Tuesday, March 30, 2021

आज बड़े समीक्षक बने फिर रहे हैं इन्द्र कुमार राठौर अच्छी बात है ।जिनके आगे पीछे आज कल है इन लोगों के चक्कर शुरू शुरू में खूब लगाया था, जब इस नवोदित रचनाकार को कोई घास नहीं डाला था तो मेरे पास आयें थें इसे सराखों पर बिठाया था ,छोटे भाई जैसे स्नेह देकर साहित्य बिरादरी में पहचान दिलाया था ,घर बुला बुला कर खाना तक खिलाया था बेरोजगार था ठेकेदारी में श्रीवास्तव साहब को बोलकर काम दिलाया था। लेकिन इस एहसान फरामोश ने इसका उल्टा सिलह दिया । अहसान फरामोशी लोग कतई साहित्यकार नहीं हो सकते हैं, इधर-उधर से नकल मारके जबरन कवि लेखकों को महिमामंडित करके समीक्षक बनकर खुश करना आसान है । समीक्षा पढ़ चुका पर मुझे एकदम सामान्य सी लगा । अपनी रचनात्मक प्रगति छोड़ कर वाहवाही लेना हो तो समीक्षक बन जाओ, कमलेश्वर साहू मेरे भी मित्र है अच्छी रचना लिखते हैं मैं भी कई बार तारीफ कर चुका हूँ, पर मित्रता वश नहीं, निष्पक्ष होकर । इन्द्र कुमार राठौर को जब मेरे माध्यम से साहित्यिक विरादरियो के बीच पहचान बनी तो उनमें बहुत बड़े साहित्यकार होने का अहं आ गया था,शुरू शुरू में उसे अपने साहित्य लिखने का या रचना लिखने की ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाया था, पर इतना अहंकार हो गया था कि बाद में हर चीज में मुझसे बहस करना शुरू कर दिये थे, एक अखबार के जी हुजूरी करके कुछ दिन समीक्षा लिखने का भूत सवार हो गया था । जो व्यक्ति अपने राह दिखाने वालों का सामान्य अहसान तक नहीं मानता उसे मैं साहित्य विरादरियो के लायक भी नहीं समझता हूं, भले ही उसे दूसरे लोग कितने बड़े समीक्षक या रचनाकार क्यों न मानता हो ।

आज बड़े समीक्षक बने फिर रहे हैं इन्द्र कुमार राठौर अच्छी बात है ।जिनके आगे पीछे आज कल है इन लोगों के चक्कर शुरू शुरू में खूब लगाया था, जब  इस नवोदित रचनाकार को कोई घास नहीं डाला था तो मेरे पास आयें थें इसे सराखों पर बिठाया था ,छोटे भाई जैसे स्नेह देकर साहित्य बिरादरी में पहचान दिलाया था ,घर बुला बुला कर खाना तक  खिलाया था बेरोजगार था  ठेकेदारी में श्रीवास्तव साहब को बोलकर काम दिलाया था। लेकिन इस एहसान फरामोश ने इसका उल्टा सिलह दिया । अहसान फरामोशी लोग कतई साहित्यकार नहीं हो सकते हैं, इधर-उधर  से नकल मारके जबरन कवि लेखकों को महिमामंडित करके समीक्षक बनकर खुश करना आसान है । समीक्षा पढ़ चुका पर मुझे एकदम सामान्य सी लगा । अपनी रचनात्मक  प्रगति छोड़ कर वाहवाही लेना हो तो समीक्षक बन जाओ, कमलेश्वर साहू मेरे भी मित्र है अच्छी रचना लिखते हैं मैं भी कई बार तारीफ कर चुका हूँ, पर मित्रता वश नहीं, निष्पक्ष होकर । इन्द्र कुमार राठौर को जब मेरे माध्यम से साहित्यिक विरादरियो के बीच पहचान बनी तो उनमें बहुत बड़े साहित्यकार होने का अहं आ गया था,शुरू शुरू में उसे अपने साहित्य लिखने का या रचना लिखने की ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाया था, पर इतना अहंकार हो गया था कि बाद में हर चीज में मुझसे बहस करना शुरू कर दिये थे, एक अखबार के जी हुजूरी करके कुछ दिन समीक्षा लिखने का भूत सवार हो गया था । जो व्यक्ति अपने राह दिखाने वालों का सामान्य अहसान तक नहीं मानता उसे मैं साहित्य विरादरियो के लायक भी नहीं समझता हूं, भले ही उसे दूसरे लोग कितने बड़े समीक्षक या रचनाकार क्यों न मानता हो ।

No comments:

Post a Comment

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...