दो पाटों के बीच पीस जाने के त्रासद सच को शीलकांत पाठक जितनी बखूबी से इन कविताओं में उजागर किए हैं , वह अतुलनीय है । विगत काफ़ी दिनों से वे मेरे राडार में थे । इस बीच उन्होंने जितनी भी कविताएं हिन्दी के पाठकों को दी , उसे लेकर मैं एक पाठक के तौर पर माइंड ब्लोविंग अनुभवों से गुजरा । प्रतीकात्मक बिम्ब , सांकेतिक उपादानों में हमारे समय के सच , संताप, संघर्ष और जिजीविषा को उबार लाने के सामर्थ्य से लैस उनकी इन कविताओं में निरपराध होकर भी आत्मबोध से उपजी आत्मग्लानि है । अपनी सीमा से आगे बढ़ कर , अपेक्षित और वांछनीय नहीं दे पाने की पीड़ा और मलाल है । आत्मश्लाघा , आत्ममुग्धता प्रभावहीन है । विचारधारा के प्रति तन्मयता व मनुष्य के प्रति तादात्म्यता ने उनमें अकूत धैर्य तथा वह विश्वास दिया है कि वे आक्रामक होने के बाद भी भाषाई और मुद्दई हैं । उन्हें जो कहना है , कह रहे हैं और ठहर नहीं रहे । नाउम्मीदी में उम्मीद , भय व संशय के बाद भी जीवन के संघर्ष पथ पर अडिग हैं । कहना न होगा कि बेहतर भविष्य की तलाश , जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्थावान जीवन शैली ही जन भाव रहे हैं । पारंपरिक स्त्रोत , साधन , संपन्नता का निर्माण क्रियाशील मनुष्य का स्वभाव है । परन्तु इन दिनों जनतांत्रिक मूल्यों के हनन ने एक ऐसे स्पेस का विनिर्माण किया है कि जन पराजय की स्थिति में है । बहुत दुखी और असहाय तथा असहज महसूस कर रहा है । लेकिन यह अच्छा है कि वह ठहर नहीं रहा है तथा उस त्रासद सच के प्रति और मुखर हो शाहीन बाग पर अथवा उसके तर्ज पर सीएए , एनआरसी एनपीआर कि किसानों के आंदोलन के साथ , विरोध में लोग घर से बाहर आए हैं , इस दास्तां को कवियों ने अपने काव्य विषय बनाए तो अभिजन को अपनी भाषा में लपेटे में भी लिया है । इन अर्थों में शीलकांत पाठक एक रूग्ण ,अवसाद और भयग्रस्त मानसिकी के विरूद्ध एक चेतना संपन्न व साहस से भरे हुए कवि हैं । उनका कथ्य , काव्य भाषा , शिल्प , बिम्ब विधान में वैविध्यता इतनी अधिक और प्रचुर है कि इतिवृत्तात्मकता के रास्ते समसमायिक संदर्भ अपने समकालीन यथार्थ बोध में साफ़ दृष्टिगोचर होता है । शीलकांत पाठक की कविताएं जरूरी नागरिक दायित्व बोध की कविताएं हैं , जागरण की कविताएं हैं , मानवीय संवेदना और उन्हें अधिकार संपन्न बनाने के संघर्ष से लैस ह्रदयहीनता के विपरीत ऊर्जावान मनुष्य की कविताएं हैं । सस्नेह आभार
।। विश्व-ग्राम के श्रेष्ठ नागरिक ।।
इस
सारे खेल में
जो
जनता के लिए है
वही
आश्चर्यजनक रूप से
गायब है
है भी तो
लड़ाकू मुर्गों की तरह
पंजों में
जिनके
एक-दूसरे के
विरुद्ध
तीखे फल वाले
चाकू
बाँध दिए गए हैं
और
उन्मादी अफीम की
अधिकतम उत्प्रेरक खुराक
दी गई है
लड़लड़कर लहुलुहान हो रहे हैं
वे
मालिक के लिए
कभी अंधेरी-रातों में छिप
डरते-डरते
वार करने वाले शैतान
अब दिन-दहाड़े
इंसानियत का मानचित्र
बेधड़क
बदलने लगे हैं
विश्व-ग्राम के
नये नक़्शे में
पुराने संकेत-चिन्ह
हटाकर
नए-नए लिए जा रहे हैं
शैतानियत और इंसानियत
एक ही संकेत-वर्ग में रखे गए हैं
और हृदयहीन ,
सहृदय-निवेशक की
परिभाषा में
विश्व-ग्राम के सर्वश्रेष्ठ-नागरिक
घोषित किये गए हैं
सब कुछ खरीद लेता है
एक
सहृदय-निवेशक
आकाश-हवा-पानी-बुद्धि
नहीं भी बिकना चाहेंगे
आप,
तो
आपके
नीचे की
आधार-जमीन खरीद लेगा
अधर में लटका देगा
आपके
समूचे इंसानियत भरे अस्तित्व को
ऐश्वर्यशाली इंद्र के
विचारहीन-गुण
गाने पर ही
आपका त्रिशंकु
उस स्वर्ग में प्रविष्ट होगा
और
तारीफ यह कि
विकास की तबाही का
बैरंग डाक
जबरन डाल
विश्व-ग्राम का
अर्थ-लोलुप डाकिया
जो कि एक
पण्य-केन्द्र में परिवर्तित हो चुका है
जुर्माना
हमारी ही
बदहाली से
क्रूर-निर्ममता से
वसूल रहा है
सत्ता, संस्कृति और निवेश के
मयखानों में
बेहोशी की हद तक
बेतहाशा
पी रहे हैं
अपने ही आत्मीयजन
पुनर्निर्माण की
" ट्रिस्ट विद डेस्टिनी " की
इस अघोषित महान
पुण्यबेला में
मदहोशी के दुष्कर्मों का
देह-विष
राष्ट्रात्मा की
अंतरात्मा के अतिसुरक्षित
" रस गगन झरै " जन की इयत्ता तक
धीरे-धीरे
धीमा पर निश्चित मृत्युकारक
देह विष फैल रहा है
जिव्हा के
स्वाद-निमित्त
की गई गलतियाँ
कितनी तकलीफ देती है
मछली के कांटे-सी
गले में फँस आज
राष्ट्र-जीवन का उन्मुक्त श्वास ही
हमसे छीने लेती है !
।। राजपुत्रों का यशोगान...।।
हमने
अमृत पान किया
और
सूर्य पर अधिकार किया
हमने
अमृत पान किया
और
चन्द्र को तमाछन्न किया
हमने
वृहस्पति से विद्या सीखी
और
गुरु पत्नी से जार किया
हमने
धरती की सौगंध ली
और
उससे उप पत्नी सा व्यवहार किया
हमने
राजसूय यज्ञ किया
निरीहों की बलि चढ़ाई
हमने
मिडास की तरह
नि: स्वार्थ आत्माओं को छुआ
और
उन्हें
ठोस सोने में बदल दिया
हमने
रोटियां सेंकी
जिनसे
खून टपकता था
हमने
जरूरतमंदों को
महल में बुलाया
उनकी
मजबूरियों से
बलात्कर किया
हमने
दस सिरों को
धारण किया
दसों दिशाओं में
भ्रांतियां
फैलाईं
दसों दिकपालों से
जी हुजूरी करवाई
पैरों तले
उनके सम्मान को
दाबे रखा
हमने
अपनी नाभि में
अमृत कुंड
स्थापित किया
और
अमृत कुंड की स्थापना को
अवैध घोषित किया
हमने
अपने
तृप्त पेटों पर
हाथ
फेरते हुए
भूखों
की
अनवरत मृत्यु पर
शोकगान गाया
रेशमी वस्त्र
पहनकर
नंगों की
शोकसभा को
संबोधित किया
हमने
अपने
महल के किनारे
बसी झोंपड़ियों को
बेदखल कर
बेघरों को
घर
देने का
वादा किया
हम हैं
कभी न अघाने वाले
रक्त चूषक
राज पुत्र
हमने
जो किया
आज तक
किसी ने
नहीं किया
।। चुप रहो ।।
चुप रहो
कि देश
जाग रहा है
चुप रहो
कि लपटें
नाच रहीं हैं
चुप रहो
कि आंच
तेज बहुत है
चुप रहो
कि सख्तियां
बेरहम हैं
चुप रहो
कि सपने
टूट रहे हैं
चुप रहो
कि इंसानियत
हांफ रही है
चुप रहो
कि कोई
कांप रहा है
चुप रहो
कि कोई
कांख रहा है
चुप रहो
कि कोई
राख हुआ है
चुप रहो
कि देश अब
जाग रहा है !
।। मि. मिनिस्टर ।।
जबकि यहां
फोटो का
कोई भी
प्रबंधन नहीं है
क्या इसीलिए
मि. मिनिस्टर
आप
इस
बीमार-लाचार-निराधार बच्चे को
आज
पुचकारेंगे भी नहीं
जबकि
यहां पर केवल
हम दोनों ही हैं
और
आपकी सुरक्षा का
भयानक एकांत है
मि. मिनिस्टर
अब बता ही दें कि
शराबबंदी---
नोटबंदी की तरह
रातों रात
क्यों लागू नहीं हो सकती
पीनेवाले या
पिलानेवाले
किसके मन में खोट है !
जबकि
रात्रि के
रति-एकांत में
आप
धर्म के बारे वस्त्र
उतार चुके हैं
मि. मिनिस्टर
यह तो बता ही दें कि
जब श्रीराम ने
शरणागत विभीषण को भी
रावण की लंका में
वापस भेजने का
मंतव्य नहीं दिया
तब
वापस भेजने वाला
यह निरर्थक
शोरोगुल क्या है !
जबकि
रूस के पास
हमसे ज्यादा युद्धास्त्र थे
पर रोजगार नहीं थे
---अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी
अपने ही भार से वह
खुद ढह गया
मि. मिनिस्टर
अर्थ और रोजगार को छोड़
हमें
किस मोर्चे पर
अब
लड़ना है
मि. मिनिस्टर
बतायेंगे प्लीज---
---हमें सोने की चिड़िया बनना है
---शेर बनना है
---सवा शेर बनना है
---(अ) धार्मिक भक्त बनना है
---या रिमोट कहीं और हो
ऐसा डिजिटल बनना है
आपकी प्रिय जनता को
भारी भ्रम है
बता ही दें प्लीज !
।। तेज मिजाज का समय ।।
लिहाज का
समय चला गया
यह
मिजाज का
समय है
गर्म मिजाज का
तेज मिजाज का
खौलते मिजाज का
एक उठे हुए
पंजे वाले
शेर का
समय है
यह
शेर के
शिकार-भोज में
शामिल
हो जाने का
समय है
यह
उसूलों के
रोस्टेड-टांगों को
प्रेम -पूर्वक
मजे लेकर
खा
जाने का
समय है
यह
दुर्दांत
जिन्न के
ऐतिहासिक
पिरामिड से
निकल आने का
समय है
अब
भयानक युद्ध से
विरत हो
शांत हुये अशोक
के
चिन्हों-शांति स्तूपों
राहगीर का
अभिनंदन करती धर्मशालाएं
प्यास बुझाते प्याऊ
छाया देते
घने
आत्मीय
वृक्षों का
समय नहीं
यह
ज्ञान के
शांति के
प्रबुद्धता के
बोधिवृक्षों का समय नहीं
यह
बहसों से निकले
निष्कर्षों का
समय नहीं
यह
उस
ऋषि का
समय नहीं
जिसने
सिकंदर को
निर्बाध सूर्य-किरणों की राह से
हटने
कहा था
यह
युद्धरत अशोक का
समय है
यह
माफ करने का
समय नहीं
यह
पुराना लिखा
सब
साफ
करने का
समय है
अगर
साफ ही
करने का
समय है
तो
यह
दिमाग के
प्रकोष्ठों में
पुराने बुने
असामाजिक
जालों को
साफ
करने का
समय
क्यों नहीं !
।।काबुल के बाजार में नीलाम ...।।
सच
शपहले जो था
रोटी
मेहनत से कमाया
हो गया है अब
डिब्बाबंद जूस
अधिकतम कमीशन देते
झूठ का
विज्ञापन करता
जगह-जगह
सुभाषितों से सजी
ऊर्जस्वी एक कक्षा
पढ़ते थे हम सभी जिसमें
आज
अपनी ही फटी बनियान को
डस्टर बना
पोंछ रहे हैं हम
अपनी सारी स्थापनाएं
गाढ़े रंग की एक
विज्ञापित शर्ट
और कन्ट्रास्ट की
खूबसूरत केप पहनकर
कम्प्यूटर की स्क्रीन पर
हम लिखते हैं
इन्डिया
फिर उसकी समस्याएँ
और
बिन प्रयास
उभर आये समाधान को देखकर
अचरज करते हैं
कि इतिहास में
यह देश
क्योँ पीडि़त रहा
न सुलझ पानेवाली
भीषिकाओं से
तैमूरलंग के घोड़े
दौड़ रहे हैं सरपट
इतिहास से भविष्य तक
दिल्ली और
सूबाई राजधानियों में
कम्प्यूटर स्क्रीन के बाहर
उसकी सेनाएँ
गाँवों को
फसलों को
रोजी-रोटी को
स्वावलंबन को
संतोष को
सत्यवृत्ती को
सत्य बुद्धि को
जला रही हैं
स्क्रीन के बाहर
पूज्य मानसिक मूर्तियां
तोड रहे हैं लुटेरे
देश-स्थापत्य के
सज्जित नीति-स्तम्भ
तोड़कर
लादे जा रहे हैं
कूबड़ वाले ऊंटों पर
एक दिशाहीन
रेगिस्तानी सफर के लिए!
और काबुल के बाजार में
नीलाम करने के लिए हमें
किसने किया
ये सरंजामे-सफर है
और
इस बार
सफर में
निकलने के पहले
सुघड़ जीवन के लिए
माँ से की गई
कोई भी प्रतिज्ञा
साथ नहीं है
माँ का ममतालु
संतोषी और धैर्य भरा
सत्तू भी साथ नहीं है
पिता के लगाये
पेड़ों की छाया
साथ नहीं है
और
राह में
पड़नेवाली नदियों में
पवित्र-तर्पण-मोक्ष-मुक्ति-स्नान का
कोई
मूल्य-संकल्प भी साथ नहीं है
और सबसे बड़ी बात
नीलाम हो जाने के बाद
फिर इसी घर लौटकर
आने की कोई गांठ भी
मन में
बँधी(-खुली) नहीं है
हम समय को
बिना समझे
टॉलस्टॉय के कहानी के पात्र की तरह
न लौटने के लिए
बेतहाशा दौड़ रहे हैं!
दुस्साहस
-----------
मेरा दुस्साहस देखिए कि
जब बड़े-बड़े युद्धक जहाज समुद्र में उतारे जा रहे हैं /
मैं बांस की टोकरी से नदी पार जाना चाहता हूं /
जब अट्टालिकाओं की भव्यता से भी लोग संतुष्ट नहीं हैं /
मैं दर्जिन चिड़ि के घोंसले को देखकर खुश हो रहा हूँ /
जब ऊंचे से ऊंचे रेस्तरां के नान रोटियों में भी लोग नुख्स निकाल रहे हो/
मुझे भुने शकरकंद और आम- पनहा की बेइंतिहा याद आ रही है /
जब अतिव्यस्तता और समयाभाव से लोग विकल हैं
मैं नदी या झरने के किनारे लेटकर पूरा दिन गवां देना चाहता हूं
जब पेट्रोल पंपों /शराबखानों के आवंटन में लोग अपनी समस्त प्रतिभा को झोंक रहे होते हैं /मैं गुलाब-छडियां बेचनेवाली बुढ़िया के पास पीपल-छैयां में बैठकर बतियाना चाहता हूं
जब लोग शहरी चौराहों पर
अपने पार्टी नेताओं की मूर्तियां लगाने झगड़ रहे होते हैं /
मैं निंदाई के लिये खेत की ओर जाते हुए /
झुर्रियों भरे बूढ़े हलवाहे की अदम्य जिजीविषा को देख खुश होता हूँ
।। घृणा के महा-अरण्य में दृश्य-दर्शन।।
खंडहरी
लोकतंत्र के
गर्भगृह से
गायब है
इष्ट-मूर्तियां
वेदी पर
ऊपर
हंसते हैं
देव
निष्प्राण
अप्रतिष्ठ हंसी
घृणा के
महा-अरण्य में
घूम रहे
हिंस्त्र-महापशु
यत्र-तत्र-सर्वत्र
लोकतांत्रिक-खंडहर का
भग्न-कलश है
जन- मन
अवगुणों का
प्रायोजित
प्रमोटेड
रम्य-पर्यटन-महा-अरण्य
हम
तमाशबीन
ढूंढते हैं
बुद्ध की शांति
महावीर का तप
शंकर का अद्वैत
पंचतारा पर्यटक-सुविधाओं को
भोगते
देखते हैं
अशोक चिन्ह का
संरक्षित सिंह
रक्त-पिपासु हो
हममें से ही
किसी एक का
फुर्ती भरा शिकार
करते हुए
खुश होते
लौटते हैं
पर्यटन-महावन से
दैखकर
अपने ही
विनाश का
भव्य-शिकार-सौंदर्य
धन्य ! धन्य ! धन्य !
लोकतांत्रिक -हिंस्त्र -महाअरण्य
वोटतंत्र
----------------------------------------
" लांग लिव द न्यू किंग "
उत्तर आजादी के
राज-सामंत
अमर रहें
उनके
पुत्र-पौत्र
फलते-फूलते रहें
वोट
देने के लिए
उन्हें
अपनी
झुलसी-कलिकाओं के साथ
जैसे-तैसे
हर हाल में हम
बचे रहें
इंद्र के पुत्र
जयंतों की
जय हो
चोंच मारने के
सारे अपराध
उन्हें
क्षम्य हों
दिन-ब-दिन
चेहरे उनके
सुर्ख रम्य हों
उनकी सत्ता
और
अपना गर्त
हमारे
काम्य हों
उनका शासन चले---धन्य हों
भले ही हमें
दुखी होना---इसकी कीमत हो
पर वे
उत्तरोत्तर
आनंदित हों
हम
झुकती कमर के साथ
वोट डालें
गुजरती उमर के साथ
वोट डालें
मोहग्रस्त हो
वोट डालें
अंधभक्त हो
वोट डालें
शून्य विवेक हो
वोट डालें
धर्म स्थलों में
धर्म की
मीटिंग कर
वोट डालें
यह हमारा धर्म है
मन से जिन्हें
अस्वीकार कर चुके---
उन्हीं को
स्वीकार करने
हम
फिर
वोट डालें
लांग लिव द न्यू किंग
हम
चाहे मरें
केंसर-ग्रस्त
राजनीति
अमर हो
उत्तर-आजादी के
राजसामंत
अमर हों
उनके
गर्भस्थ-संतानों के प्रति भी
हम
राजभक्त
इतनी हंसी
------------------------------------------
इतनी हंसी
कहां से
लाती हो
प्रिये !
मैंने
कितने बंधनों में
तुम्हें
जकड़ा
तुम्हारी
हर सौजन्यता पर
अकड़ा
तुम्हारे
हर समर्पण पर
बिफड़ा
तुम्हारी
रुचियों को
अपराध समझा
इच्छाओं को
नजरबंद किया
स्वप्नों पर
अध्यादेश लाया
आवाजाही पर
टोल टैक्स लगाया
रोजगार की खुशियों का
विमुद्रीकरण किया
पर
इस हंसी के सहारे
तुम
हर मुश्किल से
निकल आईं !
इतनी हंसी
कहां से
लाती हो प्रिये !
तुम
हर मुश्किल पर
एक
सच्चे
देशवासी की तरह
हंसती ही
रहती हो !
यह
देश भी
तुम्हारी ही तरह
हंसते ही रहता है प्रिये !
इतनी हंसी
कहां से
लाती हो
प्रिये !
वह चुप है
-----------------------------------------------
वह चुप है
क्योंकि अभी अवसर नहीं आया
वह चुप है
क्योंकि यह सही अवसर नहीं है
वह चुप है
क्योंकि अभी समय बुरा है
वह चुप है
क्योंकि कोई सुन नहीं रहा
वह चुप है
क्योंकि हर कोई बोल रहा
वह चुप है
कि कोई बोल क्यों नहीं रहा
वह चुप है
क्योंकि उसे ऐसे कहा गया
वह चुप है
क्योंकि शोर में उसकी धीमी आवाज दब जाती है
वह चुप है
क्योंकि उसकी तेज़ आवाज़ खुद एक शोर है
वह चुप है
क्योंकि उसकी कोई सुनता नहीं
वह चुप है
क्योंकि उसके पास प्रश्नों के जवाब नहीं
वह चुप है
क्योंकि उसका मौन विरोध है
सभी चुप हैं
क्योंकि बोलने वाले को ऐसा न लगे
कि विरोध हो रहा है
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