Tuesday, March 30, 2021

कमलेश्वर साहू

आखिरकार कमलेश्वर साहू के पांचवें संग्रह 'कारीगर के हाथ सोने के नहीं होते' पर लिखना संभव हो ही गया । जो कि अंतिका प्रकाशन गाजियाबाद से प्रकाशित हुई है । कमलेश्वर साहू के इस संग्रह पर मेरी ख़ास अभिरूचि इसलिए भी थी कि मैं इसके माध्यम से बस्तर को उसके ठीक ठीक संदर्भों में जान सकूं । कमलेश्वर साहू अंतिम दशक के कवि हैं । यह उनके 'यदि लिखने को कहा जाए' कविता संग्रह 2003 , 'पानी का पता पूछ रही मछ्ली' 2009 , 'किताब से निकल कर प्रेम कहानी' कविता संग्रह' 2011 , व 'पके हुए फल का स्वाद' 2012 , के बाद पांचवां संग्रह है । विगत चार संग्रह के बाद कमलेश्वर साहू इस संग्रह में भी एक बार पुनः अपने वही तेज़ और ओज के अनुरूप नमूदार हुए हैं । कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वे अपनी धार को और भी ज्यादा प्रभावी , प्रबल और तेज़ कर पाए हैं । समकालीन हिंदी कविता का यह कवि चूंकि काफी लंबे अरसे से बस्तर में रह रहा है और निरंतर रचनाशील है तो उनके इस संग्रह पर यह उम्मीद अधिक बलवती रही कि बस्तर तो आएगा ही आएगा ; और अपनी व्यापकता में आएगा । बस्तर का जीवन , संघर्ष , जिजीविषा , तजुर्बा और अनुभव की व्यापकता , उससे उनकी तादात्म्य , संबंधों की तल्लीनता इस संग्रह में स्वभाविक रूप से उपस्थित होने की अनिवार्यता थी । जो इस संग्रह में मौजूद ही नहीं , उनकी संपूर्ण कवित्व की गवाही बन आई है । यह कमलेश्वर की काव्यात्मक प्रोन्नति है । समकालीन हिंदी कविता में बस्तर पर चंद्रकांत देवताले , लक्ष्मीनारायण पयोधि , मांझी अनंत , त्रिजुगी कौशिक , विजय सिंह , शाकिर अली , पूर्णचंद्र रथ , किशनलाल सरीखे अनेक साथियों ने अच्छी कविताएं लिखी , निश्चय ही 'अच्छी' कविताएं इसलिए कहूंगा कि वे 'अच्छी' थी । पर उन कविताओं ने वह प्रभाव नहीं छोड़ पाया जो कमलेश्वर ने छोड़ा है । उन रचनाओं की अपनी सीमाएं रही , अधिकांश उन रचनाओं में कल था । कल का बस्तर था । कह सकते हैं कि कल का 'पुरा' अनुभव और वैभव था । पर आज का बस्तर कहीं न कहीं छूट गया था , जो मुझे अभी कमलेश्वर के यहां दिखाई दे रहा है । हालांकि बस्तर पर बड़ा कार्य करने वाले लाला जगदलपुरी ,अदम गोंडवी , हरिहर वैष्णव भी हैं पर वे भी अपनी सीमाओं और समयकाल के चलते हमें वह नहीं दे पाए जो कमलेश्वर ने अपनी इस संग्रह की कविताओं के माध्यम से दिया । ताज्जुब होता है कि बस्तर में बैठे तत्कालीन राजनेताओं , समाज शास्त्रियों व अनुसंधानियों की समझ पर कि वे सघन विश्लेषण से वंचित कैसे रहे ? जबकि आज का बस्तर सच मायनों में जल रहा है , बारुद के ढेर में तब्दील हो चुका है । बताना न होगा कि कमलेश्वर के आंखों देखी सच को बहुत पहले वारियर एल्विन , और बाद में हिमांशु कुमार , संजय पराते , कनक तिवारी जैसे रचनाकारों ने काफी हद तक अपनी रचनाओं में , लेखों में पुष्टि की है ।
              तो मैंने कमलेश्वर साहू की प्रतिरोधी बातों से अपनी बात प्रारंभ की । यह कवि अपने पहली ही कविता 'लिखा जाना चाहिए में क्या कह रहे हैं बानगी देखिए

'यदि नदी में पानी लिखा जाना चाहिए
तो चट्टान में खनिज
पेड़ में पंछी
'और' फसल में किसान लिखा जाना चाहिए ।

कमलेश्वर में राइट टू रिकॉल का सैद्धांतिकी है । चीज़ों की पहचान है । और चीज़ों के पहचान में देशीपना है । वे बजाय लाग-लपट के सपाट कहते हैं

'यदि लिखा जाना चाहिए उपरोक्त
तो कुछ लोगों की नीयत पर
'शक' लिखा जाना चाहिए
लिखा जाना चाहिए
बिचौलिए , व्यापारी , उद्योगपति राजनेता
और अंत में लिखा जाना चाहिए 'सांठ-गांठ'

कमलेश्वर इस कविता में यही नहीं ठहरते , वे मानते हैं कि दुनिया कहीं समाप्त नहीं होती । और दुनिया जब समाप्त नहीं होती तो वे कहते हैं

'तो लिखे जाने के बाद
लिखा जाना चाहिए
सावधान !
यह जनसम्पत्ति है !!'

चीज़ों के प्रति सतर्क और दावा कैसा हो? कमलेश्वर की दो कविताएं एक 'जनकवि बोला' और दूसरी 'कविता हो बस पानी जैसी' आज के साहित्यिक समाज में पनप आए अभिजात्य चरित्र में कवि , आलोचकों के चयन और स्वाद पर अविश्वास करती है । इन कविताओं में कमलेश्वर कविता के गीतात्मक शैली में आते हैं और ठेठ तथा देशज मुहावरे की भाषा में होते हैं । यानी बतकही में वे अभिजात्य की सिंथेटिक कविता और आलोचना के बाड़े में घुस कर हिंदी आलोचना के आलोचकीय बेईमानी पर सटीक प्रहार करते हैं और वे कहते हैं

'आलोचक जी मुझको छोड़ो
गांव का निपट गंवारू ठहरा
कृपादृष्टि उन पर बरसाओ
बोलो उनकी कविता पर'

'महानगर के कवियों की है
चमचम करती चिकनी भाषा
कविता लगती महज़ तमाशा'

ऐसा धुर देशज और दो टूकिया प्रवृत्ति नागार्जुन , केदारनाथ अग्रवाल , और त्रिलोचन के यहां है । जो लताड़ती है , धिक्कारती है और बेईमानों को दरकिनार करती है ।

वे कहते हैं  --

'कविता हो जब भोर का सूरज
कविता हो मेहनत का किस्सा
कविता हो जीवन की रंगत
कविता हो जीवन का हिस्सा
कविता हो बस पानी जैसी
या कबीर की बानगी जैसी'

एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के बीच ऊंच-नीच , अमीर-गरीब अथवा वर्गीय बोध वाली विभाजन प्रकृति सम्मत , शाश्वत नहीं है । मानव जीवन में विभाजन की यह रेखा हमारे ही द्वारा खींची गई रेखा है । जन्मना मनुष्य वह सब कुछ लेकर पैदा होता है , जो एक अमीर आदमी लेकर होता है । परन्तु , इस फांक में उन्नत और सच्चा मनुष्य , हमेशा मनुष्यता का पक्षधर हुआ है । वह मानुष गंध से निजात नहीं पाता , वह उसे रचता है , उसका सृजन करता है उसके सृजन व निर्माण में भागीदारी को सुनिश्चित करता है । इस कड़ी में कमलेश्वर की कविता 'मानुष गंध' और 'बूढ़े पहरेदार की कविता' किरदार के लिहाज से अपने मानुषिक बोध और संवेदनशील काव्यात्मक रूप में एक बेहद मार्मिक कविता है । कमलेश्वर इस कविता में उन तल्ख सच्चाईयों को उजागर करने में कामयाब दिखाई देते हैं। जिसमें एक प्राणी के प्रति आदमी कितना गैर ज़िम्मेदार और संवेदनहीन है । मह द्विस्तरीय मानव मूल्यबोध का फलसफ़ा है ।
कमलेश्वर की कविताई असीमित है । और बहुस्तरीय है । भूमंडलीकरण, उदारीकरण के बाद नवपूंजीवाद के बाज़ारवादी संस्कृति में आम आदमी के हताशा निराशा , अभिजात्य ताकतों का भोग , ऐश्वर्य और विलासिता की शिनाख्तगी ख़ूब है । जिसमें उन्होंने उनकी खूब ख़बर ली है । 'मसलन मैं तो बाज़ार घूमने गया था' 'लव टिप्स' और 'जूते' शीर्षक कविता को ही लें । इन कविताओं में हैसियत और मनुष्य का विकार साफ़ है । उसका वस्तु और बाजार में बदलता चेहरा है , जो चकाचौंध रोशनी और भ्रम के कोलाहल में इतना डूबा और इतराया हुआ है कि अजनबियत का 'मान' ,  माने नहीं रखता । आत्मविश्वास ऐसा है मानो निकलें तो बाज़ार जेब में ! उतावलेपन का एक घटिया और लचर मूल्य दृश्य है । वहां केवल कीमती मोबाइल हैं , कारें हैं , वस्त्र है , आभूषण है और उसके आगे सब बौना । उत्पाद और सेल्स की इस दुनिया में सब कुछ मीठी है , रसीली है चमकीली है और वही 'आत्मीय' है ‌। लेकिन महत्वपूर्ण यह कि वह सच नहीं है । उपासक और आराध्य का ख़ालिस भेद है । गहराता संकट है । कमलेश्वर कहते हैं कि आत्मविश्वास से भरे इस अभिजन की यह पराकाष्ठा है जो

'किसी को खाली हाथ न जाने देने लिए प्रतिबद्ध 
ग्राहक के दिल और दिमाग के द्वंद में
बाज़ी मार ले जाने में हुनरमंद'

बाज़ारवाद के इस दुश्चक्र और अपसंस्कृति का हलफनामा दर्ज करते कमलेश्वर अघाते नहीं हैं , थकते नहीं हैं , निर्बाध गतिमान हो उसकी चालाकियों को परत-दर-परत रखते हुए आखिर दुख और क्षोभ से भर कहते हैं

'मैंने देखा
बाज़ार के मायाजाल में फंसे लोगों के पास
सब कुछ था
बस कंधा नहीं था
कि ज़रूरत पड़ने पर
दे सकें किसी दूसरे को सहारा'

यही दशा का बयां 'लव टिप्स' शीर्षक कविता में भी दिखाई देता है । प्रेम के जैविक रूप से परीचित कवि के लिए उसका यांत्रिकीकरण और आसन्न संकट , उसे स्तब्ध करता है । घायल , आहत कवि का मन और मर्म इस कविता में सवाल और संदेह में जन्मता है 

'मेरे मन के कोने में
चुभ रहा है कोई सवाल
हमारे जीवन से निकल कर क्या
लव टिप्स बेचने वालों की दुनिया में
बचा रह जाएगा प्रेम ?'

कमलेश्वर बाज़ारवाद के बढ़ते दुष्प्रभाव की अच्छी समझ रखते हैं कि चौतरफा होते हमलों की नब्ज जान चुके हैं जो कि उनके 'जूते' शीर्षक कविता में साफ़ साफ़ देखी जा सकती है

'रिश्तों से याद आया
बाज़ार किसी का संबंधी नहीं होता
नहीं होता किसी का रिश्तेदार
बल्कि सबसे पहले मारता है रिश्तों को बाजार'

। कमलेश्वर में जो विचार बोध है अथवा वैचारिकता है को ; यह सुनिश्चित करना असंभव है कि वे किस खोह में या पैमाने में रखे जाएं । बेहद उथल-पुथल, विविध विषय सामग्री , संदर्भों में अंटने बैठने के कारण अनिश्चितता दिखाई देता है । पर जन सरोकार , मानवीय संवेदना और उसके मार्मिक प्रस्तुति से उनके रुझानों को मैं वाम के खाते दर्ज करता हूं । और इन मायनों में कि उनके कहन में ठसक है , निश्चिंतता है । पुलिसिया धमक है । विद्रोह है , बाध्यता का अस्वीकार है ।  'अच्छा नहीं हो रहा है' और 'सुने' शीर्षक कविता में यह फलीभूत होता दिखता है । मनुष्य के जीवन शैली और लय में यांत्रिकीकरण एक वह परिघटना साबित हुई है जो मनुष्य के समग्र जीवन शैली को बदलने में अधिक समय नहीं लगाता वह चीज़ों के रूपांतरण का अग्रगामी विन्यास होता दिख रहा है । किन्तु उसमें भी एक खोट है कि वह मूलभावों का कन्वर्शन जिस तरह से कर रहा
 है वह नागवार है कमलेश्वर इस बात से बेहद खिन्न हैं, वे कहते हैं

'इस तरह से हो रहा है यदि बदलाव
तो यकीन मानिए
देशहित में
अच्छा नहीं हो रहा है'

'सुने' कविता बढ़ते राजनीतिक दबावों से उत्पन्न खतरों के प्रति हमें सचेत करती है । बताती है कि अभिव्यक्ति के खतरों के मध्य वस्तुस्थिति केवल सुना जाना ही रह गया है । यह सत्य का प्रकाट्य रूप बेहद वीभत्स है । कहना मनाही है और सुनना अकाट्य है । कमलेश्वर इस पीड़ा को, उस विडंबना को विभिन्न बिम्बों में रख कहते हैं

'वैसे भी
जिस जमीन पर खड़े हैं आप
उस जमीन से
सुना ही जा सकता है
कहा नहीं जा सकता

सुनें'

कमलेश्वर में यह पराजय बोध और माखौल का भाव अनायस ही नहीं है , यथार्थ का दिखता प्रतिबिम्ब है और वास्तविकता का स्वीकार है । यह आर्तनाद पूरे बस्तर का है , देश का है ।

देश में 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' का स्लोगन जोरो पर है । प्रियंका रेड्डी, निर्भया , कि कुलदीप सिंह सेंगर प्रकरण की पीडिता, या फिर चिन्मयानंद प्रकरण की पीडिता को लें , बेटी ही थीं। जिसका आखिर परिणाम करता हुआ ; से सब वाकिफ़ हैं । ऐसे में कमलेश्वर साहू की कविता  'उन पिताओं में नहीं हूँ मैं' बडा़ माने रखती है । यह कविता समाजिक विसंगतियों और उसके विद्रूपता पर कड़ा प्रहार करती है व हमें आश्वस्त करती है कि तमाम- तमाम घटनाओं , परिघटनाओं के बाद भी रूकना नहीं है । कालांतर में बेटी का होना अभिशप्त माना जाता रहा है । किन्तु , कमलेश्वर की कविता में सोच का बदलाव है साफ़ है । भले ही वह अनुपात में सीमित है। वांछनीय के मुकाबले नाकाफी है , एक बडा टालरेंस बना हुआ है । कमलेश्वर इस टालरेंस को जीरो टालरेंस में देखने की कवायद करते हैं ।

'चांद चुराने वालों की कविता'  'बिना पते की चिट्ठी' 'ईश्वर के बहाने कुछ बकबक :चार कविताएं' 'उत्तर आधुनिक व्यक्ति की प्रार्थना :तीन कविताएँ' वैचारिकता के धरातल पर नहीं ठहरती, अपना कोई प्रभाव नहीं छोडती । पर ये कविताएं आम जन के जीवन में समाहित स्थितियों- परिस्थितियों उनके हास- परिहास की मोहक प्रस्तुति हैं ।  ये कविताएं अदृश्य और काल्पनिकता का रचाव करती हैं । आंशिक फैंटेसी भी है पर अधिक प्रभावी नहीं है।

'खबरों का सिलसिला जारी रहेगा' बाजारवाद , आवारा पूंजी के बरक्स प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आए पतनशीलता का नोट्स तैयार की हुई कविता है। जिसमें साधन संपन्न लोग और मीडियाकरों के सनसनीखेज, सांठगांठ, फिर ताकत के रौब पर आम जीवन को बाधित करने के कुत्सित प्रयासों की निंदा है।

'आधा' 'हर बार बाजी' 'जब भी लडना' 'मिलना जुलना' 'मगर जब गोली चली' 'तो फिर' आदि कविताएं राजनीतिक जागरूकता व चेतना से संपन्न कविताएं है।
'हर बार बाजी' शीर्षक कविता में कमलेश्वर राजा व मसख़रा को चरित्र के स्तर पर एक ही करार देते हैं। दृष्टव्य है

जन के जीवन का
सबसे बड़ा यथार्थ है यह
और सबसे बड़ी त्रासदी कि
हर बार या तो
मसख़रा    राजा होता है
या फिर राजा    मसख़रा
जो गाता है——

कमलेश्वर इस कविता में राजसत्ता के संघीय चरित्र को उजागर तो करते ही हैं वे जनता के समीप जाते हैं  और वस्तुस्थिति से अवगत कराते हैं , वे कहते हैं

'हर बार दांव लगाकर
हर बार बाजी
जनता ही हारती है

न मसखरे का कुछ बिगड़ता है
न राजा का कुछ जाता है'

यह राजनीतिक सत्य है। जीवन और अनुभव सत्य है कि सत्ता के हाथों अंततः छली जाती है जनता। 

संग्रह की कविता 'मिलना जुलना' को तत्कालीन घटनाओं के मद्देनजर इसलिए देखना अनुचित नहीं होगा कि नागरिक और राजनेता के खड़ा होने के माने किन मायनों में अलग हो जाता है, किन अर्थों में विभाजित हो जाती है मसलन नवजोत सिंह सिद्धू के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ खड़े होना , और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के घर चुपके से बिरियानीबाजी करते खड़े होने का माने करता और कैसे निकाला जा सकता हैं ? अधिनायक वाद का चरमोत्कर्ष इन पंक्तियों में दृष्टांत है

'एक राष्ट्र के नागरिक का
दूसरे राष्ट्र के नागरिक से मिलने में
संदेह /शंकाएं /सवाल/ बवाल
जबकि एक राष्ट्र का राष्ट्राध्यक्ष से
जब भी मिलता है
जनगणमन गाता है'

कमलेश्वर इस कविता के माध्यम से उस खतरनाक विद्रूप स्थितियों को रखने में सबल और कामयाब हैं जहां एक नागरिक की नागरिकता को संदिग्ध बनाए जाने का छद्म राष्ट्रवाद चलायमान है ।

'मगर जब गोली चली' 'तो फिर' कविता को संग्रह की अति महत्वपूर्ण कविताओं की श्रेणी में रखा जाना चाहिए । यह कविता नई सदी के मुहाने में किसान आंदोलन और उनके संघर्ष को निर्ममता पूर्वक व्यवस्था द्वारा कुचले जाने के दास्तान का दस्तावेजीकरण है । यह वह समय है जब दिल्ली की सल्तनत ने किसानों की मांगों
को न मानने की जिद पर अड़ी रही और किसान भूखे रह चूहे , सांप , छूछंदर अथवा अपने ही मल मूत्र खाने बाध्य हुए । वे इस कविता में चुटीले तेवर में पूंजीवादी सत्ता व्यवस्था की पोल खोलते हैं

'मगर जब गोली चली 
 दिल्ली नहीं 
 मारा गया मंजूर
 मारा गया किसान
मारा गया इस देश का आम आदमी 

 दू $$$ र 
 दिल्ली तो खड़ी रही
 अपने पूरे वैभव के साथ'

 अड़ी रही !      

            
एक चीज है —कमलेश्वर की कविता को पढ़ आप तय नहीं कर पाएंगे कि कवि की कविताई में यथार्थ और फैंटेसी आखिर  उनके भटकाव से उतपन्न होती है कि जिया यथार्थ से कि वैचारिकता आग्रह से ! यह इसलिए कि उनकी कविताएं बार-बार आपको अलग अलग दृश्य , रंग , संवाद से न केवल गुजारती ही है , बल्कि चमकाती है और विस्मित भी करती है । मुझे ऐसा लगता है कि कमलेश्वर में वैचारिकता का अतिरिक्त दबाव नहीं है। बल्कि जीवन के जिए और भोगे यथार्थ के निमित्त उनकी कविताई अविरल बहती है । वे मूर्त और अमूर्त दोनों में निर्बाध गोते लगाते हैं। यानी ठहराव या कि विराम नहीं है। गतिशीलता है । वैसा ही

'वही कबीर का ताना-बाना
भीतर बाहर एक समाना'

कमलेश्वर की कविता का एक खूबसूरत पहलू यह कि वे अनेकों कविताओं में सवाल के परस्पर संवाद करते हैं । नाट्य दृश्य रचते हैं । पर्दा गिरता है, पर्दा उठता है । चीजें छिप जाती है , फिर दिखने लगता है । कई-कई संवाद आत्मालाप, एकालाप की भी होती है । 'मसलन अमरकंटक एक्सप्रेस में मैं, भास्कर चौधरी और अंजान सहयात्री' 'आधा' ' एक दिन'  'इस दुनिया से जाने के बाद' मुहावरे का वजन' आदि कविताएँ अपने आस्वाद के अनुरूप ही मनुष्यता की वापसी में उसके जद्दोजहद में हमें शामिल कराती है। हमारे ठगे होने के बाद भी ठगे होने के अहसास और पीड़ा से हमें मुक्त कराती है । यह एक तरह का नया सौंदर्य दृष्टि है ।
 'कारीगर के हाथ होने के नहीं होते'
कमलेश्वर साहू की यह कविता उनके संग्रह की शीर्षक कविता है । कमलेश्वर इस कविता में श्रमशील , श्रमजीवी जनता के शक्ति का उत्पादन में भूमिका तथा उनके साथ होने वाले बहुतायत उपेक्षा , अपेक्षा को केन्द्रीय बनाते हैं । मानव जीवन में साधन, संपदा इत्यादि का सीधा संबंध उत्पादन की शक्ति पर निर्भर है । बावजूद उत्पादकों ने इसका अनदेखा किया और उनके इस अदेखेपन के बाद भी श्रम से लदे 'वे मनुष्य' अधिक जीवंत हैं कि उन्होंने उत्पादक को अस्वीकारा नहीं , नहीं कहा 

' वे यह भी कह सकते थे 
 सोने के हाथों में
 नहीं होता हुनर 
 हमारे हाथों वाला !!!

कुल मिलाकर चालीस कविताओं का यह संग्रह अपने चयनित कविताओं , उसके तेवर , और कलेवर के भरोसे यकीन दिलाता है कि कमलेश्वर बहुविध , अधिक सधे हुए , मंजे हुए कलाकार हैं । 

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