Friday, March 26, 2021

गोरख पाण्डेय : उसको फांसी दे दो

भक्त तो तब भी रहे ! पर जिस तादाद में वे पनपे आज हैं कुकुरमुत्तों-सा ;और फिर जो अपने कायरता और बर्बरता का मुज़ाहिरा कि नंग‌ई प्रदर्शन अब कर रहे हैं ; उसके लिए यह कहना लाज़िम है कि गोरख पाण्डेय हिंदी कविता के एक अति विशिष्ट और कालजीवी कवि हुए ! कि उनकी यह कविता कितनी खरी और सच्ची है आज !!  नहीं तो इतने दिनों बाद क्या यह कविता पहले से भी अधिक सघन , घनीभूत और सजीव प्रतीत होती ? बिल्कुल नहीं ; परन्तु ऐसा हो रहा है , ऐसा हुआ !!! तो यह गोरख पाण्डेय की दृष्टि संपन्नता चेतना का प्रभाव है । आज जिस संभावित खतरे को आप हम देख रहे हैं कि समझ पा रहे हैं , उसे गोरख बीसियों बरस पहले किस शिद्दत से महसूस किए कि यह कविता भी उतरी ; आप भी पढ़िए हमारे समय के प्रगतिशील जनवादी सांस्कृतिक मूल्यों के प्रिय कवि गोरख पांडेय को

        उसको फाँसी दे दो 
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उसको फांसी दे दो
वह कहता है उसको रोटी-कपड़ा चाहिए
बस इतना ही नहीं, उसे न्‍याय भी चाहिए
इस पर से उसको सचमुच आजादी चाहिए
उसको फांसी दे दो।

वह कहता है उसे हमेशा काम चाहिए
सिर्फ काम ही नहीं, काम का फल भी चाहिए
काम और फल पर बेरोक दखल भी चाहिए
उसको फांसी दे दो।

वह कहता है कोरा भाषण नहीं चाहिए
झूठे वादे हिंसक शासन नहीं चाहिए
भूखे-नंगे लोगों की जलती छाती पर
नकली जनतंत्री सिंहासन नहीं चाहिए
उसको फांसी दे दो।

वह कहता है अब वह सबके साथ चलेगा
वह शोषण पर टिकी व्‍यवस्‍था को बदलेगा
किसी विदेशी ताकत से वह मिला हुआ है
उसकी इस ग़द्दारी का फल तुरत मिलेगा
आओ देशभक्‍त जल्‍लादो
पूंजी के विश्‍वस्‍त पियादो
उसको फांसी दे दो

गोरख पाण्डेय

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