Monday, December 7, 2020
त्युंसदे
तेनजिंन त्सुंदे की यह कविता छद्म व कृत्रिमता के आवरण से मुक्त व निरपेक्ष तथा उस स्वीकारोक्ति से संबद्ध है जिसमें एक अजन्मे देश की नासूर टींस व पीड़ा है । तथाकथित संयुक्त राष्ट्र संघ, मानव अधिकार संगठन के होते एक काली निरीह इतिहास है । खानाबदोश व दिन ब दिन पलायन के दंश को अपने भीतर समेटे लोगों की मनोदशा है । त्सुंदे उन्हीं संभावनाओं ,उन्हीं अनुष्ठानों, उन्हीं प्रक्रियागत वस्तुनिष्ठता का स्मरण अपने थके हुए पांवों से कर रहे हैं; तो निश्चय ही उनके इस ठहराव में वह स्पेस है जिसका कि भरा जाना है । वे यह क्यों और किस लिए कर रहा है का साइक्लिंग कौतूहल रच दोगले और पिछलग्गू वैश्विक समूह का खबर लेते हैं । राष्ट्र आदमी का पहचान है और राष्ट्रीयता उसका धर्म । हिन्दुस्तान के संदर्भ में भी यह इसी तरह का है । पर तथाकथित राष्ट्रवाद के झंडाबरो ने इसकी अलग ही व्याख्या कर इसके रूप को ढाँचागत अपने फ्रेंम में मढ़ने कोई कसर नही छोड़ा है । राष्ट्रवाद का ऐसा वीभत्स व विकृत रूप आजादी के बाद पहली मर्तबा दिख रहा है। तेनजिंग जहां अपने राष्ट्रीय पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं वही हम अपने सांस्कृतिक पहचान व उसके संघर्ष के निमित्त भगवा आतंकवाद का लगातार मुकाबला कर रहे है दोनो ही संघर्ष इन अर्थो में समरूप होते हैं कि वे मानवीयता को अर्थवान बनाते हैं । त्सुंदे अपनी इस कविता में थकने की बात भले कह गए हों पर वे थके कहां हैं ? विचार और संघर्ष कभी खत्म नहीं होते, वह कभी नहीं थकता, वह सतत प्रक्रियाधीन है ।वह चरम के खिलाफ है, अनवरत है । त्सुंदे की इस कविता का एक बड़ा पक्ष जो मै देख रहा हूँ वह यह कि ,वे बजाय स्वप्न जीवी के स्वप्नदर्शी हुए । (क्रमश: )
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