दुष्यंत कुमार हिंदी गज़ल के वे गज़लगो हैं जिन्होंने उर्दू शायरी को उसके पारंपरिक रोमैंटिज्म से मुक्त करा जन पक्षीय चेतना से जोड़ा । आज उर्दू अथवा हिंदी गज़ल का जो रूप हमारे सामने है वह दुष्यंत कुमार जैसे गज़लगो की वजह से है । ऐसा नहीं है कि दुष्यंत कुमार को विरोध का सामना न करना पड़ा , परन्तु आज वे खुद एक आधुनिक ग़ज़ल में परम्परा हैं । दुष्यंत कुमार अपनी ग़ज़लों में तत्काल का जिस तरह से अतिक्रमण किए हैं वह आज के परिप्रेक्ष्य में कितना सटीक है कि कहना हो रहा है ---
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
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