Friday, March 26, 2021

विवेक चतुर्वेदी

'स्त्रियां घर लौटती हैं' विवेक चतुर्वेदी का पहला काव्य संग्रह है जो कि वाणी प्रकाशन न‌ई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है।संग्रह की कविताओं से गुज़रते हुए ज्ञात होता है कि विवेक की कविताई न सिर्फ जोड़-घटाव के प्रछन्न से मुक्त है बल्कि एक कवि की शुद्ध-चित्ति की सुदीर्घ बयानी भी है । आशय यह कि विवेक चतुर्वेदी की कविताई  गुणा-भाग , लाभ-हानि के व्यापारिक हित वाली काव्य-साधना न होकर ;  बल्कि, जिसे मन ने माना , ह्रदय ने जिसकी थाह ली ;  वस्तुत: वह है ।
 यही बात ही उनकी कविताओं में काव्य-सत्य के रूप में आगे आई है  इन अर्थों में मुझे लगता है कि विवेक चतुर्वेदी की कविताई समकालीन चेतना से भी पृथक , हमारे समय के यथार्थ से टकराकर टूटने के अनुभूत सच और उससे उपजी द्वंदात्मकता से , फलीभूत हुई मानवीय संवेदना की कविताएं , अधिक हैं । कहना न होगा इस दानवीय यंत्रणा से भरे इस समय में अच्छा होने-चाहने के तमाम उपाय जब निरर्थकता के कगार में है , और देखने-चाहने के जैसा कुछ होता नहीं दिखाई दे रहा ; तब इस कवि की स्वप्नजीवी मंगल-कामना आश्वस्ति प्रदान करने वाली लगती है ! परन्तु ऐसा सोचना या स्वीकारना भी एक अंतहीन स्थिति के प्राप्य में विकल्पहीनता को परोक्ष बल देता है और संघर्ष के बोध को बाधित करता है । अतः और अक्सर मैं इस विकल्पहीन दशा पर , दिशा की तलाश का हिमायती होता हूं । विपरीत स्थितियों से मुखालिफ़ होने का हिमायती होता हूं । जो विवेक की कविताओं के आस्वाद से भिन्न , एक अलग आस्वाद के मांग की भी हुई है । बावजूद , विवेक की कविताओं के प्रभाव से मैं मुक्त भी नहीं हो पाता हूं और इन चिंताओं से इत्तेफ़ाक रखता हूं क्योंकि विवेक चतुर्वेदी में आस्वाद को लेकर या उसकी मांग पर, धीरता और गंभीरता दोनों हैं ।

विवेक के इस संग्रह की पहली कविता  "स्त्रियाँ घर लौटती हैं" है ! जो अपने शीर्षक के भाववादी रूझान के कारण विमर्श की स्थिति में घिरते-फंसते दिख रही है । यह वाद-विवाद और संवाद की स्थिति को पैदा करती , प्रतीत हो रही है । तो दरअसल विवेक के इस चुनाव में ज्ञान पीछे है और संवेदना आगे । यानी विवेक "संवेदनात्मक ज्ञान" के राह चल प्राप्त हुए श्रम सौंदर्य को प्राथमिक बनाते हैं । जबकि ज्ञानात्मक संवेदन पूरी तरह इसका उलट तब हो जाता है , जब स्त्रीवादी चेतना और रुझान यह कहते हुए दिखाई देंगे और सवाल भी करेंगे कि स्त्रियाँ ही क्यों घर लौटती हैं ? क्या घर सिर्फ पुरूष का ही है ! कि सिर्फ स्त्री ही लौटती है !! या फिर यह स्त्री कहीं भाग गई होती हैं !!! दोनों अपनी जगह हैं । संवेदना जहाँ पहले कथ्य रुप में आएगी वहाँ भावुक हो आएगी । अकथ पीड़ा को दर्ज करती आएगी । जबकि ज्ञान मार्ग से आती संवेदना भावुकता को दरकिनार कर तर्क और स्थापनाओं से चीज़ों को काटने का यथासंभव प्रयास करेगी , और काटेगा ! बावजूद इन सबके महत्वपूर्ण यह है कि कवि की कविता क्या कह रही हैं ?

"स्त्रियाँ घर लौटती हैं
पश्चिम के आकाश में
आकुल वेग से उडती हुई
काली चिड़ियों की पांत की तरह" 

मतलब तय है कि यह सांझ का समय है , गोधूलि का समय है । तमाम व्यवहारिक प्रक्रियाओं के जीवों के लौटने का समय है । यहां , सामान्य और क्रियात्मक अर्थों में 'लौटना' यानी वापसी है और दृश्य ग्रमीण कम महानगरीय अधिक है ।  श्रम-साध्य कामकाजी स्त्रियाँ अपने सफल कार्य निष्पादन के बाद जब, कल-कारखानों से झुंड में निकलती हैं वे और घर को पहुंचती हैं तो उनके पहुँचने में जो असहज और असमान्य बातें हैं वह विवेक चतुर्वेदी की कविताई चेतना को न सिर्फ संवेदित करता है झकझोरता भी है कि आखिर एक स्त्री के रोज प्रति-रोज होने के अर्थ में यह सब शामिल हैं ? तो मैं समझता हूँ कि विवेक इस कविता में कोई स्थायी लकीर की बात नहीं कर रहे होते कि कोई अतिरिक्त महिमामंडन नहीं कर रहे होते हैं ; अपितु वास्तविक परिस्थितियों 
 को बयां करते हैं , जो किन्हीं अर्थों में स्त्री को पारंपरिकता के खोह में बनाए रख , पैठ जमाए बैठी है । चूंकि स्त्री के जीवन में दायित्व से ज्यादा, अपेक्षा की बहुलता भरी है । जो बहुत अप्रत्याशित और विपरीत परिस्थिति को पैदा करने वाले होते हैं । परन्तु इन मायनों में विवेक की स्त्री निसंदेह घर को पहुंचती सेल्फ आईडेंटिटीफाईड है । संघर्ष करती संवेदनशील स्त्री है । जो काम के बाद घर में किस तरह उतरती है ? कैसे आती है ?? यहाँ यह देखा जाए 

"स्त्री एक साथ पूरे घर में लौटती है
वह एक साथ आंगन से
चौके तक लौट आती है"

लौट आती है

"स्त्री बच्चे की भूख में'
'रोटी बन कर लौटती है 
स्त्री लौटती है 
दाल भात में... टूटी खाट में 
जतन से लगाई मसहरी में 
वो आंगन की तुलसी 
और कनेर में लौट आती है "

विवेक की कविता किसी ठस्स बौद्धिकता की मांग को पूरी करने के लिए बांडेड न होकर संवेदना से उपजी कविता है । इस कविता में स्त्री का लौटना कोई बांडेशन की तरह नहीं है और न  पूजा की ही तरह है ! यहाँ तो वह "अबला" भी नहीं , अपितु कर्मठ स्त्री है । अत: कविता उसकी उपस्थिति की महत्ता को रेखांकित करने का उपक्रम  जान पड़ता है । एक रचना की पूर्णता के आग्रह में सिर्फ नकार ही नकार उचित नहीं है स्वीकार भी किए जाने चाहिए । हमें यह नहीं भूलना चाहिए स्त्री जब भी लौटेगी अपने घर लौटेगी ! पुरुष जब भी लौटेंगे अपने घर लौटेंगे ! और यदि वह घर उसके अपने न हो तो यह लौटना संभव ही नहीं ही है !!! अत: विवेक की कविता को जरा विवेक के चश्मे में ही उतर कर देखा जाना लाजिम होगा । चूंकि विवेक की 

"स्त्री है... जो प्रायः स्त्री की तरह नहीं लौटती 
पत्नी, बहन मां या बेटी की तरह लौटती है"

किसी दबाव अथवा बांडेड में नहीं बल्कि सेल्फ रेस्पेक्ट और रेसपांसिबल , हो लौटती है उनकी स्त्री वह

"स्त्री है...जो बस रात की नींद में नहीं लौट सकती
उसे सुबह की चिंताओं में भी लौटना होता है"

 यह विवेक की पीड़ा और मर्म को समझने सहायक होगा ! 

"स्त्री चिड़िया सी लौटती है... 
और थोड़ी मिट्टी 
रोज पंजों में भर लाती है
छोड़ देती है आंगन में" 

विवेक की यह स्त्री यकीनन बांड की जगह दायित्व बोध की प्राथमिकी में , स्नेह , प्रेम और ममत्व से भरी छलकती स्त्री है ।
विवेक की कविता आवश्यक कला मांगों के अनुरूप जरूरी आंशिक फैंटेसी का सहारा भी लेती है मसलन कि दृष्ट्या कथनीयता को लें , देखें

"घर भी एक बच्चा है स्त्री के लिए 
जो रोज थोड़ा और बड़ा होता है"

अतः विवेक की कविता का लोक-राग और रंग में जब

"लौटती है स्त्री...
तो घास आंगन की
हो जाती है थोड़ी और हरी
कबेलू छप्पर के रंग
हो जाते हैं जरा और लाल"

इतना कुछ होने के भीतर या कि ; उस सबमें असल स्थापत्य तो यह है

"दरअसल एक स्त्री का घर लौटना
महज स्त्री का घर लौटना नहीं है 
धरती का अपनी धुरी पर
लौटना है"

विवेक की कविताएं यद्यपि 'लाल' नहीं हैं परन्तु लाल रंग का प्रयोग भिन्न भिन्न अर्थों में उनकी चार-पांच कविताओं में दिखाई दिए । वे उन कविताओं में लाल रंग , लाल मुरूम लाल रूमाल लाल चादर , लाल कालीन , जैसे प्रतीक बिम्बों का प्रयोग करते हैं और कहते हैं कि

"अनुभूति के 
भग्न होते दुर्ग तक पहुँचूँगा 
भाषा की सीढ़ियों से 
और पुकारूँगा...
लाल मुरम के रास्ते दूर जाती 
कविता के भीतर की स्त्री को"

 तो इसके माने क्या है ? अब सवाल तो बनेगा ही ! कि लाल मुरूम कविता के भीतर की स्त्री को मार रहा है ? या फिर कविता के भीतर स्थापित कर दी गई 'ढांचागत स्त्री' के मुक्ति की कामना के साथ उसे पुनर्जीवन देने एवं उसमें प्राणवायु भरने का उपक्रम कर रही है ।  विवेक चतुर्वेदी पर मुझे प्रबल विश्वास है कि वे नियतिवादी नहीं हैं , यथास्थितिवाद को पोषित करने वाले कवि नहीं हैं । अपितु प्रगतिशील चेतना के संवाहक हैं और लाल मुरूम कहीं न कहीं इसका ही एक बड़ा पर्याय है । अन्यथा वे यह नहीं ही कह पाते

"अनुभूति के 
भग्न होते दुर्ग तक पहुँचूँगा 
भाषा की सीढ़ियों से 
और पुकारूँगा..." 

उनके इस कथन का आशय में , यथासंभव इधर की स्त्री स्वातंत्र्य बोध की वायवीयता का अस्वीकार जितना है उतना ही उसके निरपेक्ष स्त्री होने के मान का सम्मान भी है । एक स्त्री के दैवीय रुप दर्पण जो कि स्थापित किया जा चुका है उसमें , उसके तलहटी में एक स्त्री का विच्छेदन भंजन है । विवेक चतुर्वेदी की इस कविता की मानें तो एक स्त्री को वे उनके तरलाई में , तरुणाई में और खुरदुरेपन में देखने का एक स्वायत्त नजरिया है । यहां सबसे अधिक जरूरी और उल्लेखनीय बात यह है कि विवेक की स्त्री न देवी है न 'दानव' ।  बल्कि एक जीता-जागता मानव है ।

विवेक के इस संग्रह की अधिकांश कविताओं की केन्द्रीयता में स्त्री ही है । वह स्त्री मां है , बहन है , बेटी है , कामकाजी मजदूरनी है , जीवन रथ को खींच रही एक टायपिस्ट है । दृष्ट्या कविता में मां का वह रूप-सौन्दर्य निखर आता है जिसके हाथ विभेद की गुंजाइश नहीं है , त्याग ऐसा है कि अपने भी हिस्से को बांट प्रसन्न होती जीवनदायिनी है ।

"मां सिंदूरी आम की
फांके काटती
हम देखते रहते
कोई फांक छोटी तो नहीं
पर न जाने कैसे
बिल्कुल बराबर काटती मां
हमें बांट देती"

"खुद गुही लेती"

 कहना न होगा कि विवेक की यह कविता स्मृतिजीवी है । उन स्मृतियों को अपने आज में देख-झांक रही है । परन्तु अतीतजीवी नहीं ; यानी वह नहीं है जो नामवर सिंह ने इस संदर्भ में एक सुंदर बात बहुत पहले कही , कि 

"अतीतजीवी होना मनुष्य को अकर्मण्यता की ओर ले जाता है"

विवेक की कविता का स्त्री यद्यपि अपने काल की सीमाओं से आगे बढ़ , 'अपने पुरुषार्थ' में घर परिवार के सुख-दुख , हर्ष-विषाद से जूझने में वह कहीं साहसी दिखी ,कि स्वाभिमानी हुई किन्तु क‌ई मायनों में वह , अब भी बलात् छली गई है । यह भी विवेक की कविता या कि चिंता में पूरे मानवीय बोध के अधिकार चेतस रूप में है । मसलन कि 

सुनो ! इस सदी में
कितने-कितने पुरूषों ने
देखी है लाल मुरुम बिछने की राह।
ये जो स्त्री सो रही है तुम्हारे बगल में
तुम्हारे तप्त चुम्बन से घुट रही है जिसकी सांस
क्या लाए थे इसे तुम
लाल मुरुम की सड़क से
नहीं.... तुम लाए थे इसे
धन, प्रतिष्ठा ,पद , बल या छल से

विवेक की कविता है तो बड़ी ही सीधी सादी , अभिधात्मक ही है । सीधी समझ की है । परन्तु कहीं कहीं ऐसा भी आभास होता है कि वह सिर्फ उसी तरह का नहीं है जैसा कि हमारी आंखें उसे देख रही है । अतः हमारे समय की कुटिल चालों और कुदृष्टि से बने बहुस्तरीय आंतरिक फांकों को अभिव्यक्त करने उनकी कविता व्यंजना का भी हाथ थामती है , उन गूढ़ भाव रहस्य , प्राग इतिहास की गुफ़ा तक की यात्रा करती है जिसमें 

"लड़की दौड़ती है तो थोड़ी तेज हो जाती है धरती की चाल"

या कि

"औरत टांक रही है बच्चे के अंगरखे पर सुनहरा गोट
और गर्म हो चली है सूरज की आग"

इस तरह से देखें तो विवेक की कविता में समानांतर रेखाओं के इतर अनेक आड़ी-तिरछी एक-दूसरे को काटती तिर्यक रेखाएं भी है , जो चीज़ों की सरल समझ 
के आगे की हैं ।
नैतिकता, स्वतांत्र्यबोध , अभिव्यक्ति के अधिकार के बड़ी बातों के बाहर के सच में छिपा सामंती स्वरूपों को कथात्मक और वाचनीयता में चाल चरित्र छद्म की बेहतर शिनाख्तगी की गई है वह भी बौद्धिक जगत को केन्द्र में रखकर । अच्छी और पठनीय कविता है ।
"दुनिया के लिए जरूरी है" शीर्षक कविता वस्तुत: भौतिक लिप्साओं और स्वार्थ के दलदल से ग्रसित मनुष्य का , मनुष्य और प्रकृति के विरोध में किए गए कारनामों से उत्पन्न हो रही रिक्तियों की चिंता  तथा उन प्रवृत्तियों का नकार है जो परोक्ष-अपरोक्ष मानव व प्रकृति विरोधी है । विवेक कविता के इस पहले स्टैंजे में इसकी भूमिका तय करते हैं कि जरुरी क्या है ? जब हमारे ही हाथों हत्या हमने ही मुकर्रर की हो
 कि बहुत-सी ख़ूबसूरत बातें मिटती जा रही हैं दुनिया से । मसलन

जैसे गौरैया
जैसे कुनकुनी धूप
जैसे बचपन
जैसे तारे
और जैसे एक आदमी , जो केवल आदमियत की ज़ायदाद के साथ जिंदा है" 

के जैसे अनगिन चिंताओं के मध्य विवेक कविता के इस दूसरे अन्य स्टैंजे में  क्या कह रहे हैं ध्यातव्य है और अनुकरणीय भी

"सुनों... दुनिया के लिए ज़रूरी नहीं है मिसाइल
ज़रूरी नहीं है अंतरिक्ष की खूंटी पर
अपने अहम् को टांगने भेजे ग‌ए उपग्रह
जरुरी नहीं है दानवों सी चींख़ती मशीनें
हां... क्यों ज़रूरी है मंगल पर पानी की खोज ? 

कविता में आए सवाल और तथ्य विकास के माडल का विरोध करता है न कि प्रगति के पथ का ।

 'स्त्रियां घर लौटती हैं और अन्य कविताएं' विवेक के इस संग्रह की ख़ासीयत ही यही है कि उन्होंने स्त्री के परस्पर  घर , परिवार , समाज उसके ताने-बाने में छिपी लिप्साओं , छद्मों का यथा तथ्यात्मक बहुआयामी चित्रण पूरी जिम्मेदारी से किया है जो इस संग्रह में 'मां' 'रावण'  'औरत की बात' 'टाइपिस्ट' 'स्त्री विमर्श'  'शोरूम में काम करने वाली लड़की' 'पेंसिल की तरह बरती गईं घरेलू स्त्रियां'  व 'डोरी पर घर' 'पृथ्वी के साथ भी' के विशाल कैनवास पर चहलकदमी करता मुहर लगाती है ।
'दुनिया के लिए ज़रूरी है' कि तरह जरूरी कविताओं की श्रृंखला में 'पिता' 'पेड़ की मृत्यु' 'तुम आये बाबा' 'वर्गवादी'  'गोधूलि' 'लाल रूमाल'  'सुबह होगी...''पसीने से भीगी कविता' मेरे बचपन की जेल' 'पिता की याद'कविताएं अपनी मार्मिकता में अनूठी कविताएं हैं ।  कुल मिलाकर विवेक के इस संग्रह को हिंदी के स्त्रीवादी कविताओं  और मुहावरों के बनिस्बत समग्र स्त्रीकाल दर्शन के रूप में भी देखा जा सकता है । 
                     

कविता- संग्रह- स्त्रियाँ घर लौटती हैं
कवि- विवेक चतुर्वेदी
वाणी प्रकाशन
प्रथम संस्करण-2020
मूल्य-रु 199

  

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