भाषाई अस्मिता के सवाल हो कि उसके अतिक्रमण का , कृष्ण कल्पित चूके नहीं । वे व्यवहारिक अतिक्रमण करने में भी कमतर नहीं दिखे । है तो है और नहीं तो नहीं , यह माद्दा उनमें है । कथनी और करनी में भेद बिल्कुल भी नहीं दिखता । यह दीगर है कि कृष्ण कल्पित कभी-कभी अनचाहे विवादों को जन्मते रहे , पर सैद्धांतिकी में उन्हें कमतर कर नहीं देखा जा सकता । हिंदी साहित्य में दिल्ली दरबार हमेशा से ही अपने मठाधीशी ताकत और शौर्य के लिए जाना जाता रहा । किसी ने मुंह बाए करने की कोशिश अथवा हिमाकत नहीं ही करी ; बल्कि उनका पिठ्ठू बनने में ही भला माना । पर इस विछिन्न कड़ी को विराम लगाने में गणेश पाण्डेय , उमाशंकर सिंह परमार, अजित प्रियदर्शी , कर्ण सिंह चौहान , धनंजय वर्मा , नीलकांत , अनिल पांडेय , लहक संपादक निर्भय देव्यांश तथा कृष्ण कल्पित , जैसे साथियों ने उल्लेखनीय भागीदारी सुनिश्चित कर जता दिया कि हिंदी को दिल्ली आधारित दोगलाई की जरूरत नहीं है । यहां प्रस्तुत कृष्ण कल्पित की कविता इस विचार का ही एक बानगी है , एक समग्र संस्करण है । कृष्ण कल्पित अपनी इस कविता में दिल्ली स्थित साहित्य मंडी को लेकर बेहद तीखे तेवर के साथ मुखर विद्रोह को रचने में कामयाब हुए हैं । वे दिल्ली स्थित कारखानों के घटिया उत्पाद , मिलावट , फिर मुनाफाखोरी को लेकर जितना सख्त हैं उतना ही स्त्री को उत्पाद के रुप में बदलने की कला कौशल में निपुण लोगों के प्रति अतिरिक्त सचेत भी हैं ।
'सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूठ की कोई इंतहा नहीं'
नूर ने ठीक ही कहा ।
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