Saturday, November 21, 2020
शमशेर की कविता
दिन ब दिन विषाक्त होता जा रहा है समय , जैसे दस्तूर है यह । रोज उगला जाने वाला जहर ही जैसे नीयती है हमारी । मनुष्य अपने स्वभाविक वृत्तियों को तिलांजलि किसके बहकावे में दे रहा है आखिर ? तहज़ीब भी तो कोई चीज़ है हमारे होने की ; हमारे समय के मान्य कवि शमशेर बहादुर सिंह की कविता में यही आग्रह है । इन्हीं विडंबनाओं के प्रति तार्किक नजरिया है । देश में जो कुछ घट बढ़ रहा है वह कम चिंताजनक नहीं है कि खुले में शौच करने के अपराध में तथाकथित देवदूत सजा के तौर पर हत्या को जायज़ ठहराएं कि मुस्लिम शिक्षक के संस्कृति ज्ञान ,भाषा विज्ञान पर संदेह जताएं और उसका बहिष्कार करें । मैं इसे अपने समय के सबसे शर्मनाक दौर के रूप में देखता हूं । अपने इस प्यारे देश की तहज़ीब में काला इतिहास के रूप में देख देख रहा हूं । जो शमशेर बहादुर सिंह बहुत पहले ही महसूस किए
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