Friday, March 26, 2021

हरिओम राजोरिया

कविताएं , मुझे जब तक बेचैन नहीं कर देतीं , किसी जरूरी बातों के लिए उद्देलित नहीं कर देते ; मतलब , बहुत सारी पीड़ाओं और यातना गृह की यातनाओं से मेरे भीतर सिहरन पैदा नहीं कर देती , उस पर एक लफ्ज़ भी बोलना या कि लिखना मेरे वश का नहीं रहता । अमूमन रोज़ दस बीस कविताओं से मेरा वास्ता होता ही है , पर सभी कविताओं के साथ ऐसा नहीं होता , जैसा कि हरिओम राजोरिया की कविताओं से रूबरू होते हुए आज हुआ । हरिओम राजोरिया अशोक नगर इप्का के रंगकर्मी साथी हैं समकालीन हिंदी कविता के नवें दशक की हिंदी कविता से पहचाने गए । वे नासिर अहमद सिकंदर , बुद्धि लाल पाल , शरद कोकास ,आलोक वर्मा , पूर्णचंद्र रथ , शाकिर अली , विजय सिंह , निरंजन श्रोत्रिय , मदन कश्यप , कुमार अंबुज , देवीप्रसाद मिश्र ,  मोहन कुमार नागर के समानांतर जैसे आए हैं , वैसे ही गतिमान बने हुए हैं । बल्कि पहले के मुकाबले अधिक गतिशील और  एक्टिविस्ट की भूमिका में मोर्चा संभाले दिखाई दे रहे हैं । यहां दर्ज कविताएं इसकी ही पुष्टि है । ये कविताएं हमारे समय के सबसे मुश्किल और जटिल दौर की कविताएं हैं । जहां पक्ष और पहचान भी मुश्किल था ।  पर हरिओम राजोरिया ने बहुत खूबी के साथ अपना पक्ष बता दिया है । इस मुश्किल दौर में हरिओम राजोरिया की कविताएं जनता से सीधे रूबरू हो संवाद स्थापित करती हैं । ऐसा इसलिए भी कि इन कविताओं में आज को रचा गया । इस बर्बर समय को रचा गया । मनुष्य के विरुद्ध होने वाली साजिश को रचा गया । हरिओम की इन कविताओं में तात्कालिकता और सपाटबयानी के प्रभाव को लेकर आलोचक खड़े होंगे , कहेंगे इन कविताओं के जीवन व मर्म पर बहस भी छोड़ देंगे ? कालजीवी होने पर संदेह जताते फिरेंगे । मैं फिर कह रहा हूं 'कवि अपने आज को लिखें '
जिन कविताओं में अपना आज नहीं वह कालजीवी भलि कैसे हो सकता है ? आप अपने समय , साक्ष्य , निष्कृष्ट और बर्बर इतिहास के दस्तावेजीकरण को नकार कैसे काल को जीना चाहेंगे । यानी , वे कविताएं ही क्या जिनमें अपने समय के सच और संताप को कहने , जीने का सामर्थ्य भी न रहे । उसके दुख संतापो को देख पाने का सुविचारित नजरिया न रहे ; बल्कि उससे टकराने की जगह घालमेल करते बगल खड़े हो जाए । मूर्त कलाएं कभी फ़ासिज़्म का शिकार नहीं हो सकती , वह विद्रोह पैदा करेगा । चुनौती बनेगा । इन मायनों में निश्चय ही तात्कालिक प्रतिक्रिया अथवा स्टेटमेंट के बरक्स हरिओम राजोरिया की कविताएं सम समायिकता का अतिक्रमण करती हैं और काल को जीती कविताएं हैं ।

   डर लगता है
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कौन नहीं डरता
डराए जाने के बाद
विश्वविद्यालय में निर्दोष छात्र पिटते हैं
और झूठ बोलती है पुलिस
मंत्री जवानों को सलाह देते हैं
तनिक नरमी से काम ले पुलिस

कौन नहीं डरता
अपनी पहचान और चेहरा छुपाए जब
आम जन पर लहराई जाती है लचीली लाठी 
आप पूछ तक नहीं पाते कि क्यों ?
क्यों कर ऐसा होता है कि पूरा तंत्र
एक दिन सत्ता के झूठ में शामिल हो जाता है

कौन नहीं डरता
जब झूठ बोल रहा होता है तंत्र 
और संकट में होता है जन
ऐसे समय में प्रधान कुमार जी 
विचित्र तरह से विचित्र विषयों पर 
करने लगते हैं मन की बात
कभी श्रृंगार करते , कभी जाकेट बदलते
कभी किसी बच्चे के कान उमेठते
टी वी स्क्रीन पर दिखाई पड़ जाते हैं
उधर विश्वविद्यालयों में प्रयोग करती पुलिस
देश के होनहार छात्रों पर 
लाठियां फटकार रही होती है

हो सकता है फिलहाल 
आपको न लगता हो डर
पर एक चालाक न्यूज एंकर की भंगिमाएं
आपको भीतर तक डरा सकती है
जो विद्यार्थियों को नागरिक की तरह नहीं
विधर्मियों की तरह चित्रित कर रहा होता है - 
" एक आंख ही तो गई है
एक हाथ काम नहीं भी कर रहा तो क्या
दूसरा तो अब लगभग ठीक है
दोनों पैर भले ही काम न कर रहे हों
पर चेहरा तो पूरी तरह ठीक है "1

एक दिन ऐसा भी आता है
जब छाता तलवार बना दिया जाता है
और बटुआ पत्थर का ढेला
झूठ को इस तरह परिष्कृत किया जाता है
कि आपको नए सिरे से लगने लगता है डर
आप एक साधारण से नागरिक को
धीरे - धीरे एक दंगाई में तब्दील होते हुए देखते हैं 
तब सचमुच लगता है डर
देश के इस विकृत नव मानस से
प्रधान कुमार जी एक वरिष्ठ दंगाई की तरह
प्रशिक्षु दंगाइयों की ढाल बन जाते हैं
तब वे आम नागरिकों को भी
कपड़ों से पहचानने की बात करते हैं

आप तरह तरह से जय बोल रहे होते हैं
और इस हिंसक जयकारे के बीच
कुछ भी ठीक से सुनाई नहीं पड़ता
प्रधान कुमार जी जहरीली हंसी हंसते हैं
और इस हंसी की जड़ में कहीं
छुपी होती है हिंसा की प्रेरणा

तब , जब न्याय के पक्ष के लिए
समर्थन में उठते हैं कुछ हाथ
और राजद्रोही के रूप में
चिन्हित कर लिये जाते हैं
तब होती है डर लगने की शुरूवात 
स्वप्न में सुनाई पड़ती है कहीं
हिटलर के फिर लौटने की आहट
तब लगने लगता  है डर
लगातार अपरिचित होते जाते 
अपने ही आसपास से ।
                    
  
                        
            डील
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डील होने ही वाली है
डील अब होकर ही रहेगी
डील तो होनी ही चाहिए
भारत भी चाहता है कि डील हो
अमेरिका भी चाहता है कि डील हो
सारी दुनिया की नज़र डील पर है
फिर दिक्कत क्या है
होने को तो  कुछ भी नहीं 
पर चूकि डील हो ही रही है
इसलिए डील को हो ही जाना चाहिए

डील देशहित में हो रही है
डील होने के लिए ही नहीं हो रही 
कारोबारियों का कारोबार टिका है डील पर
डील पर ही देश का सारा दारोमदार है
डील के लिए राष्ट्र प्रमुख मिल रहे हैं
डील के पक्ष में सटोरिए भी कुछ कह रहे हैं
डील तो अन्ततः होकर ही रहेगी 
बडी अगर न भी हो सकी
तो उससे कुछ  छोटी डील होगी

डील एक तरह का पेंचीदा मसला है
डील भूमंडलीकरण से पैदा हुआ
एक षडयंत्रकारी शब्द भर नहीं है
कहीं भी होती हुई डील में से कुछ 
गडबड होने की गंध आती है

डील होने का मतलब 
अकेली डील होना ही नहीं होता
आप देख पा रहे होते हैं कि
इधर डील हो रही होती है
और उधर दिल्ली में दंगा  ।

         नोमोस्ते इंडिया 
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भाड़े के गायक आए हैं
भाड़े के नर्तक
भाड़े के वादक
स्कूलों से बच्चे छोड़ दिए गए हैं
महंगे स्वागत द्वार बने हैं
तरह तरह से विचित्र सा कुछ हो रहा है
अद्भुत , अविश्वसनीय , अकल्पनीय
इंतजाम से भी बड़ा इंतजाम 
सुरक्षा ही सुरक्षा 
परिंदा पर नहीं मार सकता 
परिंदे की औकात ही क्या है ?

दोस्त आया है
दोस्ती का पैगाम लाया है
हथियार बेचने वाले देश का प्रमुख आया है
उतरते ही साबरमती आश्रम जा रहा है

प्रधान कुमार बोल रहे हैं
प्रधान कुमार को समझने की कोशिश कीजिए
अभिभूत , अचंभित जन सुन रहे हैं

नया इतिहास बन रहा है
मेरे दोस्त ट्रंप 
अमेरिका से सीधे यहां साबरमती पहुंचे हैं
दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी में
ये आसमान तक गूंजती हुई आवाज
और प्रेसीडेंट
और फर्स्ट लेडी और परिवार
और ग्रेटर और क्लोजर रिलेशनशिप
हम नमन करते हैं
हम नमस्ते करते हैं
मिस्टर प्रेसीडेंट
इस शंकर भाषा में आपका स्वागत है

नमस्ते स्वीकार करें
एक ने सबसे बड़ी मूर्ति लगाई
और दूसरा हमारे बीच है
हम दोनों एक दूसरे के बीच हैं
मुझे खुशी है
भारत अमेरिका की फ्रेंडशिप गहरी हुई है
फ्रेंड्स 
ट्रंप बड़ा सोचते हैं
फर्स्ट लेडी ट्रंप
आप बच्चों के लिए बड़ा कर रही हैं

इंवाका दोबारा भारत आईं हैं
इनके पति लाइम लाइट से दूर रहते है
उच्चारण की समस्या न होती
तो उनके पति का नाम भी हम लिखते

पूरी दुनिया आपको सुनना चाहती है
माइ फ्रेंड को सुनने ...
नमस्ते ट्रंप
नमस्ते ट्रंप
130 करोड़ भारतीयों का नमस्ते

नोमोस्ते इंडिया !!

         प्रश्न अभ्यास 
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दंगे पर कविता लिखिए 
पुलिस की छूट की व्याख्या कीजिए
दंगाइयों के पांच प्रकार बताइए
भक्त से दंगाई होने की आशंका और
संभावनाओं पर विचार कीजिए
हिंसक समय का क्रमिक विकास लिखिए

बच्चों को घृणा करना कैसे सिखाएं
निर्लज्जता से झूठ बोलने की विधियां लिखिए
दंगों में जय बोलने के महत्व 
और गालियों से आक्रमकता पैदा करने के 
प्रयोग पर एक सारगर्भित टिप्पणी करो
चाचाजी पहले अंश कालीन दंगाई थे
उनके पूर्णकालिक दंगाई बनने की यात्रा का
विस्तार पूर्वक चित्रण कीजिए
दो दंगाई विचारकों के नाम बताइए
दंगे और नरसंहार में अंतर स्पष्ट कीजिए

मनुष्य होने की हानियां लिखिए
" दंगा होता नहीं है करवाया जाता है "
इस प्रचलित झूठ पर  निवंध लिखिए
पढ़ो और पढ़ने दो की जगह
लड़ो और लड़ने दो को रेखांकित कीजिए
दंगाइयों को कपड़ों से पहचानने का
सचित्र वर्णन कीजिए

एक प्रतिबद्ध दंगाई की प्राथमिकताएं बताइए
अग्निशमन यंत्र और देशी कट्टे का रेखाचित्र खींचिए
' आभासी भय और दंगा ' 
इस वाक्य की दंगों के संदर्भ में
विस्तार पूर्वक व्याख्या कीजिए
दंगों में प्रयुक्त हथियारों के प्रकार लिखिए
ईट फेंकते दंगाई का भाव चित्रण कीजिए

इस तरह के दंगा केन्द्रित प्रश्न अभ्यास से
अपने कुछ मौलिक प्रश्न तैयार कीजिए ।
                 

  
हमारे मतलब उनके विचार
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हम चाहें तो 
घंटा भर में रास्ता खाली करवा सकते हैं
हम चाहें तो डंडा बजा सकते हैं
आपको पता होना चाहिए 
कि हमने अभी तक कुछ चाहा नहीं
आप अगर कहें तो हम 
यहीं खड़े - खड़े आपका न्याय कर सकते हैं
जब- जब भी न्याय नहीं हो पाता
तो जो होता है वह अन्याय ही होता है

दो महीने से कोई बैठा - बैठा न्याय मांग रहा है
तो न्याय मांगने की भी एक हद होती है
अब आप ही बताओ
किसी भी तरह के नागरिक को 
अपने भीतर की घुटन से बचने के लिए
भारत सरकार ने सड़कें थोड़े ही बनवाईं हैं
कि जब जी चाहे यहां आकर बैठ जाएं
और अपने भीतर की बेचैनी दूर करें

हम गोली भी चलवा सकते हैं 
( हालांकि हम चलवा भी चुके हैं )
पर न्याय नहीं कर सकते
हम बुर्के पर चुटकुले बना सकते हैं
आंदोलन में बच्चो के इस्तेमाल पर
भावुकता से भरा वक्तव्य दे सकते हैं 
कह सकते हैं आपके खाबिंद घर पर हैं
और आप मोहतरमा आप 
आप यहां चौराहे पर आकर बैठी हैं ।

हम अच्छी तरह जानते हैं
और धार्मिक पुस्तकों में भी लिखा है
कि स्त्री की जगह घर में ही है 
पढ़ने और लड़ने की जरूरत नहीं
कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं
न नागरिक कभी थीं 
न नागरिक अभी हो
स्त्री के सड़ने की जगह घर में है ।

नया भारत बन रहा है
...........................

लाचारों की भीड़ में से 
चिन्हित किया जा सकता है आपको
संभव है बगैर सहमति और मर्जी के 
आप ट्रायल पर ले लिए जाओ
नव निर्मित बैक्सीन का टीका
कोई आपके कूल्हे पर ठोककर चला जाये
बन गई है जो बनी हुई व्यवस्था 
इस व्यवस्था ने कितना आसान बना दिया है
कि वे जब चाहें छीन सकते हैं
गरीब-गुरबों से जीने का प्राकृतिक अधिकार 

आप अब नए भारत के नागरिक हैं
इसे डिजीटल इंडिया भी कह सकते हो
यहां आपकी बग़ैर मर्जी के 
सरकार आपका भला कर सकती है
इन्कार करने का 
विकल्प नहीं रहा आपके पास
घंटा और शंख बजाने के विकल्प ज़रूर खुले  हैं

पता नहीं क्या-क्या होने लगा है इन दिनों
एक सुरीले गले वाली  स्त्री 
बार-बार  फ़ोन मिलाती रहती है और फिर फिर
शून्य ब्याज दर पर लोन लेने की सलाह देती है 
वर्क ऐट होम पर सुबह से ही एक पिता 
अपने बेटे को काम करता हुआ देखता है
और उसे एक अंजाना असुरक्षाबोध 
दबे पांव आकर दबोच लेता है
इन दिनों जिस खबर को पढ़ने  को 
आप अखबार खोलते हो
उसी खबर को अखबार से गायब पाते हो

छल बढ़ रहा है
जहां पहले से ही अघोषित कर्फ्यू था
वहां और पुलिस बल बढ़ रहा है
आप सरकार से असहमत नहीं रह सकते 
इस जनतन्त्र में आपको हुंकारें भरने
और जय बोलने का नियमिय अभ्यास होना चाहिए
भीतर एक राष्ट्रभक्ति की लौ जलती रहनी चाहिए 
आपके मन में राष्ट के प्रति
सकारात्मकता और आस्था का भाव होना  चाहिए 

बन रहा है नया भारत
नए भवन , नए पथ , नए कानून बन रहे हैं
खुलता जा रहा है विकास का दरवाजा 
यहां से आप स्मार्ट सिटी में प्रवेश करेंगे 
आप देर रात घर के पलंग पर ही सोयेंगे 
पर सुबह न्यू इंडिया में खुलेगी आपकी आंख ।

                 

       हरिओम राजोरिया

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युद्ध करूणा का अंत है

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