Friday, March 26, 2021

लोक चेतना

लोक की समझ या कि चेतना में इलीट कभी भी शामिल नहीं है । इसलिए वह हमेशा 'दूसरे तरह' का ही प्रतिद्वंदी रहा । एकदम साफ़ और खुला दिखता हुआ । परन्तु उनसे भिन्न और अमूर्त रूप में असल प्रतिद्वंदी तो वही ही हैं जो लोक के साथ खड़े होने का , दिखने का बेहतर अभिनय कर रहे होते हैं और व्यवस्था के विद्रोही दिखते हुए , व्यवस्था से सुविधाएं प्राप्त करने रत्तीभर संकोच नहीं करते । वे शत्-प्रतिशत सामन्ती मान्यताओं , अवधारणाओं और विश्वासों के पैरोकार हो लोक की प्रथा तथा चेतना को खंडित कर रहे होते हैं । साथी हमें सावधान रहना होगा ।  हमारे यहां लोक के तात्पर्य को जहां तक मैं समझता हूं Vijendra Kriti Oar  ने बहुत ठीक और सारगर्भित ढंग से क्रमबद्ध समझाया है । उनके यहां लोक ग्राम्य जीवन खेतिहर किसान, मजूर तक ही सीमित नहीं है । उससे भी बहुत आगे जाते हुए शहरी निम्न मध्यवर्गीय लोग भी , लोक की श्रेणी में हैं जो उत्पादक के नियोजन जैसे अनेक असंगठित क्षेत्र को अपने  साध्य-असाध्य श्रम से बल प्रदान करते हैं । यह भी , यही पर ही सीमित नहीं है । अपितु स्वनियोजन से जुड़े वे लोग भी शामिल हैं जो रेहड़ी , ठेली ,रिक्शे से भी अपना जीवन गुजर- बसर करते जीवन में सादगी और मनुष्यता को विस्तार देते हैं ।

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