यह कहना कतई असंगत नहीं होगा कि 'लहक' संपादक के तौर पर निर्भय देव्यांश ने हिंदी साहित्य के मठ परम्परा पर बड़ी चोट की है । तथाकथित साहित्यिक सत्ताएं , संस्थाएं उनके वार से तिलमिला गए और किन्हीं मायनों में भयभीत भी हुए । वे निरंतर हिंदी के अनेकों अनछुए पहलुओं पर अपनी बेबाकी के लिए स्पष्ट रूप से पहचाने गए । अपने संपादन में उन्होंने हिंदी जगत को 'दिल्ली दरबार' हिंदी कविता में आई यौनिकता , और छायावाद के पुनर्पाठ से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण और जरूरी अंक दिए हैं जो कि अविस्मरणीय है । इस विद्रोही तेवर के साथी का आज जन्मदिन है उन्हें मेरी ढेरों बधाई व शुभकामनाएं साथी ही उनकी एक बहुत ही महत्वपूर्ण कविता और मेरी एक पुरानी टिप्पणी---
फकीराना और सूफियाना शायरी का ये कवि पता नहीं कब फकीर हो गए । पर बेसिकली हैं तो निर्भय ही । बिना लाग-लपेट के सीधे सीधे और खरी खरी कहना जैसे इनका क्रिया व्यवहार और नीयति । लहक संपादक के तौर पर कि फकीर के रूप में निर्भय लगातार सवाली और मुद्दई ही होते दिख रहे हैं । नब्बे के दशक के इस निडर कवि की चिंता में बस डर है तो रोटी और उसे डकारे जाने वाले निस्पृह हरामियों के लूट तथा उन मजलूमों , वंचितों के अधिकारो की जिन्हें निरंतर अपदस्थ किया गया और किया जा रहा है । रोटी और राजनीतिक चेतना का सवाल निश्चय ही वैश्विक सवाल था और समूचे राष्ट्र इससे दो दो हाथ कर भी रहे थे। भारत के परिप्रेक्ष्य में कहें तो छायावाद के चरम रोमानियत और असंपृक्त जीवन बोध के इतर रोटी और राजनीतिक चेतना के सवाल को जहां निराला,नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल , त्रिलोचन , शमशेर ने बड़ा बुनियादी और जरूरी बनाया वही बाद की पीढ़ी में धूमिल , सर्वेश्वरदयाल सक्सेना , रघुवीर सहाय , गोरख पांडेय सरीखे कवियों ने इसे केन्द्रीयता प्रदान की। वर्चुवल यानी आभासी सच और रीयल अर्थात वास्तविक सच के भेद की पहचान कराती निर्भय देव्यांश की इस कविता में जितना बहिर्गमन है उतना ही अन्तर्गमन है । हिंदी कविता में साठ का दशक तीव्र प्रतिरोध का रहा । भाषाई आक्रामकता चीज़ों को लांघ रही थी । संयम और धैर्य बेकाबू हो चला था । नेस्तनाबूत करने लालायित दिख रहा था । हाहाकार और कोहराम मचा था । बुद्धि और विवेक सम्पन्नता के अभाव में वह निरीह जनता से भी निरीह ही ; हो चला । यानी ; एक भयंकर और आक्रांत के दौर में भी हमें कुछ भी हासिल न हुआ और बेसिक सवाल, सवाल ही रह गया । ऐसे में निर्भय की यह कविता उन सीमाओं के अतिक्रमण की कविता बनती दिख रही है । एक सटीक विवेक और बुद्धि कौशल का परिचय देती दिख रही है । निर्भय इस कविता में बेहद संयमित और सजग रुप में प्रस्तुत होते हैं । वे रोटी की बुनियादी जरूरतों को एक तरफ़ रखते हैं तो दूसरी तरफ़ वाल्टेयर , रुसो जैसे दार्शनिक और राजनीति में भूचाल पैदा करने वाले तत्तकालीन दर्शन विज्ञान को ।
वे कहते हैं ---
दम है तो जनता को
दर्शन खिला कर रखो
तो हम कहेंगे
तुम्हारा लोकतंत्र जिंदा है
वस्तुत: भूख की पहली जरूरत रोटी है । न दर्शन , न नारे , न वादे । फ्रांस और भारत की भाव - भूमि इन मायनों में एक- सी ही रही । दोनों ने अपने राजनीतिक इतिहास में औपनिवेशिकता और संघर्ष का एक बड़ा दौर देखा तब कहीं वह कुछ हासिल कर सका । पर जिस गति से राजनीति ने जनता का जैसा माखौल उड़ाया उससे मोहभंग ज़्यादा आसान और स्वभाविक हुआ । फिर भी निर्भय ने यहां उग्र शोर - शराबे , अथवा गरियाने - कोसने से कहीं ज़्यादा कहने , सुनने और सुनाने शालीन तरीके पर यकीन किए । वे मेक्रोन के प्रतिकात्मक दृश्य बिम्ब के मार्फत के देश के 10लाखी कोट और उसमें समाए खोट को उजागर कर बताते हैं कि इससे देश अथवा जनता का कुछ भी भला नहीं होने वाला । वे कहते हैं --
मेक्रोन कोट पहनो
मगर उसके अंदर की जेब में
रोटी रखो, पानी की बोतल
टॉफी भी
तुम्हारे देश के तानाशाह नेपोलियन को
टॉफी बहुत पसंद थी
आत्म प्रचार और प्रवंचनाओ से लैस वर्तमान राजनीति अर्थात् तंत्र में लोक की संभावना क्षींण होती जा रही है। वह न्यूनतम के सूचकांक पर है । राजतंत्र की पैरोडी पर है । गाहे-बगाहे अभिशप्त लोक अनचाहा ही उसे स्वीकार रहा है । उनके उड़ाए माखौल और अपनी बेबसी पर खुलकर न रो सका न बोल सका । असहमति विद्रोह नहीं होता । करार दिया जाता है । एक्सट्रीम नेशनलिज्म के हाथों खत्म कर दी जाती है । निर्भय बखूबी यह देख, समझ रहे हैं इसीलिए ही वे कड़ा प्रतिरोध कर कहते हैं
महल में लोकतंत्र रखने से काम नहीं चलेगा मेक्रोन
यह सड़क की चीज है
देखो कि सड़क के लोग कैसे हैं
कैसे जी रहे हैं
क्या खा रहे हैं
निर्भय की यह कविता जहां असहमति की ऊपज है वहीं भय और आशंका के बीच व्यापक वैश्विक जद्दोजहद है । जो दारुण मानव मूल्य व सभ्यता के प्रति हमें सचेत भी करती है
दुनिया के हर कोने में सातों दिन काम पर डटे हैं
शनिवार को
फ्रांस जल रहा था
रविवार को कोई और जलेगा
आभार , निर्भय देव्यांश
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