अस्मिता और पहचान की राजनीति ने देश को न सिर्फ धार्मिकता और अंधविश्वास के गर्त में ढकेला, बल्कि जाति और श्रेष्ठता बोध के रास्ते हमें काफी संकीर्ण और संकुचित भी बना दिया . यह यही न संभल कर , इस कदर हमें तुच्छ और तुष्टिकरण के मार्ग में ले गया है कि हम जातिवाद जातिबोध के बैनर उठाये हिंसक हो बैठे हैं. यह समाज के लिए अनुपयोगी तो है ही देश को तोड़ने वाला भी है. साथी हिमांशु कुमार का यह पोस्ट विचार और दृष्टि से आज पुनर्विचार की मांग कर रहा है कि हम कुछ तो सुधरें कुछ तो बदलें .
________________________________
अस्मिता और पहचान की राजनीति की एक सीमा होती है,
दलित अस्मिता,आदिवासी अस्मिता, अल्पसंख्यक अस्मिता आन्दोलन की ज़रुरत तो है,
लेकिन इंसान को अस्मिता के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए होता है,
दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक को रोज़गार,शिक्षा तरक्की की ज़रुरत भी है,
अस्मितावादी आन्दोलनों के साथ मेरे दोस्ताना सम्बन्ध रहे हैं,
मुझे यह देख कर बेचैनी होती है कि इन आंदोलनों में कुछ लोग अतिवादी हो गए हैं,
ये लोग अपनी समूह अस्मिता के अलावा दूसरी अस्मिता और पहचानों से नफरत करने लगते हैं,
यहाँ तक कि मैंने कुछ दलित अस्मितावादियों में जाटव कार्यकर्ताओं को बाल्मीकियों के खिलाफ लिखते देखा है,
अनेकों कार्यकर्ता तो इतिहास के बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं,
व्हाट्सएप पर गलत जानकारियों से भरे मेसेज पढ़ कर उनकी नफरत और गहरी हो गयी है,
जाति मुक्त और साम्प्रदायिकता मुक्त समाज बनाने की जगह जातिगत घृणा फैलाई जा रही है,
गांधी के खिलाफ भयंकर माहौल बनाया जा रहा है,
पिछले दिनों भंवर मेघवंशी भाई बता रहे थे कि गांधी की मृत्यु के बाद अम्बेडकर साहब वहाँ पहुँच गए और आधी रात तक वहीं गांधीजी के शव के पास बैठे रहे,
आंबेडकर साहब गांधी की शव यात्रा में पैदल चल कर गए,
लेकिन आज संघी गांधी के खिलाफ कम ज़हर उगलते हैं खुद को अम्बेडकरवादी कहने वाले गांधी के खिलाफ ज्यादा घृणा फैला रहे हैं,
कई बार खुद को अम्बेडकरवादी कहने वाले जाकर भाजपा और शिव सेना में शामिल हो जाते हैं,
अम्बेडकर जातिनाश चाहते थे,
लेकिन कुछ लोगों ने अम्बेडकर को किसी ख़ास जाति की दूकान में बिकने वाले माल की तरह एकाधिकार कर लिया है,
मेरा जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ क्या यह मेरा अपराध है ?
क्या इसलिए मैं अम्बेडकरवादी नहीं हो सकता क्योंकि मैं किसी ख़ास जाति में पैदा नहीं हुआ ?
कुछ लोग तो इतना ज़हरीला लिख रहे हैं और सारी ज़िन्दगी आदिवासियों दलितों और अल्पसंख्यकों की समानता के लिए काम करने वाले और कुर्बानियां देने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की जातियों के कारण उनकी आलोचना कर रहे हैं,
यह तो जातिवाद को बढाने वाली हरकत ही है,
देश भर के वंचित और शोषित लोगों की समस्याओं को समझना और उनके आन्दोलनों की आपसी एकता एक ज़रूरी काम है,
लेकिन ऐसा करने की बजाय अगर आप नफरत फैलाने को फायदे का काम समझ रहे हैं,
तो आप अपने न्याय की लड़ाई को ही नुकसान पहुचाएंगे,
No comments:
Post a Comment