रचे बसे हैं । उनका इतिहास बोध का कोई सानी नहीं है । जो उनके आगे के संग्रह 'पुरातत्ववेतता' के अध्ययन से पता लगाया जा सकता है । छग की समकालीन हिन्दी कविता में नासिर अहमद सिकंदर , आलोक श्रीवास्तव ,और विजय सिंह के समानांतर उन्होंनें बड़ी महत्वपूर्ण़ साझेदारी की है । वे सतत चिंतनशील तथा सृजनरत हैं ।
No comments:
Post a Comment